>नव गीत – डा. श्याम गुप्त

>ना उम्मीदी ने हर मन में,

अविश्वास पनपाया॥
असली से भी सुन्दर,नकली-
पुष्प हुआ करते हैं;
लाचारी है बाज़ारों में,
वही बिका करते हैं।
बिन्दु-बिन्दु पर घटा-बढी है,
गुणा भाग की माया॥
चौकीदार चोर बन बैठे,
जनता की तकदीर;
जन जन है लाचार, चोर-
बन बैठे आज वज़ीर।
विश्वासों में घटा टोप,
अन्धियारा सा छाया॥
अब तो भोग प्रभु का पाकर,
भक्त रुग्ण होजाते;
धर्म और श्रद्धा,त्रष्णा के,
झुरमुट में खोजाते।
बाज़ारों ने ,सौदा करने का,
निज धर्म निभाया॥
पथरीली राहें दिखलाते,
मठ मस्ज़िद चौपाल;
बात बात पर सडकों पर,
आजाते बाल-गोपाल।
मुद्दों-मुद्दों पर विवाद का,
विषम जाल-भ्रम छाया॥
नई फ़सल कब अपनाती है,
धैर्य धीरता -धन को;
हम चाहें,मुट्ठी मेंकर सकते हैं,
सकल भुवन को।
अहंभाव युत,द्वन्द्व भाव में,
जन जन है भरमाया॥
गला काट प्रतियोगी हैं अब,
सभी खास ओर आम;
ना उम्मीदी होती है तो,
जीवन करें तमाम ।
सदा कमाई रत हमने,कब-
धर्म कर्म सिखलाया॥
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