>एक गीत : हर बार समर्पण करता हूँ….

>हर बार समर्पण करता हूँ हर बार गया ठुकराया हूँ
अधखुली उनींदी पलकों पर
इक मधुर मिलन की आस रही
दो अधरों पर तिरते सपने
चिर अन्तर्मन की प्यास रही
हर बार याचना सावन की हर बार अवर्षण पाया हूँ

तेरे घर आने की चाहत
गिरता हूँ कभी फिसलता हूँ
पाथेय नहीं औ दुर्गम पथ
लम्बा है सफ़र ,पर चलता हूँ
हर बार कल्पना मधुबन की, हर बार विजन वन पाया हूँ

अभिलाषाओं की सीमाएं
क्यों खींच नहीं डाली हमने
कुछ पागलपन था और नहीं
ये हाथ रहे खाली अपने
हर बार समन्वय चाहा है, हर बार प्रभंजन पाया हूँ

क्यों मेरे प्रणय समर्पण को
जग मेरी कमजोरी समझा
क्यों मेरे पावन परिणय को
तुमने समझा उलझा उलझा
हर बार भरा हूँ आकर्षण , हर बार विकर्षण पाया हूँ
हर बार समर्पण करता हूँ……….

-आनन्द

>फिरकापरस्त भाजपा और मस्जिद की तामीर

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आज की एक सेकुलर ख़बर पर किसी ने शायद ही गौर फ़रमाया होगा ! जनाब , आप जरुर पूछेंगे , ख़बर भी सेकुलर होती है क्या ? तो साहब ! सेकुलर इस वज़ह से की ख़बर ही कुछ ऐसी है । उत्तराखंड सरकार ने मस्जिदों और सूफी संतों की मजार के सौन्दर्यीकरण की दिशा में कारगर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं । गौर तलब है कि यहाँ फिरकापरस्त पुकारे जाने वाले भाजपा का राज है । इस दिशा में राज्य सरकार की पहल पर हरिद्वार जिला प्रशासन ने मशहूर पाक दरगाह सबीर पाक स्थित सैकड़ों साल पुराने मस्जिद को नए सिरे से तामीर करने की योजना बने है । इस पाक काम में लगभग ७ करोड़ रूपये की लागत आने का अनुमान है । और इस काम के लिए स्थानीय लोगों की सलाह से ग्राम प्रधान हाजी इरफान खुरैशी ने एक २१ सदस्यों वाली कमिटी का गठन किया गया है । बहरहाल ,उत्तराखंड की भाजपा सरकार द्वारा भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल इस दरगाह को विस्तार करने का कदम मुस्लिम समाज को भाजपा के करीब ला पायेगा जब मीडिया भाजपा को बार-बार मुसलमानों का दुश्मन बताती रही है ।

>यादें

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पीछे मुड के हमने जब देख़ा ,गुज़रा वो ज़माना याद आया।

बीती एक कहानी याद आइ, बीता एक फ़साना याद आया।…..पीछे.

सितारों को छूने की चाहत में, हम शम्मे मुहब्बत भूल गये।(2)

जब शम्मा जली एक कोने में, हम को परवाना याद आया।…..पीछे.

शीशे के महल में रहकर हम, तो हँसना-हँसाना भूल गये।(2)

पीपल की ठंडी छाँव तले वो हॅसना-हॅसाना याद आया।…..पीछे.

दौलत ही नहीं ज़ीने के लिये, रिश्ते भी ज़रूरी होते है।(2)

दौलत ना रही जब हाथों में, रिश्तों का खज़ाना याद आया।…..पीछे.

शहरॉ की ज़गमग-ज़गमग में, हम गीत वफ़ा के भूल गये।(2)

सागर की लहरॉ पे हमने, गाया था तराना याद आया।…..पीछे.

चलते ही रहे चलते ही रहे, मंजिल का पता मालूम न था।(2)

वतन की वो भीगी मिट्टी का अपना वो ठिकाना याद आया।…..पीछे.

अपनॉ ने हमें कमज़ोर किया, बाबुल वो हमारे याद आये।(2)

कमज़ोर वो ऑखॉ से उन को वो अपना रुलाना याद आया।…..पीछे.

अय “राज़” कलम तुं रोक यहीं, वरना हम भी रो देंगे।(2)

तेरी ये गज़ल में हमको भी कोइ वक़्त पुराना याद आया।…..पीछे.

>फुंक दो बिगुल बदल दो इतिहास भारी-भरकम साहित्य का

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हिन्दी अकादमी में विवाद गहराने लगा है। वजह बनी है एक ऐसा शक्स, जिस पर आरोप लगायें जा रहे है कि वह गंभीर नहीं है बल्कि हास्यवादी है। जो अपने चिंता और चिंतन को माथे के सिकन की लकीरों में तबदील होने नहीं देता बल्कि अपनी चुटिली अंदाजों से पल में हवा कर देता है। जी हाँ हम बात कर रहे है डाॅ. अशोक चक्रधर जी की। जिनके हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष बनते ही गंभीर साहित्यकार इस कदर तनाव में आ गये है कि उनकी सारी सुझ-बूझ इस्तीफे में तबदील होने लगी है। जी हां यह हादसा या कहे भारी-भरकम भूचाल आया है महा गंभीर मैन ज्योतिष जोशी के साथ। दरअसल इस विवाद की सबसे बड़ी वजह बनी है वो हिन्दी साहित्य जिसे चंद दकियानुसी साहित्यकार अपनी मुट्ठी में रखना चाहते है। आज देश की विडम्बना कहे या हिन्दी जगत के चंद सूरमाकारों की करतूत जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गंभीर बनाने के चक्कर में इतनी जटीलता ला दी है कि लोग अब हिन्दी से कटने लगे है। और हिन्दी की जगह लोग अंग्रेजी का सहारा लेने लगे है। आज देश में जितने हिन्दी नहीं पढ़े जाते उससे कही अधिक लोगों में अंग्रेजी और अंग्रेजी साहित्य के प्रति रूचिया बढ़ने लगी है। जो हमारी कलिष्ठ हिन्दी भाषा या साहित्य से काफी सरल दिखाई पड़ती है। साथ ही हिन्दी साहित्यकारों के भारी-भरकम सोच और तेवरों के कारण ही आज के नवीन और उभरते साहित्यकार को उस कदर सफलता नहीं मिल पाई है जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी। क्योंकि आज के युवा जिस प्रवेश में पल-बढ़ रहे है, जिसमें अंग्रेजी, हिन्गलीश, क्षेत्रिय आदि भाषाओं का दबाव रहता है कि वह भारी-भरकम शब्दों का चयन अपने लेखनी में नहीं कर पाते। या कही न कही आर्थिक तंगी और जीविकोपार्जन में इस कदर जुझते रहते है कि वह न तो गंभीर और मंहगी साहित्य खरीद पाते है और ना ही उसे पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते है। ऐसे में जब उनकी आत्मिक और बौद्धिक चिंतन की तरंगे निकलती है जिसे वो किताबों के पन्नों पर लिख अपना नाम साहित्य जगत में गढ़ना चाहते है तो क्या उनका हक नहीं बनता। अगर कोई साहित्यकार व कवि अपनी पंक्तियों में कलिष्ठ भाषाओं का प्रयोग किये बगैर सरल भाषाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना चाहता है तो क्या उनका ये अधिकार नहीं बनता। मैं तो मानता हूं कि युग परिवर्तन के साथ ही साहित्य में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। जब देश और देशवासी ही पूर्ण हिन्दी भाषी नहीं रहे तो भला साहित्य को कलिष्ठ भाषी बनाये रखना कहा की समझदारी है। हम जैसे नवीन कवियों को इस बात की खुशी है कि अब हमारा भी पैरोकार करने वाला हिन्दी अकादमी के मंच पर जगमगाने वाला है। और आने वाले समय में कई नये साहित्यकार उभरकर सामने आयेंगे जिनकी सोच लिखे हुए किताबों के पन्नों पर इस कदर सरल भाषा में दिखाई पड़ेंगे, जिसे एक कार्यालय का चपरासी और अफसर दोनो आसानी से पढकर समझ पायंेगे। साहित्य को लेकर उनकी बीच की खाई को आसानी से पाट दिया जाएगा। इतना ही नहीं ऐसे भी लोग साहित्य से जुड़ने लगेंगे जो छोटे-छोटे शहरों और कसबों में रहते है। हिन्दी साहित्य जगत की एक और विडम्बना सुनी होगी कि भारत जैसे हिन्दी भाषी देश में हैरी पोर्टर की किताबें सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल की गई। चलियें देर ही सही लेकिन कृष्ण के रूप में अशोक चक्रधर अपना चक्र चलाकर भारी-भरकम बोझ से झुके हिन्दी साहित्य के मकड़जाल को कांटकर सरल साहित्य का रूप देने में कामयाब रहे तो कई सारे प्रांतीय स्तर के रचनाकारों का भाग्य उज्जवल जरूर हो जाएगा। लेकिन देखना होगा कि वे जिस भारी-भरकम साहित्यकारों के चक्रव्यूह में फंसे हुए है, उसे अपने चक्र से कांट भी पाते है या अभिमन्यू की तरह बीच में ही दम तोड़ देते है। इसलिए जरूरत है कि तमाम साहित्य में रूचि रखने वाले नौजवान और नये-नये उभरते साहित्यकार और कवि जो जिस भी छंद में लेखन करते है, जिन्हे लगता हो कि साहित्य को कलिष्ठ बनाने की जगह सरस और सरल होना चाहिए, जिससे जन-जन तक साहित्य का प्रचार प्रसार हो सके। और देश में फिर से हिन्दी की दशा सुधरने लगे। डाॅ. अशोक चक्रधर की हौशला अफजाई या कहे उनके इस प्रयास के बढ़ते कदम में ताकत डालने के लिए समर्थन का बिगुल फुंकना बेहद जरूरी है। क्योंकि नेतृत्व करता में तब तक जोश नहीं आता जब तक की जय हो का जयकारा न लगे।

>माओवादियों के बरगलाये लोगों द्वारा अपनी जड़ों पर चोट

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नेपाल में हिन्दी विरोध कोई नई बात नहीं है। यह बात भी अब कोई छिपी बात नहीं रह गई है कि यहां हिन्दी विरोध का तात्पर्य भारत विरोध से है। नेपाल के उपराष्‍ट्रपति श्री परमानंद झा द्वारा हिन्दी में शपथ लेने का प्रसंग हो या फिर अभी-अभी नेपाल के शिक्षामंत्री द्वारा हिन्दी में भाषण का मामला हो। मौका मिलते ही माओवादियों द्वारा भारत विरोध को हवा देने में कोई कोताही नहीं बरती जाती। श्री पशुपतिनाथ मंदिर के परम्परागत पुजारियों का मामला हो या फिर नेपाल में प्रवेश करने वाले भारतीय वाहनों को रोकने, तोड़ने व आग लगाने का मामला हो, सभी के पीछे का निहितार्थ है – भारत विरोध। फिल्म अभिनेता ऋतिक रोशन की कोई सामान्य टिप्पणी हो या फिर चांदनी चौक से चायना तक फिल्म का मामला या फिर हिन्दी फिल्मों के विरोध का मामला हो। इन सब का विरोध यानि भारत विरोध है; और मजे की बात तो यह है कि जब भी नेपाल में हिन्दी का विरोध होता है, अधिकाशत: तथाकथित नेपाली बुद्धिजीवी, पश्चिमी संरक्षण प्राप्त मीडिया, माओवादी व अन्य दलों के कुछ नेतागण फुले नहीं समाते। इनकी वाणी और लेखनी हिन्दी विरोध की आग में घी डालने का बखुबी काम करती है।
माओवादियों द्वारा ‘कौआ कान ले गया’ चिल्लाते ही कुछ विशेष वर्ग के लोग अपने कान को नहीं टटोलते बल्कि कौए के पीछे कांव-कांव करते हुए अंधाधुंध भागते नजर आते हैं। अब अहम सवाल यह है कि क्या हिन्दी व भारत से नेपाली भाषा व नेपाल को सचमुच खतरा है? क्या, महज भारत विरोध की इन नीतियों से नेपाल का भला होगा?
जहां तक हिन्दी व नेपाली भाषाओं का सवाल है- दोनों की लिपि एक है, दोनों की जननी (संस्कृत) एक है। नेपाली साहित्य में संस्कृत व हिन्दी के शब्दों को अधिकारिक मान्यता है। हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, गुजराती, बंगाली, मारवाड़ी, कुमांऊनी, गढ़वाली आदि भाषाओं का नेपाली भाषा से बेहद मेल है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो इन सभी भाषाओं में सामान्य रूप से प्रचलित हैं। टोन व उच्चारण में थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है । उदाहरण के लिए अगर किसी को पूछना है कि-”कैसे हो”, तो नेपाली में पूछेंगे-कस्तो छौ, गुजराती में – केम छो, मारवाड़ी में – कैंया छे, बंगाली में – केमन आछो, भोजपुरी में – कइसन वाड़, मैथिली में – केना छी आदि। वास्तव में इन भाषाओं में न तो कोई आपसी द्वेष है और न ही कोई क्लेश। हिन्दी के विकास व समृद्धि से नेपाली भाषा और फलेगी और फूलेगी। तथा नेपाली भाषा के फलने फूलने से देवनागरी की बगीया और सुगन्धित होगी। चूंकि भाषा से साहित्य की रचना होती है तथा साहित्य समाज का दर्पण होता है। अत: भाषाएं जितनी विकसित होगी उसका साहित्य भी उतना ही विकसित होगा। विकसित साहित्य से समाज को अच्छा दर्शन व दिशा प्राप्त होती है। जिस प्रकार पानी और चीनी समरस होकर षरबत बनता है। पानी में चीनी विलय होते ही चीनी अदृश्‍य प्रतीत होता है परंतु पानी को पीते ही उसमें चीनी का स्वाद व मिठास होता है अर्थात् दोनों का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। लेकिन जिसको मधुमेह का रोग लगा हो उसके लिए तो यह परहेज ही है न। इसी प्रकार नेपाल के माओवादी, कथित बुद्धिजीवी, कुछ मीडिया व अन्य दलों के कुछ नेता या तो चीनी (चीन) मधुमेह, या पश्चिमी मधुमेह के रोग से ग्रसित हैं।
माओवादी नेता भली-भांति जानते हैं कि हिन्दी से नेपाली व नेपाली से हिन्दी की जड़े और मजबूत होंगी। इससे दोनों देशों के संबंध और मधुर व मजबूत होंगे। इससे नेपाल व भारत दोनों को बल मिलेगा। दोनों सशक्त व सुरक्षित होगें। परस्पर सहयोग से दोनों और अधिक विकसित होगें।
लेकिन वे इस सच्चाई को भी भली-भांति जानते है कि दोनों देशों के सामाजिक, सांस्कृतिक व भाषाइक रिश्‍ते जितने प्रखर व मजबूत होंगे, उतना ही माओवादियों के राजनैतिक अस्तित्व को खतरा होगा। इनके आका चीन केवल नाराज़ ही रही होगा बल्कि हुक्का पानी बंद कर देगा। फिर तो इनका बजूद ही समाप्त हो जाएगा। क्योंकि एक विकसित, समृद्धि और सशक्त नेपाल में माओवाद व कट्टर साम्यवाद के लिए कोई जगह नहीं रहेगा। विश्‍व में जहां-जहां गरीबी व पिछड़ापन है, वहां-वहां किसी न किसी रूप में माओवाद या कट्टर साम्यवाद जिंदा है। अन्यथा अपने जन्मभूमि पर ही कट्टर साम्यवाद दम तोड़ चुका है।
पिछले वर्ष नेपाल के प्रधानमंत्री श्री पुष्‍पकमल दाहाल (प्रचण्ड) भारत यात्रा पर आए थे। उस समय उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि ”भारत व नेपाल की सांस्कृतिक जड़ें मजबूत है, गहरी है व एक है। प्राचीन काल से दोनों की धर्म-संस्कृति समाज व पूर्वज एक हैं दोनों देशों के इन प्राचीन संबंधों को कोई मिटा नहीं सकता। हम (माओवादी) भी नहीं”। श्री प्रचण्ड ने खुद स्वीकार किया कि ”प्रत्येक पांच में से एक नेपाली नागरिक अपनी जीविका उपार्जन के लिए भारत में रहता है व काम करता है। इसका अर्थ हुआ नेपाल के 20 प्रतिशत आबादी अपनी रोजी-रोटी के लिए सीधे-सीधे भारत में रहती है। यह भी सत्य है कि भारत में रहने व रोजगार के लिए इनका हिन्दी में निपुण होना आवश्‍यक है। इसके उपरान्त शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, सैन्य सेवा व अन्य क्षेत्रों से संबंधित लाखों नेपाली नागरिक भारत पर निर्भर हैं। ऐसे में नेपाल में हिन्दी का विकास, हिन्दी में शिक्षा-दीक्षा आदि से सीधे तौर पर नेपाल को ही लाभ है। भारत ने 90 के दशक में बेहिचक नेपाली भाषा को भारतीय संविधान के आठवें अनुसूचि में ससम्मान शामिल किया। इससे भारत कमजोर नहीं हुआ है। बल्कि और मजबूत हुआ है। भारतीय व नेपाली दोनों मूल के नेपाली भाषियों को अधिकार व सम्मान प्राप्त हुआ है। वैसे भी किसी भी नेपाल के नागरिक को भारत में विदेशी नहीं माना जाता और न ही कोई भी भारतीय को नेपाल में विदेशी माना जाता है।
जहां तक हिन्दी विरोध का सवाल है, हिन्दी को भारत में भी अनेक स्थानों पर विरोध का सामना करना पड़ा है। जैसे तमिलनाडु, बंगाल, नागालैण्ड, मिजोरम इत्यादि। तमिलनाडु व नागालैण्ड-मिजोरम में तो देवनागरी लिपी तक को जलाने में कोई परहेज नहीं किया गया। परंतु आज सबसे अधिक, दूर शिक्षा के माध्यम से, हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या तमिलनाडु में है। इसी प्रकार आज नागलैण्ड सरकार ने राज्य में हिन्दी शिक्षा को अनिवार्य किया है। कारण हिन्दी विरोध के कारण यहां एक बड़ी संख्या को राष्‍ट्रीय स्तर पर रोजगार प्राप्ति में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था।
आश्‍चर्य है कि नेपाल में हिन्दी का विरोध तो खूब किया जाता है। परंतु अंग्रेजी व उर्दू के प्रति इन विरोधियों का प्रेम बढ़ते जा रहा है। हिन्दी से संस्कृति व परम्पराओं को कोई खतरा नहीं है जबकि अंग्रेजी व उर्दू से खतरा है। एक और आश्‍चर्य की बात है – चीन ने उत्तरी नेपाल के एक बढ़े भू-भाग पर कब्जा जमाए हुए हैं। आये दिन नेपाल तिब्बत बार्डर को सील कर देता है। नेपाल की दैनन्दिन राजनीति में चीन का सीधे हस्तक्षेप कर रहा है। फिर भी उसके विरूद्ध नेपाल में स्वर नहीं उठते क्यों?
नेपाल में अब तक केवल हिंदी विरोध का मामला दिखाई देता था परंतु अब नेपाली भाषा का भी विरोध शुरू हो गया है। इसके पीछे माओवादी नेताओं का हाथ है। आज नेपाल में नेपाली के समकक्ष उर्दू सहित 11 अन्य भाषा को मान्यता देने की मांग जोर-शोर से उठ रही है। इसके लिए आंदोलन खड़े किए जा रहे है। यह तर्क दिया जा रहा है कि नेपाल में नेपाली भाषा बोलने वालों की संख्या 48 प्रतिशत है। अत: अन्य 11 भाषाओं को राज्य स्तरीय भाषा का दर्जा देने की मांग जायज है। ये तत्व, नेपाल को भाषाई विवादों में डालकर अपने ही जड़ों पर प्रहार कर रहे है। भानुभक्त द्वारा स्थापित भाषाई एकता व पृथ्विनारायण शाह (राजस्थान के शिशोदिया बंग के राजा) द्वारा एकीकृत नेपाल कहीं बिखर न जाए। बिखरा हुआ नेपाल चीन के लिए हितकर व भारत-नेपाल के लिए अहितकर होगा।
:- अशोक चौरसिया-अखिल भारतीय सचिव, नेपाली संस्‍कृति परिषद्)

>ज़रा देखिये तो इन बेशर्म ब्लोग्गरों को कहीं भी घुसे आते हैं ……..

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ब्लॉगर साथियों को नमस्कार ! पिछले कई दिनों से अंतरजाल पर यत्र-तत्र भटकते हुए कई सज्जनों की हरकतों से आजिज हो कर आज शिकायत कर रहा हूँ । कुछ लोग ब्लॉग जैसे समाजोन्मुखी मंच की महत्ता को नही समझ पा रहे हैं । एक ओर ब्लॉग्गिंग को लोकतंत्र के भावी स्तंभों की कड़ी में गिना जाने लगा है वहीँ दूसरी तरफ़ हम बेहद लापरवाह होते जा रहे हैं । हिन्दी चिठ्ठों की भरमार हो गई है । गली -गली खुल रहे ट्यूशन सेंटर की भांति हर दिन १०० के करीब चिठ्ठों का पदार्पण होना खुशी की बात है । पर कई लोग ब्लॉग्गिंग को महज निजी स्वार्थों की पूर्ति के रूप में देख रहे हैं । पोस्ट और कमेन्ट की कहानी पर अब तक कई लोग ऐतराज जता चुके हैं । लोग किसी के भी पोस्ट पर आते हैं पढ़े अच्छा है , अति सुंदर रचना , बधाई हो , कभी इधर भी आयें , मेरा ब्लॉग पता आदि लिख कर अपना पता दे जाते हैं । उदाहरण के लिए इस लिंक पर देखें http://gap-shapkakona.blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html

{नोट :- इसे अन्यथा न लिया जाए हमारी किसी से निजी रंजिश नही है }

बार-बार लिंक देकर अपनी पाठक संख्या बढ़ाने को प्रयासरत मूढ़ लोग भूल जाते हैं कि बाँध कर भक्ति नहीं करवाई जा सकती !बात यही नहीं रुकती। इनकी जमात के कई लोग निजी दुश्मनी निकालने , धर्म -पंथ-विचारधारा को खुले तौर पर प्रचारित करने , आदि में लगे हुए हैं । धार्मिक भावनाओं को सीढ़ी बना कर खूब भीड़ बटोरी जा रही है । जरा निचे दिए गए लिंक पर देखें किस तरह एक बरगलाया हुआ इंसान अपनी उर्जा बेकार कि उलजुलूल बातों में नष्ट कर रहा है । किस प्रकार पूरी दुनिया को एक ही रंग में जबरन रंग डालने कि बौद्धिक कोशिश की जा रही है ! ये तू पूरी दुनिया के समय मानकों को भी केवल अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं ।इनका मानना है कि चुकि दुनिया के सबसे अंतिम समय में आया हुआ इनका धर्म है अतः लेटेस्ट होने के कारण सभी को उसका अनुयायी हो जाना चाहिए . http://swachchhsandesh.blogspot.com/2009/07/bhagwan-shiv-esteblished-in-kaaba.html

देखिये एक अन्य लेख में किस तरह मिथकों के आधार पर बहुपत्नी प्रथा जैसी अप्रासंगिक बातों का समर्थन कर रहे है …http://swachchhsandesh.blogspot.com/2009/07/why-more-then-one-wives-in-islam.html

इस तरह के और भी कई उदाहरण हैं जिन्हें अगली कड़ी में दूंगा तब तक उनका लिंक इकठ्ठा कर लूँ !

>अलविदा लीला नायडू…

>अपनी पहली ही फिल्म में अपने सौंदर्य और अभिनय का लोहा मनवा देने वाली सुप्रसिद्ध अभिनेत्री लीला नायडू नहीं रही… उनको हार्दिक श्रद्धान्जली।

फिल्म समीक्षा: अनुराधा 1960

इस फिल्म के गीत अफलातून जी ने आगाज़ पर चढ़ाये हैं सो यहां गाने ना लगाकर उस पोस्ट का ही लिंक दे रहा हूं

लालित्यपूर्ण लीला नायडू की स्मृति में अनुराधा

>कुंवारी बेटियों ने नंगे होकर हल चलाया

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बारिश के लिए लड़कियों ने नंगी होकर हल चलाया ” । बिहार के बांके बाज़ार कस्बे में किसानों की मर्जी पर उनकी कुंवारी बेटियों ने ऐसा किया । प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक लड़कियों ने सूर्यास्त के बाद मंत्रोचारण के साथ खेतों में हल चलाया और इस काम में गाँव की महिलाओं ने उनकी मदद की ।

पानी के लिए सारी दुनिया में हाहाकार मचा है । मौनसून की बेरुखी से बिहार-यूपी में किसानों की शामत आई हुई है । बारिश न हुई तो खेती –बाड़ी चौपट ,खाने को अन्न मिलना मुश्किल हो जाएगा । फसल के मौके पर बादलों के देव की नाराजगी से खौफजदा इन किसानों की आंखों में विदर्भ और बुंदेलखंड के दृश्य तैरते रहते हैं । जब इन्सान डरा हुआ हो तो अंधविश्वास की डोर और भी पक्की हो जाती है ।यूपी- बिहार के विभिन्न इलाकों में आए दिन देवराज इन्द्र को मनाने के लिए तरह -तरह के टोटके कर रहे हैं । कहीं मेढक-मेढकी की शादी करवाई जा रही है तो कहीं बैलों की जगह लोग ख़ुद जुए में लग खेत जोत रहे हैं । ऐसे में इस घटना को अंधविश्वास कहें या कुछ भी पर इन ग्रामीण किसानों को पूरा भरोसा है कि इन्द्र को भी शर्म आएगी और वो जलवृष्टि अवश्य करेंगे ।

>भारत प्यारा देश हमारा

>भारत प्यारा देश हमारा
सब देशों में सबसे न्यारा
हम सबका बस एक ही नारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
भारत प्यारा… ……….

रहे सलामत गणतंत्र हमारा
बजे हमेशा लोकतंत्र का नगारा
कितना सुंदर कितना प्यारा
इससे से तो हर दुश्मन हारा
भारत प्यारा… ……….

ये बेचारा देश हमारा
नेताऒ के बोझ का मारा
इसे चाहिए युवाओं का सहारा
नेता मिले भगत, सुभाष सा प्यारा
भारत प्यारा… ……….

मिलजुलकर सब एक हो यारा
बस यही हो संकल्प हमारा
भारत माँ का बनो दुलारा
सबने
मिलकर यही पुकारा
भारत प्यारा… ……….
-nirbhay jain
http://masthindi।blogspot।com/

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