>प्रभाष जोशी का सेकुलरवाद से गद्दारी क्यों ? वामपंथियों का सवाल

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भागो, भागो, भागो ….. अब तो पूरी जमात भेड़ियों की तरह टूट पड़ी है। अंतरजाल पर वामपंथी ताने-बाने का हरेक झंडाबरदार प्रभाष जोशी के पीछे लपक पड़े हैं । रविवार में एक आलेख क्या छपा इनकी नींद उड़ गई ! ब्लॉग से लेकर वेबसाइट तक जोशी के ब्राह्मण हो जाने की सनसनी फ़ैल गयी है । पता नहीं अब तक किसी टीवी वाले ने प्रभाष जी को चाय पर बुलाया है या नहीं ? चाय पर माने इन्टरव्यू के लिए । अरे , आख़िर माजरा क्या है ? आजीवन ब्राह्मणवाद ,मनुवाद ,हिन्दुवाद से दूर वामपंथ अथवा वामपंथ के इर्द-गिर्द अपनी लेखनी चलाने वाले लेखक -पत्रकार लोग बुढापे में अपने पंथ से गद्दारी क्यों कर बैठते हैं ? पाठकों , यह सवाल मेरा नहीं बल्कि वामपंथ के युवा लेखकों के दिल की टीस है ! उनके अनुसार तो प्रभाष जी सठिया गये हैं (एक महान पत्रकार के वेबसाइट का लिंक दिए हैं ) वाकई , सवाल तो लाखों का नहीं अरबों -खरबों का है ! मौका और फुर्सत हो तो किसी सेकुलर (छद्म वामपंथी) खोजी पत्रकार को मामले की तह में जाना चाहिए । कोई न मिल रहा हो तो तरुण तेजपाल को हीं लगा दिया जाए । कुछ न कुछ तो ढूंढ़ निकालेंगे ! साहब , मैं फालतू की बात नहीं कर रहा हूँ । यह आज तक यक्ष प्रश्न बना हुआ है । निर्मल वर्मा , कमलेश्वर , राजेंद्र यादव, उदयप्रकाश ,प्रभाष जोशी सरीखे महान लेखकों की एक लम्बी सूची है जिनको दक्षिणपंथी , हिंदूवादी ,संघप्रेमी, आदि अलंकरणों से विभूषित किया जा चुका है इनमें से प्रत्येक लेखक को लेकर उठे बबाल का ज्ञान आपक सभी को होगा हीं । अभी ताजातरीन विवाद में उदयप्रकाश को योगी आदित्यनाथ के साथ एक मंच पर खड़े होने के लिए लताड़ा गया था और अब प्रभाष जी के साक्षात्कार को लेकर चिल्लमचिल्ली मची हुई है । अभी महीने भर पहले पत्रकारीय मूल्यों में गिरावट और पैकेज वाले ख़बरों के विरुद्ध जोशी जी की मुहीम से सभी खुश थे । जगह-जगह सेमिनार / गोष्ठी / कार्यशाला लगाई जा रही थी । इन तमाम कार्यक्रमों में हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म आदर्श पत्रकार होने के गुर सिखा रहे थे ।देश भर में इन्हीं की धूम मची थी । आज अचानक एक साक्षात्कार ने इन्हें क्या से क्या बना दिया ? लोग तुम-ताम पर उतर आए हैं । आज कल ग्रहदशा कुछ ठीक नहीं चल रही है । कई बड़े लोगों की गाड़ी पटरी पर से उतरती हुई दिख रही है ।
बहरहाल ,प्रभाष जोशी के पिछले लेखन कर्म में कहीं भी पारदर्शिता का अभाव नहीं रहा है और मेरे अनुसार तो वो यहाँ भी पारदर्शी हैं । परन्तु कुछ लोगों को आभासी प्रतिबिम्बों को देख-देख कर जीने की आदत होती है । ऐसे लोगों को जोशी कुछ और नज़र आते हैं । वैसे वामपंथियों के लिए दुखी होकर चिल्लाने के अलावा एक खुश खबरी भी है । जसवंत सिंह भी अचानक पाला बदल कर सेकुलर होने की राह पर चल पड़े और आखिरकार उन्हें शहादत देते हुए भाजपा की सदस्यता गंवानी पड़ गयी । तो भाई लोग खम्भा नोचना छोड़ कर थोडा खुश हो लें क्योंकि अपने सुख से ज्यादा इंसान को दूसरों के दुःख से प्रसन्नता होती है !

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