>क्या देश में एक ही नाम का झंडा फहराया जाएगा?

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ऐसा पहली बार हुआ है, नम्बर वन हरियाणा। क्या वाकई हरियाणा देश के अन्य राज्यों के मुकाबले नम्बर वन का खिताब जीत चुका है? यह खिताब किसकी तरफ से और किस तरह से दिया गया है? राष्ट्रीय स्तर की संस्था द्वारा, सरकार द्वारा, खुद कांग्रेस द्वारा या फिर इसे पैसे से खरीदा गया है। इस तरह से कई सवाल कौंध रहे है, लोगों के मन में। अब तक तो हमने सुना था कि गुजरात अन्य राज्यों के मुकाबले में ज्यादा विकसित, प्रशासनिक रूप से कुशल, आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी सराहनीय कार्य कर अपनी जगह नम्बर वन के खिताब पर पक्की किए हुए है।

लेकिन कुछ दिनों से हरियाणा सरकार, एफएम, सरकारी और गैर सरकारी चैनलों के अलावा अखबार अर्थात बाजारू हो चुकी पत्रकारिता के माध्यम द्वारा प्रसारित अपनी चंद चुनावी घोषणाओं के आधार पर नम्बर वन कहलाने की जुगत में लगी हुई है। एफएम 92.7 (बिग एफएम) ने तो अपने हर गानों के बाद ही हरियाणा के हुड्‌डा सरकार का गुणगान कर चुनावी वोट बटोरने का खासा इंतजाम कर रखा है।
ये सब तो ठीक है भैईया कीमत उसे मिली है, आखिर चंद वोटरों को भी तो वोट डालने के लिए कीमत दी जाती रही है। लेकिन तब जब पूरे साढ़े चार साल बाद चुनाव की बारी आई। इससे पहले तक शायद हरियाणा की हुड्डा सरकार को इन बेहतरीन योजनाओं पर नजर नहीं पड़ी होगी। दरअसल ये केवल हुड्डा की बात नहीं है. बल्कि ऐसा काम कांग्रेस अनेकों बार कर चुकी है और तो और ये उनकी अब आदत सी हो गई है। वे अपने शासन के कार्यकाल के चार वर्षों तक जनता को मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से शोषण करती है। और चुनाव आते ही जनता को लुभाने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा देती है। हालांकि इसका लाभ जनता को चुनाव तक ही लोगों को मिलता है, फिर वही ढाक के तीन पात। सरकार के दोबारा सत्ता में आते ही मंहगाई चरम पर, थाल से दाल गायब, चीनी की मिठास में फीकापन, बेरोजगारी से जुझते नौजवानों का अंबार, आंतकवाद के आगे घुटने टेकते भारतीय प्रधानमंत्री। क्या ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है, दोबारा चुनी गई इस कांग्रेस सरकार में।
लेकिन ये सब कुछ भी ठीक है, क्योंकि जो जैसा करता है, वह वैसा ही पाता है। जनता ने चुनावी घोषणा को देखकर अपना मत दिया, ना कि पूरे पांच वर्ष के कामकाज को देखकर। दरअसल कांग्रेस ही क्या, सभी सरकार जानती हैं कि जनता की स्मरण शक्ति बेहद कमजोर है. वह अपने घरेलु परेशानियों से इस कदर जुझती रहती है कि उसे अन्य राजनीति में अपनी बुद्धि खर्च करना नागवार गुजरता है। और वह पुरानी बातों को आसानी से भूल जाती है। आज देश में न जाने कितनी समस्याएं है और इस परेशानियों से जनता त्राहिमाम्-त्राहिमाम्‌ करती दिखाई दे रही है। लेकिन हमें यह भी पता है कि लोग ४ सालों बाद इसे अवश्य भूल जाएंगे; क्योंकि उस वक्त भी कांग्रेस सरकार कुछ नया तोहफा, प्रसाद के तौर पर अवश्य बांटेगी। जिसका गुणगान करने में मीडिया बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा। क्योंकि मीडिया मैनेज भी बड़ी चीज होती है, जिससे भी चुनाव में जीत होती है। पर अफसोस की बात है कि मीडिया, एफएम फिर भी भारत को नम्बर वन नहीं बना पाएगा। क्योंकि जो काम ६३ सालों में नहीं हो पाया भला ५ सालों में क्या संभव होगा! हरियाणा की हुड्डा सरकार ने हाउस टैक्स, किसानों को कर में छुट, कृषि उत्पाद दरों में बढ़ोत्तरी, अनुसुचित जाति के युवतियों की शादी के लिए १५ हजार का मदद के साथ पेंशन देने का प्रावधान जैसे कई आकर्षक घोषणाएं कर हरियाणा के लोगों को आकर्षित करने का अवश्य काम किया है। यह अच्छी बात है, लेकिन यह सबकुछ दो-तीन वर्ष पहले ही हो जाता, तो शायद और भी लाभ लोगों को मिलता।
सबसे बड़ी विडम्बना यह रही कि जितनी भी चुनावी घोषणाए परियोजनाओं के तौर पर हुई वह या तो राजीव गांधी के नाम पर शुरू हुई या इंदिरा गांधी के नाम पर। फिर सवाल यह जेहन में उठता है, कि क्या हरियाणा की माटी ने किसी ऐसे महापुरूष या सपूत को जन्म नहीं दिया, जिसके नाम से यह सारी परियोजनाएं शुरू की जा सकती थी। इतना ही नहीं कम से कम हमारे देश भक्तों के नाम से भी कुछ परियोजनाएं होनी चाहिए थी, जिसके बहाने ही सही, लोगों के जेहन और जुबान में ऐसे सपूतों के नाम तो आते, जिन्होंने देश की आजादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। इतना नही तो कम से कम फिरोज गांधी के नाम से भी कुछ शिलान्यास कार्य कर डालते, जिससे लोगों को भी पता तो चलता कि नेहरू खानदान में गांधी उपनाम जुड़ने का अभिप्राय महात्मा गांधी से नहीं बल्कि
फिरोज गांधी से है। लेकिन आज जहां भी देखे और कुछ भी देखे तो किसी भी मुख्य स्थान, लगभग समस्त संस्थान या परियोजनाओं के नाम में नेहरू परिवारों का जिक्र होता रहा है। यहीं वजह है कि लोग सच्चे देश भक्तों को भूलने लगे है। और चिंता तब होती है, जब आने वाली हमारी नस्ले इन्हें पूरी तरह भूल चुकी होगी। इसके लिए राजनीतिक तौर पर कांग्रेस और नेहरू परिवार जिम्मेदार होंगे।
देश की आजादी के लिए मर मिटे शहीदों को भी नेहरू परिवार और कांग्रेस से अब घिन्न अवश्य आने लगी होगी और वे मरणोपरांत अफसोस भी जताने लगे होंगे की हमने देश के लिए क्या कुछ नहीं किया। परिवार गवाया, प्यार गवाया, जिंदगी गवाई, हमने सिर्फ खोया और जिसने केवल देश में राजनीति की, पैसों के दम पर, वह न केवल पा रहे है, बल्कि अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हमारा नामों निशान तक मिटा रहे है।

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