>एक व्यंग: सुदामा फिर आइहौ….

>सुदामा की पत्नी ने अपनी व्यथा कही ….
‘ हे प्राण नाथ ! या घर ते कबहूँ न बाहर गयो,यह पुरातन फ्रीज़ और श्वेत-श्याम टी०वी० अजहूँ ना बदली जा सकी.पड़ोस की गोपिकाएं कहती हैं ‘हे सखी! आज-कल आप के बाल-सखा श्रीकृष्ण का राज दरबार दिल्ली में है.आप दिल्ली में द्वारिका की यात्रा क्यों नहीं करते? क्यों नहीं मिल आते एक बार ? कम से यह कष्ट तो कट जाते प्राणनाथ!
‘हे प्राणेश्वरी !कितने वर्ष बीत गए. अब कौन पहचानेगा मुझे? बचपन की बात और थी जब हम साथ-साथ गौएँ चराया करते थे और वह चैन की वंशी बजाया करते थे .उनकी बात और है .वह भाग्य के प्रबल हैं.पूर्व में गोपिकाओं से घिरे रहते थे अब सेविकाओं से. हे स्वामिनी! मुझे आवश्यकता नहीं है ‘दिल्ली’ यात्रा की. हम संतुष्ट हैं अपने पुरातन फ्रिज व श्वेत-श्याम टी ०वी० से .क्या हुआ? फ्रिज में पानी ठंडा होता तो है.टीवी में ‘चित्रहार’ रंगोली आती तो है .चित्र हिलता है तो क्या?गाता तो है. अरे बावरी !औरों को गाडी बँगला टेंडर चाहिए ,हम निर्धन ब्राह्मण लिपिकों को लिफाफा बंद दान-दक्षिणा ही पर्याप्त है “-सुदामा ने कहा
कहते हैं सुन्दर स्त्रियों के अमोघ अस्त्र होते है उनके आंसू. एक बार निकले तो उसकी उषणता से पुरुष पिघल जाता है और यदा-कदा चुल्लू भर आंसू में डूब भी जाता है .सब अस्त्र चूक सकते है ,पर यह नहीं.पति नामक निरीह प्राणी फिर समर्पण कर देता है .यही इसका रहस्य है.अंततोगत्वा सुदामा जी को एक आदर्श पति की भांति,पत्नी की बात माननी पड़ी. इच्छा न होते हुए भी ‘दिल्ली’ में द्वारिका की यात्रा करनी पडी सुदामा की पत्नी एक सुयोग्य व विदुषी महिला थी /यात्रा -पथ के लिए उन्होंने पूडी-सब्जी , मिस्थान के अतिरिक्त एक पोटली और तैयार की विशेष रूप से श्री कृष्ण के द्वारपाल को भेंट देने के लिए चल पड़े सुदामा
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‘ऐ ठहरो ! कौन हो तुम? किससे काम है?-द्वारपाल ने बन्दूक की बट टोंकते हुए कड़कती आवाज़ में कहा
”भइए मैं ,मैं हूँ सुदामा.,श्री कृष्ण ले बाल-सखा मित्र से मिलना है ”
” मिलना है? हूँ !”- द्वारपाल ने एक व्यंगात्मक व परिहासजन्य कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा -‘ मिलाना है? अरे ! अपना रूप देखा है?
साहब के बाल-सखा है ! चला आया मिलने ! हूँ ,अप्वांतमेंट लिया है?”-द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की.
“ई अपैंत्मेंट का होत है भैया ? हम ठहरे बाल-सखा बाल-सखा सुदामा गोकुल में साथ-साथ गौएँ चराया करते थे ”
” तो जाकर चराओ न , इधर काहे वास्ते माथा खाता है तुम्हारे जैसा दर्ज़नों सुदामा आता है इधर साहब का मिलने वास्ते . साहब तुम जैसे चरवाहों से मिलना शुरू कर देगा कल वह भी उधर गौएँ चराता नज़र आएगा. चलो हटो ! अपना काम करो शीश पगा न झगा तन पे “-द्वारपाल ने सुदामा को परे धकेलते हुए कहा
दीन दुखी सुदामा धकियाये जाने के बाद ,बाहर सीढियों पे बैठ गए.सुदामा जो ठहरे ब्राहमण आदमी ,स्वभावगत भीरू व निश्छल आज तक लाठी-पैना के अतिरिक्त कोई अस्त्र-शस्त्र तो देखा नहीं था ,बन्दूक मशीनगन देख वैसे ही पसीना छूटने लगा मन ही मन कभी स्वयं को ,कभी पत्नी को कोसने लगे.अच्छा-भला ,शान्ति पूर्वक जीवन यापन कर रहा था ,व्यर्थ में फंसा दिया इस माया जाल में .श्वेत-श्याम टी 0 वी० ?अरे नहीं बदलता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ? और एक यह द्वारपाल का बच्चा कि खडा है द्वार पर पहाड़ की तरह .प्रवेश की अनुमति ही नहीं दे रहा है .इसीलिए कहते हैं की स्त्रियों की बात कदापि नहीं माननी चाहिए.साथ ही यदि वह स्त्री चतुर हो तो भूलवश भी नहीं .कहती थी यह पोटली दे दीजियेगा द्वारपाल को.हूँ ! यहाँ गाडी-मोटर वाले को तो कोई पूछता नहीं तो यह पोटली कौन सा तीर मार लेगी.? सुदामा जी ने कुछ साहस बटोर कर एक बार पुन: प्रयास किया .
” भइए ! अपैंतमेंट तो नहीं लाया है ,यह पोटली लाया हूँ तुम्हारे लिए,तुम्हारी भाभी ने दी है.”
द्वारपाल ने ,कक्ष के कोने में जाकर पोटली का थोडा मुख खोला पूर्ण मुख खोलने से आचार-संहिता के उल्लंघन की संभावना थी कर्तव्यनिष्ठा पर आंच आ सकती थी पोटली के भीतर कागज़ के कुछ हरे-हरे व कड़े-कड़े दुकडे नज़र आये. द्वारपाल की आँखों में एक विशेष चमक व चहरे पर एक संतोष भाव उभर आया.
जब वह अपने आस-पास देख ,पूर्ण रूप से आश्वस्त हो गया की यह सुखद क्रिया किसी अन्य आगंतुक ने नहीं देखी तो झट पोटली बंद कर अपने पास रख ली.फिर मुड़ कर वाणी में मिठास घोलते हुए कहा -” तो भईए सुदामा ! दिल्ली नगरी कब पहुँचे? रास्ता में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?
सुदामा जी स्तब्ध व अचम्भित हो गए. अभी अभी यह करेला नीम चढा था ‘रसगुल्ला कैसे बन गया? बिनौला था रसीला कैसे हो गया ?
सुदामा जी ब्राह्मण ठहरे ,द्रवीभूत हो गए.’भईया’ कितना प्यारा सम्बोधन दिया है.अपनापन उभर आया होगा . काश! धर्मपत्नी की बात मान पहले ही यह पोटली भेंट कर दी होती. परन्तु क्या था उस पोटली में की वाणी में मिठास आ गयी ? अवश्य ही नए गुड की डली रही होगी.पत्नी ने हमी से छुपाई थी यह बात . हो सकता है द्वारपाल महोदय पिघल गए होंगे . हमने भी तो भाभी का रिश्ता देकर सौंपी थी. पोटली आहा ! क्या द्वापर युग है .भेंट-दक्षिणा ‘द्वार पर ‘से ही शुरू.
सुदामा जी को मालूम नहीं ,कौन सी ‘विलक्षण’ वास्तु उस पोटली में हमें ज्ञात नहीं.यह रहस्य मात्र दो व्यक्ति जानते थे -एक द्वारपाल और दूसरे सुदामा की पत्नी.
उक्त पोटली के प्रभाव से सुदामा जी अन्दर पहुँच गए.
अन्दर ,श्रीकृष्ण जी ,मसनद के सहारे ,केहुँनी टिकाए लेते हुए हैं.अब मोर -मुकुट पीताम्बर की जगह खद्दर का कुरता,पायजामा ,जवाहर जैकेट , गांधी-टोपी है.अब छछिया भरी छाछ पे नहीं नाचते हैं ,अपितु कोटा-लाइसेंस के लिए अपने भक्तों को नचाते हैं .माखन की गगरी में नहीं ,वोट की नगरी में सेंध लगाते है.फल-फूल रखा है,अधिकारी ,व्यापारी,दरबारी घेरे खड़े हैं.कई सुदामा अपनी-अपनी झोली फैलाए खड़े है.किसी को तबादला करवाना है,किसी को तबादला रुकवाना है.किसी को परमिट चाहिए ,किसी को कोटा,बड़े लडके को मेडिकल में एड्मिसन दिलाना है.साहब एक संस्तुति -पत्र लिख दें तो कार्य सिद्ध हो जाएगा.भीतर चकाचौंध है.कुछ झोलाधारी,कुछ चश्माधारी .कुछ दाढ़ी बढाए ,कुछ मुंह लटकाए.कुछ स्वस्तिवाचन करते .कुछ स्तुतिगान करते.खड़े है
” सर ! आप तो जानते हैं कि कितने वर्ष से इस पार्टी कि निस्वार्थ सेवा कर रहा हूँ सर! एक गैस एजेन्सी मिल जाती तो ….. टेलीफोन कि घंटियाँ बज रही है टेलीफोन आ रहा है….टेलीफोन जा रहा है…….’हेलो हेलो …मैं मंत्री निवास से बोल रहा हूँ …हेलो हेलो आप सुन रहे हैं ना ….साहब की इच्छा है ……साहब चाहतें हैं …..आप सुन रहे हैं ना….साहब ने पूछा है….साहब कह रहें हैं…..साहब माँगते है……अच्छा ऐसा कर दीजिएगा ….नहीं नहीं ….लगता है…आप सुन नहीं रहे हैं…..टिकना मुश्किल हो जाएगा आप का ……आप दिल्ली आकर मिलिए …
दरबार चल रहा है.चर्चा चल रही है देश की..विदेश की . ‘गोकुल’ की नहीं “अयोध्या’ की .’मथुरा ‘ की नहीं ‘राम-जन्म भूमि’ की. ‘राधा’ की नहीं ‘छमिया ‘ की.ग्वाल-बाल की नहीं ‘मंडल ‘की वैसे साहब का अपना ‘बरसाना ‘ भी है
एक कोने में ‘सुदामा जी’ निरीह व निस्वार्थ भाव से औचक खड़े है. आज के कृष्ण सुदामा को नहीं पहचानते.अब दौड़ कर नहीं आते.बहुत सुदामा पैदा हो गए हैं.तब से अबतक .दिल्ली में सुदामा का पहचानना आवश्यक भी नहीं .पांच साल में मात्र एक बार तो पहचानना है ,जा कर पहचान लेंगे निर्वाचन क्षेत्र में पखार लेंगे पाँव एक बार
सुदामा जी के मुख पर संकोच का भाव है .यहाँ लोग कितने मिस्थान के पैकेट लाएं है और एक मैं कि कुछ नहीं लाया एक पोटली लाया भी था तो उस द्वारपाल के बच्चे ने रख लिया .विगत पचास-साठ साल से दिल्ली के किसी कोने में भारत का सुदामा आज भी खडा है ,अपने श्रीकृष्ण से मिलने के लिए .आज भी सुदामा दीन-हीन निरुपाय है आज भी ” शीश पगा न झगा तनte पे ‘है
साहब उठ गए.दरबार ख़त्म हो गया अन्य लोग भी उठ कर जाने लगे.साहब को किसी जन सभा में जाना है .भाषण देना है भारत कि दीन-हीन गरीबी पर.उनकी झोपडी पर जहाँ विकाश का रथ अभी तक नहीं पहुंचा है.उन गरीब भाइयों पर जहाँ अँधेरा है.भीड़ चल रही है .एक युवा तुर्क व्यक्ति आगे-आगे रास्ता बनाते चल रहा है …’हटिये हटिये …जरा बाएँ हो जाएँ…भाई साहब …भीड़ मत लगाइए ..अभी साहब को जाना है..’- भीड़ छंट कर अगल-बगल हो जाती है कि अचानक साहब कि दृष्टि सुदामा पर पड़ती है
‘अरे सुदामा! ? कब आए?’
‘दर्शन करने आ गया सखे !’- वाणी में विह्वलता व ह्रदय में प्रेम भर कर सुदामा ने कहा
‘ ओ० के० ओ० के० फिर मिलना ‘
भीड़ सुदामा को पीछे धकेलते आगे बढ़ जाती है
०० ००० ००००
सुदामा का भ्रम टूट गया.सखापन वाष्प बन कर उड़ गया .मन भारी हो गया.अंतर्मन आर्तनाद से भर उठा.गला रुंध गया आँखों में प्रेम के आंसू छलछला गए.
धीरे -धीरे बोझिल कदमों से बाहर आ गए
‘ भैये भेंट हो गयी अपने बाल-सखा से ?–द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की
सुदामा बंगले की सीढियां उतरते सड़क पर आ गए
” फिर आईहौ लला ! पोटली लाना न भूलिअहौ”- द्वारपाल ने आवाज़ लगाईं
अस्तु!

—-आनंद

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