>आख़िर कॉमरेड को जन्नत की हकीकत मालूम हो गई

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कल मंडीहॉउस में कॉमरेड संतोष से मिला । मुलाकात कब वाद-प्रतिवाद के ऊपर बहस में बदल गई तनिक भी पता न चला । वामपंथ की प्रासंगिकता से शुरू हुए इस बहस के अंत तक पहुँचते -पहुँचते इसकी असलियत पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया ।संतोष जैसे हजारों युवा कच्ची उम्र में एक्टिविज्म का शौक पाले विभिन्न पंथों की दूकान चलाने वाले राजनीतिक दलों , छात्र संगठनों और दबाव समूहों से जुड़कर अपना खून -पसीना बहाते हैं । इनमें से अधिकाँश को जब जन्नत की हकीकत मालूम होती है तब समाज और देश की जगह केवल व्यक्तिवादी सोच बचती है । और यही सोच यह कहने पर मजबूर करती है कि अरे यार हमने भी कॉलेज के दिनों में ये सब खूब किया था , कुछ नही बदलने वाला , साला सिस्टम ही भ्रष्ट है।ख़ुद को कॉमरेड कहने वाला संतोष भी बिहार के सीमांचल इलाके से व्यवस्था परिवर्तन , समानता , पूंजीवाद से लडाई और भी न जाने कितने सपने संजोये दिल्ली आया था । यहाँ अपने लक्ष्य को पाने के लिए ‘एस ऍफ़ आई’ का कैडर बनकर पढ़ाई और पैसे बरबाद करता रहा । हर रोज १०-२० लोगों से मिलना संगठन की बातें बताने में ही सारा दिन निकल जाता । थोडी बहुत कोर्स की पढ़ाई के अलावा विचारधारा का चिंतन और पार्टी सिधान्तों से जुड़े साहित्य का अध्ययन करते हुए कब नींद आ जाती पता ही न चलता । ४ सालों तक संगठन के नेताओं के दिशा -निर्देश का पालन बगैर सोचे -समझे करता रहा । इतने महत्वपूर्ण समय को संगठन के लिए खपाने वाला ‘कॉमरेड’ आज बेगारी से जूझ रहा है । आज उसे संगठन के नाम से भी चिढ है । क्यों उसे लगता है किउसने अपना समय बेकार में नष्ट किया ? इस सवाल का उत्तर भी संतोष के पास ही है । जबाव कई हैं ।

* समाज में आर्थिक समानता लाने , भेदभाव मिटाने , साम्प्रदायिकता से लड़ने जैसे बड़े लक्ष्य रखने का दावा करने वाले इन वाम संगठनों की कथनी और करनी में फर्क है । जिन सिधान्तों की घुट्टी कार्यकर्ताओं को पिलाई जाती है उन्हीं से शीर्ष पर बैठे लोगों का कोई सरोकार नही होता है ।
वाम
*पूंजीवाद के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का दावा करने वाले संगठनों के उच्चासीन नेताओं का रहन -सहन उन्हीं के सिधान्तों की पोल खोलता है । इसी सन्दर्भ में मुझे एक घटना याद आ रही है । जनवरी ०९ में हम कुछ साथियों के संग वी ० पी० हॉउस घूम रहा थे । इस दौरान तथाकथित पूंजीवाद विरोधी माकपा नेत्री वृंदा करात के कमरे के बाहर हमें दर्जन भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के न्यू इयर कार्ड मिले । कार्ड में स्पष्ट शब्दों में वृंदा जी को बधाई का संदेशा लिखा हुआ था ।

* नंदीग्राम के नरसंहार की वीभत्स घटना में पश्चिम बंगाल के वाम सरकार का पूंजीवाद समर्थित चेहरा दुनिया के सामने आ चुका है ।

*धर्म को अफीम कहने वाले वाम दलों की धर्मनिरपेक्षता कलंकित हो गई थी जब केरल में उग्रवादी नेता मौलाना मदनी के साथ चुनावी गटबंधन किया गया था । एक पक्ष की साम्प्रदायिकता से लड़ने के लिए दुसरे पक्ष की सांप्रदायिक दलों से हाथ मिलाने से सब साफ़ है । इनके लिए तो एक ख़ास धर्म हीं अफीम है !

ऐसे सैकडों कारनामें हैं जो इनकी कथनी और करनी में फर्क को साबित करते हैं । वृंदा और ममता बनर्जी के साड़ी के फर्क ने बंगाल का वाम किला ढाह दिया । जनता को वास्तविकता का अहसास हो गया है परन्तु अफ़सोस है कि अब भी संतोष जैसे युवा एक बंजर और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधारा को हरा-भरा करने में अपनी ऊर्जा बरबाद कर रहे हैं । कॉमरेड संतोष ने एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा किया है । वाम संगठनों में कार्यकर्ताओं से आत्मीयता और व्यक्तिगत संबंधों को न के बराबर महत्व दिया जाता है । पार्टी के जो कार्यकर्त्ता कभी महीनों संतोष के खर्चे पर पलते थे आज आँख उठा कर देखना भी पसंद नही करते हैं । भारत में सिमटते जा रहे तथाकथित वामपंथ से इनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है । संतोष सरीखे हजारों की हालत को देखकर ‘फनीश्वरनाथ रेणुकी कहानी ‘आत्मसाक्षी’ के पात्र कॉमरेड “गणपत” के जैसी है । रेणु ने जो बात सालों पहले समझ ली थी उस हकीकत को समझने -बुझने में हमें इतने दिन लग गए । चलिए देर ही सही पर दुरुस्त आए !

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