>निर्माण संवाद के पूर्वाग्रहों का जबाव , बहस में भाग जरुर लें

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श्रीमान विजयेन्द्र जी !
ब्लागरों को सत्य का ज्ञान करते समय आपने जो बातें लिखी उन पर क्रमशः मेरी प्रतिक्रिया नीचे दी जा रही है । आप कहंगे पोस्ट क्यूँ लिखा , प्रतिक्रिया तो वहीँ दी जानी चाहिए । बात से सहमत हूँ लेकिन इतनी बड़ी प्रतिक्रिया को वहां लिखने का कोई फायदा नहीं दिखा इसलिए माफ़ कीजियेगा !
१):-” आप किसी विशेष वर्ग के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं हैं “ इस बात को बिल्कुल नहीं माना जा सकता है । दलितवादी चिंतन के बैठकों / समारोहों में अक्सर सवर्णों के पश्चाताप की मांग की जाती है । ऐसे अनेक समारोहों में आप भी उपस्थित रहते हैं तब आपने कभी इस पूर्वाग्रह का विरोध क्यों नहीं किया ?
क्या आप देश के २० करोड़ मुसलमानों से भी यह उम्मीद लगाये बैठे हैं कि उन्हें भी पश्चाताप करना होगा क्योंकि उनके पुरखों ने मन्दिर ढाए थे ?
आज दलितवाद के नाम पर एक नया ब्राह्मणवाद जन्म ले रहा है जहाँ दलितोत्थान से अधिक ब्राह्मण विरोध पर जोर दिया जाता है । इस नव-ब्राह्मणवाद में उस मानसिकता के दलित आते हैं जिनकी तरक्की के बाद सामाजिक और राजनैतिक स्थिति का ग्राफ अचानक बढ़ता है । ठीक बरसाती नदी की भांति अपना अस्तित्व भूल कर ऐसे लोग ख़ुद को सवर्ण मानने की मानसिकता से घिर जाते हैं । इनको अपनी ही बिरादरी /अपने हीं समाज के लोगों से मिलने-जुलने में हीनता का भाव नज़र आता है । अन्य दलितों के प्रति इनके मन में भी वही भाव पैदा हो जाता है जो सवर्णों के दिल में होता है । आज वास्तविक खतरा इस प्रकार की मानसिकता पलने वाले नव-ब्राह्मणवादियों (तथाकथित दलितवादियों ) से है ।
दलितवाद की आड़ में ब्राह्मण मात्र होने से किसी का विरोध करना क्या पूर्वाग्रह नहीं है ? और यह केवल आपके लिए व्यक्तिगत आक्षेप नहीं है बल्कि समस्त नव-ब्राह्मणवादियों के लिए है जिनमें मायावती , रामविलास पासवान, उदितराज , राजेन्द्र यादव , रमणिका गुप्ता जैसे लोग शामिल हैं । आप भी तो इसी भीड़ का एक अंश हैं ।

२):-” आपको पार्टी बाजी में कोई दिलचस्पी नहीं है ” यह बात भी सिरे से ग़लत दिखता है । आपके हीं आलेख को पढ़कर सब स्पष्ट हो जाता है । १२० करोड़ के भारत में एक राहुल गाँधी का उदाहरण आप पेश करते हैं । राहुल के शब्दों वाली सहानुभूति से आप बड़े प्रभावित हैं लेकिन वो कलावती को रोटी-कपड़ा-मकान चाहिए । अगर राहुल सच्चे होते तो उनके द्वारा मुद्दे उठाने पर कुछ तो किया गया होता । परन्तु , आपका मानना है कि राहुल का केवल दलितों के हित में बोलना , गरीबी हटाने की बात करना हीं काफ़ी है । वैसे आप सही भी है और नहीं भी ! आज की मीडिया भी तो इसी बात को मानती है । राहुल का झोपडी में रुकना राष्ट्रीय ख़बर है जबकि गोविन्दाचार्य का एक समाजसेवी संगठन के साथ मिलकर उसी दलित का मकान बनाने की ख़बर को दबा दिया जाता है । आख़िर आप भी उसी मीडिया के परोकर हैं । हों भी क्यों नहीं ? बाज़ार में रहकर उसके ख़िलाफ़ जाने का साहस हर किसी के बस में नहीं !
आज तक यही तो होता आया है दलितों के साथ कि सबने उसके भावनाओं को छेड़ कर बस इस्तेमाल किया है । माया को ही लीजिये , इन्ही के राज में दलितों की दशा अब तक के सबसे दयनीय स्तर पर जा पहुँची है और मैडम को मूर्तियाँ लगवाने से फुर्सत ही नहीं मिलती ! सूखे से निबटने का बजट भी मूर्तियों के बजट से २० गुना कम है । ये केवल इनका राजनितिक पूर्वाग्रह नहीं है । यह हम सबों का पूर्वाग्रह है । कुछ जनता को बेवकूफ समझने का ,कुछ दलितों के नाम पर ब्राह्मण विरोध का , तो वहीँ कुछ लोग दलितों को इसी लायक समझने का पूर्वाग्रह रखते हैं । आपकी पार्टीबाज हैं ये तो राहुल महिमा पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है । वैसे ऐसा भी नहीं आप कांग्रेसी है । अगर भाजपा की सरकार होती आप मोदी गुणगान भी अवश्य करते । सोनिया राज में कांग्रेस अपनी औकात पर आ गई है माया से लेकर मोदी तक की हालत खस्ता है फ़िर आप और हम पार्टीबाजी से दूर निष्पक्ष होने की बात करें तो बेमानी होगी ।

३):- “आपने अतीत को विकृत मानते हुए उसे संस्कृति कहने पर सवाल उठाया है ” परन्तु मानव स्वाभाव ही कुछ ऐसा है कि हम जाते तो हैं निरंतर भविष्य कीओर लेकिन हमारा अतीत हमें अनवरत आकर्षित करता रहता है । हम अपने दैनिक जीवन में जब भी कोई ऐसी वास्तु पा जाते हैं जिनका भूत से सम्बन्ध हो तो हमारी आँखें चमक उठती है। अतीत को जानकर-समझ कर और उससे सीख लेकर वर्तमान तथा भविष्य दोनों को बेहतर किया जा सकता है ।किसी ने कहा है -“जिस जाति के पास अपने पूर्व-गौरव की ऐतिहासिक स्मृति होती है वो अपने गौरव की रक्षा का हर सम्भव प्रयत्न करती है। ” आज हमारे अन्दर वो स्मृति गायब होती जा रही है!
बंकिमचंद्र चटर्जी को भी यही दुःख था -‘साहब लोग अगर चिडिया मारने जाते हैं तो उसका भी इतिहास लिखा जाता है’। वैसे ये नई बात नही ,अंग्रेज साहबों से सैकडों साल पहले का इतिहास भी शासकों के इशारों पर कलमबद्ध होता रहा है । अनगिनत काव्य और ग्रन्थ चाटुकारिता के आदर्श स्थापित करने हेतु लिखे गए । कलम के पुजारियों ने निजी स्वार्थ या दवाब में आकर डरपोकों को शूरवीर , गदारों को देशभक्त ,जान-सामान्य के पैसो से मकबरा बनने वाले को मुहब्बत का देवता बना डाला । मुगलों से अंग्रेजो तक आते -आते हमारा वास्तविक इतिहास कहाँ चला गया ,पता भी नही चल पाया। कविश्रेष्ठ रविन्द्रनाथ ने इस सन्दर्भ में एक बार कहा था कि “एक विशेष कोटि के इतिहास द्वारा सांस्कृतिक उपनिवेशिकता इस देश के वास्तविक इतिहास का लोप कर देना चाहती है। हम रोटी के बदले ,सुशासन , सुविचार ,सुशिक्षा – सब कुछ एक बड़ी………….. दूकान से खरीद रहे हैं- बांकी बाजार बंद है……………..जो देश भाग्यशाली हैं वे सदा स्वदेश को इतिहास में खोजते और पाते हैं। हमारा तो सारा मामला ही उल्टा है। यहाँ देश के इतिहास ने ही स्वदेश को ढँक रखा है। “
इससे अधिक कोई और बात नहीं दिखी आपके पोस्ट में जिसका जबाव दिया जा सकें । यहाँ आने वाले बंधुओं से आग्रह है विमर्श में भाग लेकर चर्चा को आगे ले जायें ।

नोट := इसे किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप न समझा जाए

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