>कंधमाल दंगे, धर्म-परिवर्तन और गाँधी जी

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आज सुबह -सुबह जनसत्ता की सुर्खी पढ़ी – ” कंधमाल दंगों का बड़ा कारण था धर्म परिवर्तन -आयोग ” । ओडिसा दंगों की असलियत को मुख्यधारा की मीडिया ने छुपाया । तथाकथित सेकुलर लोगों ने इसे संघ की साजिश करार देने में कोई कसर नही छोड़ी । परन्तु स्थानीय परिस्थितियों को हमेशा नजर अंदाज किया गया । आज आयोग की रपट पढ़ी तो देखा उन्ही मुद्दों को दंगों की मुख्य वजह बताई गई है । किसी भी दंगे की पृष्ठभूमि में लंबे समय से चल रही किसी बात का होना जरुरी होता है । हाँ , दंगे भड़कते हैं तात्कालिक वजहों से । ओडिसा समेत देश के विभिन्न भागों में धर्म परिवर्तन के कारण हिंसा की घटनाये आम हैं । ये बात भी सच है कि इसमे राजनीति भी की जाती रहा है । लेकिन दंगे केवल भड़काने से नही होते । आख़िर वो कौन सी मानसिकता है जो दंगों को जन्म देती है दो समुदायों में नफरत बढाती है । इसी सिलसिले में गाँधी जी जो अपनी धर्मनिरपेक्षता के लिए जाने जाते हैं उनका एक उद्धरण देखिये :-

” मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यधपि आजकल ईसाई मित्र अपने मुंह से तो ऐसा नही कहते कि हिंदू – धर्म झूठा धर्म है , तो भी उनके दिल में अब भी यही भाव जड़ जमाये हुए है कि हिंदू धर्म सच्चा नही है और इसाई -धर्म ही – जैसा उन्होंने समझ रखा है – एक मात्र सच्चा धर्म है । उनकी यह मनोवृति उन उद्धरणों से प्रकट होती है जो मैंने कुछ समय पूर्व सी ० एम० एस ० की अपील में से ‘हरिजन’ में प्रकाशित किए थे । हिंदू समाज में घुसी हुई छुआछुत या ऐसी ही अन्य भूलों पर कोई प्रहार करे तो बात समझ में आ सकता है । अगर इन मानी हुई बुराइयों को दूर करने में और हमारे धर्म कि शुद्धि में हमारी सहायता करें तो यह एक रचनात्मक प्रयास होगा और उसे हम कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार भी करेंगे । पर आज जो प्रयास हो रहा है उससे तो यही दिखाई पड़ता है कि यह तो हिंदू धर्म को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने और उसके स्थान पर दूसरा धर्म कायम करने की तैयारी है । यह तो ऐसी बात है मानो किसी पुराने मकान को , जिसमे मरम्मत की बड़ी जरुरत हो , पर जो रहने को अच्छा और काम देने लायक प्रतीत होता हो , कोई जमीं में मिला देना चाहे । अगर कोई गृह स्वामी को जाकर बताये कि उसमे क्या -क्या सुधार और मरम्मत होना चाहिए , तो इसमें संदेह नही कि वह उनका स्वागत करेगा । पर अगर कोई उस मकान को ही गिराने लगे जिसमें उसके पूर्वज सदियों से रहते आए हो , तो वह जरुर उसका प्रतिकार करेगा ।

(१३। ०३। १९३७ , पृष्ठ १८५-४८६ , खंड -६४ , गाँधी वांग्मय )

गाँधी जी ने धार्मिक प्रतिस्पर्धा को चिन्हित किया है कि किस तरह से तब हिंदू -धर्म को झूठा बता कर आनी धर्मों को स्थापित किया जारहा था । आज भी स्थितियां वही हैं । तो ऐसी परिस्थिति में प्रतिकार की बात कही है । गाँधी जी अहिंसात्मक प्रतिकार की बात करते हैं पर प्रतिकार तो करना है । लेकिन जब लोगों को कोई रास्ता नही मिलता तब हिंसा ही एक मात्र सहारा बनती है । पर ये बात अनेक तथाकथित परगतिशील बुद्धिजीवियों को समझ में नही आएगी भले हीं वो नक्सली हिंसा को सही ठहराते हों ।

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