>एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूम ….

>एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूम
ट्रिन ! ट्रिन !-टेलीफोन की घंटी बजी
‘हेलो !हेलो! ,बड़े साहब हैं?”
“आप कौन बोल रहे हैं?”
: आफिस से बड़ा बाबू बोल रहा हूँ “
” तो थोडी देर बाद फोन कीजिएगा ,साहब बाथरूम में है “
बड़ा बाबू का माथा ठनका रामदीन तो कह रहा था की साहब आज घर पर ही है तो वह बाथरूम में कब घुस गए हूँ ! साहब लोगों के बाथरूम भी क्या चीज़ होती होगी होती होगी कोई चीज़ मस्त-मस्त हमें क्या!
‘बाथरूम’ का यदि शब्दश: हिंदी रूपान्तर किया जाय तो अर्थ होता है -‘स्नान-घर’ परन्तु जो बात अंग्रेजी के ‘बाथरूम’ में होता है वह हिंदी के ‘स्नान-घर में नहीं “बाथरूम” शब्द से एक अभिजात्य वर्ग का बोध होता है -टाइल्स लगी हुई दीवार ,मैचिंग करते हुए बेसिन ,शीशे- सी चमकती हुई फर्श ,हलकी-हलकी फैली हुई गुलाब की खुशबू की जो कल्पना ‘बाथरूम ‘ से उभरती है वह चिथड़े गंदे टंगे परदे हिंदी के स्नान-घर से नहीं.ज्ञातव्य है की साहब लोगों के बाथरूम में मात्र स्नान कर्म ही नहीं होता अपितु ‘नित्य-कर्म’ का निपटान भी होता है. जन साधारण के लिए ‘साहब बाथरूम में है ” का सामान्य अर्थ होता है कि साहब ‘दैनिक-निपटान-क्रिया ‘ में व्यस्त हैं.
उस दिन श्रीमती जी एक सहेली आई थीं .गोद में ६ महीने का एक बच्चा भी था.थीं तो ‘भृगु-क्षेत्र’ (बलिया) की परन्तु जब से रांची आई है इधर दो-चार अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना सीख रही हैं.
वह अंग्रेजी भी भोजपुरी शैली में बोलती हैं उदाहरणत: -‘जानती हैं भाभी जी इस्कूल-उस्कूल में पढाई-लिखाई नहीं होती हैं न ,गौरमिंट के इम्प्लाई है सब टीउशनवे में मन लगता है
उस दिन सोफे पर बच्चे ने सू-सू कर दिया ,बेचारी सकुचा गई ‘….लो लो लो राजा बाबा ने सोफे पर “बाथरूम’ कर दिया ना..ना..ना.. तब मुझे बाथरूम शब्द का एक और व्यापक अर्थ मिला सत्य भी है- शब्द वही जो श्रोता को अपना अभीष्ट अर्थ सम्यक प्रेषित करे
एक घंटे पश्चात ,बड़े बाबू ने पुन: फोन किया /घंटी बजी ,किसी ने टेलेफोन उठाया बोला-‘अरे! कह दिया न साहब बाथरूम में है ‘ थोडी देर बाद टेलीफोन कीजिएगा …’
बड़े बाबू सोचने लगे कि यह साहब लोग भी क्या चीज़ होते है ,हमेशा बाथरूम में ही बैठे रहते हैं ‘बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया सत्य भी है बड़े बाबू को साहब लोगो के बाथरूम कि कल्पना भी नहीं होगी .होती भी कैसे? गाँव-गिरांव में ऐसे बाथरूम तो होते नहीं.उस कार्य के लिए वहां खेत है ,मैदान है .नीचे खुली ज़मीन है ऊपर आसमान है और शहर में? एक अदद सरकारी क्वार्टर है जिसमे मात्र एक बाथरूम है बाथरूम भी इतना छोटा कि मात्र 5 मिनट में दम घुटने लगता है .अत: जल्दी बाहर आ जाते है दियासलाई का डिब्बा भी उनके बाथरूम से बड़ा होता है. बकौल बशीर साहेब :-
‘पाँव फैलाऊं तो दीवार से सर लगता है’
यही कारण है कि छोटे कर्मचारी बाथरूम में कम ही पाए जाते है. यह बात अन्य है कि उचित रख-रखाव व अनुरक्षण के अभाव में पूरा का पूरा कमरा ही बाथरूम नज़र आता है
मगर साहब लोगो का बाथरूम ? जितना बड़ा साहब उतना बड़ा बाथरूम .अगर श्रेणी चार का आवास है तो २ बाथरूम ,श्रेणी 5 का आवास है तो ३ बाथरूम .अगर निजी आवास है तो कई बाथरूम .हो सकता है कई कमरें में संलग्न बाथरूम हो.जितने बाथरूम होते है उतनी ही दुर्गन्ध फैलती है .ऐसे ही लोग समाज में ज्यादा गंध फैलाते है.कभी यह घोटाला ,कभी वह घोटाला.पास बैठेंगे तो विचारों से भी दुर्गन्ध आती है.फिर बड़ी शान से बताते हैं कि कैसे वह ‘रिंद के रिंद रहे सुबह को तौबा कर ली ‘क्या बिगाड़ पाई सी०बी०आइ० ,कोर्ट-कचहरी या व्यवस्था ?
सूना है हिरोइनों के बाथरूम काफी बड़े व महंगे होते है.लाखो रुपये कि तो इतालियन मार्बल ही लगी रहती है चाहे तो आप अपना चेहरा भी देख सकते हैं बशर्ते कि काले धन से आप का चेहरा काला न हो गया हो
एक बार पढ़ा था कि अमुक हिरोइन के बाथरूम के जीर्णोध्दार मात्र में उस ज़माने में १० लाख का खर्च आया था .अब यह बात डिब्बी वाले बाथरूम के बड़ा बाबू क्या समझेंगे !
वर्मा जी ने अपना बाथरूम बहुत बड़ा बनवाया था .आयकर विभाग में अधिकारी थे .उन्होंने संगमरमरी फर्श के अतिरिक्त काफी साज-ओ-सामान लगवा रखा था .गर्म पानी केलिए गीजर, ठंडे पानी के लिए फ्रिज ,केबुल टी०वी० ,एक बुक-स्टैंड ,कुछ पत्रिकाएँ ,कुछ किताबें ,एक कोने में एक सोफा भी डाल रखा था सुबह ही सुबह अपना मोबाईल फोन व समाचार पत्र लेकर बाथरूम में जो घुसते तो दो घंटे बाद ही निकलते .समाचार भी पढ़ते तो पत्र का नाम -पता-अंक-वर्ष- प्रकाशन संस्करण से लेकर प्रकाशक-मुद्रक तक पढ़ डालते थे
एक अधिकारी थे शर्मा जी . किसी राज्य स्तरीय घोटाले में लिप्त थे .सोचते थे मेरे घोटाले से वर्मा का घोटाला ज्यादा सफ़ेद क्यों.? मेरे बाथरूम से वर्मा का बाथरूम बड़ा क्यों? क्यों वर्मा ने बाथरूम में केबुल टी०वी० फ्रिज टेलीफोन लगा रखा है ? स्साले का बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया
अत: शर्मा जी ने ‘बाथरूम ‘ को बड़ा करने के बजाय बाथरूम को ही अपने ड्राइंग रूम में लेते आये.अब उनका दीवान भी समंजित हो गया .आत्म-तुष्टि हो गई .उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह पहले से ज्यादा स्पष्ट नंगा नज़र आने लगे.पूछने पर कहते हैं ‘…हमने तो छुप-छुपा कर ही घोटाला किया था परन्तु यह सी०बी०आइ० वालों ने नंगा कर दिया .अब बचा ही क्या है छुपाने के लिए ? और बाथरूम में तो यूँ ही सब नंगे होते है .मेरा ड्राइंग रूम ही मेरा बाथरूम है.कितना बड़ा है मेरा बाथरूम ….” और उन्हें मन ही मन अपने बड़े होने का एहसास होने लगा
शायद इसी कारण उनकी सोच ,उनके विचारों में दूषित गंध है उन्हें पता नहीं है.वह स्वस्थ समाज की सुगन्धित हवाओं से परिचित क्यों नहीं हैं.वह अपनी दुर्गन्ध को ही सुगंध मानते हैं.सूअरों को गन्दगी का एहसास नहीं होता .शायद ऐसे ही जगहों पर लोट-पोट कर आनंद प्राप्त होता है.ऐसे लोगो का आतंरिक सौन्दर्य बोध व चेतना मर जाती है.फिर वह बाथरूम के भीतर नंगे हों या बाहर नंगे हो ,अंतर नहीं पड़ता
साहब लोग बाथरूम में करते क्या है? बाथरूम में सभी ‘दैनिक-क्रिया’ का निपटान ही करते हैं /किसी को यह ‘निपटान ‘जल्दी हो जाता है किसी को विलंब से बड़ा साहब है तो बडा समय लगेगा. गरीबो को तो खाने के ही लाले पड़े रहते है क्या खाए ?,क्या निकाले ?आफिस के बाबू किरानी को तो साग-सब्जी पर ही संतोष करना पड़ता है .पेट में कुछ है ही नहीं तो खायेगा क्या निकालेगा क्या. अत: 5 मिनट में ही निवृत हो कर बाहर आ जाता है
और बड़ा साहब ! बड़ा साहब-बड़ा पेट वह खाता है मांस-मछली,मुर्ग-मुस्सलम ,चिली-चिकेन,चिकेन-बिरयानी,…. वह पीता है बीयर,व्हिस्की अगर इस से भी तुष्टि नहीं मिलती तो खाता है चारा ,अलकतरा ,शेयर तोप,पनडुब्बी ,टेलीफोन यूंरिया ,.. इस से भी आगे खाता है गरीबो के मुंह का निवाला ,सड़क,मकान,पुल के ठेके .दूकान के ठेके ,अगर मौका मिला तो आदमी को भी कच्चा खा सकता है ….
जब पेट में इतने गरिष्ठ भोजन हो तो कब्जियत की शिकायत होगी ही.विचारों में गरिष्टता छायेगी ही. फिर फिर ‘बाथरूम में कौन सी पची-अनपची चीज़ पहले बाहर निकले स्पष्ट नहीं हो पाता फिर हो जाता है बवासीर…निकलता है खून जो गरीबो का पीया होता है.
‘ट्रिन ! ट्रिन !! ट्रिन !!! ‘- बड़े बाबू ने फोन किया —‘साहब है ?
‘ नहीं, साहब बाथरूम में है ‘
अस्तु

—आनंद

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