>चीर देंगे वक्त के जिस्म पर लगा हर एक घाव

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जय हिंद , साथिओं !
अभी -अभी हमारे गणतंत्र या लोकतंत्र अथवा प्रजातंत्र जो भी कहें , क्योंकि वो बस कहने भर को हमारा है बाद बाकि इसकी आत्मा अर्थात संविधान तो आयातित ही है ना , का कुम्भ समाप्त हुआ है । वैसे तो यह कुम्भ मेला कम अखाडा ज्यादा लगता है पर अखाड़े की धुल मिटटी की जगह यहाँ भ्रष्टाचार के कीचड़ उछाले जाते हैं । आशंकाओं के विपरीत कांग्रेस का २०० सीटों पर जीत कर आना और यूपीए द्वारा बहुमत से सरकार बनाने को लेकर लोग बड़े खुश दिखाते हैं। बहुत सालों बाद अच्छी बहुमत वाली सरकार देखकर शायद उन्हें भ्रम हो रहा है किअगले ५ वर्ष शांतिपूर्वक मनमोहन सरकार की सुविधाभोगी नीतियों के सहारे गुजर जायेंगे । युवा साथिओं ! अगर आप भी कुछ ऐसा सोचते हैं तो आप ग़लत हो सकते हैं । अरे, आप तो सोचिये , विचारिये , आस-पास उठ रहे झंझावातों की आहट को पहचानिये ! कभी जयप्रकाश तो कभी मंडल -कमंडल के जरिये प्रतिउत्तर देने वाला स्वतंत्र भारत का वो वर्ग एक बार फ़िर क्रांति की जमीन तलाश रहा है । ऐसे युग- परिवर्तकों की संख्या आज भी सैकडों में है जिन्हें सरकार के बनने , नही बनने से मतलब सत्ता से कोई खास फर्क नही पड़ता । संघर्ष को ही जीवन का अन्तिम सत्य मन लेना संभवतः इनके स्वभाव में ही रचा -बसा है । प्रश्न उठता है संघर्ष क्यों और किस हेतु ? उत्तर में हमारे एक बुजुर्ग आंदोलनकारी ने मुझसे कहा ” झूठी बात नही कहूँगा , देश और समाज से ज्यादा यह ख़ुद के लिए है माने स्वान्तः सुखाय। और चित्त ही ऐसा हो गया है कि बगैर इन बातों के हम तो मृतप्राय ही हो जायेंगे । “
लोग अक्सर कहते हुए सुने जाते हैं कि आज के युवाओं के लिए आन्दोलन , क्रांति जैसे शब्द बेमानी हैं । कुछ युवा ऐसे मिलते भी हैं । अक्सर चर्चा के दौरान अधिकांश लोग ‘राम मन्दिर आन्दोलन ‘ की बात करके न केवल संघ को लपेटते हैं बल्कि आन्दोलन की प्रासंगिकता को भी चुनौती दे जाते हैं । समझ -समझ की बात है और हमारे अन्दर ऐसी समझ भौतिकतावादी / यथास्थितिवादी / भाग्यवादी मतों ने पैदा की हैं । तब ऐसे – वैसे समय में यही संघर्षशील लोग परिस्थिति में संतुलन बनाये रखते हैं ।( यहाँ संघर्षशील लोगों का तात्पर्य सड़क पर उतरने वालों की ही नही अपितु उनसे भी है जो इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं , इनके मुद्दे तैयार करते हैं ) तभी तो लोकतंत्र में ऐसे दबाव समूहों की भूमिका को अनिवार्य माना जाता है ।कुछ मानवता के नाम पर अतिउत्साहित युवा अक्सर इन समूहों अथवा संगठनों को समाप्त करने की बात करते हैं । कई लोग इनके ख़ुद ख़त्म होने की भविश्यवाणी भी करते हुए मिल ही जाते हैं । अपने अव्यावहारिक ज्ञान के कारण हम में से कई लोग प्रकृति के संतुलन का सिद्धांत भूल जाते हैं । मुझे ‘मकबूल’ फ़िल्म का संवाद याद आ रहा है जिसमे नसीरुद्दीन शाह कहता है ‘ ” आग के लिए पानी का डर बना रहना चाहिए ” । लगता है , आंदोलनों की काफी गहरे में चले जा रहे हैं । पुनः वापस लौटते हैं चुनाव परिणाम की संतुष्टि में खोये , स्थिर सरकार की निश्चिंतता में सोये राष्ट्र के प्रहरियों को बताने की परिवर्तन ऊंट फ़िर से करवट ले रहा है। भारतीय संविधान के ६० साल पुरे होने वाले हैं । देश भर के अनेकों विचारकों द्वारा वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था की विफलता को लेकर वर्ष भर राष्ट्रीयबहस का माहौल पैदा किया जाने का अनुमान हैं । बाबा रामदेव और पंडित रविशंकर सरीखे आध्यात्मिक गुरुओं ने सक्रीय राजनीति में प्रवेश लगभग कर लिया है। आने वाले एक साल के भीतर ‘राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद’ के विवाद का फ़ैसला आने वाला है । निर्णय चाहे जो भी हो एक बड़ा तूफ़ान तो खड़ा होगा ही । और विश्व हिंदू परिषद् द्वारा ‘राम शिलाओं’ को विवादित भूमि के नजदीक ले जाने की घोषणा से सब कुछ साफ़ हो जाता है । जरा सा गौर से आस -पास की हलचलों पर जोर देन तो आने वाले भविष्य की जो तस्वीर स्पष्ट हो जाती है उसके अनुसार देश एक लंबे अन्तराल के बाद आस्था , राष्ट्रवाद , बढती आर्थिक असमानता आदि मुद्दों के कारण आन्दोलनों की चपेट में होगा । वक्त संक्रमण का शिकार हो चुका है । बदलाव के ऐसे स्वर्णिम अवसर में हमें अपनी -अपनी भूमिका भी तय कर लेनी चाहिए । हमारा” युवा ” भी इस बार कमर कस कर खड़ा है । हर साथी उत्साहित है उधम सिंह और नेता जी की तरह अपने उद्देश्यों को संपन्न करने हेतु । आने वाले समय की तकदीर हम लिखेंगे अपने हाथों से । चीर देंगे वक्त के जिस्म पर लगा हर घाव !
आईये सपथ लें उस मातृभूमि की जिसका दूध हमारी रगों का लहू है । सपथ लें उस समाज का जिसको बदलने का सपना हम देखा करते हैं । जय हिंद !

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