भारत पर शासन करने के लिये विदेशी पढ़ाई और “गोरी प्रेस” को मैनेज करना ज़रूरी है… Rahul Gandhi, Western Education, Western Media

हाल ही में एक अमेरिकी पत्रिका “न्यूज़वीक” ने राहुल गाँधी पर एक कवर स्टोरी तैयार की है, जिसमें पत्रिका के कवर पर उनका एक बड़ा सा फ़ोटो लगा है और लेख में राहुल गाँधी को “एक खामोश क्रान्ति का जनक” बताया गया है। हालांकि यह उपमा वामपंथियों को बिलकुल नहीं सुहायेगी, क्योंकि इतिहास में क्रान्तिकारी तो सिर्फ़ एक-दो ही हुए हैं, जैसे कार्ल मार्क्स या चे ग्वेवारा या माओ त्से तुंग और मजे की बात यह है कि इस लेख के लेखक सुदीप मजूमदार नक्सलवाद के समर्थक माने जाते हैं। बहरहाल, लेख में आगे कहा गया है कि राहुल गाँधी इस देश का “रीमेक” करने जा रहे हैं (मानो यह देश सदियों से एक मिट्टी का लोंदा हो और राहुल एक दक्ष कुम्हार) (लेख यहाँ देखें… http://www.newsweek.com/id/200051 – Sudip Mazumdar)।

पिछले सौ वर्षों में नेहरू-गाँधी परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने विदेश में उच्च शिक्षा(?) हासिल की है, या फ़िर इंग्लैंड-अमेरिका में काफ़ी समय बिताया है। पश्चिमी मीडिया और नेहरु-गाँधी पीढ़ी और उनके विरासतियों के बीच प्रगाढ़ सम्बन्ध बहुत पहले से ही रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक राहुल गाँधी विश्व में कुछ खास नहीं पहचाने जाते थे (भारत में ही कौन से जाने-पहचाने जाते थे), पश्चिम और पश्चिमी मीडिया में कुछ समय पहले तक राहुल गांधी की चर्चा कभी-कभार ही हुआ करती थी, वह भी एक “राजपरिवार” के सदस्य के रूप में ही। लेकिन अब अचानक एक लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद पश्चिमी मीडिया ने उन्हें “भारत का भविष्य” घोषित कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे 60 साल पहले “पश्चिम के ही एक और दुलारे” जवाहरलाल, को घोषित किया था। सबसे पहले पश्चिमी मीडिया ने ही नेहरू को भारत का कर्णधार और प्रधानमंत्री घोषित किया था और सरदार पटेल तथा अन्य की राह में मुश्किलें खड़ी कर दी थीं। पश्चिमी मीडिया अपनी मुहिम में सफ़ल भी हुआ और नेहरू-महात्मा की महत्वाकांक्षा के चलते आखिर वे ही प्रधानमंत्री बने। अब यही मीडिया उनके परनाती को भारत का अगला प्रधानमंत्री बनाने पर तुल गया है, और गुणगान करने लग पड़ा है। लेकिन इसमें नया कुछ भी नहीं है, जैसा कि पहले कहा गया कि पश्चिमी सत्ता संस्थान और वहाँ के मीडिया को गाँधी परिवार से खास लगाव है, और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि ये लोग पश्चिमी शिक्षा-दीक्षा के कारण वहाँ के रंग-ढंग, आचार-विचार में पूरी तरह से ढल चुके होते हैं और फ़िर इनसे कोई काम निकलवाना (यानी कोई विशेष नीतिगत मामला, अंतर्राष्ट्रीय मंचों और समझौतों, UNO आदि में पश्चिम के पक्ष में वोटिंग या “हाँ/ना” में मुंडी हिलाना, तथा अपना माल बेचने के लिये परमाणु करार, हथियार सौदे या क्रूड तेल बेचना आदि करना) आसान हो जाता है।

यह पश्चिमी मीडिया का बहुत पुराना आजमाया हुआ तरीका है, वे पहले एक व्यक्ति को जनता में “प्रोजेक्ट” करते हैं, वर्षों पहले उन्होंने नेहरु को भी भारत का भाग्य-विधाता बताया था, जबकि उन्होंने 1952 के जीप घोटाले में कृष्ण मेनन का पक्ष लेकर भारत में भ्रष्टाचार की नींव का पहला पत्थर रखा था। हालांकि पश्चिम में यह सब पहले से तय किया हुआ होता है कि वे किस देश में “अपने अनुकूल रहने वाला” कैसा नेतृत्व चाहते हैं, वे हमें बताते हैं कि नेहरु अच्छे हैं, इन्दिरा अच्छी हैं, राजीव बहुत सुदर्शन और भोले हैं, सोनिया त्यागमयी हैं और राहुल क्रान्तिकारी हैं। हम पश्चिम की हर बात अपने सिर-माथे लेने के आदी हो चुके हैं, चाहे वह फ़ैशन हो, फ़िल्में हों या कुसंस्कार हों, लगे हाथ नेता भी उनका बताया हुआ ले लेते हैं। पश्चिमी मीडिया के अनुसार राहुल गाँधी भारत की “खोज” कर रहे हैं, ठीक ऐसी ही एक खोज उनके परनाना ने भी की थी। राहुल गाँधी भारत को खोज कैसे रहे हैं, कलावती के झोपड़े में, उत्तरप्रदेश में एक दलित के यहाँ रात गुज़ारकर, और सड़क किनारे खाना खाकर। यदि इसी पैमाने को “भारत खोजना” या “क्रान्तिकारी कदम” कहते हैं तो इससे सौ गुना अधिक तो भाजपा-बसपा-वामपंथी सभी पार्टियों के कई नेता अपनी जवानी में कर चुके हैं, गाँव-गाँव सम्पर्क बनाकर, पदयात्रा करके, धूल-मिट्टी फ़ाँककर… उन्हें तो कभी क्रान्तिकारी नहीं कहा गया। जबकि राहुल गाँधी की शिक्षा-दीक्षा के बारे में संदेह अभी भी बना हुआ है, कि आखिर उन्होंने कौन सी डिग्री ली है? (यहाँ देखें http://baltimore.indymedia.org/newswire/display/14469/index.php)

वैसे अब नवीन चावला के रहते अब हम कभी भी नहीं जान पायेंगे कि आखिर कांग्रेस ने वोटिंग मशीनों में किस प्रकार हेराफ़ेरी की और चुनाव जीती, लेकिन एक बात तय है कि पश्चिम के सत्ता संस्थानों और पश्चिमी मीडिया में “गाँधी परिवार” की अच्छी पकड़ है, उनके बीच एक अच्छी “समझ” और गठबन्धन विकसित हो चुका है, और फ़िर 100 साल से “कैम्ब्रिज” इस परिवार का पसन्दीदा स्थान रहा है। क्या यह मात्र संयोग है या कुछ और? अनौपचारिक बातचीत में कई बड़े-बड़े राजनेता इस बात को दबे-छिपे स्वर में मानते हैं कि बगैर अमेरिका और ब्रिटेन की सहमति के भारत का प्रधानमंत्री बनना बहुत मुश्किल है, यदि कोई बन भी जाये तो टिकना मुश्किल है। अमेरिका को धता बताकर पोखरण परमाणु विस्फ़ोट करने के बाद से ही भाजपा उनकी आँख की किरकिरी बनी, जबकि विश्व बैंक पेंशन होल्डर मनमोहन सिंह उनके सबसे पसन्दीदा उम्मीदवार हैं। कई वरिष्ठ पत्रकार भी मानते हैं कि हमेशा आम चुनावों के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन के दिल्ली स्थित दूतावासों में अनपेक्षित और संदेहास्पद गतिविधियाँ अचानक बढ़ जाती हैं।

वापस आते हैं नेहरु-गाँधी के शिक्षा बैकग्राउंड पर, नेहरू ने हार्वर्ड और कैम्ब्रिज में शिक्षा ग्रहण की यह बात सत्य है, उनकी बेटी इन्दिरा प्रियदर्शिनी ने भी लन्दन में काफ़ी समय बिताया (शिक्षा प्राप्त की, कितनी की, क्या प्रभाव छोड़ा आदि कहना जरा मुश्किल है, क्योंकि उस समय का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है), हाँ लेकिन वहाँ इन्दिरा कम्युनिस्टों के सम्पर्क में अवश्य आईं, जैसे कृष्ण मेनन, पीएन हक्सर और ज्योति बसु। राजीव गाँधी भी कैम्ब्रिज में पढ़े और बगैर डिग्री के वापस चले आये, और अब राहुल गाँधी, जो कि न्यूज़वीक के अनुसार पहले हारवर्ड गये, लेकिन डिग्री ली रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से और एमफ़िल की कैम्ब्रिज से। मतलब ये कि कैम्ब्रिज भारत के शासकों का एक पसन्दीदा स्थान है, और ये हमारा “सौभाग्य”(?) है कि हमेशा भारत की तकदीर बदलने, अथवा क्रान्तिकारी परिवर्तन होने का सारथी पूरे भारत में सिर्फ़ और सिर्फ़ नेहरु-गाँधी परिवार ही होता है, पहले-पहल ये बात हमें पश्चिमी मीडिया बताता है, फ़िर भारत का मीडिया भी “सदासर्वदा पिछलग्गू” की तरह इस विचार के समर्थन में मुण्डी हिलाता है फ़िर जनता को मूर्ख बनाने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है। हालांकि जनता कभी-कभार अपना रुख बदलती है (1977, 1998-99) आदि, लेकिन फ़िर जल्दी ही वह “लाइन” पर आ जाती है।

अभी “न्यूज़वीक” ने यह शुरुआत की है, अब आप जल्द ही अन्य चिकने पन्नों वाली पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर राहुल गाँधी की तस्वीर पायेंगे, पीछे-पीछे हारवर्ड और येल-ठेल-पेल यूनिवर्सिटियों के कथित मैनेजमेंट गुरु हमें बतायेंगे कि भारत का भविष्य यानी राहुल गाँधी तुम्हारे सामने खड़ा है, उठो और चुन लो। फ़िर नम्बर आयेगा संयुक्त राष्ट्र अथवा किसी अन्य बड़े अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उनके “अवतरण” का, जहाँ एक लिखा-लिखाया भाषण देकर वे ससम्मान विश्व मंच पर आसीन हो जायेंगे, सबसे अन्त में (हो सकता है एक साल के भीतर ही) बराक ओबामा उन्हें मिलने बुलायें या ऐसा कोई “विशिष्ट संयोग” बन जाये कि हमें बराक ओबामा अथवा बिल गेट्स के साथ दाँत निपोरते और हाथ मिलाते हुए राहुल गाँधी के फ़ोटो देखने को मिल जायें।

अब ये मत पूछियेगा कि अब तक राहुल गांधी का भारत के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक उन्नयन में कितना योगदान है (हिन्दी भाषा में इसे “कौन सा तीर मार लिया”, कहते हैं)? ये भी न पूछियेगा कि यदि राहुल बाबा इतने ही ज्ञानवान और ऊर्जा से भरपूर हैं तो युवाओं से सम्बन्धित मामलों जैसे धारा 377 (समलैंगिकता), हरियाणा की पंचायत द्वारा हत्या किये जाने जैसे मामलों पर बहस करने या बयान देने कभी आगे क्यों नहीं आते? अक्सर उन्हें टीवी पर हाथ हिलाते और कॉलेज के युवकों-युवतियों के साथ मुस्कराते हुए ही क्यों देखा जाता है, बजाय इसके कि वे देश में फ़ैले भ्रष्टाचार के बारे में कुछ करने की बातें करें (आखिर यह रायता भी तो उन्हीं के परिवार ने फ़ैलाया है, इसे समेटने की बड़ी जिम्मेदारी भी उन्हीं की है)? अमरनाथ-कश्मीर-शोपियाँ, धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता-आरक्षण-युवाओं में फ़ैलती निराशा, देश की जर्जर प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे ज्वलंत मुद्दों पर कभी आपने उन्हें कभी टीवी पर किसी बहस में हिस्सा लेते देखा है? नहीं देखा होगा, क्योंकि खुद उनकी “मम्मी” ने आज तक मुश्किल से दो-चार इंटरव्यू दिये होंगे (वो भी उस पत्रकार पर बड़ा अहसान जताकर)। “बड़े लोग” (खासकर कैम्ब्रिज/ऑक्सफ़ोर्ड/हार्वर्ड आदि में पढ़े-लिखे) कभी भी “फ़ड़तूस” और “दो कौड़ी के पत्रकारों” को अव्वल तो घर में घुसने ही नहीं देते और जब भी कोई इंटरव्यू या बहस हेतु “बाइट्स” देते भी हैं तो इसकी पूरी व्यवस्था पहले ही की जा चुकी होती है कि चैनल/अखबार का मालिक “चादर से बाहर पैर” न निकाल सके, संवाददाता या पत्रकार की तो औकात ही क्या है, क्योंकि यदि पैसा और पावर हो तो मीडिया को “मैनेज करना” (हिन्दी भाषा में इसे “दरवाजे पर दरबान बनाना” कहते हैं) बेहद आसान होता है।

तो भाईयों और बहनों, राजकुमार के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाये तैयार रहिये, जल्द ही आपका सुनहरा भविष्य आपके सामने एक जगमगाते हुए प्रधानमंत्री के रूप मे मौजूद होगा, भारत एक महाशक्ति बनेगा, गरीबी मिटेगी, असमानता हटेगी, खुशहाली आने ही वाली है…। और हाँ, यदि आपकी भी इच्छा हो भारत के सुनहरे भविष्य में कुछ हाथ बँटाने की, तो चलिये, उठिये और कैम्ब्रिज की राह पकड़िये…। कहाँ IIT और IIM के चक्कर में पड़े हैं, इन जगहों पर पढ़कर आप अधिक से अधिक किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के “नौकर” बन सकते हैं, “भारत के सत्ताधारी” नहीं…

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46 Comments

  1. Mohammed Umar Kairanvi said,

    July 28, 2009 at 9:17 am

    बहुत अच्छा लेख, ज‍ब जिससे पैसे ना मिले उसके खिलाफ यही तरीका अपनाना चाहिये, आप कामयाब रहे, बधाई

    अल्लाह के चैलेंज
    islaminhindi.blogspot.com (Rank-2)
    कल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.
    antimawtar.blogspot.com (Rank-1)

  2. July 28, 2009 at 9:17 am

    बहुत अच्छा लेख, ज‍ब जिससे पैसे ना मिले उसके खिलाफ यही तरीका अपनाना चाहिये, आप कामयाब रहे, बधाईअल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.com (Rank-2)कल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com (Rank-1)

  3. संजय बेंगाणी said,

    July 28, 2009 at 9:29 am

    मोहम्द भाई ने सही कहा है, पैसा लेकर लिखो…वे भी तो ऐसा ही कर रहे हैं…आप हो कि बिना लिये ठेले जा रहे हो….

    भारत की एक मानसिकता है, जिसे मुगलों ने फिर अंग्रेजो ने सही सही समझा और राज किया. अब जो भी समझेगा, राज करेगा. इस हिसाब से कॉग्रेंस स्वभाविक शासक पार्टी है. और गाँधी राजपरिवार….जय हो.

  4. July 28, 2009 at 9:29 am

    मोहम्द भाई ने सही कहा है, पैसा लेकर लिखो…वे भी तो ऐसा ही कर रहे हैं…आप हो कि बिना लिये ठेले जा रहे हो….भारत की एक मानसिकता है, जिसे मुगलों ने फिर अंग्रेजो ने सही सही समझा और राज किया. अब जो भी समझेगा, राज करेगा. इस हिसाब से कॉग्रेंस स्वभाविक शासक पार्टी है. और गाँधी राजपरिवार….जय हो.

  5. धर्मेन्‍द्र चौहान said,

    July 28, 2009 at 10:50 am

    भाईजान कड़वा लिखने के लिए बधाई। बेहतरीन लेख लिखा है आपने मैं जानता हूं आप गांधी परिवार के दुश्‍मन नहीं लेकिन सच तो सच है। फिर नेहरू क्‍या और फिर राहुल क्‍या।

  6. July 28, 2009 at 10:50 am

    भाईजान कड़वा लिखने के लिए बधाई। बेहतरीन लेख लिखा है आपने मैं जानता हूं आप गांधी परिवार के दुश्‍मन नहीं लेकिन सच तो सच है। फिर नेहरू क्‍या और फिर राहुल क्‍या।

  7. धर्मेन्‍द्र चौहान said,

    July 28, 2009 at 10:50 am

    भाईजान कड़वा लिखने के लिए बधाई। बेहतरीन लेख लिखा है आपने मैं जानता हूं आप गांधी परिवार के दुश्‍मन नहीं लेकिन सच तो सच है। फिर नेहरू क्‍या और फिर राहुल क्‍या।

  8. July 28, 2009 at 10:50 am

    भाईजान कड़वा लिखने के लिए बधाई। बेहतरीन लेख लिखा है आपने मैं जानता हूं आप गांधी परिवार के दुश्‍मन नहीं लेकिन सच तो सच है। फिर नेहरू क्‍या और फिर राहुल क्‍या।

  9. निशाचर said,

    July 28, 2009 at 11:24 am

    सुरेश जी, मोतीलाल नेहरु ने भारत का भविष्य देख लिया था. वे जानते थे कि अंगरेज एक न एक दिन जायेंगे ही और फिर सत्ता उच्च तबके के चंद पढ़े-लिखे (अंगरेजी पढ़े-लिखे) लोगों के हाथ में ही आनी है. सो जनमानस में छवि बनाने के लिए वे और उनके सुपुत्र कभी-कभार जेल भी हो आते थे. इससे वे न सिर्फ गाँधी जी की नजरों में सुर्खरू हुए बल्कि अपने समकालीन अन्य अभिजात्यों (इसे गद्दार मनसबदार पढें) से ज्यादा नम्बर बनाने में भी सफल हुए. इसी वजह से अनेक ऐसे लोग जो स्वतंत्रता आन्दोलन में अंग्रेजो के सहायक रहे बाद में केवल मंत्री-संत्री ही बन पाए और प्रधानमंत्री बनने का पुश्तैनी हक़ नेहरु-गाँधी खानदान को ही मिला.

    स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी जिंदगी होम कर देने वाले गांधीवादी कांग्रेसी या तो किनारे लगा दिए गए या फिर पसरते भ्रष्टाचार और चाटुकारिता से सामंजस्य न बैठा पाने के कारण स्वयं ही किनारा कर गए.

    कांग्रेस एक "आन्दोलन" के रूप में जितना अनुकरणीय था, एक राजनीतिक पार्टी के रूप में उतनी ही "गलीच". राहुल बाबा तो भारत की छाती पर मूंग दलने के लिए पोसा गया एक "मासूम छौना" ही है. इसका स्वागत कीजिये और अपने भाग्य को सराहिये. जय हो…….

  10. July 28, 2009 at 11:24 am

    सुरेश जी, मोतीलाल नेहरु ने भारत का भविष्य देख लिया था. वे जानते थे कि अंगरेज एक न एक दिन जायेंगे ही और फिर सत्ता उच्च तबके के चंद पढ़े-लिखे (अंगरेजी पढ़े-लिखे) लोगों के हाथ में ही आनी है. सो जनमानस में छवि बनाने के लिए वे और उनके सुपुत्र कभी-कभार जेल भी हो आते थे. इससे वे न सिर्फ गाँधी जी की नजरों में सुर्खरू हुए बल्कि अपने समकालीन अन्य अभिजात्यों (इसे गद्दार मनसबदार पढें) से ज्यादा नम्बर बनाने में भी सफल हुए. इसी वजह से अनेक ऐसे लोग जो स्वतंत्रता आन्दोलन में अंग्रेजो के सहायक रहे बाद में केवल मंत्री-संत्री ही बन पाए और प्रधानमंत्री बनने का पुश्तैनी हक़ नेहरु-गाँधी खानदान को ही मिला.स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी जिंदगी होम कर देने वाले गांधीवादी कांग्रेसी या तो किनारे लगा दिए गए या फिर पसरते भ्रष्टाचार और चाटुकारिता से सामंजस्य न बैठा पाने के कारण स्वयं ही किनारा कर गए.कांग्रेस एक "आन्दोलन" के रूप में जितना अनुकरणीय था, एक राजनीतिक पार्टी के रूप में उतनी ही "गलीच". राहुल बाबा तो भारत की छाती पर मूंग दलने के लिए पोसा गया एक "मासूम छौना" ही है. इसका स्वागत कीजिये और अपने भाग्य को सराहिये. जय हो…….

  11. Vivek Rastogi said,

    July 28, 2009 at 2:54 pm

    सहमत हैं आपसे और इंतजार है एक और विदेशी डिग्रीधारी युवा प्रधानमंत्री का।

    प्रधानमंत्री बनने की ये योग्यताएँ हमारी पाठ्यपुस्तकों में भी होना चाहिये।

  12. July 28, 2009 at 2:54 pm

    सहमत हैं आपसे और इंतजार है एक और विदेशी डिग्रीधारी युवा प्रधानमंत्री का।प्रधानमंत्री बनने की ये योग्यताएँ हमारी पाठ्यपुस्तकों में भी होना चाहिये।

  13. भारतीय नागरिक - Indian Citizen said,

    July 28, 2009 at 2:55 pm

    absolutely right.

  14. July 28, 2009 at 2:55 pm

    absolutely right.

  15. rahul said,

    July 28, 2009 at 3:11 pm

    प्रिय बंधु
    आप का लेख पसंद आया कुछ जगहों को छोड़ के ,
    मेरी ये दिली अभिलाषा है कि, आप का एक लेख
    गाँधी (मोहन दास) पर हो जाय, जिससे बिस्तार
    से बात हो सके |

    धन्यवाद

  16. rahul said,

    July 28, 2009 at 3:11 pm

    प्रिय बंधु आप का लेख पसंद आया कुछ जगहों को छोड़ के , मेरी ये दिली अभिलाषा है कि, आप का एक लेख गाँधी (मोहन दास) पर हो जाय, जिससे बिस्तार से बात हो सके | धन्यवाद

  17. Rakesh Singh - राकेश सिंह said,

    July 28, 2009 at 4:06 pm

    सुरेश जी मीडिया का खेल इतना बिगडा होगा मालूम ही नहीं | आपने सच ही कहा बिना ब्रिटन – अमेरिका की सहमती के भारत के प्रधानमंत्री बनना बहुत मुस्किल है |

    कड़वा सच लिखा है | लिखते रहिये |

  18. July 28, 2009 at 4:06 pm

    सुरेश जी मीडिया का खेल इतना बिगडा होगा मालूम ही नहीं | आपने सच ही कहा बिना ब्रिटन – अमेरिका की सहमती के भारत के प्रधानमंत्री बनना बहुत मुस्किल है | कड़वा सच लिखा है | लिखते रहिये |

  19. psudo said,

    July 28, 2009 at 5:02 pm

    Nice article as usual , your writing skills and analysis are exceptional. Straight,Simple Funny and Sad.

  20. psudo said,

    July 28, 2009 at 5:02 pm

    Nice article as usual , your writing skills and analysis are exceptional. Straight,Simple Funny and Sad.

  21. P.N. Subramanian said,

    July 28, 2009 at 5:33 pm

    बहुत ही गंभीर मसला है!

  22. July 28, 2009 at 5:33 pm

    बहुत ही गंभीर मसला है!

  23. Common Hindu said,

    July 28, 2009 at 6:01 pm

    Hello Blogger Friend,

    Your excellent post has been back-linked in
    http://hinduonline.blogspot.com/

  24. Common Hindu said,

    July 28, 2009 at 6:01 pm

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/

  25. cmpershad said,

    July 28, 2009 at 6:42 pm

    चुनावी नतीजों के पहले से ही देश के तथाकथित बडे नेता राहुल को राजकुमार और देश का भविष्य जैसे अलंकारों से नवाज़ रहे हैं। जब नेता ही इतने चापलूस हों तो बेचारी जनता क्या करे?

  26. cmpershad said,

    July 28, 2009 at 6:42 pm

    चुनावी नतीजों के पहले से ही देश के तथाकथित बडे नेता राहुल को राजकुमार और देश का भविष्य जैसे अलंकारों से नवाज़ रहे हैं। जब नेता ही इतने चापलूस हों तो बेचारी जनता क्या करे?

  27. smart said,

    July 28, 2009 at 6:46 pm

    अरे सुरेश बाबु! जीतनी चिढ आप को राहुल गाँधी से है,उतनी ही हमें भी है. लेकिन क्या करें? न आप से कुछ उखड पायेगा न हमसे. राहुल गाँधी से एक बात का तो फायदा हुआ कि, जो मायावती "प्रधानमंत्री" बनने का ख्वाब देख रही थी, वो तो अभी पॉँच साल के लिए चकनाचूर हो गया. नहीं तो अगर वो प्रधानमंत्री बन जाती तो शायद पॉँच सौ और हजार के नोट पर भी "कांशीराम या मायावती की फोटो" ही नज़र आती. पूरे देश को पार्क बना कर मूर्तियों से पाट दिया जाता. छप्पन हजार करोड़ की(उत्तर प्रदेश में दो हजार करोड़ तो अट्ठाईस राज्यों में छप्पन हजार करोड़) मूर्तियाँ बनाई जाती. भाड़ में जाये देश का विकास. बीजेपी वालों में तो अब दम है नहीं की अपने दम पर सरकार बना सकें. बिना किसी विरोध व मुद्दे के राजनितिक "वृहन्नला" बनी भारतीय जनता पार्टी अब "पांच साल तक निर्वासन" भोगने पर मजबूर है. यदि "मोदी" को छोड़ दो तो किसी एक का नाम बता दो जो प्रधानमंत्री बनने लायक है. रही मोदी की बात तो उन्हें लेकर खुद भारतीय जनता पार्टी (गोधरा मुद्दे पर) शर्मिंदा होती है या होने का ढोंग करती है.

    इधर भारतीय जनता पार्टी जो सत्ता की मलाई चाटना चाह रही थी उस तक पहुँचने के लिए उन्होंने भी "गाँधी" (मेनका गाँधी और वरुण गाँधी) के कन्धों का ही सहारा लिया. ये अलग बात है कि वरुण बाबु अपने को संभाल नहीं पाए और बीजेपी छींके तक नहीं पहुँच पाई.

    रही विदेशी पढाई की तो जब एक फटीचर कंपनी का नौकर बनने के लिए लोग न जाने कहाँ-कहाँ (आस्ट्रेलिया) जाकर जूते खाते है,तो जिसका परनाना,दादी और पिता देश के प्रधानमंत्री रहे हों वो यदि विदेश की डिग्री नहीं लेगा तो क्या हम जैसे फटीचर लोग लेंगे.

    किसी गाँव का (सवर्ण)व्यक्ति जिसकी कोई औकात नहीं है उससे यदि आप कह दो की किसी नीची जाति (हरिजन या रैदास) के घर जाकर खाना खा ले तो वो नहीं खायेगा. तो क्या आप को नहीं लगता की राहुल गाँधी(जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अति कुलीन है) द्वारा किया गया कार्य(किसी दलित के घर खाना खाना) बड़ा है?

  28. smart said,

    July 28, 2009 at 6:46 pm

    अरे सुरेश बाबु! जीतनी चिढ आप को राहुल गाँधी से है,उतनी ही हमें भी है. लेकिन क्या करें? न आप से कुछ उखड पायेगा न हमसे. राहुल गाँधी से एक बात का तो फायदा हुआ कि, जो मायावती "प्रधानमंत्री" बनने का ख्वाब देख रही थी, वो तो अभी पॉँच साल के लिए चकनाचूर हो गया. नहीं तो अगर वो प्रधानमंत्री बन जाती तो शायद पॉँच सौ और हजार के नोट पर भी "कांशीराम या मायावती की फोटो" ही नज़र आती. पूरे देश को पार्क बना कर मूर्तियों से पाट दिया जाता. छप्पन हजार करोड़ की(उत्तर प्रदेश में दो हजार करोड़ तो अट्ठाईस राज्यों में छप्पन हजार करोड़) मूर्तियाँ बनाई जाती. भाड़ में जाये देश का विकास. बीजेपी वालों में तो अब दम है नहीं की अपने दम पर सरकार बना सकें. बिना किसी विरोध व मुद्दे के राजनितिक "वृहन्नला" बनी भारतीय जनता पार्टी अब "पांच साल तक निर्वासन" भोगने पर मजबूर है. यदि "मोदी" को छोड़ दो तो किसी एक का नाम बता दो जो प्रधानमंत्री बनने लायक है. रही मोदी की बात तो उन्हें लेकर खुद भारतीय जनता पार्टी (गोधरा मुद्दे पर) शर्मिंदा होती है या होने का ढोंग करती है. इधर भारतीय जनता पार्टी जो सत्ता की मलाई चाटना चाह रही थी उस तक पहुँचने के लिए उन्होंने भी "गाँधी" (मेनका गाँधी और वरुण गाँधी) के कन्धों का ही सहारा लिया. ये अलग बात है कि वरुण बाबु अपने को संभाल नहीं पाए और बीजेपी छींके तक नहीं पहुँच पाई.रही विदेशी पढाई की तो जब एक फटीचर कंपनी का नौकर बनने के लिए लोग न जाने कहाँ-कहाँ (आस्ट्रेलिया) जाकर जूते खाते है,तो जिसका परनाना,दादी और पिता देश के प्रधानमंत्री रहे हों वो यदि विदेश की डिग्री नहीं लेगा तो क्या हम जैसे फटीचर लोग लेंगे. किसी गाँव का (सवर्ण)व्यक्ति जिसकी कोई औकात नहीं है उससे यदि आप कह दो की किसी नीची जाति (हरिजन या रैदास) के घर जाकर खाना खा ले तो वो नहीं खायेगा. तो क्या आप को नहीं लगता की राहुल गाँधी(जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अति कुलीन है) द्वारा किया गया कार्य(किसी दलित के घर खाना खाना) बड़ा है?

  29. Jeet Bhargava said,

    July 28, 2009 at 9:09 pm

    संजय बेंगानी की प्रतिक्रया को मेरी भी माना जाए. आज ही विस्फोट पर भी यह लेख पढा. देश को नेहरु ने ही आजाद कराया है सो उनके नाती-पोते ही राज करेंगे. लगता है भगत, आजाद, सावरकर, अशफाक ने तो कुछ किया ही नहीं! वह तो नींव का पत्थर बनकर कहाँ खो गए? सिर्फ नेहरूजी ने ही यह आजादी दिलाई है! हमारा मीडिया तो यही बताना चाहता है. जय हो कंगूरों की!

  30. July 28, 2009 at 9:09 pm

    संजय बेंगानी की प्रतिक्रया को मेरी भी माना जाए. आज ही विस्फोट पर भी यह लेख पढा. देश को नेहरु ने ही आजाद कराया है सो उनके नाती-पोते ही राज करेंगे. लगता है भगत, आजाद, सावरकर, अशफाक ने तो कुछ किया ही नहीं! वह तो नींव का पत्थर बनकर कहाँ खो गए? सिर्फ नेहरूजी ने ही यह आजादी दिलाई है! हमारा मीडिया तो यही बताना चाहता है. जय हो कंगूरों की!

  31. umashankar sharma said,

    July 29, 2009 at 9:21 am

    सुरेश जी अभी तो बस इतना ही कहूँगा कि सच को निगलने के लिए आपके लेख मजबूर कर देते हैं . कई सेकुलर लोगों की जलने लगती है और वे अपना धर्मनिरपेक्षता का वही भोंडा राग अलापने लगते हैं कि सुरेश जी जैसे लोग हमारे देश की अखंडता के लिए खतरा हैं . लिखते रहिये एक दिन वो हो ही जायेगा जो सोचने पर हमें छद्म धर्मनिरपेक्षी लोग राष्ट्र कि अखंडता के लिए खतरा बताने लगते हैं. जय भारत….!

  32. July 29, 2009 at 9:21 am

    सुरेश जी अभी तो बस इतना ही कहूँगा कि सच को निगलने के लिए आपके लेख मजबूर कर देते हैं . कई सेकुलर लोगों की जलने लगती है और वे अपना धर्मनिरपेक्षता का वही भोंडा राग अलापने लगते हैं कि सुरेश जी जैसे लोग हमारे देश की अखंडता के लिए खतरा हैं . लिखते रहिये एक दिन वो हो ही जायेगा जो सोचने पर हमें छद्म धर्मनिरपेक्षी लोग राष्ट्र कि अखंडता के लिए खतरा बताने लगते हैं. जय भारत….!

  33. PD said,

    July 29, 2009 at 9:26 am

    बेहद सच के साथ सही तस्वीर उतारी है आपने.. मगर साथ ही कुछ कहना भी चाहूंगा..

    आपका यह लेख कोई भी नया पाठक पढ़ेगा वह यही समझेगा कि आप राजनितिक कारणों से यह सब लिख रहे हैं.. मुझे यह अच्छे से पता है कि आप इतने भी मशहूर नहीं हैं कि कोई पार्टी आपको लिखने के लिये पैसों का ऑफर करे.. सो ऐसी बातें ना ही सुने तो अच्छा रहेगा.. 🙂

  34. PD said,

    July 29, 2009 at 9:26 am

    बेहद सच के साथ सही तस्वीर उतारी है आपने.. मगर साथ ही कुछ कहना भी चाहूंगा..आपका यह लेख कोई भी नया पाठक पढ़ेगा वह यही समझेगा कि आप राजनितिक कारणों से यह सब लिख रहे हैं.. मुझे यह अच्छे से पता है कि आप इतने भी मशहूर नहीं हैं कि कोई पार्टी आपको लिखने के लिये पैसों का ऑफर करे.. सो ऐसी बातें ना ही सुने तो अच्छा रहेगा.. 🙂

  35. डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said,

    July 30, 2009 at 11:07 am

    जबरदस्त….कुछ कहने को शब्द नहीं। आपके शोध के लिए बधाई।

  36. July 30, 2009 at 11:07 am

    जबरदस्त….कुछ कहने को शब्द नहीं। आपके शोध के लिए बधाई।

  37. बेरोजगार said,

    July 31, 2009 at 8:58 pm

    सभी भाइयों से मै ऊपर अपने द्वारा की गई टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगता हूँ. ये टिप्पणी मेरे द्वारा बिना सोचे समझे भावातिरेक में की गई थी.

  38. July 31, 2009 at 8:58 pm

    सभी भाइयों से मै ऊपर अपने द्वारा की गई टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगता हूँ. ये टिप्पणी मेरे द्वारा बिना सोचे समझे भावातिरेक में की गई थी.

  39. smart said,

    July 31, 2009 at 10:07 pm

    कांग्रेस सरकार बनी और बनाते ही इसने अपने रंग दिखा दिए। जो पेट्रोल के दाम घटाए थे, वो वापस बढा दिए.महंगाई रोकने के नाम पर केवल नाटक हो रहा है। आइये इसी पर एक स्वरचित कविता हो जाये :-

    कांग्रेस को चुने!
    फिर अपना सिर धुनें।।

    "खेलते" हैं "ये" धर्मनिरपेक्षता की आड़ में,
    चाहे देश जाये भाड़ में।।

    इस देश की यही कहानी है।
    "राहुल" राजकुमार तो "सोनिया" लोकतंत्र की "रानी" है।।

  40. smart said,

    July 31, 2009 at 10:07 pm

    कांग्रेस सरकार बनी और बनाते ही इसने अपने रंग दिखा दिए। जो पेट्रोल के दाम घटाए थे, वो वापस बढा दिए.महंगाई रोकने के नाम पर केवल नाटक हो रहा है। आइये इसी पर एक स्वरचित कविता हो जाये :-कांग्रेस को चुने!फिर अपना सिर धुनें।। "खेलते" हैं "ये" धर्मनिरपेक्षता की आड़ में,चाहे देश जाये भाड़ में।। इस देश की यही कहानी है।"राहुल" राजकुमार तो "सोनिया" लोकतंत्र की "रानी" है।।

  41. smart said,

    July 31, 2009 at 10:10 pm

    ऊपर दी गई कविता स्मार्ट की है .बिना अनुमति के कहीं न छापें.
    ईमेल :-dahibada211@yahoo.co.in

  42. smart said,

    July 31, 2009 at 10:10 pm

    ऊपर दी गई कविता स्मार्ट की है .बिना अनुमति के कहीं न छापें.ईमेल :-dahibada211@yahoo.co.in

  43. जयराम "विप्लव" said,

    August 1, 2009 at 11:48 am

    chiplunkar jee ! aapne to hamre man ki baat kah dee ! neki aur puchh-puchh ………

    ye lijiye jay.choudhary16@gmail.com
    9718108845.

    dhanywaad

  44. August 1, 2009 at 11:48 am

    chiplunkar jee ! aapne to hamre man ki baat kah dee ! neki aur puchh-puchh ………ye lijiye jay.choudhary16@gmail.com 9718108845. dhanywaad

  45. hem pandey said,

    August 2, 2009 at 8:35 am

    बिलकुल सच लिखा है. अलबत्ता कुछ को कड़वा जरूर लगा यह टिप्पणियों से ही उजागर हो गया है.

  46. hem pandey said,

    August 2, 2009 at 8:35 am

    बिलकुल सच लिखा है. अलबत्ता कुछ को कड़वा जरूर लगा यह टिप्पणियों से ही उजागर हो गया है.


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