>वैसे लोग जो उत्तेजित होते हैं माँ का स्तन देखकर

>


मैं एक अच्छा हिन्दू हूँ
खजुराहो और कोणार्क के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता
कामसूत्र को मैंने हाथ से छुआ तक नही
दुर्गा और सरस्वती को नंगे रूप में देखूं तो
मुझे स्वप्न दोष की परेशानी होगी
हमारे देवी -देवताओं के जननेद्रिय नहीं होते
जो भी थे उन्हें हमने काशी और कामख्या में प्रतिष्ठित किया

कबीर के राम को हमने अयोध्या में बंदी बनाया
गाँधी के राम को हमने गाँधी के जन्मस्थान में ही जला दिया ।
आत्मा को बेचकर इस गेरुए झंडे को खरीदने के बाद
और किसी भी रंग को देखूं तो मैं आग बबूला हो जाऊँगा ।
मेरी पतलून के नीचे छुरी है ।
सर चूमने के लिए नहीं काट-काट कर नीचे गिराने के लिए ॥

रचनाकार : के ० सच्चिदानंदन (अनुवाद : एम०एस विश्वभरण )

साभार : नया ज्ञानोदय , अप्रैल ०९ ////

पाठकों के लिए बड़ी मेहनत से वर्तमान साहित्य की दुनिया में छाये विषयों में से एक संघ के बहाने “हिंदू गाली गान “ की परम्परा के इस उत्कृष्ट कविता को पेश कर रहा हूँ । कविता के रंगे गए पंक्तियों को पढ़े उसके भावों को समझें फ़िर अपनी टिप्पणी जरुर दें । कवि की कल्पनाशीलता खुशवंत जी जैसे उच्च कोटि के वयोवृद्ध साहित्यकार से मिलती-जुलती है जिनकी हर बात घुटने से ऊपर और कमर के बीच ख़त्म हो जाती है । हो सकता है ऐसे लोग अपनी सगी माँ के बारे में भी ऐसा ही ख्याल रखते होंगे । एक बड़ी गलती है इस कवि की जो अभिव्यक्ति के नाम पर भावनाएं भड़काने के आरोप सिद्ध हो सकने वाली कविता लिखते हैं । आदमी अपनी माँ को नंगा देख भी ले तब भी स्वप्नदोष की बात मानवीय गुणों से परे और ओछी है । भारतीय समाज कभी भी किसी के धार्मिक भावनाओ पर चोट का अधिकार नही देता है ऐसे में ये पंक्तियाँ निश्चित ही उनके नाजायज होने की चुगली करता है । अगर हम बात करे हुसैन की जिन्होंने हिंदुत्व की भावनाओं को आहत करने के लिए हिंदू देवी देवताओं का संभोगरत चित्र बनाकर अपनी खोखली मानसिकता का परिचय दिया था । वहीँ ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन महाशय के पैदाइश में भी जनाब हुसैन की मेहनत हो क्योंकि हमारे क्षेत्र में एक कहावत बड़ा ही मशहूर है कि “बेटा कितना भी आगे क्यों न चला जाए उसमें अपने पिता का मानसिक गुण थोड़ा बहुत जरुर रहता है ।” और अगर हम दोनों के मानसिक स्तर की बात करें तो ये हुसैन से भी कही ज्यादा पतित नजर आते है । अन्तर केवल इतना है कि हुसैन ने माध्यम चित्र को बनाया और इस महाशय ने शब्दों को ।

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