>न्यायप्रक्रिया का निट्ठाल्लापन

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किसी भी तथ्य को समझने के लिए गहराई में जाना आवश्यक है तभी यथार्थ से साक्षात्कार होता है । बात ये है कि इतनी फुर्सत किसे है ! यहाँ तो बस सब को निट्ठल्लेपन में जीना बेहद पसंद है । वह एक दफ्तर का मामूली मुलाजिम हो अथवा कोई न्यायाधीश हर कोई आराम पसंद लोग हैं । न्याय प्रक्रिया की कच्छप चाल की खबरें आए दिन अख़बार की सुर्खियों में आता रहता है । ‘दामिनी’ फ़िल्म का संवाद हमारी न्याय प्रणाली को सही अक्स दिखता है जिसमें नायक द्वारा अदालत में जज को खूब खरी-खोटी सुनाई जाती है । “तारीख पर तारीख “वाला संवाद आज भी लोगों की जुबान पर है ।

भारतीय न्याय प्रणाली की तारीफ़ में क्या कहें ! विवादों के निबटारे में देरी तो आम बात है । कभी-कभी तो ऐसा होता है वादी /प्रतिवादी के मर जाने पर भी मामले की सुनवाई ख़त्म नही हो पाती ! कई हज़ार ऐसे उदाहरण हैं जहाँ पीढी दर पीढी केस चलता रहता है । ऐसा क्यों होता है , कभी सोचा है आपने ? कोई मुकदमा करने का मन बनता है तो लोग समझाते हैं :’ अरे किस लफडे में पड़ रहे हो ? पहले ही अदालतों में लाखों केस दर्ज हैं जिनका हल अभी तक नही निकला ।तो तुम कौन से गफलत में जी रहे हो ?’ अब इस मामले को गंभीरता से अध्ययन करें तो कई चौकाने वाले तथ्य सामने आयेंगे । जहाँ एक सामान्य कर्मचारी वर्ष भर २४५ दिन काम करता है वहीँ सर्वोच्च न्यायालय के जज महज १९० दिन । उनकी छुट्टियाँ न्यायपालिका के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा है । निचली अदालत के जजों को २४ दिन और उच्च न्यायालय के जज को ३० दिन की गर्मी छुट्टी मिलती है । जबकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ५० दिन की छुट्टी मुहैया कराइ जाती है । इतना कुछ जान लेने पर न्याय प्रक्रिया के ऊपर जमी धुंध हट गई होगी ।

:-“सुधाकर कुमार सिंह “

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