>राजनीति के देनदार रहे जयप्रकाश

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एक शख़्स, जिसके बारे में मैं कुछ दिनों पहले तक अनभिज्ञ था। इसका कदापि तात्यर्प नहीं कि मैं उन्हें बिल्कुल नहीं जानता था। बल्कि उनकी संद्घर्ष की दासता और उनके द्वारा भारतीय समाज के लिये उठाये गए कदमों से पूरी तरह से अनजान था। देश का वो सपूत जिसने अपने जीवन रथ पर सवार होकर केवल लोगों दिया है, उनसे कुछ नहीं लिया, अन्य स्वतंत्राता सेनानियों की तरह। उन्होंने देश में समाजवाद का नारा दिया। युवा शक्ति को संगठित कर पूरे देश को इसका जलवा दिखाया। बताया किस प्रकार एकता और संगठित होकर चलने से बड़े से बड़े पहाड़ जैसी मुसीबत को भी आसानी से हल किया जा सकता है। मैं बात कर रहा हूं, स्वतंत्राता सेनानी जयप्रकाश नारायण की। उनकी उपलब्ध्यिों की, जिसे २१वीं सदी की युवा पीढी पूरी तरह भुला चुकी है। दरअसल जब लोकनायक जयप्रकाश अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र के महासचिव अभय सिन्हा के सम्पर्क में आया और उनके माध्यम से संस्था और जेपी से जुड़े लोगों से मिला। तो जाना की जेपी किस प्रकार के इंसान थे। जिन्होंने न केवल देश की आजादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया बल्कि सत्तर के दशक में तानाशाह हो चुकी एकछत्रा राज करने वाली कांग्रेस सरकार को भी सत्ता से बेदखल कर दिखाया। उन्होंने अपने आंदोलन से सि( कर दिया कि किसी भी पक्ष की सरकार हो, अगर वह अपने कार्यों का निर्वहन सही ढंग से न कर सके, जिसकी वजह से इंसान और इंसानियत पर खासा असर पड़ने लगे, तो आंदोलन बेहद जरूरी हो जाता है। उन्होंने आंदोलन के लिए क्षेत्रा विशेष का सहारा नहीं लिया। बल्कि पूरे देशवासियों को इसमें शामिल किया। उन्होंने हमेशा जाति, क्षेत्रा, र्ध्म और सम्प्रदाय से उठकर काम किया। इसलिए तो उनके आंदोलन में देश के विभिन्न राज्यों के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। जो दुनिया के लिये एकता का बड़ा परिचायक बना। कई नामी-गिरामी राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों ने उनके साथ कदम-ताल किए। डॉ लोहिया, एस.एन.जोशी, भीनू, मसानी, अच्यूत, पटवर्ध्न, आचार्य नरेन्द्र देव, मध्ुकर दंडवते, विनोवाभावे आदि कई चिंतक उनके साथ थे। यहां तक की उनके आंदोलन से जुड़े कई युवा नेता आज देश के विभिन्न प्रतिष्ठित सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में विराजित है। पर शायद उनमें से कुछ युवा नेता जेपी के राष्ट्रभक्ति की राह से पूरी तरह भटक चुके है। उन्हें जेपी की बातें तो याद है लेकिन जेहन में उन्हें वे अब तक उतार नहीं पाये हैं। उन्हें लगता है कि आज के राजनीतिक परिवेश में जेपी की अवधारणा पर चल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन दिखाई देता है। इतना ही नहीं, कुछ ने तो उनकी विचारधराओं की तिलांजलि तक दे डाली है। क्षेत्रावाद, जातिवाद, सम्प्रदायावाद की जिस राजनीति से जेपी जीवन भर दूर रहे। आज वोट के लिए चंद राजनेता केवल इसी के सहारे अपनी पहचान बना रहे है। यहां तक की देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले सिपाहियों पर वोट के लिए राजनीति करने से भी नहीं चुकते। ऐसे में जेपी की आत्मा को ठेस पहुंचना लाजमी है। क्योंकि युवा नेताओं को उन्होंने अपनी पेड़ की शाखा समझकर सींचा ताकि आने वाले दिनों में पोषित होकर पफल, पफूल और हरे पत्तों के साथ वातावारण को शु( बना सके, आज उन शाखाओं में सड़ांध् की बू सी आने लगी है। ऐसे में उनकी आत्मा का कल्पित होना स्वाभाविक है। लेकिन दाद देनी होगी अभय सिन्हा जैसे लोगों की, जो आज भी जयप्रकाश के विचारो को जीवित रखने के लिए प्रयासरत है। जिनकी अन्तरात्मा में आज भी जयप्रकाश जिंदा है। भले ही जहन में जेपी की विचाराधराओं में थोड़ी ध्ूल जम गई हो। लेकिन उन्होंने इस ध्ूल को भी सापफ करने का जो बीड़ा उठाया है। वह बेहद ही सराहनीय कदम है। वह एक न एक दिन कामयाबी का जरूर स्वाद चखेंगे, इसकी पूरी संभावना दिखती है। लेकिन इसके लिए उन्हें सेमिनारों के आयोजन के साथ-साथ आज की युवा पीढ़ी, जो जेपी के योगदान से अब तक अनभिज्ञ है, को ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस मंच पर लाने का प्रयास करना बहुत जरूरी होगा।
आज की युवा पीढी के साथ न्यूज चैनलों को यह भी बतलाने की जरूरत है कि ११ अक्टूबर केवल पिफल्मी हस्ती अमिताभ बच्चन तक सीमित नहीं है। बल्कि ११ अक्टूबर लोकतंत्रा में खुद को स्वतंत्रा स्थापित करने का मौलिक चिंतन है, जिसे जेपी ने पूरे भारत वर्ष को दिया। साथ ही लोकतंत्रा के तानाशाही बनाने के प्रयास को विपफल करने का सपफल अभियान के रूप में देखा जा सकता है।
नरेंद्र निर्मल

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