>केवल धारा 377 हीं नज़र आता है आपको

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समलैंगिकता को अपराधमुक्त किए जाने को लेकर वाद-विवाद का दौर शुरू हो चुका है । अख़बारों , समाचार चैनलों , इन्टरनेट जैसे संचार के जनमाध्यमों (जो अब व्यापार मध्यम हो चुके हैं ) से लेकर अंतर्व्यक्ति स्तर पर भी हर ओर गे -गे -गे का शोर बढ़ता जा रहा है । कई नामचीन हस्तियां इस फैसले के समर्थन में है तो कई विरोध में । समर्थको का कहना है -“ये एक ऐतिहासिक फ़ैसला है । अंग्रेजी शासन में लॉर्ड मैकाले द्वारा सन १८६० बनाये गए इस कानून को रद्द कर हमें एक और गुलामी से मुक्ति मिली । स्वतंत्र भारत में नागरिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा फ़ैसला है । ” अभी फिलहाल समलैंगिकता के इस मुद्दे पर बहस का इरादा तो नही है । हाँ समयाभाव में भी एक महत्पूर्ण सवाल उठाना चाहूँगा और जिसका जबाव आप सभी को सोचना चाहिए । भारतवर्ष की शिक्षा पद्धति आज भी मैकाले के सिद्धांतों के अनुरूप चलाई जा रही है । हमारा पाठ्यक्रम पुरी तरह से अंग्रेजो की भारत-तोड़क शिक्षा पद्धति पर आधारित है जो हमें अपनी जड़ों से दूर करता जा रहा है । शिक्षा जिससे किसी भी व्यक्ति का , व्यक्ति से समाज का और समाज से देश का निर्माण होता है । वो शिक्षा आज भी मैकाले की जी हुजूरी कर रहा है पर आप में से किसी ने इस बात पर कभी नही सोचा ! अंग्रेजों के बनाये कानून “इंडियन पैनल कोड ” को बदलने की कोई जरुरत नही समझी ! केवल धारा ३७७ ही नजर आता है आपको ! अरे , इस फैसले में भारतीयता को ढूंढ़ पाना नामुमकिन है । गुलामी से दूर होने के बजाय हमें मानसिक गुलामी की एक और कानूनी जंजीर से बाँध दिया गया है ।

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