>हमें आप सबों की सहायता चाहिए

>हम कुछ युवा मित्र इन छुट्टियों में एक दस्तावेज तैयार कर रहे हैं । ” भारत-संस्कृति और संभावनाएं ” . दरअसल गुलामी के पिछले २०० वर्षों में हमने खुद को भुला दिया है . भारतीय संस्कृति के संक्रमण काल की शुरुआत तो इस्लामी शासन से ही हो जाता है . लेकिन मुस्लिम शासकों ने सीधे धर्म परिवर्तन और सत्ता में रहने की कवायद में ही समय गुजर दिया . वो भारतीय जनमानस में छुपी संस्कृति के सूक्ष्म तत्वों को नहीं परख सके . जहाँ तक हुआ हमारा प्रभाव उन पर पड़ा . वहीँ अंग्रेजों के शासन काल में सीधे हमला न कर हमारे इन सूक्ष्मतम मूल्यों , हमारे मन में बसे अतीत के गौरव को धीरे -धीरे कम किया जाता रहा और आज हम लगभग शून्य की स्थिति में पहुँच गए हैं . १८५७ की क्रांति के बाद ही वो समझ गए थे कि भारतीयों kee ताकत इनकी सांस्कृतिक एकता और गौरव है . जिस मूल्यों और विचारों के दम पर ये १० हजार सालों से केवल जिन्दा नहीं बल्कि सोने की चिडियां और विश्वगुरु बन कर रहे उसे मिटाए बिना यहाँ पर राज संभव नहीं . तब उन्होंने बिलकुल सुनियोजित रूप में मनगढ़ंत सिद्धांतों के प्रचार से हमारे अन्दर हीनता का भाव पैदा करना प्रारंभ किया . बहुत जल्द ही हताशा में हमें ऐसा लगने लगा हम गलत थे और हमें पश्छिम का अनुकरण करना चाहिए . चाहे वो इंडो-आर्यन सिधांत हो या पश्चिमी मानकों -मूल्यों को कार्य व्यापार में शामिल करना . इस २०० सालों में हम स्वयं को ऐसा भूले कि आजादी के बाद भी उसका स्मरण न आया . हमने सत्ता , शासन , व्यवस्था , शिक्षा , व्यापार हर जगह उनके मोडल को नहीं भूल पाए . हम भूल गए कि चीजे सापेक्ष होती है जो देश- काल-परिस्थिति के हिसाब से संचालित होती है . परिणाम हमारे समक्ष है . आज भारतीय बौधिक जगत में भारतीय पक्ष / भारतीय दृष्टिकोण से विषय -वस्तु को देखने समझने का सर्वथा अभाव है .हमारा यह प्रयास शून्य को समाप्त करने की दिशा में एक छोटा प्रयत्न है . आज की समस्यायों और मसलों का हल भारतीय संस्कृति की परम्परा में ढूंढ़ कर नए रूप में व्याख्यायित करने का कार्य कठिन तो है पर मुश्किल नहीं . हम आज के प्रगतिशील भारतीयों को पीछे लौटने की नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाओ को अपनी संस्कृति में खोजने की बात कर रहे हैं . स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ सालों तक दूसरो की व्यवस्था में जी कर हम देख चुके . संविधान का साठवां वर्ष आने वाला हैं . और व्यवस्था को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी करने की दिशा में दर्जनों विद्वत जन लगे हुए हैं . हम भी इस आन्दोलन में अपनी भूमिका , अपना योगदान चाहते हैं . आप से भी अनुरोध है हमारा साथ दें .
इसके लिए आप सम्बंधित विषयों पर अपने आलेख हमारे मेल jay.choudhary16@gmail.com पर भेजें . ताकि सम्बंधित विषय में एक अच्छा साहित्य उपलब्ध हो सके . जय हिंद जय भारत !
विषय :- परिवार व्यवस्था (सामाजिक सुरक्षा , बचपन की सहज और नैसर्गिक शिक्षा तथा संस्कृतिक मूल्यों के सन्दर्भ में )

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