>मुस्लिम तुष्टीकरण से ज्यादा विकास पर विचार करें मुस्लिम समाज

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१५ वीं लोकसभा का चुनाव के नतीजों से यह आभाष हो चुका है कि युग परिवर्तन के साथ-साथ लोकतंत्र में भी बदलाव होने की पूरी-पूरी संभावना है। ६२ वर्ष पूर्व भारत के चंद महानायको अर्थात नेताओं ने भारतवासियों के सहयोग से अंग्रेजों कि गुलामी की जंजीरों को तोड़ इस लोकतंत्रा का निर्माण किया और अपने आवाम की खुशी को ध्यान में रखकर संविधान का निर्माण कराया ताकि देश के हर नागरिक को समान अधिकार मिल सके। और वे अपना विकास अपने आधर पर स्वतंत्र रूप से कर पाएं ।
एक उस वक्त के नेता थे और एक आज के नेता है। दोनों में कितना अंतर आ गया है, जहां वे मर्यादित ढंग़ से अपने कार्यों को अंजाम देते, जनता के सुख-दुख से जुड़े होते, वहीं आज के नेता बिल्कुल विकृत और विपरित परिदृश्य में नजर आने लगे हैं। जनता का सुख-दुख देखना तो दूर शांति से जीने-मरने तक नहीं देते। कोई शांति से जीना चाहे तो वहां सांप्रदायिक उन्माद उत्पन्न कर देते है, जिससे उनमें असुरक्षा की भावना फैल जाती है । कोई क्षेत्रवाद के नाम पर उत्पात मचाता दिखाई देता है तो कोई जातिवाद के नाम पर। धर्म की तो कल्पना से भी परे। यहां तक की धर्म किसी और का लेकिन पैरोकार होते दूसरे धर्म का। जहां तक रही शांति से बात मरने की तो इस पर भी नेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेकनी शुरू कर दी है। शहीद मोहन चंद्र शर्मा जिनकी आत्मा आज भी व्याकुल और भटकती होगी, यह बताने के लिए कि मैं तो मर ही चुका हूं। जिसने जो किया सो किया अब मेरी आत्मा को तो शांति से जीने दो। लेकिन हमारे नेता इन्हें तो केवल सत्ता की कुर्सी का मोह है, जिसे पाकर वो स्वीस बैंक में करोड़ो की सम्पत्ति को दफना सकें । ताकि स्वीस बैंक वाले जन्नत में उनका सीट रिजर्व कर दें। वहां मखमली सेज बिछवादे। सोने-चांदी की थाली में खाने के लिए उपलब्ध् कराये, मंहगे-मंहगे आभूषण,वस्त्र का इंतजाम कर के रखवा दे साथ ही उनके भोग विलास के लिए शराब-शबाब की व्यवस्था कर दे।
वे सत्ता और पैसे की चमक में इस कदर अंधे हो चुके है कि उन्हें यह नहीं सुझता की मरने के बाद उसे एक तिनका भी नसीब न होगा साथ ले जाने के लिए। हां शास्त्रों में यह जरूर कहा गया है कि इंसान अपनी मृत्यु के बाद कर्म अवश्य ले जाता है जिसका उसके अगले जनम पर खासा असर देखने को मिलता है।
आज पूरे विश्व में आतंकवाद की समस्या है। जिसके लिए खास तौर पर मुस्लिम देश जिम्मेवार है। पाकिस्तान और तालिबान जैसे देश विशेष तौर पर इसके लिए जिम्मेवार दिखाई दे रहे है। क्योंकि वे पूरी तरह मुस्लिम राष्ट्र है। भारत की आबादी तेज रपफ्‌तार से बढ़ रही है और जैसे-जैसे ही मुसलमानों की संख्या में भी गुणात्मक वृद्धि हो रहा है। वैसे-वैसे ही देश में भी अशांति और अस्थिरता का वातावरण बढ़ता जा रहा है। आज इस देश में जो भी नेता आगे बढ़ना चाहता है वो मुस्लिम समाज को अवश्य बैसाखी बनाते हैं। वह किसी भी धर्म या जाति का हो, फ़िर चाहे उसमें सत्ता चलाने की काबिलियत हो या ना हो। वह हर वक्त उन्हें सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करता है। क्योंकि यही धर्म है जो बिल्कुल सीढ़ी के समान है क्योंकि इनमें अनेक जातियां है बावजूद ये आज भी सीढ़ीयों की तरह एक लय में पिरोये हुए है। और बेचारा यह मुस्लिम समाज बस सीढ़ियों की तरह बनकर इन चंद नेताओं के दबाव की मार को सहता और उनकी पैरों तले कुचलता रहता है।
यहीं वजह है कि मुस्लिम समाज ६१ सालों में केवल एक चुनावी ठप्पा बनकर रह गया है। सीढ़ी छाप का ठप्पा जिसके लगने मात्रा से इसका पैरोकार नेता या पार्टी सत्ता को प्राप्त कर अपना उल्लू सीध करता, सत्ता रूपी आम के मीठे रसभरे मलाई का भरपूर आनंद उठाता और गुठलियां इनकी तरफ फेक देता है । आज आजादी के ६२ वर्ष हो चुके है बावजूद देश में पिछड़ा हुआ आज कोई है तो वह मुस्लिम समाज ही है।
आज देश में मुसलमानों के मसीहा पार्टियों में कांग्रेस, राजद, सपा, लोजपा, बसपा आदि का विशेषतौर पे नाम आता है। कांग्रेस तो ६१ सालों से उनका मसीहा बनी हुई है। लेकिन विडम्बना यह रही कि विकास न तो वह मुसलमानों का कर सके न ही देश का। लेकिन उनकी इसी एक तरपफा झुकाव ने भाजपा जैसी हिन्दूत्ववादी पार्टी को जन्म देने का काम अवश्य किया है। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद उसे अल्पसंख्यक बताने की होड़ ने भी भाजपा को हिन्दूत्व का नारा लगाने पर मजबूर किया है।
इस चुनाव में राजनेताओं की बयानबाजियों से तो कुछ ऐसा ही दृष्टिगत हो रहा है। आज भारत में भी पाकिस्तान की तरह आतंकवाद का खतरा बढ़ चुका है, जिससे यहां का वातावरण भी बिल्कुल अशांत हो चुका है। राजनीतिज्ञों की बयानबाजियों से आज हर शख्स घबराया हुआ है। ऐसी विकृत राजनीति में राजनीतिज्ञो की मानसिकताओं और विचारों को देखकर देश के कुछ महानायकों पर रोस भी प्रकट होता है कि देश को उन्होंने क्यों बांटा और बांटा भी तो सही रूप में क्यों नहीं। अगर पाकिस्तान को पूर्ण मुस्लिम राष्ट्र बनाया तो भारत को पूर्ण हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं? यह अन्याय भारतवासियों विशेष तौर से हिन्दुओं के साथ क्यों? लेकिन जो हुआ सो हुआ। अब इसे बदला नहीं जा सकता। हमे देश को इसी रूप में सभी को स्वीकार करने की जरूरत है।
भारत देश का धर्मनिरपेक्ष होना हमारे लिए गौरव की बात है। लेकिन डर यह लगता है कि चंद राजनीतिज्ञों की मौकापरस्ती और मुस्लिम तुस्टीकरण की वजह से यह शांतिप्रिय माना जाने वाला देश जिसका संदेश हर वक्त वसुधैब कुटुम्बकम रहा है, आने वाले वक्त में बिखराव के कटघरे में न खड़ा हो जाये। और यह तब तक जारी रहेगा जबतक आबादी के बढ़ने की रफ्‌तार तेज रहेगी और मुसलमानों में गुणात्मक संख्या में बढ़ोत्तरी होती रहेगी। वह भी उनकी विचार और शिक्षा में शून्यता के साथ।
इसलिए अब मुस्लिम समाज को विचार करने की जरूरत है कि वह विकास पर जोर दे। धर्म की राजनीति करने वालों का मुह-तोड़ जवाब दे। जो राजनीतिक दल विकास का कार्य को दरकिनार कर चुनावी सभाओं में केवल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करता दिखाई दे, उसे वे अपने वोट की ताकत से सबक सीखाने का काम करें। वह पार्टी विशेष से ज्यादा अपने प्रतिनिधियों के चरित्र पर जोर दे। जैसा कि इस चुनाव के दौरान कई सामाजिक संगठनों एवं महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने जनता को अपने संबोधन में कहा। अगर विकास दिल्ली, गुजरात और छत्तीसगढ़ करता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि केवल विकास हिन्दूओं का होगा बल्कि इसका लाभ मुसलमानों को भी होगा। अगर मुस्लिम और पिछड़ों का मसीहा कहे जाने वाले लालू और पासवान ने अपने शासनकाल में बिहार को पिछड़ा बना दिया तो केवल पिछड़े हुए लोगों में हिन्दू या पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं है बल्कि बहुतायत की संख्या में इसके शिकार मुस्लिम समाज भी हुआ है। इसलिए इन तुष्टीकरण करने वाले नेताओं से आज बचने की जरूरत है। खासतौर से मुस्लिम समाज को। क्योंकि इसका लाभ न केवल मुस्लिम समाज को होगा बल्कि इससे देश की प्रगति पर भी खासा असर देखने को मिल सकेगा।
नरेन्द्र ‘निर्मल’

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