भाजपा को “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” से दूर हटने और “सेकुलर” वायरस को गले लगाने की सजा BJP’s Defeat in 2009 Elections, Hindutva and Secularism

एक सज्जन हैं जो एक समय पर पक्के और ठोस कम्युनिस्ट थे, हिन्दुत्व और साम्प्रदायिकता को कोसने का जो फ़ैशन आज भी चलता है, उसी के ध्वजवाहक थे उन दिनों… आईआईटी मुम्बई के ग्रेजुएट बुद्धिजीवी। माकपा की छात्र इकाई, स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के सक्रिय कार्यकर्ता। जब ये साहब माकपा में थे तब उन्होंने मास्को का दौरा भी किया था और मुम्बई की लोकल ट्रेनों में “साम्प्रदायिकता” (ज़ाहिर है कि हिन्दू साम्प्रदायिकता) के खिलाफ़ सैकड़ों पोस्टर चिपकाये थे, ये पोस्टर जावेद आनन्द और तीस्ता सीतलवाड के साथ मिलकर इन्होंने संघ-विरोध और सेकुलर-समर्थन में लगाये थे। सस्पेंस बनाने की कोई तुक नहीं है, क्योंकि काफ़ी लोग इन सज्जन को जानते हैं, ये हैं “सुधीन्द्र कुलकर्णी”, जो 1998 में वाजपेयी के दफ़्तर (प्रधानमंत्री कार्यालय) में डायरेक्टर के पद पर रहे, 2004 में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव, और 2005 से आडवाणी के सलाहकार हैं, इनका मानना है कि भाजपा को संघ से अपना नाता तोड़ लेना चाहिये। माना जाता है कि इन्हीं की सलाह पर आडवाणी ने अपनी “इमेज” सुधारने(?) के लिए पाकिस्तान दौरे में जिन्ना की मज़ार पर सिर झुकाया और विश्वस्त सूत्रों की मानें तो नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा न मिले इसके लिये भी ये पर्दे के पीछे से प्रयासरत रहे। अब तो आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिये, कि आखिर भाजपा की वर्तमान दुर्गति कैसे-कैसे लोगों की सलाहकारी के कारण हो रही है। चुनाव हारने के बाद सारा ठीकरा वरुण गाँधी और नरेन्द्र मोदी के सिर फ़ोड़ने की कोशिश हो रही है, इसके पीछे भाजपा का वैचारिक पतन ही है।

हाल के लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद तमाम मंथन-वंथन हुए, पार्टी की मीटिंग-दर-मीटिंग हुईं, लेकिन नतीजा सिफ़र ही रहा और पार्टी को मजबूत करने के नाम पर भाजपाई नेता, नौ दिन में अढ़ाई कोस भी नहीं चल पाये। जमाने भर की मगजमारी और माथाफ़ोड़ी के बाद भी इतने बड़े-बड़े और विद्वान नेतागण यह समझने में नाकाम रहे कि भाजपा की इस हार की एक वजह “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” से दूर हटना और “सेकुलर” वायरस से ग्रस्त होना भी है। कालिदास की कथा सभी ने पढ़ी होगी जो जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे, भाजपा का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। 1984 में जब पार्टी को सिर्फ़ 2 सीटें मिली थीं, उसके बाद 1989, 1991, 1996, 1999 के चुनावों में पार्टी को 189 सीटों तक किसने पहुँचाया? प्रखर हिन्दुत्व और राष्ट्रवादी विचारों वाली पार्टी के वफ़ादार स्वयंसेवकों और प्रतिबद्ध भाजपाई वोटरों ने। इसमें आडवाणी की रथयात्रा के महत्व को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन जो प्रतिबद्ध वोटर हर बुरे से बुरे वक्त में भाजपा को वोट देता था उसे खारिज करने और उपेक्षित करने का काम 1999 से शुरु हुआ, खासकर जबसे पार्टी में “सत्ता” के कीटाणु घुसे।

सत्ता के इन कीटाणुओं ने प्रेस के एक वर्ग के साथ मिलकर पार्टी के भीतर और बाहर ऐसा माहौल बनाया कि भाजपा जब तक “सेकुलर”(?) नहीं बनेगी तब तक दिल्ली की सत्ता उसे नहीं मिलेगी। इस झाँसे में आकर कई ऊटपटांग गठबंधन किये गये, कई जायज-नाजायज समझौते किये गये, किसी तरह धक्के खाते-खाते 5 साल सत्ता चलाई। गठबंधन किया इसमें कोई हर्ज नहीं, लेकिन गठबंधन के सहयोगियों के ब्लैकमेल के आगे लगातार झुकते रहे यह सबसे बड़ी गलती रही। जब नायडू, बीजू, जयललिता, ममता, माया और फ़ारुक जैसे घोर अवसरवादी लोग अपनी शर्तें भाजपा पर थोपते रहे और मनवाते रहे, तब क्या भाजपा में इतना भी दम नहीं था कि वह अपनी एक-दो मुख्य हिन्दुत्ववादी और राष्ट्रवादी शर्तें मनवा पाती? असल में भाजपा के नेता सत्ता के मद में इतने चूर हो चुके थे कि वे भूल गये कि वे किस प्रतिबद्ध वोटर के बल पर 189 सीटों तक पहुँचे हैं, और उन्होंने राम-मन्दिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता आदि मुद्दों को दरी के नीचे दबा दिया। सेकुलरों की बातों में आकर आडवाणी को भी लगा कि शायद मुस्लिमों के वोट के बिना सत्ता नहीं मिलने वाली, सो वे भी जिन्ना की मज़ार पर जाकर सजदा कर आये (जबकि कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है कि मुस्लिम कभी थोक में भाजपा को वोट देंगे)।

भाजपा की सबसे बड़ी गलती (बल्कि अक्षम्य अपराध) रही कंधार प्रकरण… जिस प्रकरण से पार्टी अपनी ऐतिहासिक छवि बना सकती थी और खुद को वाकई में “पार्टी विथ डिफ़रेंस” दर्शा सकती थी, ऐसा मौका न सिर्फ़ गँवा दिया गया, बल्कि “खजेले कुत्ते की तरह पीछे पड़े हुए” मीडिया के दबाव में पार्टी ने अपनी जोरदार भद पिटवाई। वह प्रकरण पार्टी के गर्त में जाने की ओर एक बड़ा “टर्निंग पॉइंट” साबित हुआ। उस प्रकरण के बाद पार्टी के कई प्रतिबद्ध वोटरों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया, और पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में निराशा फ़ैलना शुरु हो चुकी थी। आज भी कांग्रेसी जब-तब हमेशा कंधार प्रकरण का उदाहरण देते फ़िरते हैं (यानी सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें सौ छेद)।

ज़रा याद करके बतायें कि कितने लोगों ने पिछले 5-7 साल में, धारा 370 को हटाने, राम सेतु को गिराने के मुद्दे, बांग्लादेशियों को खदेड़ने, असम में पाकिस्तानी झंडा लहराये जाने, कश्मीर में जारी कत्लेआम आदि राष्ट्रवादी मुद्दों पर भाजपा को बेहद आक्रामक मूड में देखा है? नहीं देखा होगा, क्योंकि “सत्ता के सुविधाभोग” में आंदोलनों की जो गर्मी थी, वह निकल चुकी। मीडिया और सेकुलर पत्रकारों ने भाजपा के नेताओं पर कुछ ऐसा जादू किया है कि पार्टी कुछ भी बोलने से पहले यह सोचती है कि “लोग क्या कहेंगे…?”, “मुस्लिम क्या सोचेंगे…?”, “पार्टी की छवि को नुकसान तो नहीं होगा…?”, यानी जिस पार्टी को “फ़्रण्टफ़ुट” पर आकर चौका मारना चाहिये था, वह “बैकफ़ुट” पर जाकर डिफ़ेंसिव खेलने लग पड़ी है। असल में पार्टी इस मुगालते में पूरी तरह से आ चुकी है कि मुसलमान उसे वोट देंगे, जबकि हकीकत यह है कि इक्का-दुक्का इलाकाई “पॉकेट्स” को छोड़ दिया जाये तो अखिल भारतीय स्तर पर भाजपा को मुसलमानों के 1-2 प्रतिशत वोट मिल जायें तो बहुत बड़ी बात होगी। लेकिन इन 1-2 प्रतिशत वोटों की खातिर अपने प्रतिबद्ध वोटरों को नाराज करने वाली, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाली पार्टी यानी भाजपा।

जब वरुण गाँधी पैदा भी नहीं हुए थे उस समय से भाजपा-संघ-जनसंघ, मुसलमानों के लिये एक “हिन्दू पार्टी” हैं। चाहे भाजपा सर के बल खड़ी हो जाये, डांस करके दिखाये, उठक-बैठक लगा ले, मुस्लिमों की ओर से उसे तालियाँ मिलेंगी, कुछ सेकुलर अखबारों में प्रशंसात्मक लेख मिल सकते हैं लेकिन वोट नहीं मिलेंगे। वन्देमातरम की बजाय किसी कव्वाली को भी यदि राष्ट्रगान घोषित कर दिया जाये तब भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे। फ़िर क्यों खामखा, सफ़ेद जाली वाली टोपी लगाकर इधर-उधर सम्मेलन आयोजित करते फ़िरते हो, क्यों खामखा हरे साफ़े और हरी चद्दरें विभिन्न मंचों पर ओढ़ते फ़िरते हो, इस कवायद की बजाय यदि अपने प्रतिबद्ध वोटरों की ओर ध्यान दिया होता तो शायद आज कांग्रेस के बराबर न सही उसके आसपास तो सीटें आतीं। माना कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को सत्ता में आने के लिये दूसरे समुदायों को भी अपने साथ जोड़ना पड़ता है, लेकिन क्या यह जरूरी है कि “सेकुलर कैबरे” करते समय अपने प्रतिबद्ध वोटरों और कार्यकर्ताओं को नज़र-अंदाज़ किया जाये? कांग्रेस की बात अलग है, क्योंकि उसकी तो कोई “विचारधारा” ही नहीं है, लेकिन भाजपा तो एक विचारधारा आधारित पार्टी है फ़िर कैसे वह अपने ही समर्पित कार्यकर्ताओं को भुलाकर अपनी मूल पहचान खो बैठी।

इन ताज़ा लोकसभा चुनावों में जो पार्टी अपने प्रतिबद्ध वोटरों से हटी, वही पिटी। बसपा ने “सोशल इंजीनियरिंग” का फ़ार्मूला अपनाकर ब्राह्मणों को पास लाने की कोशिश की तो उसका मूल आधार ही सरक गया, वामपंथियों ने अपनी सोच को खुला करके टाटा को लाने की कोशिश की, किसानों-गरीबों की जमीन छीनी, अपने प्रतिबद्ध वोटरों को नाराज कर दिया, उसके पटिये उलाल हो गये, यही भाजपा भी कर रही है। वरुण गाँधी के बयान के बाद भाजपा के नेता ऊपर बताये गये 1-2 प्रतिशत वोटों को खुश करने के चक्कर में कैमरे के सामने आने से बचते रहे, वरुण के समर्थन में बयान भी आया तो कब जब वरुण पीलीभीत में एक “शख्सियत” बन गये तब!!! ऐसा ढुलमुल रवैया देखकर कार्यकर्ता तो ठीक, आम वोटर भी भ्रमित हो गया। भाजपा को उसी समय सोचना चाहिये था कि मुल्ला-मार्क्स-मिशनरी-मैकाले के हाथों बिका हुआ मीडिया दिन-रात वरुण गाँधी के फ़ुटेज दिखा-दिखाकर एक जाल फ़ैला रहा है, और उस जाल में भाजपा आराम से फ़ँस गई, 1-2 प्रतिशत वोटरों को खुश करने के चक्कर में “श्योर-शॉट” मिलने वाले वोटों से हाथ धो लिया। भाजपा के प्रतिबद्ध वोटर जब नाराज होते हैं तब वे वोट नहीं करते, क्योंकि कांग्रेस को तो गिरी से गिरी हालत में भी दे नहीं सकते, और कार्यकर्ताओं का यह “वोट न देना” तथा ज़ाहिर तौर पर अन्य मतदाताओं को वोट देने के लिये प्रेरित न करना भाजपा को भारी पड़ जाता है, कुछ-कुछ ऐसा ही इस चुनाव में भी हुआ है। जो पार्टी अपने खास वोटरों को अपना बँधुआ मजदूर समझती हो और उसे ही नाराज करके आगे बढ़ना चाहती हो, उसका यह हश्र हुआ तो कुछ गलत नहीं हुआ। भाजपा ने वर्षों की मेहनत से एक खून-पसीना बहाने वाला कार्यकर्ता और एक प्रतिबद्ध वोटरों का समूह खड़ा किया था। विश्वास जमने में बरसों का समय लगता है, टूटने में एक मिनट भी नहीं लगता। हिन्दू वोटरों को विश्वास था कि भाजपा उनके मुद्दे उठायेगी, चारों तरफ़ जब हिन्दुओं को गरियाया-लतियाया जा रहा हो तब भाजपा हिन्दुओं के पक्ष में खम-ताल ठोंककर खड़ी होगी, लेकिन ये क्या? “सत्ता प्रेम” इतना बढ़ गया कि प्रमुख मुद्दों को ही गठबंधन के नाम पर भूल गये… और गठबंधन भी किनसे, जो मेंढक हैं, थाली के बैंगन हैं, जब चाहे जिधर लुढ़क जाते हैं, उनसे? ऐसे नकली गठबंधन से तो अकेले चलना भला… धीरे-धीरे ही सही 2 से 189 तक तो पहुँचे थे, कुछ राज्यों में सत्ता भी मिली है, क्या इतना पर्याप्त नहीं है? दिल्ली की सत्ता के मोह में “सेकुलर कीचड़” में लोट लगाने की क्या आवश्यकता है? वह कीचड़ भरा “फ़ील्ड” जिस टाइप के लोगों का है, तुम उनसे उस “फ़ील्ड” में नहीं जीत सकते, फ़िर क्यों कोशिश करते हो?

(भाग-2 में जारी रहेगा… — अगले भाग में भाजपा और मीडिया के रिश्तों पर कुछ खरी-खरी…)

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37 Comments

  1. khursheed said,

    July 10, 2009 at 8:05 am

    भाजपा को २ से १८९ तक देशव्यापी दंगे और नफरत की राजनीती ने पहुचाया और एक बार फिर अगर वो सत्ता में वापिस आना चाहती है तो देशव्यापी दंगा भाजपा को एक बार फिर से कराना पड़ेगा. मगर अफ़सोस देश की जनता अब समझदार हो चुकी है और वो भाजपा की फिजूल बातो में आने को तैयार नहीं है.

  2. khursheed said,

    July 10, 2009 at 8:05 am

    भाजपा को २ से १८९ तक देशव्यापी दंगे और नफरत की राजनीती ने पहुचाया और एक बार फिर अगर वो सत्ता में वापिस आना चाहती है तो देशव्यापी दंगा भाजपा को एक बार फिर से कराना पड़ेगा. मगर अफ़सोस देश की जनता अब समझदार हो चुकी है और वो भाजपा की फिजूल बातो में आने को तैयार नहीं है.

  3. संजय बेंगाणी said,

    July 10, 2009 at 8:05 am

    एक वोटर के नाते खरी खरी सुना दी…

    एक चिंतन मैने भी किया था, मगर पार्टी नहीं उसके मतदाताओं पर….लगता है लिखना अब पड़ेगा 🙂

  4. July 10, 2009 at 8:05 am

    एक वोटर के नाते खरी खरी सुना दी…एक चिंतन मैने भी किया था, मगर पार्टी नहीं उसके मतदाताओं पर….लगता है लिखना अब पड़ेगा 🙂

  5. संजय बेंगाणी said,

    July 10, 2009 at 8:07 am

    खुर्शीत बात पर हँसा ही जा सकता है. वे पहले इतिहास पढ़े तो अच्छा है, फिर भी खुश फहमी पालने का हक सबको है.

  6. July 10, 2009 at 8:07 am

    खुर्शीत बात पर हँसा ही जा सकता है. वे पहले इतिहास पढ़े तो अच्छा है, फिर भी खुश फहमी पालने का हक सबको है.

  7. राज भाटिय़ा said,

    July 10, 2009 at 9:23 am

    आप ने सच लिखा है, अगली कडी का इंतजार रहेगा.
    धन्यवाद

  8. July 10, 2009 at 9:23 am

    आप ने सच लिखा है, अगली कडी का इंतजार रहेगा.धन्यवाद

  9. मिहिरभोज said,

    July 10, 2009 at 11:49 am

    कौवे ने हंस की चाल चलने की कौशिश की या यूं कहें कि इन्होने सैक्यूलरिज्म का लबादा ओढने की कोशिस तो न ये घोङे रहे न ही गधे…मतदाता को इनके राष्ट्रवाद पर शक हुआ और सैक्यूलर ये पहले से ही नहीं थे….अर्थात खच्चर हो गये और खच्चरों के संतान नहीं होती सुरेश भाई …..अगर इन्होने सुधींद्र कुलकर्णी जैसों को निकाल बाहर नहीं किया तो जनता इनको खुरच खुरच कर बाहर कर देगी….आपने हमेशा की भांती सटीक लिखा ….साधुवाद

  10. July 10, 2009 at 11:49 am

    कौवे ने हंस की चाल चलने की कौशिश की या यूं कहें कि इन्होने सैक्यूलरिज्म का लबादा ओढने की कोशिस तो न ये घोङे रहे न ही गधे…मतदाता को इनके राष्ट्रवाद पर शक हुआ और सैक्यूलर ये पहले से ही नहीं थे….अर्थात खच्चर हो गये और खच्चरों के संतान नहीं होती सुरेश भाई …..अगर इन्होने सुधींद्र कुलकर्णी जैसों को निकाल बाहर नहीं किया तो जनता इनको खुरच खुरच कर बाहर कर देगी….आपने हमेशा की भांती सटीक लिखा ….साधुवाद

  11. त्यागी said,

    July 10, 2009 at 12:58 pm

    खुर्शीद जैसे दिव्ये आत्मा ने बीजेपी के दो दशक के इतिहास को बता ही दिया. और इन्ही महान वोटो के लिए साष्टांग किया जा रहा है. मोटी बात है जिनको दो देश और एक प्रदेश पूरा दे दिया वो आज भी तुम्हे काफिर कहते है और अभी भी धमका रहे है तो हिन्दुओ का होगा क्या. http://parshuram27.blogspot.com/

  12. July 10, 2009 at 12:58 pm

    खुर्शीद जैसे दिव्ये आत्मा ने बीजेपी के दो दशक के इतिहास को बता ही दिया. और इन्ही महान वोटो के लिए साष्टांग किया जा रहा है. मोटी बात है जिनको दो देश और एक प्रदेश पूरा दे दिया वो आज भी तुम्हे काफिर कहते है और अभी भी धमका रहे है तो हिन्दुओ का होगा क्या. http://parshuram27.blogspot.com/

  13. rajitsinha said,

    July 10, 2009 at 1:32 pm

    अच्छा लेख है … यही बात डा. वैद प्रताप वैदिक ने भी कुछ दिनो पहले अपने एक आलेख मे कही थी बेहद संतुलित शब्दो में. लेकिन वही बात कहने का आपका तरीका बहुत शानदार रहा.

  14. rajitsinha said,

    July 10, 2009 at 1:32 pm

    अच्छा लेख है … यही बात डा. वैद प्रताप वैदिक ने भी कुछ दिनो पहले अपने एक आलेख मे कही थी बेहद संतुलित शब्दो में. लेकिन वही बात कहने का आपका तरीका बहुत शानदार रहा.

  15. BS said,

    July 10, 2009 at 6:42 pm

    इसका मतलब हुआ कि भाजपा को हराकर हमने एक घोर धर्मनिरपेक्ष सरकार बनने से रोक दिया वर्ना पता नहीं ये नये नये धर्मनिरपेक्ष लोग पता नहीं हिन्दुओं को कितना लतियाते।

  16. BS said,

    July 10, 2009 at 6:42 pm

    इसका मतलब हुआ कि भाजपा को हराकर हमने एक घोर धर्मनिरपेक्ष सरकार बनने से रोक दिया वर्ना पता नहीं ये नये नये धर्मनिरपेक्ष लोग पता नहीं हिन्दुओं को कितना लतियाते।

  17. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    July 11, 2009 at 3:50 am

    सुरेश जी, क्या बात है आप अपनी बात को ही काटते दिख रहे है….अभी कुछ दिनो पहले आपने कहा की शायद ईवीएम मशीनों मे गडबड की गयी थी इस वजह से हारे…अब कह रहे है की भाजपा के वोटर ने वोट नही किया..

    लगता है इतनी बुरी तरह हार बर्दाश्त नही हुई।

    @ रही बात खुर्शीद जी की तो उन्होने वही कहा है जो सुरेश जी कह रहे है लेकिन बस अलफ़ाज़ो का हेरफ़ेर है…

    @ त्यागी जी, पहली बात काफ़िर गाली नही है तो आप इतना गुस्सा ना होयें। सनातन धर्म का पालन करने वाले लोगो को हमेशा काफ़िर ही कहा जाता है क्यौंकी काफ़िर का मतलब कुफ़्र करने वाला/इन्कारी…जो अल्लाह के कलाम को न मानें..अल्लाह के रसुल को रसुल ना मानें…

  18. July 11, 2009 at 3:50 am

    सुरेश जी, क्या बात है आप अपनी बात को ही काटते दिख रहे है….अभी कुछ दिनो पहले आपने कहा की शायद ईवीएम मशीनों मे गडबड की गयी थी इस वजह से हारे…अब कह रहे है की भाजपा के वोटर ने वोट नही किया..लगता है इतनी बुरी तरह हार बर्दाश्त नही हुई।@ रही बात खुर्शीद जी की तो उन्होने वही कहा है जो सुरेश जी कह रहे है लेकिन बस अलफ़ाज़ो का हेरफ़ेर है…@ त्यागी जी, पहली बात काफ़िर गाली नही है तो आप इतना गुस्सा ना होयें। सनातन धर्म का पालन करने वाले लोगो को हमेशा काफ़िर ही कहा जाता है क्यौंकी काफ़िर का मतलब कुफ़्र करने वाला/इन्कारी…जो अल्लाह के कलाम को न मानें..अल्लाह के रसुल को रसुल ना मानें…

  19. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    July 11, 2009 at 3:57 am

    और एक बात तो कहना भुल गया की

    इस्लाम मे पक्की कब्र और दरगाह सख्त मना है…ये कुफ़्र है, शिर्क है और इसकी माफ़ी नही है..

    लेकिन हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बागंलादेश के मुस्लमानॊं के दिल दिमाग मे "कुछ कथित मौलवियों" ने इस तरह से भर दिया है की इसको निकालने के लिये हम जैसे लोगो को बहुत मेहनत करनी पड रही है..लेकिन इन्शाल्लाह एक दिन ये गन्दगी हम साफ़ कर ही लेंगे।

  20. July 11, 2009 at 3:57 am

    और एक बात तो कहना भुल गया कीइस्लाम मे पक्की कब्र और दरगाह सख्त मना है…ये कुफ़्र है, शिर्क है और इसकी माफ़ी नही है..लेकिन हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बागंलादेश के मुस्लमानॊं के दिल दिमाग मे "कुछ कथित मौलवियों" ने इस तरह से भर दिया है की इसको निकालने के लिये हम जैसे लोगो को बहुत मेहनत करनी पड रही है..लेकिन इन्शाल्लाह एक दिन ये गन्दगी हम साफ़ कर ही लेंगे।

  21. Suresh Chiplunkar said,

    July 11, 2009 at 5:50 am

    @ खुर्शीद – शायद अभी आपने कांग्रेस का पूरा इतिहास और कांग्रेसियों की फ़ितरत को ठीक से समझा नहीं है, इसीलिये भाजपा को कोस रहे हैं… 1980 में भाजपा का जन्म हुआ, 1980 से पहले के दंगों पर नज़र डालियेगा कभी समय मिले तो, नरेन्द्र मोदी भी शर्मा जायेंगे कांग्रेसियों के सामने…

    @ काशिफ़ आरिफ़ – इसे कहते हैं "कूद कर नतीजे पर पहुँचना…"। वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की बात अपनी जगह पर कायम है ही, यहाँ बात हो रही है कर्मठ कार्यकर्ताओं और प्रतिबद्ध मतदाताओं में फ़ैली निराशा और हताशा की…। कथित "सेकुलर" नीतियों और राष्ट्रवाद को भूलने की वजह से भाजपा को वोट देने वाला काफ़ी बड़ा वर्ग घर से बाहर नहीं निकला वोट देने। अब भाजपा में काबिज यही वर्ग नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी पर निशाना साध रहा है… खैर इससे आपको क्या? आपके लिये तो यह खुशी की ही बात है कि कांग्रेस सत्ता में है और 5 साल और रहेगी… आप तो कमरतोड़ महंगाई की मार झेलिये और राहुल बाबा के गुणगान करने वालों का साथ दीजिये…। भाजपा के सत्ता में नहीं आने की खुशियाँ मनाईये और कांग्रेसियों द्वारा स्विस बैंकों में जमा पैसे को भूल जाईये। मैं ऐसा नहीं कर सकता, मैं तो हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद से दूर हटने वाले भाजपाईयों की भी खबर लूंगा।
    @ काशिफ़ आरिफ़ (2) – ये कब्र-दरगाह वाली बात इस पोस्ट में कहाँ से आ गई? बात हो रही है खेत की आप पहुँच गये खलिहान में?

  22. July 11, 2009 at 5:50 am

    @ खुर्शीद – शायद अभी आपने कांग्रेस का पूरा इतिहास और कांग्रेसियों की फ़ितरत को ठीक से समझा नहीं है, इसीलिये भाजपा को कोस रहे हैं… 1980 में भाजपा का जन्म हुआ, 1980 से पहले के दंगों पर नज़र डालियेगा कभी समय मिले तो, नरेन्द्र मोदी भी शर्मा जायेंगे कांग्रेसियों के सामने… @ काशिफ़ आरिफ़ – इसे कहते हैं "कूद कर नतीजे पर पहुँचना…"। वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की बात अपनी जगह पर कायम है ही, यहाँ बात हो रही है कर्मठ कार्यकर्ताओं और प्रतिबद्ध मतदाताओं में फ़ैली निराशा और हताशा की…। कथित "सेकुलर" नीतियों और राष्ट्रवाद को भूलने की वजह से भाजपा को वोट देने वाला काफ़ी बड़ा वर्ग घर से बाहर नहीं निकला वोट देने। अब भाजपा में काबिज यही वर्ग नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी पर निशाना साध रहा है… खैर इससे आपको क्या? आपके लिये तो यह खुशी की ही बात है कि कांग्रेस सत्ता में है और 5 साल और रहेगी… आप तो कमरतोड़ महंगाई की मार झेलिये और राहुल बाबा के गुणगान करने वालों का साथ दीजिये…। भाजपा के सत्ता में नहीं आने की खुशियाँ मनाईये और कांग्रेसियों द्वारा स्विस बैंकों में जमा पैसे को भूल जाईये। मैं ऐसा नहीं कर सकता, मैं तो हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद से दूर हटने वाले भाजपाईयों की भी खबर लूंगा। @ काशिफ़ आरिफ़ (2) – ये कब्र-दरगाह वाली बात इस पोस्ट में कहाँ से आ गई? बात हो रही है खेत की आप पहुँच गये खलिहान में?

  23. cmpershad said,

    July 11, 2009 at 7:07 am

    सत्ता जो न कराये कम है:)

  24. cmpershad said,

    July 11, 2009 at 7:07 am

    सत्ता जो न कराये कम है:)

  25. GJ said,

    July 11, 2009 at 8:26 am

    very soon you going to score a Century

    very soon you are going to have your 100th blog follower

    very soon ….

    Your excellent post has been back-linked in
    http://hinduonline.blogspot.com/

  26. GJ said,

    July 11, 2009 at 8:26 am

    very soon you going to score a Centuryvery soon you are going to have your 100th blog followervery soon ….Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/

  27. RAJ SINH said,

    July 11, 2009 at 11:24 am

    अरे आसिफ़ो कासिफ़ोन ,
    यही समस्या है . तुम उन्हेन काफ़िर कहो और वे तुम्हेन मलेक्छ और यवन . और मियान सपने तो देख ही सकते हो . हकीकत जान लो तुम्हरे अल्लामा तक कह गये ….कुछ बात है कि हस्ती मितती नहीन हमारी …तो कभी वन्दे मातरम कहना ना कहना लेकिन यह जरूर जान लेना जिस तलवार के जोर से इस्लाम जो कुछ भी यहान तिका उस्मे और उस्के किसी फ़ैलाव मे निरीह नारी जरूर थी और उस मा के खून का आदर करना तुम्से भुल्वा दिया गया है . ऐसा दम्भ अब इस मुल्क मे इस्लाम को स्थापित नहीन करेगा , इस देश से इस्लाम को मिटा देगा क्योन्कि इतिहास पढ लो , इस्लाम को इस देश मे तिकने के लिये समझौते कर्ने पडे थे . और ये दर्गाहेन वगैरह वही सम्झौतोन की निशानियान हैन .

  28. RAJ SINH said,

    July 11, 2009 at 11:24 am

    अरे आसिफ़ो कासिफ़ोन ,यही समस्या है . तुम उन्हेन काफ़िर कहो और वे तुम्हेन मलेक्छ और यवन . और मियान सपने तो देख ही सकते हो . हकीकत जान लो तुम्हरे अल्लामा तक कह गये ….कुछ बात है कि हस्ती मितती नहीन हमारी …तो कभी वन्दे मातरम कहना ना कहना लेकिन यह जरूर जान लेना जिस तलवार के जोर से इस्लाम जो कुछ भी यहान तिका उस्मे और उस्के किसी फ़ैलाव मे निरीह नारी जरूर थी और उस मा के खून का आदर करना तुम्से भुल्वा दिया गया है . ऐसा दम्भ अब इस मुल्क मे इस्लाम को स्थापित नहीन करेगा , इस देश से इस्लाम को मिटा देगा क्योन्कि इतिहास पढ लो , इस्लाम को इस देश मे तिकने के लिये समझौते कर्ने पडे थे . और ये दर्गाहेन वगैरह वही सम्झौतोन की निशानियान हैन .

  29. दिलीप कवठेकर said,

    July 12, 2009 at 8:55 am

    वन्देमातरम की बजाय किसी कव्वाली को भी यदि राष्ट्रगान घोषित कर दिया जाये तब भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे।

    बात खरी खरी सुनाई. मगर यहां हम दूसरे रास्ते पर जाने लगे हैं.

    दुख की बात यह है कि धर्म निरपेक्षता का अर्थ हमें वो लोग सिखा रहे है, जिनका धर्म मात्र अवसरवाद है. हम चाहे जो भी कुछ सोचें, आम तबका आज रोज़ी रोटी की जुगाड़ में ज़्यादा बावला हुआ जा रहा है.बाकी सांपनाथ और नागनाथ सभी जगह बिल बिला रहे है, और वातावरण दूषित कर रहे हैं.

    मीडिया के बारे में सत्य लिख रहे हैं–मुल्ला-मार्क्स-मिशनरी-मैकाले के हाथों बिका हुआ मीडिया-

  30. July 12, 2009 at 8:55 am

    वन्देमातरम की बजाय किसी कव्वाली को भी यदि राष्ट्रगान घोषित कर दिया जाये तब भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे। बात खरी खरी सुनाई. मगर यहां हम दूसरे रास्ते पर जाने लगे हैं.दुख की बात यह है कि धर्म निरपेक्षता का अर्थ हमें वो लोग सिखा रहे है, जिनका धर्म मात्र अवसरवाद है. हम चाहे जो भी कुछ सोचें, आम तबका आज रोज़ी रोटी की जुगाड़ में ज़्यादा बावला हुआ जा रहा है.बाकी सांपनाथ और नागनाथ सभी जगह बिल बिला रहे है, और वातावरण दूषित कर रहे हैं.मीडिया के बारे में सत्य लिख रहे हैं–मुल्ला-मार्क्स-मिशनरी-मैकाले के हाथों बिका हुआ मीडिया-

  31. kailash tiwari said,

    July 12, 2009 at 6:46 pm

    suresh ji
    BHP har ka achchha postmortem kiya hai.yah lekh par kar BJP ko anty virous dose lena chahie ,taki vah secular virous se mukt ho sake.

  32. July 12, 2009 at 6:46 pm

    suresh ji BHP har ka achchha postmortem kiya hai.yah lekh par kar BJP ko anty virous dose lena chahie ,taki vah secular virous se mukt ho sake.

  33. Rakesh Singh - राकेश सिंह said,

    July 14, 2009 at 8:08 pm

    सुरेश जी बहुत अच्छा लिखा है | अच्छा लिखने का आशीर्वाद भी मिल रहा है आपको, लीजिये हम भी आ गए इधर और आपके फोल्लोवेर्स की संख्या को १०१ तक पहुंचा दिया | बधाई हो |

  34. July 14, 2009 at 8:08 pm

    सुरेश जी बहुत अच्छा लिखा है | अच्छा लिखने का आशीर्वाद भी मिल रहा है आपको, लीजिये हम भी आ गए इधर और आपके फोल्लोवेर्स की संख्या को १०१ तक पहुंचा दिया | बधाई हो |

  35. khursheed said,

    July 15, 2009 at 8:30 am

    सुरेश जी बच्चा समझ लिया है क्या १९८० में जनसंघ ने अपना केचुल बदलकर भाजपा का केचुल पहना था.

  36. khursheed said,

    July 15, 2009 at 8:30 am

    सुरेश जी बच्चा समझ लिया है क्या १९८० में जनसंघ ने अपना केचुल बदलकर भाजपा का केचुल पहना था.

  37. smart said,

    July 20, 2009 at 5:14 am

    उत्तर प्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी का घर जलाने वाले "मुसलमान" को मायावती ने मंत्री बना कर जैसे उसे इनाम दिया है और आगे आने वाले भविष्य की भयानक तस्वीर पेश की है. मायावती की कृपा पाने के लिए कुछ लोगों ने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष का घर जलाया,ये एक शुरुआत है आगे कोई कुछ और जलाएगा और कहीं कोई देश नहीं जला दे. ऐसा लग रहा है जैसे एक नए किस्म का आतंकवाद जन्म ले रहा है जिसको "दलित आतंकवाद" कहा जा सकता है. यदि समय रहते गैर दलित नहीं चेते तो गंभीर परिणाम भुगतने को मिलेंगे,क्योंकि दलितों को सरकारी संरक्षण मिला हुआ है और ये लोग उसको आधार बना कर दादागिरी करते हैं.


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