>सुगंध फैलाने वालों की चर्चा भाग -3

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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आप सबों को हार्दिक बधाई ! आज फ़िर ब्लॉग जगत की भीड़ से नवागंतुकों को छांक कर संवाद के इस मंच पर ला रहा हूँ । ब्लॉग प्रशंसा के तीसरे भाग में उन लोगों को शामिल किया गया है जो देश के वर्तमान शासनतंत्र से निजात चाहते हैं । इनका सीधा सवाल हमसे , आपसे , नेताओं से , सरकार से , नौकरशाहों से यानी देश के हर नागरिक से है , क्या हम आजाद हैं ?
*हम आज़ाद है क्या सच में ?
“युवा क्रन्तिकारी शहीद सरदार भगत सिंह ने फांसी लगने से पहले कहा था की “भारत में न्याय के लिए आईपीसी यानि भारतीय दंड संहिता को समाप्त किया जाए !”*भारत के सबसे कम उम्र के फांसी पाने वाले क्रांतिकारी मदनलाल धींगरा ने लन्दन से लिखे अपने एक पत्र में इसकी समाप्ति की बात कही थी !*स्वतंत्रता के बाद अनेक नेताओ क्रांतिकारियों ने आईपीसी को हटाने को कहा लेकिन हमारे प्रधानमंत्री चाचा नेहरू ने कहा की “इसी के आधार पर तो हम शासन चलाएंगे ,यही तो व्यवस्था है !”हमारी आज़ाद गुलामी तो देखिये की जनाब, अपराध पाप अनाचार की परिभाषा भी हमने इस आईपीसी यानि आयरिश पीनल कोड यानि इंडियन पीनल कोड ली है !इसके बाद भी हम कहते है की हम आज़ाद है ।”
http://ramendralekhan.blogspot.com/2009/08/blog-post_12.html
** गरीबी रोकने की सबसे बड़ी उपलब्धि नरेगा और उसकी हकीकत
“बिहार के इस पिछडे इलाके में हर साल डैरिया से १०० से ज्यादा लोगों की मौत होती है । वजह सनिटेशन का घोर अभाव है । दूर से आती दुर्गंध हवा आपको किसी बस्ती का एहसास करा सकती है । गाँव से बाहर की सड़के मल-मूत्र से भरा पड़ा है । दिन में बच्चे की बारी होती है तो दोपहर के बाद इन सड़कों पर वयस्क मर्दों का कब्जा हो जाता है । जबकि शाम ढलते ही महिलयों की टोली यहाँ जम जाती । अपना कहने के लिए सिर्फ़ यह सड़क ही साझा शौचालय है ।
यूनिसेफ का मानना है कि गाँव में शौचालय बनाकर डैरिया की मौत से लोगों को बचाया जा सकता है । यूनिसेफ की रिपोर्ट को माने तो भारत के महज १५ फीसद गाँव में ही अबतक शौचालय लोकप्रिय हो पाया है । चौकाने वाली बात यह है कि भारत के ग्रामीण इलाके में सबसे ज्यादा मौत डैरिया से ही होती है । मुखिया पदम् सिंह इस सच को स्वीकार कर ते है लेकिन अपनी मजबूरी बताते है कि हमें सिर्फ़ मिटटी काटने को कहा गया है ।”
http://bakwasreport.blogspot.com/2009/08/blog-post.html
*** आईये हाथ उठायें हम..मिलके..!
“एक सवाल पूछती हूँ, आप सभीसे…जो बेहद सामायिक है…हमारी सुरक्षा से निगडित है॥हम सभी को इसका जवाब खोजना है.. इसका सामना करने की निहायत ज़रूरत है…वो आतंक वाद को लेके…!क्या आपलोग Indian Evidence Act २५/२७ के बारेमे जानते हैं? जानते हैं,कि, इसके क्या दुष्परिणाम हैं? के ये १५० साल पुराना, अंग्रेजों ने ख़ुद को बचाए रखने के लिए बनाया क़ानून आज पूरी दुनिया के लिए समस्या बन गया है? हमें निगल रहा है और हम हाथ पे हाथ धरे बैठे है? आख़िर क्यों? हमारी आज़ादी की सालगिरह हमें आतंक के साये में मनानी पड़ती है॥आख़िर कबतक?के, अर्न्तगत सुरक्षा यंत्रणा के हाथ मज़बूत करने के लिए दिए गए सुझाव,उच्च तम न्यायलय के आदेशों के बावजूद पिछले २९ सालों से लागू नही किए गए?के, जबतक इन क़ानूनों में तब्दीलियाँ नही आतीं, हम आतंक से महफूज़ नहीँ? के अफ़ीम- गाँजा की तस्करी भी जारी रहेगी और हम मुँह तकते रहेंगे?ये सभी सवाल,एक ही सवाल के तहत हैं…हम हमारे देशकी कानून व्यवस्था के बारेमे कितनी जानकारी रखते हैं? ख़ास कर जहाँ तस्करी से निपटने का प्रश्न आता है ???हम एक बारूद के ढेर पे बठे हुए हैं/रहेंगे…और निगले जायेंगे,जब तक जागरूक नही बनेंगे….एक लोक तंत्र में सबसे अधिक लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है..आईये ! हम कुछ करें…मिलके..!”
http://shama-shamaneeraj-eksawalblogspotcom.blogspot.com/2009/08/blog-post_7005.html
उपरोक्त तीनों चिट्ठों में अलग-अलग सवाल उठाये गये हैं। सारे सवालों का सार यही है कि आज़ादी के ६२ सालों बाद भी हमारी स्थिति दयनीय है। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के पूर्ति के लिए जद्दोजहद कर रहे एक आम भारतीय की वास्तविक हालत क्या एक स्वतंत्र मनुष्य की है ? हाँ , इतना जरुर है कि देश का एक तबका आर्थिक , सामाजिक , राजनितिक तमाम तरह की स्वतंत्रता का उपभोग कर रहा है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जिस अधिकार को संविधान ने आम लोगों के हक में बने था । आज उसी अधिकार का नजायज फायदा उठकर तथाकथित बौद्धिक लोग अपनी जेबें भर रहे हैं । मीडिया अपने कर्तव्यों को विस्मृत कर बाज़ार की गोद में जा बैठा है । चाँदी के टुकडों की चमक में कलम की स्याही फीकी और कैमरे की रौशनी कम पड़ गई है। ऐसे संक्रमण काल में इन चिट्ठों की भूमिका सराहनीय है । निकट भविष्य में वैकल्पिक मीडिया होने जा रहे ब्लॉग जगत को अपने अन्दर बदलाव लाने की जरुरत है । अपनी छपास रोग से उत्पन्न कुंठा को शांत करने के हेतु लिखने के स्थान पर अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए विषय-वास्तु का चयन करना सीखना होगा । आगे भी ब्लॉग-प्रशंसा का यह प्रयास चलता रहेगा तब तक के लिए विदा !!

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