>गंध मचाने वालों के बाद सुगंध फैलाने वालों की चर्चा

>ब्लॉग्गिंग में गंध मचाने वालों की ख़बर ली तो सोचा कुछ सामाजिक सरोकार वाले नए लोगों की बात भी इस मंच से आपके सामने रखी जाएइसी सन्दर्भ में कुछ नए चिट्ठों को खंगाल कर ला रहा हूँदेखिये तो चिट्ठाजगत के नवागंतुकों के विचार :-

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MERI AWAJ SUNO एक राजनेता पाँच साल में कैसे करोड़ों का मालिक हो जाता है?

लोक सभा चुनाव बीते अभी महीने भर भी नही हुए है, इस लिए लोगों के जेहन में इन नेताओ के दिए हुए सम्पति सम्बन्धी शपथपत्र की यादें अभी ताजा है। जिन भी विधायकों और सांसदों ने पर्चा भरा उनमे से ज्यादातर की सम्पति करोणों में थी, जब यहियो राजनेता पाँच साल पहले चुनाव् लादे थे तब से इनकी सम्पतियों में ब्यापक इजाफा हुआ है। अतः यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है की इन पाँच सालो में कुबेर जी ने वह कोण सा करू का खजाना इनके लिए खोल दिया जो आम जनता के लिए हमेशा सपने जैसा और रहस्यमय होता है।
यदि एक सांसद के मासिक भत्ते और अन्य सुविधाओं परनजर डाली जाए तो वह लगभग एक लाख रूपये महीने आती है यानि एक साल में साथ लाख रूपये । इस हिसाब से पाँच सालों में कुल प्राप्ति लगभग तीन करोड़ रूपये की ही हुयी। फ़िर इन नेताओं के पास वो कौन सी जादू की छड़ी है कि पाँच साल बाद इनकी घोषित कमाई पांच करोड़ से उपर की हो जाती है। अघोषित की बात न ही करे तो ज्यादा अच्छा ।
नेताजी लोगों , क्या आम जनता को भी इस जादू के छडी का राज बताएँगे?

http://humkolikhen.blogspot.com/

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बच्चे.. जो बच्चे न रह पायेंगे
उस दिन टीवी पर प्रसारित होने वाले बच्चों के धारावाहिकों की सूची देख रहा था, तब यह जानकर आश्चर्य हुआ कि आजकल बच्चोें के लिए टीवी पर ऐसा कुछ भी देखने लायक नहीं है, जिससे उनके मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान भी बढ़े. आजकल जो कुछ भी बच्चों के नाम पर टीवी पर परोसा जा रहा है, उससे लगता है कि एक साजिश के तहत बच्चों को ‘ग्लोबल इंडियन ‘ बनाया जा रहा है. यह एक खतरनाक सच्चाई है, जिसे आज के पालक भले ही समझें, पर सच तो यह है कि आगे चलकर यह निश्चित रूप से समाज के लिए एक पीड़ादायी स्थिति का निर्माण होगा, जिसमें बच्चे केवल बच्चे बनकर नहीं रह पाएँगे, बल्कि उनका व्यवहार ऐसा होगा, जिससे लगेगा कि वे समय से पहले ही बड़े हो गए हैं, उनका बचपन तो पहले ही मारा जा चुका है. आगे पढ़ें ……… http://amar8weblog.blogspot.com

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रेल में आप ऐसा खाना खा रहे हैं !!!

ताब्दी एक्सप्रेस को बेहतरीन फूड क्वालिटी व कैटरिंग सर्विस के लिए दो साल पहले आईएसओ सर्टिफिकेट मिला था। लेकिन कालका से नई दिल्ली जाने वाली शताब्दी एक्सप्रेस के अंबाला स्थित बेस किचन की हालत देखकर लगता है कि यह सर्टिफिकेट छलावा भर है।

700 यात्रियों का खाना दो कमरों वाले इस किचन में रोजाना औसतन 700 यात्रियों के लिए खाना तैयार व पैक होता है। उल्लेखनीय है कि खाना बनाने की प्रक्रिया में तो साफ-सफाई का ख्याल नहीं रखा जाता, लेकिन पैकिंग में पूरी सावधानी बरती जाती है। शायद किचन का ठेकेदार मानता है कि अफसर और यात्री किचन देखने तो आते नहीं, वे तो केवल पैकिंग देखकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। आईआरसीटीसी ने किचन का ठेका एक ठेकेदार को दे रखा है।

अक्सर रहती है यात्रियों को शिकायतशताब्दी एक्सप्रेस में सर्व किए जाने वाले फूड को लेकर यात्रियों को अक्सर शिकायतें रहती हैं। इस बात को अंबाला मंडल भी स्वीकार करता है, लेकिन इस मुद्दे को आईआरसीटीसी के अधिकारियों से बात कर सुलझाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। कुछ समय पहले डॉ। संदीप छत्रपाल के माता-पिता शताब्दी का खाना खाकर बीमार हो गए थे। यही नहीं बीते वर्ष चंडीगढ़ शहर के चीफ इंजीनियर रह चुके वीके भारद्वाज अपनी पत्नी के साथ शताब्दी में नई दिल्ली जा रहे थे, तो कटलेट में मौजूद लोहे की तार उनकी पत्नी के गले में फंस गई थी, जिसके चलते उन्हें अस्पताल में भी दाखिल होना पड़ा था |
किचन का जल्द ही रेनोवेशन कराया जाएगा। खाने की गुणवत्ता जांचने के लिए 20 से 25 दिन में एक बार पीएफए टेस्ट होता है। जहां तक गंदगी का सवाल है तो इसे चेक कराएंगे।
अनीत दुल्लत, ग्रुप जनरल मैनेजर, आईआरसीटीसी
आईएसो से ले चुके रेलवे के उस सर्टिफिकेट पर भी संदेह के सवालों ने घेर लिया है जो अब अपनी आंखों देखने के बाद कोई यकीं नहीं कर सकता , लेकिन अभी रेलवे के अधिकारी किचन की गंदगी की जांच की ही बात कह रहे हैं |
आईआरसीटीसी की इस लापरवाही के लिए आख़िर कौन जिम्मेवार है ? और कौन इस पर करवाई करेगा ? जो लोग रेलवे की इस किचन का खाना खाने के बाद आप बीती सुनाते हैं उन शिकायतों पर कौन अमल करेगा ?
http://khbarchikascandelpoint.blogspot.com/2009/08/hrefhttpads.html

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दौड़ता भारत – रेंगते लोग

गाँव हो या शहर, यहाँ पे चलना एक मुस्किल कला बनी हुई है ! बात चाहे पैदल चलने की हो या फ़िर सड़को पे चलने की, हर कोई मजबूर हताश ही दिखता है! चाहे लोग यहाँ कितना भी दौडे आखिर में सब रेंगते ही मिलते है !
आज बात सिर्फ शहरों की करते हैं अब गए वो दिन जब देश के विकास का रास्ता गाँव से होकर गुजरता था , अब तो जहाँ से हाईवे गुजरता है समझो वहीँ शहर बस जाता है! रेंगने की कला में शहर गाँव से कहीं आगे है आखिर गाँव और कसबे ने भी तो यह कला शहर से ही सीखी है !
घर से निकलते ही सर्कस की शुरुवात भी हो जाती है ,गलियों में बचते बचाते आगे बढना पड़ता है, जल्दी होती है तो जल्दी २ भागता है ख़ुद को बचाते,कभी दाएं कभी बाएँ , कभी इधर कभी उधर ! चोकन्ना होकर आगे बढते हुए, अचानक ही जाने अनजाने पड़ोसियों के कूड़े से भी झुझना पड़ता है, कई बार कूड़ा ताज़ा होता है तो कई बार बासी और बदबूदार ! कई बार तो मालूम ही नही होता की कूड़ा आखिर आया तो आया किस घर से ?ऐसी स्थिति में चुपचाप ही निकलना एक बेहतर उपाए समझा गया है, अगर किसी ग़लत घर पर आरोप लगा बैठे तो लेने के देने भी पड़ जाते है और पिटाई के साथ- घर के सामने से कूड़ा भी आरोप लगाने वाले को ही उठाना पड़ता है! आगे पढ़ें ………………. .http://ekbat.blogspot.com/2009/07/blog-post.html

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लड़किया चलाएंगी छुरियां

भारत का पुलिस महकमा कितना दुरूस्त है इसका नजारा आए दिन यहां की सड़कों पर देखने को मिलता है। अब तक तो यह सुनने में मिलता था कि पुलिस किसी दबे कुचले रिपोर्ट को लिखने में ही आनाकानी करते हैं लेकिन ठहरिए अब वह अपनी जिम्मेदारी से भी बचते नजर आएंगे। गुजरात पुलिस ने यह साफ किया है कि लड़कियां बाहर निकलें तो अपने साथ मिर्ची पाउडर और चाकू लेकर चलें। तो इसका सीधा सा अर्थ यह निकाला जाय कि हमारी पुलिस हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहेगी।
कहीं कोई हादसा हो जाए तो पुलिस आराम से अपना बहाना खोज लेगी। समय से पहुंच जाएं ऐसा यहां होता नहीं क्योंकि शायद लेट से आना इनकी फितरत में शामिल है। एक नादान बच्ची, जिसे चोरी क्या है इसकी भी जानकारी नहीं है, को खुलेआम पुलिस घसीट कर पीटने से बाज नहीं आती है पर कोई तथाकथित समाज के ऊंचे लोग किसी महिला के साथ कोई बदसलूकी करें तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने में कानूनी धारा पर शोध करना शुरु कर देते हैं।
दूसरों को शराब सबाब से दूर रहने की सालाह देने वाले ये लोग खुद ही सड़कों पर टल्ली होकर घूमते दिख जाते हैं। समाज को सुधारने के बजाय ये कई बार ऐसे ऐसे गुल खिलाते हैं की इंसानियत ही शर्मसार हो जाए।आजकल महिलाओं के साथ छेड़छाड़ बलात्कार जैसी घटनाओं में दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की हो रही है। इसके बावजूद पुलिस ने एक सर्कुलर जारी कर लड़कियों को अपने साथ छोटा चाकू और मिर्ची पॉडर रखने की सलाह दी है साथ ही देर रात घर से नहीं निकलने की भी सलाह दी है। आपको याद होगा कि यह तो पुलिस का सर्कुलर है लेकिन कुछ महीने पहले दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी यह कह डाला था कि महिलाओं को रात्रि में निकलने की क्या जरुरत है। यह तो मानसिकता है हमारे प्रशासन और गुजरात पुलिस इस तरह के सर्कुलर जारी अपने कर्तव्य से मुह फेरना चाहती है। इन्होने ये सलाह तो दे दी की लड़कियां अपने साथ चाकू रखे पर इसकी क्या गारंटी है कि इनका निशाना कोई मनचला ही होगा और निशाना लगाने के बाद इनपर कोई कार्रवाई नहीं होगी क्या इसका विश्वास भी ये दिला रहे हैं। अगर हर लड़की इस तरह से अपनी रक्षा खुद ही कर ले तो इन रखवालों का क्या काम है। http://deo4priya.blogspot.com/2009/08/blog-post.html

अब तक कई चिट्ठाकार इस प्रकार की पोस्ट को चिट्ठाचर्चा नाम से लगाते आए हैं। बाकायदा इस नाम से ब्लॉग भी चलाया जा रहा हैलेकिन इस कड़ी में हमारा यह प्रयास एक मामले में भिन्न हैवो इस प्रकार कि हमने उन्ही लोगों को चुना है जो बिल्कुल हीं नए हैंइनमें से अधिकांश चिट्ठों की पहली पोस्ट को उठाया गया हैआशा है इसे आप पसंद करेंगे और इन नवागंतुकों का उत्साह भी बढेगाजय हिंद !!

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