>संस्कृति खतरे में है……कोई तो बचाने आओ

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आज हमारी इस ब्लाग पर यह पहली पोस्ट है। चूँकि सच बोलना मना है (शायद इस कारण कि कड़वा होता है या फिर इस कारण कि इसे सुनना कोई पसंद नहीं करता) चलिए कुछ लिखने के पहले शपथ कि जो कहेंगे सच कहेंगे (पता नहीं कितना) सच के सिवाय भी बहुत कुछ कहेंगे।
सवाल यह कि क्या सच है और क्या नहीं? आज देश में उबाल आ गया है (जैसा बासी कढ़ी में आता है) अदालत के धारा 377 के ऊपर अपना निर्णय देने के बाद से। संस्कृति क्षरण का मामला दिख रहा है; देश की सभ्यता संकट में आती दिख रही है।
इस अदालती फैसले का बुरा तो हमें भी लगा क्यों लगा यह समझ नहीं आया? समलैंगिकों को देश की मुख्यधारा में जोड़ने का कोई एक यही तरीका नहीं था कि इसे कानूनी मदद दे दी जाये। ये तो वैसा ही हो गया जैसे कि डकैतों, चोरों, बलात्कारियों को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए कानूनी सेरक्षण दे दिया जाये।
सहमति से बालिग स्त्री-स्त्री का और पुरुष-पुरुष का सम्बन्ध बनता है तो वह कानूनी अपराध नहीं है। बिना हत्या किये यदि डकैती डाल दी जाती है तो वह डकैती नहीं। बलात्कार किया जाये और महिला को शारीरिक चोट न पहुँचे या फिर वह गर्भवती न हो तो बलात्कार अपराध नहीं। समझ गये आप क्या कहना चाह रहे हैं हम?
जहाँ तक संस्कृति की बात है तो देश की संस्कृति को लोगों ने इतना सहज बना दिया है कि हर कोई उसकी व्याख्या करने लगता है। समलैंगिकता के समर्थकों ने तो कह दिया कि वेद-पुराण में भी ऐसे सम्बन्धों के बारे में चर्चा है। यहाँ गौर किया जाये कि समलैंगिकता का समर्थन करने वाली तादाद युवा वर्ग की है, लगभग शत-प्रतिशत। हास्यास्पद तो यह है कि जिस पीढ़ी को अपने माँ-बाप का, अपने परिवार की संस्कृति का पता नहीं वह हमारे वेद-पुराणों को पढ़ का उसका व्याख्यान दे रही है। जिस पीढ़ी को सहज सेक्स के बारे में ज्ञात नहीं वह वेद-पुराणों में सेक्स सम्बन्धों का चित्र प्रस्तुत कर रही है।
समलैंगिकता के सम्बन्धों का वेद-पुराणों में हवाला देने वाले बतायें कि कौन से वेद में इस तरह का वर्णन है? खजुराहो और कामसूत्र का जो लोग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं वे यह बात अच्छी तरह जान लें कि इन साहित्यों की रचना इसी तरह के भ्रष्ट कामियों को राह दिखाने के लिए की गई थी।
अब कुछ संस्कृति के कथित रक्षकों के लिए भी। वह यह कि जो लोग भगवान राम को काल्पनिक मानते हैं वे शंबूक वध का सहारा लेकर समूची हिन्दू जाति, भगवान राम और सवर्ण जाति को गाली देते घूमते हैं। कृपया बताया जाये कि यदि उनकी दृष्टि में भगवान राम काल्पनिक हैं तो शंबूक वध कहाँ से वास्तविक है?
इसी तरह माता सीता का नाम लेकर समूचे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। स्त्री के ऊपर अत्याचार का वर्णन किया जाता है। कितनी-कितनी बार अग्निपरीक्षा देने की दुहाई दी जाती है। ऐसा करने वालीं स्त्रियाँ, महिला सशक्तिकरण की समर्थक महिलायें उसी परिवार की एक महिला उर्मिला के त्याग को भूल जातीं हैं। सीता जी का नाम लेकर स्वयं को पुरुष वर्ग से टकराने तक की ताकत दिखाने वालीं महिलायें क्या उसी उर्मिला का नाम लेकर अपनी सास या ससुर की सेवा कर सकतीं हैं? बिना पति के घर-परिवार को चला सकतीं हैं? आज आलम यह है कि घर में आते ही एकल परिवार की अवधारणा को पुष्ट करने लगतीं हैं।
संस्कृति के नाम पर क्या हो रहा है, क्या होना चाहिए यह किसी को सही से ज्ञात नहीं। समलैंगिकता के नाम पर हो रहे हो-हल्ले से कुछ और हो या न हो उन लोगों के हौंसले अवश्य बढ़ेंगे जो प्राकृतिक सेक्स में असफल इसी तरह के अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों की आस में लगे रहते हैं।

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