>वर्जिन की तलाश , क्या होगी पूरी ?

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” वर्जिन की तलाश “ यह किसी मोबाईल का एड नहीं है बल्कि जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। आज की इस दौड़ती भागती जिंदगी और पर्यावरण में घुलते रासायनिक जहर ने लोगों में स्वच्छता को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं । जहाँ लोगों को न तो पीने के लिए स्वच्छ पानी मिल पा रहा है और न ही श्वांस लेने के लिए स्वच्छ हवा। यहां तक कि खुद इंसान भी स्वच्छता के पैमाने में खरा नहीं उतर पा रहा है। दरअसल ये बात है समाज में फैलती कुरीतियों की। और पाश्चात्य सभ्यता के बढ़ते चलन की। आज जिसकी चपेट में आकर ज्यादातर पुरुष और महिलाएं अपनी वर्जीनिटी खोते जा रहे हैं।
पाश्चात्य सभ्यता और विकास की आड़ में बनते प्रेमप्रसंग की। लिव-इन-रिलशनसिप, होमोसेक्सुअल रिलेशन और सफलता के लिए कॉम्प्रोमाईज जैसे शब्द, जहां भारतीय संस्कृति को मुंह चिढ़ा रहे हैं वही इसके आम होते प्रचलन ने परिवार वालों की नींदे उड़ा रखी है। दरअसल ऐसे प्रेम प्रसंगों के कई खौफनाक नतीजे आए दिन अखबारों और टीवी पर पढे़ और देखे जाते हैं। जहां प्रेमिका अपनी प्रेमी के लिए पति और प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए पत्नी की हत्या करवा देता है। वही प्राइवेट कम्पनियों में कामकाजी महिलाओं में कॉम्प्रोमाइजिंग का बढ़ता प्रचलन उनकी शादी शुदा जिंदगी को भी काफी प्रभावित करने लगा है। ऐसा नही है कि इस कॉम्प्रोमाइजिंग शब्द का इस्तेमाल केवल महिलाओं एवं लड़कियों को करना पड़ता है बल्की पुरुष समाज भी इससे अछूते नहीं है। इस बात के साक्ष्य आए दिन मीडिया एवं टीवी के धारावाहिक और फिल्मों के माध्यम से लोगों तक पहुचते रहते हैं। मीडिया और फिल्म समाज का आईना हैं, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं , फैशन और फिल्म जैसी इंडस्ट्री ने तो और एक कदम आगे बढ़ाते हुए होमोसेक्सुअल रिलेशनसिप बनाने वाले लोगों का अंबार ही खड़ा कर दिया है। जो देश की संस्कृति पर एक बड़ा बदनुमा दाग के समान है।
ऐसे लोगों का इजाफा तेजी से हो रहा है। सरकार भी अब इसे मान्यता देने पर आमादा है। जिसे लेकर संसद के गलियारों में अच्छी-खासी बहस भी हुई। इधर स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस पर हरी झण्डी देनी शुरु कर दी है। जबकि गृहमंत्रालय ने इस पर खासा ऐतराज जताया। दोनों मंत्रालयों के विवाद ने फिलहाल इस मुदृदे को न्यायालय की सीढ़ियों तक पहुंचा दिया है। कुछ राजनीतिज्ञ इसे भी वोट बैंक का खेल समझकर ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक बताकर राजनीति करने से बाज नहीं आए।
इस पाश्चात्य दिखावे वाले कुकृत्य का असर केवल युवाओं तक सीमित नहीं रहा है। बल्कि आज इसकी चपेट में आकर कई नाबालिग लड़के-लड़किया ऐसा काम कर बैठते है जिसके बाद उनके पास पछतावे के अलावा कुछ नही बच पाता। यहां तक की इसका असर उनके भविष्य पर भी दिखाई पड़ने लगता है। आज इस बात को न्यायालय भी मानने लगी है, जिसे लेकर कड़कड़डुमा की अदालत ने अपने एक अहम फैसले में नाबालिग लड़कियों की उम्र सीमा को बढ़ाने पर सरकार द्वारा पुनर्विचार करने की बात कही थी। उन्हें इसलिए ऐसा कहना पड़ा क्योंकि इसकी वजह से कई बेगुनाह आज भी सलाखों के पीछे हैं।
इस एमेच्योंर प्यार का केवल यहां तक ही असर देखने को नही मिलता बल्कि उनकी की गई नादानी का पूरे परिवार और समाज को भुगतना पड़ता है। बाजार में आते रोज नए-नए एमएमएस इसका जीता जागता सबूत है। साथ ही यह उस प्यार के विश्वास को तोड़ता है जिस विश्वास को मानकर लड़कियां अपनी सबसे बड़ी चीज, जिसे वर्जनिटी कहते है, न्यौच्छावर कर देती है। मगर कभी-कभार उसके साथी की दकियानूसी सोच उस लड़की के हसते-खिलते चेहरे को मुरझाने पर विवश कर देती है। इतना ही नही, आज चाहे फिल्म जगत हो या हमारा मीडिया जगत, जहां पर्दे के पीछे और टीवी पर चेहरे तो जगमगाते नजर आते है, पर सच्चाई यह भी है कि इन जगमगाते चेहरे के पीछे वो फैशन का सच है, जिसे मधुर भंडारकर ने अपने फिल्म में उतारा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि इसे सच्चाई मानते हुए लोगों के वर्जिन पति या पत्नि पाने की आश छोड़ देनी चाहिए। या फिर इसे जिंदगी की कड़वी सच्चाई समझकर इससे मुंह फेर लेना ही समझदारी है। जहां तक मेरी समझ है इसे हादसा समझकर भूलना ही सबकी भलाई है। पर एहतियात इस बात का दोनों पक्षों को रखना चाहिए कि उनकी पिछली जिंदगी का असर आने वाले कल पर न पड़े।

नरेन्द्र ‘निर्मल’

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