>घर का "दीपक"

>

सुनती हो? अभी तक तुम्हारा लाड़ला घर पहुंचा नहिं है। रसोई से ज़रा बाहर तो आओ! प्रोफ़ेसर अनिल अपनी पत्नी से बोले।

हाल में ही कालेज से आकर बैठक में बैठी राजुल दैनिक पेपर में अपना मुंह लगाकर चुपके से अपने बाबू जी का गुस्सा देख रही थी।

अपने हाथों को रुमाल से पोंछती हुई निर्मला गभराई सी रसोई से बाहर आ गई।

क्या है? चिल्लाते क्यों हो? आ जायेगा। कहेकर तो गया है कि दोस्तों के साथ घूमने जा रहा हूं

आज चौथा दिन है। पता नहिं कहाँ है? एक तो अपना मोबाइल भी बंद कर रखा है। यहाँ सर पर बेटी की शादी कि चिंता है । इसे तो हमारी या बहन की कोइ चिंता ही कहाँ?

एक मेरी कमाई पे सारा घर चलाना है। बेटी की शादी कोइ छोटी मोटी बात थोडी है? प्रो.अनिल ने कहा

शांत हो जाओ। इस बार में उसे ठीक से समझाउंगी। आप परेशान न हो। बी। पी बढ़ जायेगा। निर्मला वातावरण को नोर्मल बनाने का प्रयास करने लगी।

तभी राजुल की सहेली कल्पना घर में आई। जो दीपक के दोस्त विनय की बहन थी। राजुल ने उस से कहा क्या विनय, दीपक के साथ नहिं गया? सुरेश और पंकज तो दीपक के साथ गये हुए हैं?

क्या बात करती हो! आज ही तो वो दोनों मेरे घर आये थे।कल्पना ने कहा।

सुना!! ये दीपक ही हमारे घर में अँधेरा कर देगा देखना तुम। प्रो.अनिल ने गभराहट में कहा।

वे सब आज ही आये होंगे। दीपक भी आ जायेगा। चिंता मत करो राजुल बेटी तू ही अब अपने पिताजी को ज़रा समझा”। निर्मला स्वस्थ होने का दिखावा करते हुए बोली।

…..कि एकदम लडख़डाता हुआ दीपक घर में आया। राजुल डर गई कहीं पिताजी का हाथ ना उठ जाये भैया पर। वातावरण को गरम देखकर कल्पना ने भी यहाँ से उठ जाना ही योग्य माना।

दीपक अपने बेडरूम की और चला गया। हाथों में वही सुटकेस थी, जो हर बार घूमने जाता तो ले जाया करता।

लो अब तो नशा भी करने लग गया है तुम्हारा बेटा! मैं अब उसे फ़ुटी कौड़ी भी नहिं देनेवाला। खुद ही

कमाए और खुद ही ख़ाए। मुझे कुछ भी नहिं चाहिए। अपने भारी स्वर में निर्मला को डाँटते हुए प्रोफ़ेसर अनिल बोले।

शाम होने लगी थी। पर अभी तक दीपक अपने कमरे से बाहर नहिं आया था। निर्मला ने राजुल को कुछ इशारा किया। राजुल आहिस्ता से दीपक के कमरे में देखकर आई और अपनी माँ को सोने का संकेत दिया। मां और बेटी दूसरे कमरे की और चल दीये।

कनखियों से झाँकते हुए प्रोफ़ेसर अनिल ने माँ बेटी का संकेत देख लिया और अनजान बनकर टी.वी का स्वीच ओन कर दिया।

टी वी पर लोकल न्युज़ थी। लाली वाला किडनी अस्पताल में किडनी एजेंट का भंडाफोड़। डॉक्टर और एजेंट गिरफ्तार। निर्दोष लोगों को बहला फ़ुसलाकर उनके गुरदे परदेश में बेच दीया करते थे

एक अन्जान डर ने प्रोफ़ेसर अनिल को हिला कर रख दिया। सहसा खडे होकर दीपक के कमरे की ओर चल पडे। कमरे में अँधेरा था। डीम लाईट का स्वीच ओन किया। बेड के पास रखा काला ऎरबेग खोला एक पोलीथीन में सो-सो के करारे नोट रख़े हुए थे। साथ में एक लेटर था। लिखा था बाबूजी-माँ ! मैं फ़िलहाल बेकार हुं। कंई जगह इन्टर्व्यु देता रहा कि नौकरी मिल जाये। पर हरबार निराशा मिली।

मुझे पता है दीदी की शादी है। मैं आपका हाथ कैसे बंटाता? तभी मुझे ये रास्ता मिला….

आपने मुझे जन्म दिया है। मेरा ईतना तो फ़र्ज़ है कि मैं आपके कुछ काम आ सकुं। सोरी पिताजी!!!!

प्रोफेसर अनिल बेड का कोना पकडकर लडखडाते हुए खडे हुए। आहिस्ता आहिस्ता दीपक के करीब पहुंचे। उसका शर्ट उंचा करके डरते हुए देखा पेट पर ड्रेसींग लगी हुई थी। उन्हें अपना दीपक अंधेरे में ज़गमगाता नज़्रर आने लगा।

उन्हें लगा वो जल्दी बूढे होने चले हैं।






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अमेरिका में शाहरुख खान को रोकने के दो और मजबूत कारण… Shahrukh Khan Detention At US-Airport

गत दिनों शाहरुख को अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के लिये रोके जाने पर खासा बावेला खड़ा किया गया था। शाहरुख खान का हास्यास्पद बयान था कि उसे मुस्लिम होने की वजह से परेशान किया गया, और भारत में सेकुलरों और हमारे भाण्ड-गवैये टाइप इलेक्ट्रानिक मीडिया को एक मुद्दा मिल गया था दो दिन तक चबाने के लिये। हालांकि इस मुद्दे पर अमेरिका के सुरक्षा अधिकारियों की तरफ़ से भी स्पष्टीकरण आ चुका है, लेकिन इस मामले में शाहरुख को वहाँ रोके रखने के दो और सम्भावित कारण सामने आये हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत से फ़िल्मी कलाकार अक्सर अमेरिका स्टेज शो करके डालर में मोटी रकम कमाने आते-जाते रहते हैं। डालर की चकाचौंध के कारण विदेशों में इस प्रकार के कई संगठन खड़े हो गये हैं जो भारतीय फ़िल्म कलाकारों को बुलाते रहते हैं, यदि भारतीय कलाकार वहाँ सिर्फ़ “भारत के नागरिक” बनकर जायें तो उन्हें उतना पैसा नहीं मिलेगा, चूंकि हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रियता पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में भी काफ़ी है, इसलिये अमेरिका, कनाडा आदि देशों में ऐसे सभी आप्रवासियों को एकत्रित करके इस प्रकार के स्टेज शो को “साउथ एशिया” के किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। इस चालाकी में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय कलाकारों और हिन्दी फ़िल्मों की ताकत का प्रदर्शन है। शाहरुख खान का 15 अगस्त का दौरा ऐसे ही एक कार्यक्रम हेतु था (वे वहाँ भारत के किसी स्वाधीनता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने नहीं गये थे, बल्कि पैसा कमाने गये थे)। 15 अगस्त को शिकागो और ह्यूस्टन में अमेरिका स्थित भारतीयों और पाकिस्तानियों के एक ग्रुप ने “साउथ एशिया कार्निवाल” का आयोजन रखा था, उसमें शाहरुख बतौर “मेहमान”(?) बुलाये गये थे। इस कार्निवाल का टिकट 25 डालर प्रति व्यक्ति था, मेले में बॉलीवुड के कई कलाकारों के नृत्य-गीत का कार्यक्रम, एक फ़ैशन शो और एक वैवाहिक आईटमों की प्रदर्शनी शामिल था (तात्पर्य यह कि “स्वतन्त्रता दिवस” जैसा कोई कार्यक्रम नहीं था, जिसका दावा शाहरुख अपनी देशभक्ति दर्शाने के लिये कर रहे थे)। इस कार्निवाल के विज्ञापन में सैफ़ अली खान, करीना, कैटरीना, दीया मिर्ज़ा और बिपाशा बसु का भी नाम दिया जा रहा था, इस कार्निवाल को भारत की एयर इंडिया तथा सहारा एवं पाकिस्तान की दो बड़ी कम्पनियाँ प्रायोजित कर रही थीं, पूरे विज्ञापन में कहीं भी भारत या पाकिस्तान (14 अगस्त) के स्वतन्त्रता दिवस का कोई उल्लेख नहीं था।

तो समस्या कहाँ से शुरु हुई होगी? अमेरिका जाते समय तो ये कलाकार भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि और भारत के नागरिक के तौर पर जाते हैं लेकिन अमेरिका में प्रवेश करते समय कस्टम की पहचान सम्बन्धी पूछताछ के दौरान कभी-कभी ये अपने आपको “दक्षिण एशियाई” बता देते हैं। एक सम्भावना यह है कि शाहरुख ने पहले तो जाँच के नाम पर अपनी परम्परागत भारतीय “फ़ूं-फ़ाँ” दिखाई होगी, जिससे अमेरिकी पुलिसवाला और भी शक खा गया होगा अथवा भड़क गया होगा, ऊपर से तुर्रा यह था कि शाहरुख का सामान भी उनके साथ नहीं पहुँचा था (बाद में अगली फ़्लाइट से आने वाला था), ऐसे मामलों में अमेरिकी अधिकारी और अधिक सख्त तथा शंकालु हो जाते हैं। शाहरुख और उस पुलिस वाले के बीच हुई एक काल्पनिक बातचीत का आनन्द लें (क्या बात हुई होगी, इसकी एक सम्भावना) –

अमेरिकी कस्टम अधिकारी – तो मि शाहरुख आप अमेरिका क्यों आये हैं?

शाहरुख – मुझे यहाँ “साउथ एशिया कार्निवाल” में एक भाषण देने के लिये बुलाया गया है।

अधिकारी – अच्छा, वह कैसा और क्या कार्यक्रम है?

शाहरुख – (हे ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए… बकरे की तरह मिमियाने का शाहरुखी स्टाइल) दक्षिण एशिया के लोग आपस में मेलजोल बढ़ाने के लिये एकत्रित होते हैं और स्वतन्त्रता दिवस मनाते हैं…

अधिकारी – दक्षिण एशिया, क्या वह भी कोई देश है?

शाहरुख – नहीं, नहीं, दक्षिण एशिया मतलब भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान के लोग…

सुरक्षा अधिकारी पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनकर ही सतर्क हो जाता है… “वेट ए मिनट मैन्…” अधिकारी अन्दर जाकर वरिष्ठ अधिकारी के कान में फ़ुसफ़ुसाता है… यह आदमी अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान और भाषण वगैरा बड़बड़ा रहा है, मुझे शक है… इसे और गहन जाँच के लिये रोकना होगा।

सही बात तो शाहरुख और वह जाँच करने वाला अमेरिकी अधिकारी ही बता सकता है, लेकिन जैसा कि अमेरिका की सुरक्षा जाँच सम्बन्धी मानक बन गये हैं, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनते ही अमेरिकी अधिकारियों के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसे में क्या जरूरत है अपनी अच्छी खासी भारतीय पहचान छिपाकर खामखा “दक्षिण एशियाई” की पहचान बताने की? आप भले ही कितने ही शरीफ़ हों, लेकिन यदि आप वेश्याओं के मोहल्ले में रहते हैं तो सामान्यतः शक के घेरे में आ ही जाते हैं। खुद ही सोचिये, कहाँ भारत, भारत की इमेज, भारतीयों की अमेरिका में इमेज आदि, और कहाँ पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान के साथ खुद को जोड़कर देखना? है कोई तालमेल? इन “असफ़ल और आतंकवादी देशों” के साथ खुद को खड़ा करने की क्या तुक है?

जबकि इसी काल्पनिक घटना का दूसरा रूप यह भी हो सकता था –

अधिकारी – मि शाहरुख आप अमेरिका किसलिये आये हैं?

शाहरुख – मैं यहाँ भारत के स्वतन्त्रता दिवस समारोह में एक भाषण देने आया हूं।

अधिकारी – भारत का स्वतन्त्रता दिवस?

शाहरुख – जी 15 अगस्त को भारत का 63 वां स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा है।

अधिकारी – वाह, बधाईयाँ, अमेरिका में आपका स्वागत है…

संदेश साफ़ है, हम पाकिस्तान और बांग्लादेश रूपी सूअरों के दो बाड़ों से घिरे हैं, उनकी “पहचान” के साथ भारत की गौरवशाली पहचान मिक्स करने की कोई जरूरत नहीं है, गर्व से कहो हम “भारतीय” हैं, दक्षिण एशियाई क्या होता है?
(समाचार यहाँ देखें…)

2) शाहरुख को रोकने की एक और वजह सामने आई है। बेवजह इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीय तूल दिया गया और हमारे मूर्ख मीडिया ने इसे मुस्लिम पुट देकर बेवकूफ़ाना अन्दाज़ में इसे पेश किया, जबकि इस मामले में रंग, जाति, धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। असल में जिस कार्निवाल की बात ऊपर बताई गई उसके आयोजकों का रिकॉर्ड अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सन्देह के घेरे में है, भले ही वे आतंकवादी गुटों से सम्बद्ध न हों लेकिन अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धित अवश्य हैं। इस नाच-गाने के शो का प्रमुख प्रमोटर था लन्दन निवासी फ़रहत हुसैन और शिकागो में रहने वाला उसका भाई अल्ताफ़ हुसैन, इन दोनों भाईयों की एक संस्था है लेक काउंटी साउथ एशियन एंटरटेनमेंट इन्क। इन दोनों भाईयों पर टैक्स चोरी और अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धों के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को शक है। जैसा कि शाहरुख खान ने बाद में प्रेस से कहा कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के कुछ सवाल “अपमानजनक”, “गैर-जिम्मेदाराना”, “बेतुके” थे, असल में यह सवाल इन्हीं दोनों भाईयों के सम्बन्ध में थे। कुछ समय पहले भी ऐसी ही एक कम्पनी “एलीट एंटरटेनमेंट” के प्रमोटर विजय तनेजा नामक शख्स को अमेरिका में धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का दोषी पाया गया और उसे बन्द करवा दिया था।

अब इस पर ध्यान दीजिये… एक वरिष्ठ सीनेटर केनेडी अमेरिका में जाना-पहचाना नाम है, उन्हें भी कई बार सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ा, क्योंकि उनके नाम का उपयोग करके एक आतंकवादी ने अमेरिका में घुसने की कोशिश की थी, बाद में बार-बार होने वाली परेशानी से तंग आकर केनेडी ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई और उनका नाम “शंकास्पद नामों” की लिस्ट से हटाया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति अल-गोर एक बार बगैर सामान चेक करवाये ग्रीन दरवाजे से जाने लगे तब उन्हें भी रोककर खासी तलाशी ली गई थी। जिस दिन शाहरुख की जाँच की गई थी, उसी दिन एक दूसरे शहर में अमेरिका के प्रसिद्ध रॉक स्टार बॉब डिलन को दो पुलिसवालों ने जाँच के लिये रोका, (और पुलिस वाले यदि पहचान भी गये हों तब भी), जब वे अपनी पहचान प्रस्तुत नहीं कर पाये तब उन्हें पकड़कर उनके मेज़बान के घर ले जाया गया और तसदीक करके ही छोड़ा। उससे कुछ ही दिन पहले ओलम्पिक के मशहूर तैराक विश्व चैम्पियन माइकल फ़ेल्प्स, बीयर पीकर कार चलाते पकड़े गये, हालांकि फ़ेल्प्स द्वारा पी गई बीयर कानूनी सीमा के भीतर ही थी, लेकिन फ़िर भी पुलिसवाले उन्हें थाने ले गये, उन्हें एक लिखित चेतावनी दी गई फ़िर छोड़ा गया। (देखें चित्र)

दिक्कत यह हुई कि शाहरुख खान को उम्मीद ही नहीं थी कि एक “सुपर स्टार” होने के नाते उनसे ऐसी कड़ी पूछताछ हो सकती है, सो उन्होंने निश्चित ही वहाँ कुछ “अकड़-फ़ूं” दिखाई होगी, जिससे मामला और उलझ गया। जबकि अमेरिका में सुरक्षा अधिकारी न तो कैनेडी को छोड़ते हैं न ही अल गोर को, कहने का मतलब ये कि शाहरुख का नाम यदि “सेड्रिक डिसूजा” भी होता तो तब भी वे उसे बिना जाँच और पूछताछ के न छोड़ते। अमेरिका, अमेरिका है, न कि भारत जैसी कोई “धर्मशाला”। हमारे यहाँ तो कोई भी, कभी भी, कहीं से भी आ-जा सकता है और यहाँ के सरकारी कर्मचारी, कार्पोरेट्स, अमीरज़ादे और नेता, भ्रष्टाचार और चापलूसी की जीवंत मूर्तियाँ हैं, किसी को भी “कानून का राज” का मतलब ही नहीं पता।

तात्पर्य यह कि न तो शाहरुख के साथ कथित ज्यादती(?) “खान” नाम होने की वजह से हुई, न ही उस दिन शाहरुख का भारत के स्वतन्त्रता दिवस से कोई लेना-देना था, और इमरान हाशमी की तरह “रोतलापन” दिखाकर उन्होंने अमेरिका में अपनी हँसी ही उड़वाई है, जबकि भारत में “अभी भी” शाहरुख को सही मानने वालों की कमी नहीं होगी, इसका मुझे पूरा विश्वास है।

स्रोत – टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क यूएस तथा India Syndicate

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अमेरिका में शाहरुख खान को रोकने के दो और मजबूत कारण… Shahrukh Khan Detention At US-Airport

गत दिनों शाहरुख को अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के लिये रोके जाने पर खासा बावेला खड़ा किया गया था। शाहरुख खान का हास्यास्पद बयान था कि उसे मुस्लिम होने की वजह से परेशान किया गया, और भारत में सेकुलरों और हमारे भाण्ड-गवैये टाइप इलेक्ट्रानिक मीडिया को एक मुद्दा मिल गया था दो दिन तक चबाने के लिये। हालांकि इस मुद्दे पर अमेरिका के सुरक्षा अधिकारियों की तरफ़ से भी स्पष्टीकरण आ चुका है, लेकिन इस मामले में शाहरुख को वहाँ रोके रखने के दो और सम्भावित कारण सामने आये हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत से फ़िल्मी कलाकार अक्सर अमेरिका स्टेज शो करके डालर में मोटी रकम कमाने आते-जाते रहते हैं। डालर की चकाचौंध के कारण विदेशों में इस प्रकार के कई संगठन खड़े हो गये हैं जो भारतीय फ़िल्म कलाकारों को बुलाते रहते हैं, यदि भारतीय कलाकार वहाँ सिर्फ़ “भारत के नागरिक” बनकर जायें तो उन्हें उतना पैसा नहीं मिलेगा, चूंकि हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रियता पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में भी काफ़ी है, इसलिये अमेरिका, कनाडा आदि देशों में ऐसे सभी आप्रवासियों को एकत्रित करके इस प्रकार के स्टेज शो को “साउथ एशिया” के किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। इस चालाकी में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय कलाकारों और हिन्दी फ़िल्मों की ताकत का प्रदर्शन है। शाहरुख खान का 15 अगस्त का दौरा ऐसे ही एक कार्यक्रम हेतु था (वे वहाँ भारत के किसी स्वाधीनता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने नहीं गये थे, बल्कि पैसा कमाने गये थे)। 15 अगस्त को शिकागो और ह्यूस्टन में अमेरिका स्थित भारतीयों और पाकिस्तानियों के एक ग्रुप ने “साउथ एशिया कार्निवाल” का आयोजन रखा था, उसमें शाहरुख बतौर “मेहमान”(?) बुलाये गये थे। इस कार्निवाल का टिकट 25 डालर प्रति व्यक्ति था, मेले में बॉलीवुड के कई कलाकारों के नृत्य-गीत का कार्यक्रम, एक फ़ैशन शो और एक वैवाहिक आईटमों की प्रदर्शनी शामिल था (तात्पर्य यह कि “स्वतन्त्रता दिवस” जैसा कोई कार्यक्रम नहीं था, जिसका दावा शाहरुख अपनी देशभक्ति दर्शाने के लिये कर रहे थे)। इस कार्निवाल के विज्ञापन में सैफ़ अली खान, करीना, कैटरीना, दीया मिर्ज़ा और बिपाशा बसु का भी नाम दिया जा रहा था, इस कार्निवाल को भारत की एयर इंडिया तथा सहारा एवं पाकिस्तान की दो बड़ी कम्पनियाँ प्रायोजित कर रही थीं, पूरे विज्ञापन में कहीं भी भारत या पाकिस्तान (14 अगस्त) के स्वतन्त्रता दिवस का कोई उल्लेख नहीं था।

तो समस्या कहाँ से शुरु हुई होगी? अमेरिका जाते समय तो ये कलाकार भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि और भारत के नागरिक के तौर पर जाते हैं लेकिन अमेरिका में प्रवेश करते समय कस्टम की पहचान सम्बन्धी पूछताछ के दौरान कभी-कभी ये अपने आपको “दक्षिण एशियाई” बता देते हैं। एक सम्भावना यह है कि शाहरुख ने पहले तो जाँच के नाम पर अपनी परम्परागत भारतीय “फ़ूं-फ़ाँ” दिखाई होगी, जिससे अमेरिकी पुलिसवाला और भी शक खा गया होगा अथवा भड़क गया होगा, ऊपर से तुर्रा यह था कि शाहरुख का सामान भी उनके साथ नहीं पहुँचा था (बाद में अगली फ़्लाइट से आने वाला था), ऐसे मामलों में अमेरिकी अधिकारी और अधिक सख्त तथा शंकालु हो जाते हैं। शाहरुख और उस पुलिस वाले के बीच हुई एक काल्पनिक बातचीत का आनन्द लें (क्या बात हुई होगी, इसकी एक सम्भावना) –

अमेरिकी कस्टम अधिकारी – तो मि शाहरुख आप अमेरिका क्यों आये हैं?

शाहरुख – मुझे यहाँ “साउथ एशिया कार्निवाल” में एक भाषण देने के लिये बुलाया गया है।

अधिकारी – अच्छा, वह कैसा और क्या कार्यक्रम है?

शाहरुख – (हे ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए… बकरे की तरह मिमियाने का शाहरुखी स्टाइल) दक्षिण एशिया के लोग आपस में मेलजोल बढ़ाने के लिये एकत्रित होते हैं और स्वतन्त्रता दिवस मनाते हैं…

अधिकारी – दक्षिण एशिया, क्या वह भी कोई देश है?

शाहरुख – नहीं, नहीं, दक्षिण एशिया मतलब भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान के लोग…

सुरक्षा अधिकारी पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनकर ही सतर्क हो जाता है… “वेट ए मिनट मैन्…” अधिकारी अन्दर जाकर वरिष्ठ अधिकारी के कान में फ़ुसफ़ुसाता है… यह आदमी अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान और भाषण वगैरा बड़बड़ा रहा है, मुझे शक है… इसे और गहन जाँच के लिये रोकना होगा।

सही बात तो शाहरुख और वह जाँच करने वाला अमेरिकी अधिकारी ही बता सकता है, लेकिन जैसा कि अमेरिका की सुरक्षा जाँच सम्बन्धी मानक बन गये हैं, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनते ही अमेरिकी अधिकारियों के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसे में क्या जरूरत है अपनी अच्छी खासी भारतीय पहचान छिपाकर खामखा “दक्षिण एशियाई” की पहचान बताने की? आप भले ही कितने ही शरीफ़ हों, लेकिन यदि आप वेश्याओं के मोहल्ले में रहते हैं तो सामान्यतः शक के घेरे में आ ही जाते हैं। खुद ही सोचिये, कहाँ भारत, भारत की इमेज, भारतीयों की अमेरिका में इमेज आदि, और कहाँ पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान के साथ खुद को जोड़कर देखना? है कोई तालमेल? इन “असफ़ल और आतंकवादी देशों” के साथ खुद को खड़ा करने की क्या तुक है?

जबकि इसी काल्पनिक घटना का दूसरा रूप यह भी हो सकता था –

अधिकारी – मि शाहरुख आप अमेरिका किसलिये आये हैं?

शाहरुख – मैं यहाँ भारत के स्वतन्त्रता दिवस समारोह में एक भाषण देने आया हूं।

अधिकारी – भारत का स्वतन्त्रता दिवस?

शाहरुख – जी 15 अगस्त को भारत का 63 वां स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा है।

अधिकारी – वाह, बधाईयाँ, अमेरिका में आपका स्वागत है…

संदेश साफ़ है, हम पाकिस्तान और बांग्लादेश रूपी सूअरों के दो बाड़ों से घिरे हैं, उनकी “पहचान” के साथ भारत की गौरवशाली पहचान मिक्स करने की कोई जरूरत नहीं है, गर्व से कहो हम “भारतीय” हैं, दक्षिण एशियाई क्या होता है?
(समाचार यहाँ देखें…)

2) शाहरुख को रोकने की एक और वजह सामने आई है। बेवजह इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीय तूल दिया गया और हमारे मूर्ख मीडिया ने इसे मुस्लिम पुट देकर बेवकूफ़ाना अन्दाज़ में इसे पेश किया, जबकि इस मामले में रंग, जाति, धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। असल में जिस कार्निवाल की बात ऊपर बताई गई उसके आयोजकों का रिकॉर्ड अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सन्देह के घेरे में है, भले ही वे आतंकवादी गुटों से सम्बद्ध न हों लेकिन अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धित अवश्य हैं। इस नाच-गाने के शो का प्रमुख प्रमोटर था लन्दन निवासी फ़रहत हुसैन और शिकागो में रहने वाला उसका भाई अल्ताफ़ हुसैन, इन दोनों भाईयों की एक संस्था है लेक काउंटी साउथ एशियन एंटरटेनमेंट इन्क। इन दोनों भाईयों पर टैक्स चोरी और अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धों के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को शक है। जैसा कि शाहरुख खान ने बाद में प्रेस से कहा कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के कुछ सवाल “अपमानजनक”, “गैर-जिम्मेदाराना”, “बेतुके” थे, असल में यह सवाल इन्हीं दोनों भाईयों के सम्बन्ध में थे। कुछ समय पहले भी ऐसी ही एक कम्पनी “एलीट एंटरटेनमेंट” के प्रमोटर विजय तनेजा नामक शख्स को अमेरिका में धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का दोषी पाया गया और उसे बन्द करवा दिया था।

अब इस पर ध्यान दीजिये… एक वरिष्ठ सीनेटर केनेडी अमेरिका में जाना-पहचाना नाम है, उन्हें भी कई बार सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ा, क्योंकि उनके नाम का उपयोग करके एक आतंकवादी ने अमेरिका में घुसने की कोशिश की थी, बाद में बार-बार होने वाली परेशानी से तंग आकर केनेडी ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई और उनका नाम “शंकास्पद नामों” की लिस्ट से हटाया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति अल-गोर एक बार बगैर सामान चेक करवाये ग्रीन दरवाजे से जाने लगे तब उन्हें भी रोककर खासी तलाशी ली गई थी। जिस दिन शाहरुख की जाँच की गई थी, उसी दिन एक दूसरे शहर में अमेरिका के प्रसिद्ध रॉक स्टार बॉब डिलन को दो पुलिसवालों ने जाँच के लिये रोका, (और पुलिस वाले यदि पहचान भी गये हों तब भी), जब वे अपनी पहचान प्रस्तुत नहीं कर पाये तब उन्हें पकड़कर उनके मेज़बान के घर ले जाया गया और तसदीक करके ही छोड़ा। उससे कुछ ही दिन पहले ओलम्पिक के मशहूर तैराक विश्व चैम्पियन माइकल फ़ेल्प्स, बीयर पीकर कार चलाते पकड़े गये, हालांकि फ़ेल्प्स द्वारा पी गई बीयर कानूनी सीमा के भीतर ही थी, लेकिन फ़िर भी पुलिसवाले उन्हें थाने ले गये, उन्हें एक लिखित चेतावनी दी गई फ़िर छोड़ा गया। (देखें चित्र)

दिक्कत यह हुई कि शाहरुख खान को उम्मीद ही नहीं थी कि एक “सुपर स्टार” होने के नाते उनसे ऐसी कड़ी पूछताछ हो सकती है, सो उन्होंने निश्चित ही वहाँ कुछ “अकड़-फ़ूं” दिखाई होगी, जिससे मामला और उलझ गया। जबकि अमेरिका में सुरक्षा अधिकारी न तो कैनेडी को छोड़ते हैं न ही अल गोर को, कहने का मतलब ये कि शाहरुख का नाम यदि “सेड्रिक डिसूजा” भी होता तो तब भी वे उसे बिना जाँच और पूछताछ के न छोड़ते। अमेरिका, अमेरिका है, न कि भारत जैसी कोई “धर्मशाला”। हमारे यहाँ तो कोई भी, कभी भी, कहीं से भी आ-जा सकता है और यहाँ के सरकारी कर्मचारी, कार्पोरेट्स, अमीरज़ादे और नेता, भ्रष्टाचार और चापलूसी की जीवंत मूर्तियाँ हैं, किसी को भी “कानून का राज” का मतलब ही नहीं पता।

तात्पर्य यह कि न तो शाहरुख के साथ कथित ज्यादती(?) “खान” नाम होने की वजह से हुई, न ही उस दिन शाहरुख का भारत के स्वतन्त्रता दिवस से कोई लेना-देना था, और इमरान हाशमी की तरह “रोतलापन” दिखाकर उन्होंने अमेरिका में अपनी हँसी ही उड़वाई है, जबकि भारत में “अभी भी” शाहरुख को सही मानने वालों की कमी नहीं होगी, इसका मुझे पूरा विश्वास है।

स्रोत – टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क यूएस तथा India Syndicate

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>बैरी पिया

>


झूमे जिया मेरा मन बाबर

कहे सताए न आये पिया
मन के भवर मे गोते लगाये
वो छलिया मेरा बैरी पिया
संग न हो मै कैसे करू बतिया
आखे जो मिचु अपनी पाउ उसे सखिया
भोले पिया तरसे मेरी रतिया
वो छलिया मेरा बैरी पिया
जुल्फों से खेले ये पुरबैया
मन मे चुभोये यादो की सुईया
मै बाबरी समझी आये मेरे पिया
वो छलिया मेरा बैरी पिया
सोला श्रींगार मेरा खाली पड़ा
आखों से काजल गए माथे से बिंदिया
दर्पण ने भाये मोहे कब आओगे पिया
वो छलिया मेरा बैरी पिया

>काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग (भाग-2) Kaaba a Hindu Temple

>(भाग…1 से http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/08/kaaba-hindu-temple-pn-oak.html आगे जारी…)

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है –
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है –

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

(लेखमाला के तीसरे और अन्तिम भाग में संस्कृतनिष्ठ नामों और चिन्हों आदि के बारे में…)
जारी रहेगा भाग…3 में…

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काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग (भाग-2) Kaaba a Hindu Temple

(भाग…1 से http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/08/kaaba-hindu-temple-pn-oak.html आगे जारी…)

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है –
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है –

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

(लेखमाला के तीसरे और अन्तिम भाग में संस्कृतनिष्ठ नामों और चिन्हों आदि के बारे में…)
जारी रहेगा भाग…3 में…

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>…..जब वो गाती है….

>

झुमती गाती और गुनगुनाती गज़ल,

गीत कोइ सुहाने सुनाती गज़ल।

ज़िंदगी से हमें है मिलाती गज़ल,

उसके अशआर में एक इनाम है,

उसके हर शेर में एक पैगाम है।

सबको हर मोड पे ले के जाती गज़ल।

उसको ख़िलवत मिले या मिले अंजुमन।

उसको ख़िरमन मिले या मिले फ़िर चमन,

वो बहारों को फ़िर है ख़िलाती गज़ल।

वो इबारत कभी, वो इशारत कभी।

वो शरारत कभी , वो करामत कभी।

हर तरहाँ के समाँ में समाती गज़ल

वो न मोहताज है, वो न मग़रूर है।

वो तो हर ग़म-खुशी से ही भरपूर है।

हर मिज़ाजे सुख़न को जगाती गज़ल।

वो महोब्बत के प्यारों की है आरज़ु।

प्यार के दो दिवानों की है जुस्तजु।

हो विसाले मोहबबत पिलाती गज़ल।

वो कभी पासबाँ, वो कभी राजदाँ।

उसके पहेलु में छाया है सारा जहाँ।

लोरियों में भी आके सुनाती गज़ल।

वो कभी ग़मज़दा वो कभी है ख़फा।

वक़्त के मोड पर वो बदलती अदा।

कुछ तरानों से हर ग़म भुलाती गज़ल।

वो तो ख़ुद प्यास है फ़िर भी वो आस है।

प्यासी धरती पे मानो वो बरसात है।

अपनी बुंदोँ से शीद्दत बुझाती गज़ल।

उसमें आवाज़ है उसमें अंदाज़ है।

इसलिये तो दीवानी हुइ राज़ है।

जब वो गाती है तब मुस्कुराती गज़ल।

>मेरा बिखरा आशियाना

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खामोश रस्ते पर

भीर से बिपरीत शामियाने मे
एक सुनसान,तनहा,अकेले आशियाने मे
दबी-दबी सी सासों से चुपके-चुपके पाओ से
सोच-समझ कर अपना हर एक कदम बढा रही थी
डरी-डरी सी सिसक रही थी काप रहे थे मेरे हाथ
क्या दरवाज़ा खोलू और मिल जाये कोई सौगात
जब पहुची आशियाने के भीतर बंद पड़े थे सारे शाख
धुल बरस रही थी फर्श पर जैसे खालीपन हो उसके साथ
सहम-सहम कर कदम बढ़ रहे थे मेरे
और दरवाज़े सारे बंद पड़े थे
टूटी-फूटी छत से कुछ किरने बिखर रही थी
सोच रही थी इन किरणों को कर दू मै कैसे आबाद
टूटी सी एक मेज़ पर कुछ पन्ने बिखरे पड़े थे
और उन पन्नो पर यादो की एक धुल चढी थी
भटक रही थी हर कोने मे
चारो तरफ यादे बिखरी थी
समेट रही थी उन यादो को
अपने नन्हे से दामन मे
आखों से आसू बह रहे थे
मेरे मन के प्रांगन मे
खामोश रास्ते पर
भीर से बिपरीत शामियाने मे
एक सुनसान तनहा अकेले आशियाने मे

>घबराने की आवश्यकता नहीं, यह "कुलकर्णी वायरस" का बुखार है… मरीज़ जल्दी ही ठीक होगा… Secularism in BJP, Muslim Votes, Defeat in Elections

>भाजपा में बहुप्रतीक्षित उठापटक आखिरकार शुरु हो ही गई। इस बात का इन्तज़ार काफ़ी समय से किया जा रहा था कि लगातार दो चुनाव हारने के बाद ही सही शायद भाजपा के सिर से “सेकुलर” नाली में लोट लगाने का भूत उतर गया हो, लेकिन शायद अभी नहीं। सबसे पहले पुस्तक के बहाने जसवन्त सिंह को बाहर किया गया, जबकि जसवन्त सिंह को बाहर करने की असली वजह है वह चिठ्ठी जिसमें उन्होंने हार के लिये जिम्मेदार व्यक्तियों को पुरस्कृत करने पर सवाल उठाया था। “बहाने से” इसलिये कह रहा हूं कि उनकी विवादित पुस्तक के रिलीज़ होने के 36 घण्टे के भीतर उन्हें अपमानजनक तरीके से निकाल दिया गया, मुझे नहीं पता कि 36 घंटे से कम समय में पार्टी ने या इसके चिन्तकों ने 700 पेज की यह पुस्तक कब पढ़ी, और कब उसमें से यह भी ढूंढ लिया कि यह पार्टी विरोधी है, लेकिन ताबड़तोड़ न कोई नोटिस, न कोई अनुशासन समिति, सीधे बाहर…।

अब हार के लिये “जिम्मेदार व्यक्ति” यानी कौन? ज़ाहिर है कि पार्टी पर काबिज एक गुट, जो कि भाजपा को सेकुलर बनाने और अपना उल्लू सीधा करके पार्टी को कांग्रेस की एक घटिया “बी” टीम बनाने पर तुला हुआ है। लेकिन “सीधी बात” कर दी अरुण शौरी ने, ऐसे व्यक्ति ने, जिसे पार्टी का बौद्धिक चेहरा समझा जाता है, ज़मीनी नहीं। ऐसे व्यक्ति ने आम कार्यकर्ताओं के मन की बात पढ़ते हुए बिना किसी लाग-लपेट के सच्ची बात कह दी अर्थात “संघ को भाजपा को टेक-ओवर कर लेना चाहिये…”, और इस बात से पार्टी में कुछ लोगों को सिर्फ़ मिर्ची नहीं लगी, बल्कि भूचाल सा आ गया है। जबकि अरुण शौरी द्वारा लगाये गये सारे आरोप, एक आम कार्यकर्ता के दिल की बात है।

लेकिन सुधीन्द्र कुलकर्णी नामक “सेकुलर वायरस” ने पार्टी को इस कदर जकड़ रखा था कि उसका असर दिमाग पर भी हो गया था, और पार्टी कुछ सोचने की स्थिति में ही नहीं थी, सिवाय एक बात के कि किस तरह मुसलमानों को खुश किया जाये, किस तरह से मुस्लिम वोट प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के जतन किये जायें। जो छोटी सी बात एक सड़क का कार्यकर्ता समझता है कि चाहे भाजपा लगातार 2 माह तक शीर्षासन भी कर ले, मुस्लिम उसे वोट नहीं देने वाले, यह बात शीर्ष नेतृत्व को समझ नहीं आई। पहले इस कुलकर्णी वायरस ने आडवाणी को चपेट में लिया, वे जिन्ना की मज़ार पर गये, वहाँ जाकर पता नहीं क्या-क्या कसीदे काढ़ आये, जबकि बेचारे जसवन्त सिंह ने तो जिन्ना को शराबी, अय्याश और स्वार्थी बताया है। फ़िर भी चैन नहीं मिला तो आडवाणी ने पुस्तक लिख मारी और कंधार प्रकरण से खुद को अलग कर लिया, जबकि बच्चा भी समझता है कि बगैर देश के गृहमंत्री की सलाह या जानकारी के कोई भी इस प्रकार दुर्दान्त आतंकवादियों को साथ लेकर नहीं जा सकता। थोड़ी कसर बाकी रह गई थी, तो खुद को “मजबूत प्रधानमंत्री” भी घोषित करवा लिया, पुस्तक के उर्दू संस्करण के विमोचन में भाजपा-संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले नामवर सिंह और एक अन्य मुस्लिम लेखक को मंच पर बुला लाये। कहने का मतलब यह कि हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और पार्टी की पहचान बने सारे मुद्दे को छोड़कर भाजपा ने अपनी चाल ही बदल ली, ऐसे में आम कार्यकर्ता का दुखी और हताश होना स्वाभाविक ही था, हालांकि कार्यकर्ता बेमन से ही सही चुनाव प्रचार में जुटे, लेकिन जनता के मन में कांग्रेस के प्रति जो गुस्सा था उसे भाजपा नेतृत्व भुना नहीं पाया, क्योंकि “सेकुलर वायरस” के कारण उसकी आँखों पर हरी पट्टी बँध चुकी थी। पार्टी भूल गई कि जिस विचारधारा और मुद्दों की बदौलत वे 2 सीटों से 190 तक पहुँचे हैं, वही छोड़ देने पर उसे वापस 116 पर आना ही था। वोटिंग पैटर्न देखकर ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ मुसलमानों ने रणनीति के तहत “सिर्फ़ भाजपा को हराने के लिये” वोटिंग की है, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि जीतने वाला कांग्रेसी है, या बसपाई, या सपाई, बस भाजपा को हराना था। यानी भाजपा की हालत “आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी पाये न पूरी पाये” जैसी हो गई। जो परम्परागत हिन्दू वोट बैंक था, वह तो दरक गया, कर्मों की वजह से हाथ से खिसक गया और बदले में मिला कुछ नहीं। पार्टी पर काबिज एक गुट ने प्रश्न पूछने के लिये पैसा लेने वाल्रे सांसदों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की, स्टिंग आपरेशन होने पर भी बेशर्मी से भ्रष्टों का बचाव करते रहे, टीवी पर चेहरा दिखाने के लालच में धुर-भाजपा विरोधी चैनलों पर चहक-चहककर बातें करते रहे, गरज यह कि पार्टी को बरबाद करने के लिये जो कुछ बन पड़ा सब किया। “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” गये भाड़ में, तब नतीजा तो भुगतना ही था। आडवाणी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि, 2 सीटों से 190 तक ले जाने में उनके राम मन्दिर आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ रहा और इसके लिये पार्टी कार्यकर्ता उन्हें श्रेय भी देते हैं, लेकिन वह पिछली सदी और पिछली पीढ़ी की बात थी, “हिन्दुत्व” के उस विराट आंदोलन के बाद आडवाणी को समय रहते अपना चार्ज वक्त रहते किसी युवा के हाथों में दे देना चाहिये था, लेकिन इस बात में जो देरी हुई उसका नतीजा आज पार्टी भुगत रही है।

अब जो चिन्तन-विन्तन के नाम पर जो भी हो रहा है, वह सिर्फ़ आपसी गुटबाजी और सिर-फ़ुटौव्वल है, बाकी कुछ नहीं। गोविन्दाचार्य ने बिलकुल सही कहा कि सैनिक तो लड़ने के लिये तैयार बैठे हैं, सेनापति ही आपस में लड़ रहे हैं, तो युद्ध कैसे जीतेंगे। कार्यकर्ता तो इन्तज़ार कर रहा है कि कब पार्टी गरजकर कहे कि “बस, अब बहुत हुआ!!! राम मन्दिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता, बांग्लादेशी घुसपैठिये, उत्तर-पूर्व के राज्यों में सघन धर्मान्तरण, नकली सेकुलरिज़्म का फ़ैलता जाल, जैसे मुद्दों को लेकर जनमानस में माहौल बनाया जाये। पहले से ही महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से त्रस्त जनता को उद्वेलित करने में अधिक समय नहीं लगेगा, लेकिन यह बात बड़े नेताओं को एक आम कार्यकर्ता कैसे समझाये? उन्हें यह कैसे समझाये कि देश की युवा पीढ़ी भी देश के नपुंसक हालात, बेरोजगारी, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि से त्रस्त है, “राष्ट्रवाद” की एक मजबूत चिंगारी भी एक बड़े वोट बैंक को भाजपा के पीछे खड़ा कर सकती है, लेकिन नेताओं को लड़ने से फ़ुर्सत मिले तब ना। मजे की बात यह भी है कि अब आरोप लग रहे हैं कि भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा रहा, क्यों निभाये भाई? पिछले 5 साल में देश की वाट लगी पड़ी है, अगले 5 साल और लगेगी, समस्याओं के लिये कांग्रेस को दोष नहीं देंगे, लेकिन भाजपा पर जिम्मेदार विपक्ष बनने की जिम्मेदारी ढोल रहे हैं। जब जनता ने, मीडिया ने, चुनाव आयोग ने, उद्योगपतियों ने, वोटिंग मशीनों की हेराफ़ेरी ने, सबने मिलकर कांग्रेस को जिताया है, तो अब वही जनता भुगते। भाजपा को पहले अपना घर दुरुस्त करना अधिक जरूरी है।

खैर… भले ही फ़िलहाल इस सेकुलर वायरस ने पार्टी को ICU में पहुँचा रखा हो, भाजपा के तमाम विरोधियों की बाँछें खिली हुई हों, भाजपा की पतली हालत देखकर उनके मन में लड्डू फ़ूट रहे हैं। जबकि ऐसे लोग भी मन ही मन जानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में जनता अधिक कष्ट भुगतेगी, फ़िर भी उनका मन भाजपा-विरोध पर ही टिका रहता है, ऐसे भाजपा-विरोधी चाहते हैं कि कांग्रेस का विकल्प तो बने, लेकिन “कांग्रेस-बी” के रूप में, हिन्दुत्ववादी भाजपा के रूप में नहीं। ऐसा कैसे होने दिया जा सकता है? जल्दी ही पार्टी के नेताओं को समझ में आयेगा कि “कांग्रेस-बी” बनना उसकी सेहत के लिये ठीक नहीं है, उसे अपने मूल स्वरूप “भाजपा” ही बनकर रहना होगा, और यदि वे कांग्रेस-बी बनना चाहेंगे भी, तो अब आम कार्यकर्ता, भाजपा समर्थक वोटर और अन्य समूह उसे ऐसा करने नहीं देंगे। बस बहुत हुई “सेकुलर नौटंकी”, यदि यही रवैया जारी रहा तो कांग्रेस को हराने से पहले भाजपा को हराना पड़ेगा, इतनी बार हराना पड़ेगा कि वह “सेकुलरिज़्म” का नाम भी भूल जाये। अधिक से अधिक क्या होगा, कांग्रेस चुनाव जीतती रहेगी यही ना!!! क्या फ़र्क पड़ेगा, लेकिन अपनी “मूल विचारधारा” से खोखली हो चुकी भाजपा को रास्ते पर लाना अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय कांग्रेस की जीत या हार के। पहले देखें कि इस मजमे से निपटने के बाद पार्टी क्या राह पकड़ती है, फ़िर कार्यकर्ता और भाजपा समर्थक भी अपना रुख तय करेंगे। लेकिन एक अदना सी सलाह यह है कि 2004 और 2009 के चुनाव में भाजपा को शाइनिंग इंडिया, विकास, नदी-जोड़ो योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, वाजपेयी की प्रधानमंत्री सड़क योजना आदि के बावजूद जनता ने हरा दिया, तो फ़िर पार्टी को अपनी पुरानी हिन्दुत्ववादी लाइन पर लौटने में क्या हर्ज है? वैसे भी तो हारे ही, फ़िर इस लाइन को अपनाकर हारने में क्या बुराई है? यह मिथक भी सेकुलर मीडिया द्वारा ही फ़ैलाया गया है कि अब आज का युवा साम्प्रदायिक नारों से प्रभावित नहीं होता, सिर्फ़ एक बार यह लाइन सच्चाई से पकड़कर और उस पर ईमानदारी से चलकर देखो तो सही, कैसे बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त हिन्दू वोट बैंक तुम्हारे पीछे एकत्रित होता है, लेकिन जब “कुलकर्णी वायरस” दिमाग पर हावी हो जाता है तब कुछ सूझता नहीं है।

सो फ़िलहाल कार्यकर्ता चिन्ता ना करें, अभी जो हो रहा है होने दिया जाये, कम से कम यह भी पार्टी-लोकतन्त्र का एक हिस्सा ही है, अभी इतनी गिरावट भी नहीं आई कि महारानी या युवराज के एक इशारे पर किसी पार्टी के लोग ज़मीन पर लोट लगाने लगें। सेकुलर बुखार से पीड़ित इस मरीज को अभी थोड़े और झटके सहने पड़ेंगे, लेकिन एक बार यह वायरस उसके शरीर से पूरी तरह निकल जाये, तब “ताज़ा खून” संचारित होते देर नहीं लगेगी, और मरीज फ़िर से चलने-फ़िरने-दौड़ने लगेगा…। आज की तारीख में संघ-भाजपा-हिन्दुत्व विरोधियों का “पार्टी-टाइम” चल रहा है, उन्हें मनाने दो…

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भाजपा में बहुप्रतीक्षित उठापटक आखिरकार शुरु हो ही गई। इस बात का इन्तज़ार काफ़ी समय से किया जा रहा था कि लगातार दो चुनाव हारने के बाद ही सही शायद भाजपा के सिर से “सेकुलर” नाली में लोट लगाने का भूत उतर गया हो, लेकिन शायद अभी नहीं। सबसे पहले पुस्तक के बहाने जसवन्त सिंह को बाहर किया गया, जबकि जसवन्त सिंह को बाहर करने की असली वजह है वह चिठ्ठी जिसमें उन्होंने हार के लिये जिम्मेदार व्यक्तियों को पुरस्कृत करने पर सवाल उठाया था। “बहाने से” इसलिये कह रहा हूं कि उनकी विवादित पुस्तक के रिलीज़ होने के 36 घण्टे के भीतर उन्हें अपमानजनक तरीके से निकाल दिया गया, मुझे नहीं पता कि 36 घंटे से कम समय में पार्टी ने या इसके चिन्तकों ने 700 पेज की यह पुस्तक कब पढ़ी, और कब उसमें से यह भी ढूंढ लिया कि यह पार्टी विरोधी है, लेकिन ताबड़तोड़ न कोई नोटिस, न कोई अनुशासन समिति, सीधे बाहर…।

अब हार के लिये “जिम्मेदार व्यक्ति” यानी कौन? ज़ाहिर है कि पार्टी पर काबिज एक गुट, जो कि भाजपा को सेकुलर बनाने और अपना उल्लू सीधा करके पार्टी को कांग्रेस की एक घटिया “बी” टीम बनाने पर तुला हुआ है। लेकिन “सीधी बात” कर दी अरुण शौरी ने, ऐसे व्यक्ति ने, जिसे पार्टी का बौद्धिक चेहरा समझा जाता है, ज़मीनी नहीं। ऐसे व्यक्ति ने आम कार्यकर्ताओं के मन की बात पढ़ते हुए बिना किसी लाग-लपेट के सच्ची बात कह दी अर्थात “संघ को भाजपा को टेक-ओवर कर लेना चाहिये…”, और इस बात से पार्टी में कुछ लोगों को सिर्फ़ मिर्ची नहीं लगी, बल्कि भूचाल सा आ गया है। जबकि अरुण शौरी द्वारा लगाये गये सारे आरोप, एक आम कार्यकर्ता के दिल की बात है।

लेकिन सुधीन्द्र कुलकर्णी नामक “सेकुलर वायरस” ने पार्टी को इस कदर जकड़ रखा था कि उसका असर दिमाग पर भी हो गया था, और पार्टी कुछ सोचने की स्थिति में ही नहीं थी, सिवाय एक बात के कि किस तरह मुसलमानों को खुश किया जाये, किस तरह से मुस्लिम वोट प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के जतन किये जायें। जो छोटी सी बात एक सड़क का कार्यकर्ता समझता है कि चाहे भाजपा लगातार 2 माह तक शीर्षासन भी कर ले, मुस्लिम उसे वोट नहीं देने वाले, यह बात शीर्ष नेतृत्व को समझ नहीं आई। पहले इस कुलकर्णी वायरस ने आडवाणी को चपेट में लिया, वे जिन्ना की मज़ार पर गये, वहाँ जाकर पता नहीं क्या-क्या कसीदे काढ़ आये, जबकि बेचारे जसवन्त सिंह ने तो जिन्ना को शराबी, अय्याश और स्वार्थी बताया है। फ़िर भी चैन नहीं मिला तो आडवाणी ने पुस्तक लिख मारी और कंधार प्रकरण से खुद को अलग कर लिया, जबकि बच्चा भी समझता है कि बगैर देश के गृहमंत्री की सलाह या जानकारी के कोई भी इस प्रकार दुर्दान्त आतंकवादियों को साथ लेकर नहीं जा सकता। थोड़ी कसर बाकी रह गई थी, तो खुद को “मजबूत प्रधानमंत्री” भी घोषित करवा लिया, पुस्तक के उर्दू संस्करण के विमोचन में भाजपा-संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले नामवर सिंह और एक अन्य मुस्लिम लेखक को मंच पर बुला लाये। कहने का मतलब यह कि हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और पार्टी की पहचान बने सारे मुद्दे को छोड़कर भाजपा ने अपनी चाल ही बदल ली, ऐसे में आम कार्यकर्ता का दुखी और हताश होना स्वाभाविक ही था, हालांकि कार्यकर्ता बेमन से ही सही चुनाव प्रचार में जुटे, लेकिन जनता के मन में कांग्रेस के प्रति जो गुस्सा था उसे भाजपा नेतृत्व भुना नहीं पाया, क्योंकि “सेकुलर वायरस” के कारण उसकी आँखों पर हरी पट्टी बँध चुकी थी। पार्टी भूल गई कि जिस विचारधारा और मुद्दों की बदौलत वे 2 सीटों से 190 तक पहुँचे हैं, वही छोड़ देने पर उसे वापस 116 पर आना ही था। वोटिंग पैटर्न देखकर ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ मुसलमानों ने रणनीति के तहत “सिर्फ़ भाजपा को हराने के लिये” वोटिंग की है, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि जीतने वाला कांग्रेसी है, या बसपाई, या सपाई, बस भाजपा को हराना था। यानी भाजपा की हालत “आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी पाये न पूरी पाये” जैसी हो गई। जो परम्परागत हिन्दू वोट बैंक था, वह तो दरक गया, कर्मों की वजह से हाथ से खिसक गया और बदले में मिला कुछ नहीं। पार्टी पर काबिज एक गुट ने प्रश्न पूछने के लिये पैसा लेने वाल्रे सांसदों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की, स्टिंग आपरेशन होने पर भी बेशर्मी से भ्रष्टों का बचाव करते रहे, टीवी पर चेहरा दिखाने के लालच में धुर-भाजपा विरोधी चैनलों पर चहक-चहककर बातें करते रहे, गरज यह कि पार्टी को बरबाद करने के लिये जो कुछ बन पड़ा सब किया। “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” गये भाड़ में, तब नतीजा तो भुगतना ही था। आडवाणी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि, 2 सीटों से 190 तक ले जाने में उनके राम मन्दिर आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ रहा और इसके लिये पार्टी कार्यकर्ता उन्हें श्रेय भी देते हैं, लेकिन वह पिछली सदी और पिछली पीढ़ी की बात थी, “हिन्दुत्व” के उस विराट आंदोलन के बाद आडवाणी को समय रहते अपना चार्ज वक्त रहते किसी युवा के हाथों में दे देना चाहिये था, लेकिन इस बात में जो देरी हुई उसका नतीजा आज पार्टी भुगत रही है।

अब जो चिन्तन-विन्तन के नाम पर जो भी हो रहा है, वह सिर्फ़ आपसी गुटबाजी और सिर-फ़ुटौव्वल है, बाकी कुछ नहीं। गोविन्दाचार्य ने बिलकुल सही कहा कि सैनिक तो लड़ने के लिये तैयार बैठे हैं, सेनापति ही आपस में लड़ रहे हैं, तो युद्ध कैसे जीतेंगे। कार्यकर्ता तो इन्तज़ार कर रहा है कि कब पार्टी गरजकर कहे कि “बस, अब बहुत हुआ!!! राम मन्दिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता, बांग्लादेशी घुसपैठिये, उत्तर-पूर्व के राज्यों में सघन धर्मान्तरण, नकली सेकुलरिज़्म का फ़ैलता जाल, जैसे मुद्दों को लेकर जनमानस में माहौल बनाया जाये। पहले से ही महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से त्रस्त जनता को उद्वेलित करने में अधिक समय नहीं लगेगा, लेकिन यह बात बड़े नेताओं को एक आम कार्यकर्ता कैसे समझाये? उन्हें यह कैसे समझाये कि देश की युवा पीढ़ी भी देश के नपुंसक हालात, बेरोजगारी, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि से त्रस्त है, “राष्ट्रवाद” की एक मजबूत चिंगारी भी एक बड़े वोट बैंक को भाजपा के पीछे खड़ा कर सकती है, लेकिन नेताओं को लड़ने से फ़ुर्सत मिले तब ना। मजे की बात यह भी है कि अब आरोप लग रहे हैं कि भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा रहा, क्यों निभाये भाई? पिछले 5 साल में देश की वाट लगी पड़ी है, अगले 5 साल और लगेगी, समस्याओं के लिये कांग्रेस को दोष नहीं देंगे, लेकिन भाजपा पर जिम्मेदार विपक्ष बनने की जिम्मेदारी ढोल रहे हैं। जब जनता ने, मीडिया ने, चुनाव आयोग ने, उद्योगपतियों ने, वोटिंग मशीनों की हेराफ़ेरी ने, सबने मिलकर कांग्रेस को जिताया है, तो अब वही जनता भुगते। भाजपा को पहले अपना घर दुरुस्त करना अधिक जरूरी है।

खैर… भले ही फ़िलहाल इस सेकुलर वायरस ने पार्टी को ICU में पहुँचा रखा हो, भाजपा के तमाम विरोधियों की बाँछें खिली हुई हों, भाजपा की पतली हालत देखकर उनके मन में लड्डू फ़ूट रहे हैं। जबकि ऐसे लोग भी मन ही मन जानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में जनता अधिक कष्ट भुगतेगी, फ़िर भी उनका मन भाजपा-विरोध पर ही टिका रहता है, ऐसे भाजपा-विरोधी चाहते हैं कि कांग्रेस का विकल्प तो बने, लेकिन “कांग्रेस-बी” के रूप में, हिन्दुत्ववादी भाजपा के रूप में नहीं। ऐसा कैसे होने दिया जा सकता है? जल्दी ही पार्टी के नेताओं को समझ में आयेगा कि “कांग्रेस-बी” बनना उसकी सेहत के लिये ठीक नहीं है, उसे अपने मूल स्वरूप “भाजपा” ही बनकर रहना होगा, और यदि वे कांग्रेस-बी बनना चाहेंगे भी, तो अब आम कार्यकर्ता, भाजपा समर्थक वोटर और अन्य समूह उसे ऐसा करने नहीं देंगे। बस बहुत हुई “सेकुलर नौटंकी”, यदि यही रवैया जारी रहा तो कांग्रेस को हराने से पहले भाजपा को हराना पड़ेगा, इतनी बार हराना पड़ेगा कि वह “सेकुलरिज़्म” का नाम भी भूल जाये। अधिक से अधिक क्या होगा, कांग्रेस चुनाव जीतती रहेगी यही ना!!! क्या फ़र्क पड़ेगा, लेकिन अपनी “मूल विचारधारा” से खोखली हो चुकी भाजपा को रास्ते पर लाना अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय कांग्रेस की जीत या हार के। पहले देखें कि इस मजमे से निपटने के बाद पार्टी क्या राह पकड़ती है, फ़िर कार्यकर्ता और भाजपा समर्थक भी अपना रुख तय करेंगे। लेकिन एक अदना सी सलाह यह है कि 2004 और 2009 के चुनाव में भाजपा को शाइनिंग इंडिया, विकास, नदी-जोड़ो योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, वाजपेयी की प्रधानमंत्री सड़क योजना आदि के बावजूद जनता ने हरा दिया, तो फ़िर पार्टी को अपनी पुरानी हिन्दुत्ववादी लाइन पर लौटने में क्या हर्ज है? वैसे भी तो हारे ही, फ़िर इस लाइन को अपनाकर हारने में क्या बुराई है? यह मिथक भी सेकुलर मीडिया द्वारा ही फ़ैलाया गया है कि अब आज का युवा साम्प्रदायिक नारों से प्रभावित नहीं होता, सिर्फ़ एक बार यह लाइन सच्चाई से पकड़कर और उस पर ईमानदारी से चलकर देखो तो सही, कैसे बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त हिन्दू वोट बैंक तुम्हारे पीछे एकत्रित होता है, लेकिन जब “कुलकर्णी वायरस” दिमाग पर हावी हो जाता है तब कुछ सूझता नहीं है।

सो फ़िलहाल कार्यकर्ता चिन्ता ना करें, अभी जो हो रहा है होने दिया जाये, कम से कम यह भी पार्टी-लोकतन्त्र का एक हिस्सा ही है, अभी इतनी गिरावट भी नहीं आई कि महारानी या युवराज के एक इशारे पर किसी पार्टी के लोग ज़मीन पर लोट लगाने लगें। सेकुलर बुखार से पीड़ित इस मरीज को अभी थोड़े और झटके सहने पड़ेंगे, लेकिन एक बार यह वायरस उसके शरीर से पूरी तरह निकल जाये, तब “ताज़ा खून” संचारित होते देर नहीं लगेगी, और मरीज फ़िर से चलने-फ़िरने-दौड़ने लगेगा…। आज की तारीख में संघ-भाजपा-हिन्दुत्व विरोधियों का “पार्टी-टाइम” चल रहा है, उन्हें मनाने दो…

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