>भारत में ही भारतीयो पर हो रहे नस्ली हमलो का जिम्मेवार कौन?

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चंद वर्षो पहले इंग्लैंड के छोटे परदे पर दिखाए गए रियलिटी शो बिग ब्रदर में भारतीय अभनेत्री शिल्पा शेट्टी के साथ हुए नस्लभेदी बर्ताव ने जहँ देश के आत्म सम्मान को ठेस पहुचाया। वही सभ्य समाज का चोल ओढे इंग्लैंड वासियो का असली चेहरा पुरे विश्व के सामने दिखाई दिया। इसके बाद जो दिखा पुरी दुनिया ने देखा की किस प्रकार भारत की अश्वेत कलाकार शिल्पा शेट्टी ने अपने जीत का परचम लहराया। हालाँकि इस मामले ने भी काफी तुल पकड़ा । दोनों देशों के रिश्तों में भी काफी खटास आने लगी थी। परन्तु समय के साथ और नस्लभेद का व्यवहार करने वाली महिला अभिनेत्री जेड़ गूडी ने शिल्पा शेट्टी से माफ़ी मांगकर इसे दबा दिया।
आज कुछ इसी प्रकार का नस्लभेद ऑस्ट्रेलियाइ जनता द्वारा एशियाई मूल खासतौर से भारतीयो के खिलाफ हुए हमले से जग जाहीर हो रहा है। वहाँ पर रहने वाले छात्रों और काम करने वाले लोगो के साथ नस्लीय टिप्न्निया आम हो चुकी है। हालत इतने गंभीर हो चुके है कि स्थानीय लोगो द्वारा भारतीय छात्रों पर जानलेवा हमले किए जा रहे है। सिडनी में पिछले एक महीने में छात्रों के साथ मारपीट के कम से कम २० से ज्यादा घटनाएं सामने आई है। वही महिलाओ एवं छात्राओं के साथ यौन दुराचार बढ़ने लगा है। आलम यह है कि कई छात्र सिडनी से पलायन करने लगे है। कईयों ने तो डर से ऑस्ट्रेलिया छोड़कर भारत लौट आए है। इन्ही वजहों से आहत बीग बी ने ऑस्ट्रेलिया द्वारा दिए जा रहे डॉक्टरेट कि उपाधि लेने से इंकार कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इसके लिए केवल ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे देश जिम्मेदार है। या कही न कही, किसी न किसी रूप से हम भी इसके लिए जिम्मेवार दिखाई देते है। यह सोचने का विषय है। और यह मान लेना कि भारत इस मामले में पाक साफ़ है तो यह भी संसय ही होगा। क्योंकि ऐसा भारतियो के साथ ही क्यो होता है अफ्रीकन या अन्य एशियाई मूल के लोगो के साथ क्यों नही। इसपर शायद ही कोई विचार करता होगा। आख़िर हम्मे ऐसा क्या है और हमने ऐसा क्या किया है। जिसकी वजह से इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे सभ्य सामाजिक देशवासी इस तरह का घृणित कार्य करने लगे है। लेकिन इसे जानने के लिए सबसे पहले हमें अपनी संरचना और अपने अन्दर ही झाँकने कि जरुरत है।
उदाहरण के लिए भारत में ही क्षेत्रवाद कि समस्या भी किसी नस्लभेद से कम नही है। जिस प्रकार क्षेत्रवाद में एक खास क्षेत्र के लोगो को निशाना बनाया जाता है। उसी प्रकार नस्लभेद में भी एक खास देश मतलब भारत के साथ ही दुर्व्यवहार किया जाता है। इसका कारन जहाँ तक मुझे लगता है, वह है सबसे बड़ी बीमारी बेरोजगारी। जिसका एक मात्र कारन है अनियंत्रित जनसँख्या वृद्धि। जैसे उत्तर भारतियो खासतौर से बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगो के आर्थिक पिछडेपन के कारन अन्य शहरों में पलायन होने के कारन दिखाई देता है। और जिन-जिन शहरों में उनकी तादाद बढ़ने के कारन वहां मौजूद लोगो में बेरोजगारी और अन्य प्रकार कि समस्याओं में इजाफा होने लगता है, ऐसे में उस क्षेत्र के लोगो द्वारा अपनी आजीविका कि सुरक्षा के लिए उनका विरोध करना आम दिखाई देने लगता है। जैसे किसी जंगल में अन्य जंगल से कोई भूखा शेर आ जाए तो उसे उस जंगल के शेरो का कोप भजन होना पड़ता है। क्योंकि यह उस क्षेत्र के शेरो का आजीविका खतरे में दिखाई पड़ने लगता है। कुछ इसी प्रकार का हमला महाराष्ट्र, आसाम एवं अन्य कुछ छोटे शहरों में दिखाई दिया था। जहाँ लोगो ने अपनी आजीविका बचाने के लिए उत्तर्भार्तियो पर हमला किया। जबकि हम क्षेत्रवासी से पहले देशवासी है। और क्षेत्र धर्म से बड़ा देश धर्म होता है। महाराष्ट्र और आसाम जैसे राज्यों में इसका उग्र रूप दिखाई दिया, जबकि अन्य प्रान्तों में यह घटना छिटपुट ही रहा।
कुछ राजनेताओं ने इस मुद्दे को भुनाकर अपना वोट बैंक कैश किया और राजसत्ता का केवल सुख भोगा लेकिन इसके हल के लिए किसी ने विचार नही किया। आज हमारे देश कि जनसँख्या १ अरब ३० करोड़ से भी अधिक है। और इसके बढ़ने कि क्रमवार श्रृंखला बरक़रार है। अगर हम भारत और ऑस्ट्रेलिया में क्षेत्रफल कि तुलना करे तो हम उनके मुकाबले कई गुना छोटे होंगे। वही आबादी कि तुलना में हम उनसे सैकडों गुना आगे है। यहाँ तक कि हर वर्ष हम ऑस्ट्रेलिया कि जनसँख्या से भी अधिक कि आबादी उत्पन्न कर देते है। यही वजह है कि हम चाह कर भी १०० फीसदी शिक्षित नही हो पाते है। भारत कि बढती गुणात्मक जनसँख्या ने न केवल क्षेत्रवाद और नस्लवाद जैसे तत्वों को बढाया है बल्कि अन्य कई समस्याएँ भी अपना जाल फैलाने लगी है। जातिवाद, सम्प्रदायवाद, भासवाद, भ्रस्ताचार, दुर्घटनाए, क्राइम, अमीर-गरीब कि खाई, अशिक्षा, प्रदुषण, जलवायु परिवर्तन, जंगल और जंगली जन्तुओ पक्षिओं पर भी इसका खासा असर देखने को मील रहा है। घुश देने कि प्रवृति , आजीविका के लिए अपराधीकरण जैसी अन्य कई समस्याए भी हालिया दस बीस वर्षों में बढती ही जा रही है।
हमारे देश के नेता विकाश के बड़े-बड़े दावे करते है। लेकिन सच्चाई यह है कि विकाश केवल कुछ शहरों का ही हुआ है, वह भी जनसँख्या के अनुपात में बेहद कम। आज छात्र और कामकाजी लोग देश से पलायन कर रहे है तो केवल काम कि तलाश में/अच्छी जिंदगी पाने के लिए लेकिन उन्हें मिलता क्या है, नस्लभेद, क्षेत्रवाद। अगर वाकई देश का विकास सरकार चाहती है तो उसे इसके लिए विकास के साथ साथ जनसँख्या नियंत्रण पर भी खासा जोर देकर सोचना होगा। भले ही हमारा देश लोकतान्त्रिक हो लेकिन आज जरुरत है देश में चीन कि तरह अलोकतांत्रिक विधि से कड़े कानून लाकर ”हम दो हमारे दो” पर सख्त रवैया अपनाने की। और ऐसे राजनेताओं को विशेष रूप से हितायत देने और उन्हें शक्तिहीन करने कि जरुरत है जो विकास कम मुस्लिम तुस्टीकरण और जातिवाद के आधार पर राजनितिक गोतिया सकने और सत्ता पर काबिज होकर मलाई खाने कि आदत डाले हुए है।
आज देश को सख्त सिपहसलार कि जरुरत है। पर शायद जनता ऐसा नही चाहती, उसे तो मुंगेरी लाल के सपने देखने कि आदत सी हो गई है। दिल्ली-एनसीआर कि विकास को देखकर ही उनकी आँखे चौंधियाने लगी है। लेकिन देशवासियो और इस सरकार को आने वाले खतरे का तनिक भी अंदाजा नही है जो आने वाले ५० वर्षों में दिखाई देगा। जब लोग एक दुसरे को मरकर अपना जीवन सुरक्षित मानेंगे। इसलिए अब भी वक्त है जनता जगे और आने वाले समय के बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचे कि सिमित क्षेत्र में असीमित जनसँख्या का दबाव क्या भारत जैसा छोटा देश सह पाएगा। या इसके दबाव में आकर एक ऐसा भूचाल पैदा करेगा कि दुनिया कल के मुख में समां जाएगी। तब सब लोगो को समझ आएगा कि सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग के बाद कलयुग का भी अंत होना सुनिश्चित है।

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