>सुगंध फैलाने वालों की चर्चा भाग -2

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गत रविवार को आरम्भ किए गए इस स्तम्भ के अर्न्तगत दूसरा पोस्ट में तीन नए चिट्ठाकारों को शामिल किया जा रहा है । समाज और देश से सरोकार रखने वाले मसले पर कहीं कुछ लिखा मिल जाता है तो यहाँ लाने का दुस्साहस कर बैठता हूँ । हिन्दी ब्लॉग्गिंग की दुनिया में इन नए महारथियों की लेखनी और इनकी पैनी नज़र को देख कर “ब्लॉग जगत ” के भी चौथे खम्भे में शामिल होने की बात प्रमाणित लगती है ।
*दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी क्षेत्र या मजदूर पैदा करने का कारखाना!
दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी क्षेत्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण और बदहाली के दलदल में धँसा हुआ है। हालाँकि यह बदहाली बहुत पुरानी है परन्तु आजादी के पहले चूँकि पूरा क्षेत्र एक अन्यायपूर्ण अंगे्रजी हुकूमत के अधीन था इसलिये उस दौर के बारे में हम बहुत अधिक अपेक्षा नहीं रख सकते, पर आजादी के बाद आज बासठ साल गुजर जाने के बावजूद क्यों इस क्षेत्र के हालात नहीं बदले और क्यों यहाँ के लोगों की जिन्दगी बद से बदतर होती चली गयी, इस सवाल का जवाब आने वाला कल जरूर लेकर रहेगा। सोचने वाली बात है कि अगर इस बदहाली को समाप्त करने का कोई इरादा हमारी राजनीतिक पार्टियों या सरकारी व्यवस्था का होता तो क्या बासठ साल का समय इसके लिये बहुत कम था ? समानता और लोकतंत्र पर आधारित हमारे संविधान ने यह इन्तजाम किया था कि इस देश के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले और किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय अथवा वर्ग के लोगों को एक नागरिक के तौर पर देश के संसाधनों एवं सुविधाओं में बराबर का साझीदार बनाया जाएगा तथा उनके लिये सम्मानपूर्वक जीने, अपनी संस्कृति या धर्म के अनुसार चलने और विकास करने की आजादी होगी। इसके पीछे यह सोच काम कर रही थी कि सदियों से जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर होते चले आ रहे शोषण को समाप्त कर एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की जा सकेगी। पर क्या इस देश के सभी क्षेत्र के लोगों को एक आजाद देश में रहने का सुख मिल सका ? हमने देखा कि देश के कुछ क्षेत्रों में तो अमीरी के बड़े-बड़े महल खड़े हो गये पर ज्यादातर क्षेत्र लगातार बदहाल और कंगाल होते चले गये। इसी देश के अन्दर मुट्ठी भर अमीरों ने बाकी लोगों से अलग अपने-अपने किले बना लिये और उनकी संपत्ति लाखों से करोड़ों और करोड़ों से अरबों में पहुँच गयी पर दूसरी तरफ देश के बहुसंख्यक वंचितों और गरीबों की न केवल संख्या ही बढ़ी बल्कि उनकी गरीबी का स्तर भी बढ़ा। कहने का मतलब यह कि आजादी के बाद उनका जीवन पहले से कहीं अधिक कठिन, अधिक लाचार और असुरक्षित हो गया। देश के कुछ क्षेत्र जो भौगोलिक और प्राकृतिक दृष्टि से बाकी क्षेत्रों से कटे हुए थे, उनकी मुश्किलें तो सारी हदों को पार कर गईं और उन्होंने इन्सान होने का एहसास तक खो दिया। दक्षिणी राजस्थान का यह आदिवासी क्षेत्र भी इसी दुश्चक्र में उलझ कर रह गया है। सरकार की तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के अन्तर्गत लाखों-करोड़ों की धनराशि अब तक खर्च की जा चुकी है पर इस क्षेत्र के लोगों के जीवन में, उनके रहन-सहन में कोई गुणात्मक परिवर्तन नजर नहीं आता।दक्षिणी राजस्थान का यह आदिवासी क्षेत्र आज भी जीवन की बुनियादी सुविधाओं तक के लिए तरस रहा है। यहाँ के खेत पानी के अभाव में सूख जाते हैं। न तो यहाँ रोजगार के पर्याप्त साधन हैं और न ही सड़क, पानी, बिजली, यातायात या चिकित्सा की मामूली सुविधाएँ भी लोगों को मिल पाई हैं। साल के कुछ महीनों में अपनी तथा अपने परिवार की जिन्दगी बचाने के लिए शहरों की तरफ पलायन करना तो जैसे इस क्षेत्र के लोगों की नियति बन चुकी है। क्षेत्र के गाँव-गाँव में स्कूलों का जाल तो बिछ गया है पर उन स्कूलों में एक ऐसी शिक्षा प्रणाली चलाई जा रही है, जिसमें यहाँ के बच्चों के पढ़ने, कुछ सीख पाने या आगे बढ़ने के मौके बिल्कुल नहीं हैं। इस शिक्षा प्रणाली से गुजरने के बाद भी यहाँ के बच्चे इस लायक नहीं बन पाते कि वे मजदूरी के अलावा कोई दूसरा काम कर सकें और इस तरह उन्हें जिन्दगी भर सुविधासम्पन्न तबके के लोगों के नीचे ही रहकर काम करना पडता है। यही कारण है कि आज दक्षिणी राजस्थान के स्कूलों को बडे पैमाने पर मजदूर तैयार करने का कारखाना कहा जा रहा है।
ब्लॉग का नाम :-समान बचपन अभियान http://samanbachpanabhiyan.blogspot.com/
** ‘जो कुछ बचा, मंहगाई मार गई’
गरीबों के मुंह से निवाला छीन लेने वाली मंहगाई ने आम लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। आख़िर क्यों बढ़ गई मंहगाई? कौन है इसके लिए जिम्मेवार? क्या congress party जिम्मेवार है? क्या BJP जिम्मेवार है? जनता सोच रही है अब किसे जिताया जाए? बीजेपी और कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, वाम दलों सहित सभी छोटी-बड़ी पार्टियों की सरकारों को देख लिया गया है। जहाँ तक आम मेहनतकश जनता और गरीब लोगों का सवाल है, उनमें रत्ती भर भी फर्क नहीं है। आज जब मंहगाई बढ़कर इतनी हो गई है कि खाते-पीते परिवारों के यहाँ से भी दाल और सब्जियां गायब होती जा रही हैं, तो पूंजीवादी पार्टियाँ भी मंहगाई पर चिंता जाहिर कर रही हैं। उन्हें डर है कि भूखी जनता सड़क पर न आ जाए, कहीं विधि -व्यवस्था न बिगड़ जाए और शासन पर जनता धावा न बोल दे! परंतु, जब वे स्वयं अपनी जाती हुई सत्ता को ” झपटने” के लिए विधि-व्यवस्था बिगाड़ते हैं तो उन्हें इसकी कोई फिक्र नहीं होती है!! सवाल यह भी है कि जनता स्वयं क्या सोचती है।
ब्लॉग का नाम :PEOPLE’S DISCOURSE /
http://proletarianalternative.blogspot.com/2009/08/blog-post_10.हटमल
*** माया की माया …
कई दिनों से एक ख़बर मीडिया में सुर्खियों में रहती है, फिर कहीं न कहीं दब कर रह जाती है, आज सुबह अखबार के पन्ने पलटते हुए मैंने असमान की तरफ़ देखा। बादलों की पतली लकीर सूरज की तेज़ किरणों को छुपाने की कोशिश कर रही थी। मैंने न जाने क्यों पर, ऊपर वाले से मन ही मन थोडी बारिश की प्रार्थना कर बैठा। शायद मैं उस धुप को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, पर उन किसानो का क्या जो रोज़ इस आस में सोते हैं की कल बारिश होगी तोह कहती की गाड़ी आगे बढेगी। झूठा दिलासा ही है पर फिर भी वोह अपने आप को दिलासा देता जरूर है। आसमान से बारिश ना हो तोह क्या ? शायद इस साल भूखा रहना पड़े, किसी की बिटिया का ब्याह न होगा, किसी पर कर्जे का भार और बढ़ जाएगा, वोह छोटी खुशियाँ जो एक किअसं अपने परिवार के लिए देखता है, वोह उनसे वंचित रह जाएगा, पर इसकी पड़ी किसको है। कृषि प्रधान देश होने पर भी हमारी निर्भरता बारिश पर इतनी ज्यादा है, वोह हम सब जानते हैं, तब तोह खेती होगी ही राम भरोसे। एक तरफ़ तो यह पहलु है और दूसरा पहलु है, मायावती और उनकी माया। प्रदेश सूखे की मार झेल रहा है और माया जी को अपनी मूर्ती बनवाने से फुर्सत नहीं। किसान रोता है तोह रोये, मैं तोह अपने आपको अमर करके इस दुनिया से रुखसत होउंगी। भाई चुना है तोह भुगतो, मुलायम ने भी तोह ऐश की थी, अब मेरी और मेरे हान्थियों की बारी है। ज्यादा हो हल्ला हो तो सीधे केन्द्र की सरकार पर निशाना साधो, केन्द्र अपना पल्ला झड़ने के लिए कुछ करोड़ रुपये दे देता है और फिर वोह पैसे किसे उद्धार में जाते है वोह या तो माया को मालूम है या उसके अय्यियारों को। केन्द्र कुएक अनोखी परियोजना ले कर आ जाता है, सस्ते अनाज, चावल सिर्फ़ ३ रुपये किलो। मीडिया शांत, किसान कुछ बोले तोह सरकार का जवाब होता है चावल सस्ते कर दिए हैं आप लोग सूखे से निपट सकते हो अब। भाई कमाल है, कोई इनसे यह पूछे क्या साल भर केवल चावल खाते हो नेताजी। और यह सस्ते अनाज बाँट कर आप कोई उद्धार नहीं कर रहे हो, बल्कि आप एक इज्ज़तदार किसान को, जोह देश का पेट भरता है, एक भिखारी बना रहे हो, उसे सस्ते की आदत मत डालो, उसे अच्छी आदत डालो, उसे मेहनत करने से मत रोको, उसे उन्नति की राह दिखाओ। कृषि प्रधान इस देश में सिंचाई की सुद्रिड वेवस्था करो, की कुछ दिन बारिश ना हो तोह वोह भिखारी बनने पर मजबूर न हो। ब्लॉग का नाम :Turning Heads
http://pradeepsingh14.blogspot.com/2009/08/blog-post.हटमल
तीन ब्लॉग , तीन पोस्ट और तीन समसामयिक मुद्दे पर शानदार कलमघसीटी की गई है । महंगाई -मजदूरी -माया इन तीन चीजों को ढोना आज हमारी मजबूरी सी बन गई है । या यूँ कहिये बनी नहीं हमने बना दिया है । वर्तमान को ध्यान में रखकर और भविष्य को विचार कर लिखे गए इन आलेखों से ब्लॉग जगत की गंभीरता सामने आती है । आशा है ये नए लोग आगे और भी सार्थक विषयों पर लिखते रहेंगे । जय हिंद !
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