>बढ़ते बक***दी के कारण ब्लॉग जगत को एक चौकीदार की जरुरत आन पड़ी है

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हिन्दी ब्लाग जगत ने अल्प समय में व्यापक प्रगति तो कर ली, परन्तु मीडिया के व्यवस्थित ढांचे मे यह जो अभिव्यक्ति की पगडंडी है, वह कितनी सार्थक है, यह विचार करने का समय गया है।यहां अच्छे या बुरे ब्लागर की बात नहीं की जा रही, बल्कि ब्लाग के वैकल्पिक मीडिया के स्वरूप, आदर्श और मानदंड और अभिव्यक्ति पर एक विचार पेश है। आज ब्लागिंग पत्रकारिता या वैकल्पिक मीडिया तो नहीं परलिखने की कलाबनता जा रहा है। अनापसनाप लिखने वालों की कमी नही। महान कलमतोड़ू और लिख्खाड़ लोग धड़ल्ले से बक**दी कर सक्रियता क्रम को मेडल की तरह दिखा रहें है। मैं नही कहता कि हम इनसे अलग हैं ,पर मेरा क्या
मैं मुकम्म्ल हो गया तो देवता बन जाउँगा, मुझमें जो खामियां हैं वो खामियां रहने भी दो…वाली तर्ज पर खुद को अलग करता हूं।
हां तो ब्लागर भाइयों……पेश है आपके बेलगाम बक**दी पर यह पक्तियां
आपका मंच है, आपको रोका किसने अपने पोखर को समन्दर कहिए॥
ब्लागरों की जो प्रतिक्रिया देने का अंदाज है वह तो पाकेट मारने जैसा। मेरे एक ब्लागर मित्र ने हाल में हीं इस अंदाज को बड़ी सटीक संज्ञा दी थी। उनका कहना था: देखो तो इन ब्लागरों को जहां जाते हैं हग आतें है आपको बता दें कि यह बात हिंदी मे कही गयी है। आप अंग्रेजी भाषा का हग का अर्थ यहां लगाएं। तो प्रतिक्रिया देने की जो औपचारिकता है वह
अच्छा लेख! बधाई हो…… जैसे आपके यहां बच्चा पैदा हुआ हो और आप बाप बनने का मद्दा न रखतें हो।
सुन्दर रचना…… जैसे कुछ और कह देते तो ” वाह” कह कर हीं चला जाता।
बढ़िया अभिव्यक्ति…… जैसे अपने हिन्दी को लेकर आशावान हो।

इससे साफ जाहिर होता है कि, आपके पोस्ट को पढ़े बगैर, प्रतिक्रिया दर्ज कर दी। मेरे एक कविता पर एक टिप्पणी
आई।बधाई हो! सुन्दर लेख!” मैं आवाक रह गया। मुझे लगा कविता तो छंद मुक्त नही थी। क्योंकि कभीकभी
नवोदित छंद मुक्त कविता लेखन पहचान पाना मुश्किल हो जाता है। मै समझ गया, यह टिप्प्णी,डेस्कटाप पर नोट पैड से कटपेस्ट की गई थी।
कोई सुनता नही इक दूसरे की बात अब इस ब्लाग जगत में हर शख्स बहरा हो गया

चर्चा का विषय यह है कि वैकल्पिक होने का क्या अर्थ है। आखिर किसका विकल्प होने की बात की जा रही है।
वह है, मुख्यधारा की मीडिया। वैकल्पिक मीडिया के लिए, यह आवश्यक है कि उसे मुख्यधारा के विचार से अलग
रख कर देखना होगा। एक नज़रिया जो उसे मुख्यधारा से अलग पहचान दे। सीधे शब्दों मे मै उसे आंदोलनधर्मिता कह सकता हूं। बात उस पहलू पर जो मुख्याधारा की मीडिया का चारा नहीं है। समाज के उन लोगों की बात,जो हाशिए पर हैं। देश का एक बड़ा वर्ग, जो अपनी बात कहने के लिये माध्यम का मुहताज है। किसी अल्पसंख्यक विचार को एक मंच प्रदान करने की प्रतिबद्धता हीं वैकल्पिक मीडिया का स्वरुप है।

हमारे यहां दुर्भाग्य है कि मुख्यधारा की मीडिया अल्पसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करती है। और बहुसंख्यक समाज मजबूरन वैकल्पिक मीडिया का सहारा लेता है।इसे इस तरह समझना होगाहमारे देश के 72% लोग ग्रामवासी हैं. वे भारत के नागरिक नहीं, भारत के ग्रामीण हैं। लेकिन दुःखद बात यह है कि आज अखबार या टीवी चैनल उस बहुसंख्यक समाज की समस्याओं को 5% भी जगह नही देता। हमारे मुख्यधारा की मीडिया, अपने उपभोक्ता वर्ग की समस्याओं को हीं राष्ट्रीय समस्या या बहस का मुद्दा बनाती है। एक सर्वे का दावा है कि दिल्ली की राष्ट्रीय मीडिया में, दलित और आदिवासी कुल 0% है ( जहां आबादी में वह 25% हैं) हमारे देश का मीडिया खायाअघाया वर्ग यानि उपर के 10-12% को कवर करने में लगा है। तो ब्लाग, जिसे वैकल्पिक मीडिया का सबसे ताकतवर हथियार माना जा रहा है, का यह दायित्व बनता है कि ऐसे विचारों या मुद्दों को उठाना या जगाना, जो देश के मीडिया वर्ग या शासक वर्ग के विचार नहीं हैं।
लोकतंत्र का यह नवजात प्रहरी, यह धारदार हथियार कहीं भोथड़ा पड़ जाये। ऐसे में सुरेश चिपलूनकर, विजयेन्द्र , जयरामविप्लव,जैसे ब्लागरों के प्रयासों को शतशत नमन्।
शायद आज रात लिखी गयी यह कविता, कुछ कह जाये

कनिष्क: हे ब्लागर! क्या तुम बनोगे विकल्प?

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