>क्या हम वाकई आजाद हैं?

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हम आजाद है और ये आजादी की ६२वीं वर्षगांठ है। पर सचमुच क्या हम आजाद है? मन से या तन से, शायद तन से ही होगा, क्योंकि अंग्रेजो की गुलामी की जंजीरे जो तोड़ी है हमने। लेकिन मन आज भी किसी न किसी बात पर व्याकुल रहता है और खुद को सहज महसूस नहीं होने देता। वह सोचता है, रात-रात भर जागता रहता है। जब देखता ६२ वर्षों में बदले इंसानी स्वरूप को, फैली अराजकता को, अपनी जीविका के लिए कुछ भी कर गुजरने वालें लोगों को। यहां तक की अमीर-गरीब में बढ़ती खाई और राजनीतिक ओछेपन की उस परिदृश्य को, जिसने समान रक्त और मांस से बने इस ढ़ांचे को धर्म, जाति, रंग, लिंग और सम्प्रदाय में बांट दिया है। चिंता होती है आने वाले कल की, जब दो वक्त की रोटी के लिए लोग एक-दूसरे का गला कांटने से भी परहेज नहीं करेंगे। मंहगाई की उंस चरम सीमा की, जिसने अभी तो केवल दाल को थाल से छीना है पर शायद कल दो-रोटी भी न छीन ले। इतना ही नहीं चिंता होती है हमे स्वच्छ वायु और जल की, जो हमारे पेड़ देते रहे है। सांस लेने के लिए प्यास मिटाने के लिए, मगर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई कर कांक्रीट के बनते उंचे-उंचे इमारतो ने तो हमारे सांस लेने में भी मुश्किले खड़ी कर दी है। और हम सांस लेना भी चाहते है तो स्वाईन फ्‌लू का डर हमे सांस लेने तक नहीं देता।
हां, आजादी मिली है उन राजनेताओं को जो सांसद या मंत्री बनते ही सात पुश्तों के लिए भोजन-पानी का प्रबंध करने लगते है। उन भ्रष्टाचारी इंसानों को जिनके जमीर को कागज के टुकड़े और खनकते सिक्के ने मार रखा है। उन व्यापारिक घरानों को जिन्हे लाख करोड़ या अरब से भी संतोष नहीं होता। बल्कि खरबों की चाहत लिए मजदूरों का शोषण और नेताओं से मिलकर जनता को लुटने के लिए जमाखोरी करने से भी बाज नहीं आते। उन फिल्मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की, जो पैसों के लिए अपने अंग की नुमाईश कर, भारतीय युवा पीढ़ी का मार्ग दर्च्चक बनकर भारतीय संस्कृति को नेस्तनाबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है।
सबसे दुख तो तब होता है जब अपने ही देच्च का एक छोटा सा हिस्सा जिसे हम छोटा भाई समझकर उसके तमाम गलतियों को हर बार भुलाना चाहते है बावजूद आतंकवाद के आतंक का छूरा हमारे पीठ पर भोंकने से वह छोटा भाई कभी नहीं चूकता! इन ६२ वषोर्ं में आजादी के बाद इंसान की मानवीयता, आत्मियता, रिश्ते-नाते, मदद के लिए बढ़ते हाथ जरूर आजाद होने लगे है। जिनके मन में थोड़ी बहुत इच्छा बची होती है और वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है तो चंद मुट््‌ठी भर अमानवीय इंसान भीड़ में उसे गोली मारकर या चाकू घोंप कर उसके आवाज को बंद कर देता है और भीड़ तमाशबीन की तरह देखता रहता है। उसे यह भी एहसास नहीं होता की आने वाले कल में वह भी इसका हिस्सा हो सकता है।
सबसे बड़ी चिंता तो मुझे इस बढ़ती गुणात्मक जनसंख्या से हो रही है जो कल तक शक्ति का स्वरूप थी पर आज संख्या बनकर रह गई है। जो खेतों की जमीने उजाड़कर शॅपिंग मौल, बंगले, जहर उगलने वाली फक्ट्रीयां, चौड़ी सड़के आदि बनाने में लगी हुई है और साथ ही जंगलो को कांट कर खेत बनाने में लगे हुए है। और जब सारे जंगल समाप्त हो जायेंगे तो सारे जीव-जंतु का अंत होना सुनिच्च्िचत ही है। चलो ये तो बदजुबान जानवर है अपना विरोध दर्ज कराने के लिए जंतर-मंतर भी नहीं आ पायेंगे। और जब इनकी सुनने वाला कोई नहीं होगा तो बेचारे वे बेमौत मारे जायेंगे। फिर हमारे पर्यावरण चक्र का क्या होगा भला चंद मुट्ठी भर लोगों के अलावा इसकी चिंता और कौन करता होगा? क्योंकि हर इंसान तो बस यहीं चिंता करता रहता है। मैं हूं, एक अच्छी नौकरी हो, उसके बाद एक सुन्दर सी बीबी हो, दो-चार बच्चे हो, हमारे रहने के लिए कम से कम एक घर हो, अगर धन ज्यादा हो तो विभिन्न प्रांतो में दो-चार बंगले हो ताकि ठंड में कन्याकारी की गर्मी का आनन्द उठा सकूं और सूरज की तपीस ज्यादा हो तो कच्च्मीर या शिमला की हसीन वादियों में बंर्फीले ठंडक का मजा ले सकूं। इसके साथ-साथ दो-चार गाड़ियां बंगले के आगे लगी हो, जिससे पड़ोसी देखकर जल सके। और जिसमें वह अपनी बीबी या गर्लफ्रेंड को लांग ड्राइव में ले जा सके। साथ ही अपने बच्चे के अटपटे शौक को भी पूरा कर सकूं।
यही सोचता हूं कि भारत की सीमित क्षेत्रफल में विश्व की कुल जनसंख्या का १/६ भाग का समावेश और गुणात्मक बढ़ती जनसंख्या के कारण नस्लभेद, क्षेत्रवाद, प्रदुषण, पर्यावरण असंतुलन, आरक्षण की राजनीति, वृक्ष कटाव, सुखा, बाढ़, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, अमीर-गरीब में बढ़ता खाई, मंहगाई, आदि हमें विनाश की ओर अग्रसर तो नहीं कर रहा है। या फिर नवीन युग के आने का यह संकेत मात्र है। जिस तरह सतयुग, त्रेतायुग और द्वापर युग का समाप्त होना निश्चित है जबकि उन युगों में धरती पर पाप कम करने के लिए भगवान राम और कृष्ण अवतरीत हुए थे पर शायद इस कल युग में संत-महात्मा तक का चरित्र पूरी तरह कलयुगी हो चुका है। जो माया और मोक्ष से मुक्ति का मार्ग दिखाने की बात करते है पर खुद माया की जंजाल में फंसे नजर आते है।
फिर अंत में तमाम चिंताओं को भूलकर आसमान में उड़ते उस पतंग को देखता हूं जिसे न तो उमस भरी गर्मी का अहसास होता है न ही दो वक्त की रोटी, सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु और प्यास मिटाने के लिए स्वच्छ जल की चिंता होती है। उसे स्वाईन फ्‌लू का भी डर नहीं होता। हमें तो ंिचंता और भी कई सारी है जैसे इन आजादी के ६२ वर्षों में असली शहीदों को लोगों द्वारा भूल जाने की। उन्हें याद है तो बस उस नेहरू खानदान की जो गांधी का तमगा लगाकर तमाम हॉस्पिटलो, पार्कों, सामाजिक संस्थानों, चौक-चौराहों आदि स्थानों पर अपना परचम लहराकर तमाम अन्य शहीदों जैसे, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश, लोहिया, खुदीराम बोस, विवेकानंद, नरेन्द्र देव, आदि को लोगों के जेहन से मिटाने में लगे हुए है।
हमे तो चिंता और भी कई सारी है पर क्या लाभ कोई और भी तो इसकी चिंता करे मुझ अकेले की चिंता करने से क्या होगा? जनसंख्या नियंत्रण के सवाल पर या जंगल और खेत बचाने के नाम पर सब कागजी खाना पूर्ति करने लगे है। हमने इस चिंता से सबको अवगत कराया है ज्यादा से ज्यादा कुछ लोग इस चिंता को समझकर अपनी चंद अलफाज लिखकर चिंता मुक्त हो जाएंगे। फिर जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा। फिर अगले दिन दो वक्त की रोटी जुटाने की चिंता में ये तमाम चिंताए धुल-धुसरित होती नजर आयेगी। अब भी कहें क्या हमसब आज भी आजाद है?

रचनाकार: नरेन्द्र निर्मल

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