>बासठ वर्ष की आजादी और हमारा आशावाद

>1947 में जो आशावाद, जो हौसला देश की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी था, वह आज भी कायम है और नई ऊंचाइयां छूने को प्रेरित कर रहा है। आज आजादी की सालगिरह पर किंचित संतोष के साथ याद किया जा सकता है कि बीते बासठ वर्षो में भारत ने लंबी दूरी तय की है। आज की युवा पीढ़ी को तो शायद अंदाज भी नहीं होगा कि 15 अगस्त 1947 को हमारे नवस्वतंत्र देश के पास विराट जागृति, आशावाद और हौसले के अलावा ज्यादा कुछ नहीं था। लेकिन उसके बाद से पीढ़ी-दर-पीढ़ी, दशक-दर-दशक हमने ऊंची छलांगें भरीं और आज वहां हैं जहां से दुनिया के सवरेपरि देशों में शामिल होने का और भी ऊंचे सपने देखने का साहस कर सकते हैं।1947 में तब के राष्ट्र निर्माताओं के सामने सबसे पहली चुनौती रियासतों और रजवाड़ों में बंटे देश को मजबूत राष्ट्र के रूप में गूंथने की थी। तत्कालीन गृह मंत्री और आजादी की लड़ाई के एक सबसे बड़े नेता सरदार पटेल ने इस काम को दृढ़ता से अंजाम दिया। फिर संविधान और लोकतंत्र की स्थापना हुई और देश की एकता व अखंडता पर मंडराते आशंकाओं के बादल कुछ दशक बीतने के साथ तिरोहित होते गए। आज हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि भारत की राष्ट्रीय एकता हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं को मजबूती से समाहित करती है।देश ने दूसरी बड़ी छलांग तब लगाई, जब हरित क्रांति के साथ हमने खाद्य सुरक्षा हासिल की। अन्यथा उसके पहले हमें अनाज के लिए दूसरे देशों के सामने हाथ फैलाने पड़ते थे और वे अहसान करते हुए खराब गुणवत्ता का अनाज हमारी झोली में डाल देते थे। देश की आंतरिक शक्ति और महत्वाकांक्षाओं का विस्फोट दरअसल नब्बे के दशक में आर्थिक सुधारों के साथ हुआ, जब लगभग हर क्षेत्र में मेधावी और कुशल लोगों की फौज ने न सिर्फ खुद अपनी क्षमता और संभावनाओं को साकार किया, बल्कि वैश्विक फलक देश के खोये हुए गौरव को भी स्थापित करना प्रारंभ किया।आज सारी दुनिया कहने और मानने लगी है कि इक्कीसवीं सदी भारत की होगी। हमें सिर्फ आर्थिक रूप से संपन्न राष्ट्र ही नहीं बनाना है बल्कि एक ऐसा देश बनाना है जिसमें हर चेहरे पर उल्लास और खुशी हो। यह अनवरत यात्रा है और इस यात्रा में कई चुनौतियां और कठिनाइयां आएंगी। एक अच्छी बात यह है कि 1947 में जो आशावाद, जो हौसला देश की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी था, वह आज भी कायम है और नई ऊंचाइयां छूने के लिए प्रेरित कर रहा है।

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