>अति सर्वत्र वर्जयेत -गुलवर्गा की घटना और मीडिया .

>हर वस्तु की अति बुरी होती हैये मीडिया वाले कब समझेंगे कि ,किसी बात को हज़ार बार रिपीट करने पर अब वह न तो सच बनती है,न लोगों की अधिक समझ में आजाती है। बल्कि उलटा ही होता है, बार-बार वही घटना,टी वी पर दिखाते -सुनाते रहने पर व्यक्ति-जनता उसे रोज -रोज की सामान्य चख-चख समझ कर ,इग्नोर करने लगती है तथा समाचार व उसके श्रोत की विश्वसनीयता घटने लगती है। इस ग़लत फहमी को दूर कर मीडिया सिर्फ़ एक बार ही ख़बर दिखाए और पुनः उसका परिणाम लेकर आए तो अधिक सटीक बात बने।
गुलबर्गा की घटना को चेनलों ने बही फ़िल्म बार-बार दिखाई ,बच्चों का रोना-धोना आदि दिखाकर सनसनी उत्पन्न करके रेटिंग बढ़ाने की तथा हर भारतीय बात को ग़लत ठहराने की मंसा साफ़ नज़र आयी। वास्तविकता का कोई मंज़र नज़र नही आया। न कोई परिणाम दिखाया ,न कोई फोलोअप ,कि बच्चों में कोई ठीक हुआ या नहीं ,किसी को कोई हानि हुई या नहीं ,माँ -बाप से कुछ नहीं पूछा गया कि किसकी सलाह पर वे आए ,क्या उन्हें अपने बच्चों पर दया नहीं आरही ,क्यों ? क्या इस बात से पहले बच्चे ठीक हुए हैं या नहीं ?उन्हें सत्य थोड़े ही जानना है बस सनसनी
बच्चों की क्या है वे तो सुई लगाने के नाम से,आप्रेसन ,हस्पताल ,डाक्टर ,स्कूल -पढाई सभी के नाम से रोते हैं ,क्या कठोर होकर निर्णय नहीं लेते,उनके भविष्य के लिए क्या ये बच्चों पर अत्याचार है ?ये माँ-बाप भी तो किसी सद्-मंसा से बच्चों के कष्ट देखपारहे हैं।
यूनीसेफ वालों को क्या पता कि यह सब बच्चों की सेहत के लिए खराव है ,क्या उनहोंने कोई प्रयोग करके देखा है?जो भारत में होरहा है वह खराब है?? क्या यह नहीं होसकता कि मंद-बुद्धि व विकलांग बच्चों के चिल्लाते रहने से मस्तिष्क एक्टिव होजाता हो व अन्दर की गरमी,नमी से अंगों में रक्त संचार ।विशेषग्यज्योतिषियों ,वैद्यों ,मनो – वैज्ञानिकों ,चिकित्सकों आदि के व्याख्यात्मक बयान प्रस्तुत करें सत्य जानने के लिए ,छानने के लिए बात की तह में जाना चाहिए नाकि अन्धविश्वासी की तरह विश्वास कर लिया और लगे कथा कहने।
मीडिया को चाहिए कि वे घटना का पीछा करें व सचाई जानें व दिखाएँ । सच्चाई जानने से ही अंधविश्वास मिटेगा ,कथा सुनाने से नहीं।

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