>दिग्भ्रमित वो होते हैं जिनके मन में एक साथ कई दिशाओं में जाने की लालसा हो

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मेरी एक पोस्ट को लेकर लगाये गए आरोपों का जवाब :-

रिश्तों की उलझन इंसान की बहुत बड़ी कमजोरी रही है । कोई इन्सान एक छोटे से कसबे के ग्राम्य जीवन से निकल कर नागरीय जीवन में आता है तो यह उलझाव निरंतर बढ़ता ही जाता है । कौन अपना ? कौन पराया? किस पर विश्वास करें ? किस पर ना करें ? , ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो शायद खो जाते है ।आपके पास के कुछ लोग भरोसा तोड़ कर मतलब निकाल चले जाते हैं। जी, आपके दिमाग को बगैर खपाए बता देता हूँ कि मैं अपनी बात कर रहा हूँ । मेरे साथ भी पिछले एक साल से ऐसा कुछ हो रहा है । कई दोस्त आए और गैर होकर चले गए । पर मैं टूटा नही हूँ । आज भी मेरे सच्चे दोस्तों की संख्या उन चंदलोगों से कहीं ज्यादा है जो कभी मित्रता का दंभ भरते थे । मेरे एक करीबी दोस्त और मार्गदर्शक कहा करते हैं कि ‘जयराम भाई ! एक क्षेत्र के लोगों में प्रोफेसन कहीं न कहीं टकराता जरुर है ।’ ये बात आज मुझे समझ में आई । परन्तु एक बात अब भी समझ से परे है कि मित्रों में कैसी प्रतिद्वंदिता ?

फिलहाल , यहाँ बात ब्लोगिंग की दुनिया की हो रही है । अभी पिछले दिनों ही अपने एक पोस्ट ” सच बोलना मना है का पाठकों के नाम संदेश ” में सामुदायिक ब्लॉग के ऊपर चर्चा करते हुए ,ब्लॉग को लोकप्रिय बनने के शोर्टकट तरीके पर टिप्पणी की थी ।आजकल निंदक नियरे रखने की आदत बहुत कम लोगों में है । सो , उस टिप्पणी को मेरे एक मित्र व्यक्तिगत रूप से लेते हुए धडाधड अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट लिख डाली ।उन्होंने उसे व्यक्तिगत आक्षेप समझ कर जल्दबाजी में मुझे कूपमंडूक करार देते हुए यह आरोप जड़ डाला कि मैंने उनकी देखा देखी ‘ब्लोगिंग’ शुरू की है । तो यह बात कहने की नही प्रमाणित करने की है। गूगल बाबा सब जानते हैं । जरा उनसे पूछ आयें जवाब मिल जाएगा ।

ब्लॉग -जगत के वरिष्ठ साथियों ! निश्चित रूप से मेरा ज्ञान अभी अधूरा है और आप सबों से कम भी । ‘निरंतर सीखना और विस्तृत सोच को पैदा करना’ मैं अपने व्यवहार में शामिल रखता हूँ । कुल मिलाकर , कूपमंडूक तो नही हूँ । मेरे उक्त मित्र ने मुझे अपने ब्लॉग के उद्देश्यों को लेकर दिग्भ्रमित होने की बात कही है । मित्रों , दिग्भ्रमित तो वो होते हैं जिनके मन में एक साथ कई दिशाओं में जाने की लालसा रखते हैं । मेरे चयन में गलती हो सकती है । तुच्छ बुद्धि का प्राणी हूँ , लेकिन इतना आश्वस्त हूँ कि जीवन के लक्ष्यों तक पहुँचने का मेरा रास्ता तटस्थ है । जहाँ तक बात है , मनसा और वाचा से उपर उठने की तो बगैर मन से सोचे , लोगों तक चर्चा को पहुंचाए कर्म की बात बेमानी है ।अच्छे प्रस्तुतीकरण और विवादों के जरिये घटियाँ तथा लोगों को भरमाने वाला माल बेचने की बाजारू प्रवृति का चलन हमारी इस दुनिया में भी जम कर चल रहा है । पैसे भले हीं न मिलते हो पर लोकप्रियता तो मिल रही है न ! अरे नकारात्मक हो या सकारात्मक लोकप्रियता चाहे जैसे भी आए समाज चाहे जहाँ भी जाए हमें क्या ? और भी इस सन्दर्भ में कई बातें जानने के लिए पढ़े – http://janokti.blogspot.com/2009/05/blog-post_9990.html

अंत में , कुछ बातें अपने बारें में और आपसे कुछ सवाल – मुझे अपने विचारों से समझौता कर आगे बढ़ना पसंद नही है । हाँ , औरों के अच्छे विचारों को ग्रहण कर अपनी मानसिक छितिज को विस्तारित करने में सदैव प्रयत्नशील रहता हूँ । पता नही कुछ लोग स्वस्थ संवाद की जगह विवाद पैदा कर चर्चित होने की इच्छा क्यूँ रखते हैं ? दूसरे के कार्यों का श्रेय लेकर कैसे अपनी आत्मा से खिलवाड़ करते हैं ? बाजारू मीडिया से लड़ने की बात करते करने वाले ख़ुद जब उसी मीडिया के फार्मूले “विवाद पैदा कर टी आर पी हासिल करना’ पर चलते हों तो आप स्वयं लडाई और उसके परिणाम का अंदाजा लगा सकते हैं । एक बात साफ तौर पर कहना चाहता हूँ कोई भी सज्जन इसे व्यक्तिगत आक्षेप न माने । क्योंकि किसी ने कहा है – “मतभेद हो सकता है पर मनभेद होना जरुरी नही । “

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