>कल का "सम्भोग" आज "सेक्स" है

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समय चक्र परिवर्तित हुआ है , जिस वज़ह से अनेक पुरानी परम्पराएँ टूटती नज़र आ रही है। कल का सम्भोग आज सेक्स का रूप ले चुका है। सेक्स केवल बंद कमरों के भीतर बिछावन तक सीमित न हो कर शिक्षा मंदिरों(डीपी एस दिल्ली की घटना याद होगी ) से होते हुए कार्य स्थली (कॉल सेंटरों की कहानी भी आप तक पहुँच गई होगी) तक विस्तार ले चुका है। पाश्चात्य का अनुकरण किसी और क्षेत्र में तो नहीं परन्तु सेक्स और भ्रष्टाचार के मामले में जम कर हुआ है। कुछ लोग इसे मेट्रो शहरों में सीमित बताते हैं जबकि ये मसला भी महानगरीय उच्च -मध्य वर्गो (अर्थात विकासशील इंडिया )से निकल कर देहातों में मध्य- निम्न वर्गो (गरीब भारत जिसे अमेरिकाऔर यूरोप वाले रियल इंडिया कहते हैं)तक फ़ैल चुका है । ऐसा भी नहीं है कि यह सब अचानक हो गया । किसी भी सामाजिक परिवर्तन / बदलाव के पीछे कई छोटी -बड़ी ,साधारण से साधारण घटनाएँ सालों से भूमिका बना रहे होते हैं । यहाँ में जिस बदलाव की बात कर रहा हूँ वो यूँ ही नहीं हुआ उसके पीछे सूचनातंत्र की महती भूमिका रही है । हालाँकि सूचना क्रांति ने हमें काफी सुख-सुविधाएं मुहैया करायी लेकिन भारतीय समाज को उससे बहुत बड़ा घाटा हुआ है। विज्ञान का ये वरदान हमारी संस्कृति के लिए अभिशाप ही साबित हुआ । चलिए अतीत में बहुत दूर न जाकर स्वतंत्र भारत को लेकर आगे बढ़ते हैं। हम बात कर रहें हैं सेक्स के सामाजिक सन्दर्भों की । अवैध संबंधो को अब तक भारत में सामाजिक मान्यता नहीं मिली है बावजूद इसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता की छतरी लगाये अनैतिकता से बचने की कोशिश जारी है। आज कदम -कदम पर आधुनिकता के नाम पर सामाजिक दायरे ,सदियों से चली आ रही परम्पराए तोड़ी जा रही हैं। मुझे पता है आप कहेंगे कि परम्पराएँ टूटनी ही चाहिए । ठीक हैं मैं भी कहता हूँ, हाँ पर वो परम्पराएँ ग़लत होनी चाहिए । ध्यान रहे कभी प्रथाएं नहीं टूटी बल्कि कुप्रथाएं तोड़ी गई हैंऔर इसे बदलाव नहीं क्रांति /आन्दोलन कहा गया। उदाहरण के लिए समय-समय पर हुए समाज और धर्म सुधार आंदोलनों को समझनेका प्रयास करें तो बात स्पष्ट हो जायेगी । वर्तमान समय में युवा वर्ग मानसिक तौर पर उत्तर आधुनिक है या बनना चाहता है। आज का प्रगतिशील युवा अक्सर परम्पराओं को रूढ़ी कहना ज्यादा पसंद करता है । और इसको तोड़ कर ख़ुद को विकास की दिशा में अग्रसर समझता है। यहाँ हमें परम्पराओं तथा रुढियों में अन्तर करना सीखना होगा।
परिवार ,समाज, विद्यालय ,कार्यस्थल अर्थात स्थान (देश) , विभिन्न् परिस्थितिवश और काल (समय) के आधार पर ही सेक्स का स्वरुप और इसकी नैतिकता /अनैतिकता को परिभाषित किया जा सकता है। ये तो चिरंतन सत्य है कि कोई भी चीज देश ,काल, परिस्थितिओं पर टिका होता है। जिस बात को आज मान्यता देने अथवा दिलाने की मांग चल रही है या यूँ कहें कि कुछ हद तक मजबूरीवश स्वीकार भी किया जा रहा है, वह नई तो नहीं है पर स्वरुप बदल गया है। समलैंगिक सेक्स पहले भी होता रहा है। किशोरावस्था में सेक्सुअल शारीरिक बदलावों से उत्पन्न उत्सुकता की वज़ह से एक्के -दुक्के लोग ऐसा करते थे । आज की तरह तब कोई लेस्बियन /गे समाज नही था । समाज की नजर में ये तब बुरी बात थी बहुत हद तक आज भी है । पर कहीं न कहीं आज ये सब फैशन बनता जा रहा है । समलैंगिक होना अप्राकृतिक है यह सब जानते -बुझते हैं। भला एक पुरूष -पुरूष के साथ ,एक स्त्री-स्त्री के साथ पुरा जीवन कैसे गुजर सकती है ? उनके मध्य वो भावनात्मक जुडाव कैसे आ सकता है जो दो विपरीत लिंगों के प्रति एक स्त्री-पुरूष के मध्य होता है। इस बात को विज्ञान भी मानता है । प्रकृति ने नर-नारी की रचना ही इस प्रकार की है दोनों का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है।
पश्छिम में ऐसा -वैसा कुछ भी होना आम बात है क्योंकि हमारा जीवन दर्शन और उनका जीवन दर्शन बिल्कुल ही विपरीत है ,जैसे उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव । वहां सेक्स एक जरुरत है । इंसान भावशून्यता में जीता है । ज्यादा सेज्यादा भौतिक सुखों की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है । ऐसे में पाश्चात्य के जीवनशैली के बीजको भारत भूमि (विपरीत काल -देश और परिस्थिति)में उगाकर फसल काटने की बात सोचना कहाँ की बुद्धिमानी है। आज समलैंगिकता के समर्थक लोगों से वंश वृद्धि की भी बात नही कही जा सकती , ये टेस्ट ट्यूब बेबी का जमाना है भाई । वंश बढ़ने का उपाय तो कर लिया प्रगतिशील मानवों ने लेकिन निकट का फायदा देखने से पूर्व दूर का नुक्सान नही सोच पाया । *क्या माँ-बाप एक टेस्ट ट्यूब बेबी से उतना प्यार कर पाएंगे जो प्राकृतिक रूप से उत्पन्न बच्चे से स्वतः हो जाता है ? *क्या वो बच्चा अपने माँ-बाप, परिवार , पड़ोस आदि के प्रति वफादार होगा ? नहीं बिल्कुल नहीं। यहाँ भी प्रकृति पर विजय पाने का परिणाम बुरा ही होगा। उस दिन की कल्पना कीजिये जब हर घर में टेस्ट ट्यूब बेबी होगा । तब परिवार -समाज चीजें इतिहास की किताबों में दफ़न हो जाएँगी । इस दिशा में मानव के कदम डगमगाते -डगमगाते ही सही पर बढ़ जरुर रहे है।

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