काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग (भाग-2) Kaaba a Hindu Temple

(भाग…1 से http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/08/kaaba-hindu-temple-pn-oak.html आगे जारी…)

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है –
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है –

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

(लेखमाला के तीसरे और अन्तिम भाग में संस्कृतनिष्ठ नामों और चिन्हों आदि के बारे में…)
जारी रहेगा भाग…3 में…

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141 Comments

  1. संजय बेंगाणी said,

    August 28, 2009 at 12:50 pm

    मेरे टिप्पणी करने न करने से क्या होगा? स्वच्छता वालों को ही आने दें… 🙂

  2. August 28, 2009 at 12:50 pm

    मेरे टिप्पणी करने न करने से क्या होगा? स्वच्छता वालों को ही आने दें… 🙂

  3. wahreindia said,

    August 28, 2009 at 12:57 pm

    महोदय अगर आपकी इज़ाज़त हो तो ये संपूर्ण सामग्री आपके नाम से अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट कर दूं ताकि अधिक से अधिक लोगो तक पहुँच सके.
    धन्यवाद

  4. wahreindia said,

    August 28, 2009 at 12:57 pm

    महोदय अगर आपकी इज़ाज़त हो तो ये संपूर्ण सामग्री आपके नाम से अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट कर दूं ताकि अधिक से अधिक लोगो तक पहुँच सके.धन्यवाद

  5. पी.सी.गोदियाल said,

    August 28, 2009 at 1:01 pm

    संजय जी, आज वे लोग ९/११ को उनके विरादारो द्बारा धवस्त किये गए ट्रेड टावर का मालवा उठाने में व्यस्त है , हा-हा-हा-हा !

  6. August 28, 2009 at 1:01 pm

    संजय जी, आज वे लोग ९/११ को उनके विरादारो द्बारा धवस्त किये गए ट्रेड टावर का मालवा उठाने में व्यस्त है , हा-हा-हा-हा !

  7. Suresh Chiplunkar said,

    August 28, 2009 at 1:09 pm

    @ wahreindia – आप यह सामग्री ले सकते हैं और अपने ब्लाग पर सजा सकते हैं, सिर्फ़ मेरे ब्लाग का लिंक अथवा नाम दे दें, इतनी अर्ज़ है।

  8. August 28, 2009 at 1:09 pm

    @ wahreindia – आप यह सामग्री ले सकते हैं और अपने ब्लाग पर सजा सकते हैं, सिर्फ़ मेरे ब्लाग का लिंक अथवा नाम दे दें, इतनी अर्ज़ है।

  9. स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said,

    August 28, 2009 at 1:14 pm

    जी हाँ, ये सब चीज़ें हिन्दुओं से इस्लाम में आयीं…..और विडम्बना देखिये 'हिन्दू' शब्द ही मुसलमानों का दिया हुआ है…….

    काफ़ी समानताएं हैं…….

    (wait for my new post भगवान् शिव काबा में विराजमान हैं Answer to Suresh Chiplunkar)

  10. August 28, 2009 at 1:14 pm

    जी हाँ, ये सब चीज़ें हिन्दुओं से इस्लाम में आयीं…..और विडम्बना देखिये 'हिन्दू' शब्द ही मुसलमानों का दिया हुआ है…….काफ़ी समानताएं हैं…….(wait for my new post भगवान् शिव काबा में विराजमान हैं Answer to Suresh Chiplunkar)

  11. SHASHI SINGH said,

    August 28, 2009 at 1:29 pm

    दिल बड़ा और दिमाग खुला हो तो ऐसे बहुत से रास्ते हैं जिसके सहारे आपस में मिलके रहा जा सकता है। अमन और चैन से रहने की शर्त्त शायद मैंने थोड़ी कड़ी लगा दी।

  12. SHASHI SINGH said,

    August 28, 2009 at 1:29 pm

    दिल बड़ा और दिमाग खुला हो तो ऐसे बहुत से रास्ते हैं जिसके सहारे आपस में मिलके रहा जा सकता है। अमन और चैन से रहने की शर्त्त शायद मैंने थोड़ी कड़ी लगा दी।

  13. wahreindia said,

    August 28, 2009 at 1:35 pm

    सुरेश जी धन्यवाद

  14. wahreindia said,

    August 28, 2009 at 1:35 pm

    सुरेश जी धन्यवाद

  15. बेरोजगार said,

    August 28, 2009 at 1:49 pm

    मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ. क्योंकि हमारे पुरखे व्यापार करने जाते थे और महीनों,सालों में लौटते थे. धर्मशाला और मंदिर बनवाना हिन्दू धर्म में पुण्य का काम माना जाता था. अगर अरब में हिन्दू व्यापारियों द्वारा मंदिर बनवा दिए गए हों तो इसमें क्या आश्चर्य? हिन्दू धर्म के सारे कार्यों को उल्टा कर दो तो 'इसलाम' बन जाता है.कभी कभी तो ऐसा लगता है हिन्दुओं के विरोध स्वरुप ही इसलाम का प्रादुर्भाव हुआ है.डिस्कवरी के एक कार्यक्रम में एक मुस्लिम देश में कुछ इमारतों को दिखाया गया, जिसमें हिन्दू व्यापारी रूकते थे. @स्वच्छ जी को इसमें चिढ़ने की जरूरत नहीं है.मैं तो ये भी कहता हूँ हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आधे से ज्यादा मुस्लिम 'हिन्दू' ही हैं,जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया डर की वजह से. .

  16. August 28, 2009 at 1:49 pm

    मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ. क्योंकि हमारे पुरखे व्यापार करने जाते थे और महीनों,सालों में लौटते थे. धर्मशाला और मंदिर बनवाना हिन्दू धर्म में पुण्य का काम माना जाता था. अगर अरब में हिन्दू व्यापारियों द्वारा मंदिर बनवा दिए गए हों तो इसमें क्या आश्चर्य? हिन्दू धर्म के सारे कार्यों को उल्टा कर दो तो 'इसलाम' बन जाता है.कभी कभी तो ऐसा लगता है हिन्दुओं के विरोध स्वरुप ही इसलाम का प्रादुर्भाव हुआ है.डिस्कवरी के एक कार्यक्रम में एक मुस्लिम देश में कुछ इमारतों को दिखाया गया, जिसमें हिन्दू व्यापारी रूकते थे. @स्वच्छ जी को इसमें चिढ़ने की जरूरत नहीं है.मैं तो ये भी कहता हूँ हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आधे से ज्यादा मुस्लिम 'हिन्दू' ही हैं,जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया डर की वजह से. .

  17. गरुणध्वज said,

    August 28, 2009 at 1:50 pm

    चलिए सलीम खान ने माना तो सभी चीज़ें हिन्दुओं की दी हुई है इस्लाम को
    बस बुराइयों को छोड़कर जो वैसे भी 99% भरी हुई हैं इस्लाम में |

    और ये महाशय पिछले कुछ लेखों से बस अपनी पोस्ट का इंतज़ार करवा रहें हैं शायद मुहम्मद साहब खुद उतरने वाले हैं लिखने ?

    वैसे सलीम मियां नीचे के कुछ सवालों का जवाब दे दीजिये तो :

    (1) "जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है "

    भाई हमने तो सुना है की केवल गन्दगी वाले ही अल्लाह को पसंद आते हैं उनमे से भी वह जिन्होंने सर पर जालीदार टोपी और एक फ़ुट की दाढ़ी रखी हो, तो ऐसा क्यों होता है काबा में ?……क्या वहां कोई दुसरे देवता हैं क्या ?

    या अल्लाह का नया आधुनिक रूप है वैसे वो तो ७वी सदी के बाद बदला ही नहीं है ?

    (२)काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है

    क्या सलीम मियां इस झरने के पानी की क्या जन्नत से सीधे सप्लाई है क्या ? या इसके पानी में भी कीडे नहीं नहीं पड़ते ?

    (3)मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं?

    यार तुम लोग परिक्रमा भी करते हो तो क्या कुरआन में भी निर्देश है की काबा की परिक्रमा करो तो क्यों ?

    और तुम लोग सभी काम सभी धर्मो से उल्टा क्यों करते हो , सोते उल्टे हो , लिखते उल्टे ही हो , परिक्रमा भी वही उलटी ही ,
    और यहाँ तक की सोचते भी उल्टा हो (सोचते भी हो या नहीं इस बारे में बुद्धिजीवियों में मतभेद है) ,
    सभी सूर्य को उर्जा का स्रोत मानते हैं और तुम चाँद में अटके हो ?

    यहाँ तक की सारी दुनिया आगे जा रही है और तुम लोग पीछे जा रहे हो |

    अजीब हाल है यार तुम लोगों का सभी कर्म में उल्टे, अच्छा है चलते सीधा हो वर्ना आपकी बिरादरी को अजायब में रखने की कोई कसर थी वह पूरी हो जाती |

    🙂 😦 😛 😀 :$ 😉 😉 :$ 😀 😛 😦

  18. August 28, 2009 at 1:50 pm

    चलिए सलीम खान ने माना तो सभी चीज़ें हिन्दुओं की दी हुई है इस्लाम को बस बुराइयों को छोड़कर जो वैसे भी 99% भरी हुई हैं इस्लाम में | और ये महाशय पिछले कुछ लेखों से बस अपनी पोस्ट का इंतज़ार करवा रहें हैं शायद मुहम्मद साहब खुद उतरने वाले हैं लिखने ?वैसे सलीम मियां नीचे के कुछ सवालों का जवाब दे दीजिये तो :(1) "जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है "भाई हमने तो सुना है की केवल गन्दगी वाले ही अल्लाह को पसंद आते हैं उनमे से भी वह जिन्होंने सर पर जालीदार टोपी और एक फ़ुट की दाढ़ी रखी हो, तो ऐसा क्यों होता है काबा में ?……क्या वहां कोई दुसरे देवता हैं क्या ?या अल्लाह का नया आधुनिक रूप है वैसे वो तो ७वी सदी के बाद बदला ही नहीं है ?(२)काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता हैक्या सलीम मियां इस झरने के पानी की क्या जन्नत से सीधे सप्लाई है क्या ? या इसके पानी में भी कीडे नहीं नहीं पड़ते ?(3)मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं?यार तुम लोग परिक्रमा भी करते हो तो क्या कुरआन में भी निर्देश है की काबा की परिक्रमा करो तो क्यों ?और तुम लोग सभी काम सभी धर्मो से उल्टा क्यों करते हो , सोते उल्टे हो , लिखते उल्टे ही हो , परिक्रमा भी वही उलटी ही ,और यहाँ तक की सोचते भी उल्टा हो (सोचते भी हो या नहीं इस बारे में बुद्धिजीवियों में मतभेद है) , सभी सूर्य को उर्जा का स्रोत मानते हैं और तुम चाँद में अटके हो ?यहाँ तक की सारी दुनिया आगे जा रही है और तुम लोग पीछे जा रहे हो |अजीब हाल है यार तुम लोगों का सभी कर्म में उल्टे, अच्छा है चलते सीधा हो वर्ना आपकी बिरादरी को अजायब में रखने की कोई कसर थी वह पूरी हो जाती | 🙂 😦 😛 😀 :$ 😉 😉 :$ 😀 😛 😦

  19. जी.के. अवधिया said,

    August 28, 2009 at 2:13 pm

    परिक्रमा तो शुद्ध हिन्दू रीति ही है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि यदि काबा में परिक्रमा की जाती है तो फिर अन्य मुस्लिम इबाबतगाहों में क्यों नहीं?

    आपके तर्क वास्तव में अच्छे हैं किन्तु विडम्बना तो यह है कि लोग उसे सुनना-समझना ही नहीं चाहेंगे। हाँ सोते हुए को तो जगाया जा सकता है पर जागे-जागे सोये रहने वाले को नहीं जगाया जा सकता।

  20. August 28, 2009 at 2:13 pm

    परिक्रमा तो शुद्ध हिन्दू रीति ही है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि यदि काबा में परिक्रमा की जाती है तो फिर अन्य मुस्लिम इबाबतगाहों में क्यों नहीं?आपके तर्क वास्तव में अच्छे हैं किन्तु विडम्बना तो यह है कि लोग उसे सुनना-समझना ही नहीं चाहेंगे। हाँ सोते हुए को तो जगाया जा सकता है पर जागे-जागे सोये रहने वाले को नहीं जगाया जा सकता।

  21. Rakesh Singh - राकेश सिंह said,

    August 28, 2009 at 3:07 pm

    सुरेश जी आपने जो लिखी है वो एक ऐसा विस्फोट है जिसमे तथ्यों के सहारे सच्चाई सामने आई है | मैं आभारी हूँ की आपने इस विषय पर अपने ब्लॉग मैं पोस्ट किया है |

    अभी तक के सारे खोज-बिन इसी बात की पुश्टी करते हैं की काबा शिव मंदिर था | आपने तो सारे बात कह ही दी, और इसपे क्या कहें |

  22. August 28, 2009 at 3:07 pm

    सुरेश जी आपने जो लिखी है वो एक ऐसा विस्फोट है जिसमे तथ्यों के सहारे सच्चाई सामने आई है | मैं आभारी हूँ की आपने इस विषय पर अपने ब्लॉग मैं पोस्ट किया है | अभी तक के सारे खोज-बिन इसी बात की पुश्टी करते हैं की काबा शिव मंदिर था | आपने तो सारे बात कह ही दी, और इसपे क्या कहें |

  23. विवेक सिंह said,

    August 28, 2009 at 3:29 pm

    इति सिद्धम् !

  24. August 28, 2009 at 3:29 pm

    इति सिद्धम् !

  25. संजय तिवारी said,

    August 28, 2009 at 4:53 pm

    काबा में शिव मंदिर और इधर ताजमहल के नीचे भी शिव मंदिर. इनमें सच्चाई भी हो तो क्या हो जाएगा?

    ये तर्क ऐसे ही होते हैं जैसे यह कहें कि कपड़े के नीचे हर आदमी नंगा है. खैर, इस देश में लोग अपने अतीत को ही याद करके प्रसन्न हो जाते हैं.

  26. August 28, 2009 at 4:53 pm

    काबा में शिव मंदिर और इधर ताजमहल के नीचे भी शिव मंदिर. इनमें सच्चाई भी हो तो क्या हो जाएगा? ये तर्क ऐसे ही होते हैं जैसे यह कहें कि कपड़े के नीचे हर आदमी नंगा है. खैर, इस देश में लोग अपने अतीत को ही याद करके प्रसन्न हो जाते हैं.

  27. Common Hindu said,

    August 28, 2009 at 5:08 pm

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    – a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
    – Hindu Online.

  28. Common Hindu said,

    August 28, 2009 at 5:08 pm

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/– a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu- Hindu Online.

  29. Vivek Rastogi said,

    August 28, 2009 at 5:40 pm

    सुरेशजी इस बेहतरीन शोध के लिये बहुत बधाई, और बहुत आभार इसमें इतना ऊर्जा लगाने और समय लगाने का ।

  30. August 28, 2009 at 5:40 pm

    सुरेशजी इस बेहतरीन शोध के लिये बहुत बधाई, और बहुत आभार इसमें इतना ऊर्जा लगाने और समय लगाने का ।

  31. भारतीय नागरिक - Indian Citizen said,

    August 28, 2009 at 5:49 pm

    मुस्लिमों को आगे आना चाहिये और जो तथ्य कह रहे हैं उन्हे स्वीकार करना चाहिये. कुतर्कों से काम नहीं चलता. आपका लेख बहुत सार्थक,सोद्देश्य तथा तथ्यपूर्ण है. मुझे अब इन्तजार है कैरानवी जी का तथा सलीम मियां का, देखिये किन कुतर्कों के साथ हाजिर होते हैं. वैसे मैंने काफी अरसा पहले कहीं यह पढ़ा था कि मुस्लिमों की उत्पत्ति कौरवों से हुई थी. उसमें कई तर्क भी दिये थे जो अब मुझे याद नहीं.बहरहाल यदि मुस्लिम खुले दिमाग से सोचें तो शायद भारत में सौहार्द बढ़ सकता है.

  32. August 28, 2009 at 5:49 pm

    मुस्लिमों को आगे आना चाहिये और जो तथ्य कह रहे हैं उन्हे स्वीकार करना चाहिये. कुतर्कों से काम नहीं चलता. आपका लेख बहुत सार्थक,सोद्देश्य तथा तथ्यपूर्ण है. मुझे अब इन्तजार है कैरानवी जी का तथा सलीम मियां का, देखिये किन कुतर्कों के साथ हाजिर होते हैं. वैसे मैंने काफी अरसा पहले कहीं यह पढ़ा था कि मुस्लिमों की उत्पत्ति कौरवों से हुई थी. उसमें कई तर्क भी दिये थे जो अब मुझे याद नहीं.बहरहाल यदि मुस्लिम खुले दिमाग से सोचें तो शायद भारत में सौहार्द बढ़ सकता है.

    • aHindu said,

      May 10, 2011 at 6:48 pm

      अब ये क्या बकवास है,
      आप ही तो खुद सौहाद्र बिगाड़ने में लगे हैं.
      क्या कभी झूटों को केस जीतते नहीं सुना आपने, साहब कोर्ट में तर्क वितर्क ही तो काम आते हैं., सामने वाले से सबूत पेश करते ना बने तो वहां उसे सीधे सीधे गुनाहगार मान लिया जाता है, वहां तर्कों का दुरूपयोग अक्सर होता है सो कृपया तर्कों की बात ना कीजिये वैसे भी इस तरह के घटिया सेन्स लेस सादे हुए वितरकों का तो उल्लेख करना ही आपको मूर्खों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है.,

  33. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 28, 2009 at 5:53 pm

    सुरेश जी,
    एक सलाह है :- आगे से कुरआन को सही तरह से लिखा करें…सही अलफ़ज़ xकुरानx नही xकुरआनx है

    सबसे पहले आपने इस लेख को लिखने के लिये जो मेहनत की है उसकी मैं दाद देता हूं…लेकिन आपके दिये गये तथ्यों से मैं सहमत नही हूं

    क्यौं नही हूं ये मैं आपके लेख के अनुसार एक-एक करके आपको बता रहा हूं—

    जैसा की मैं आपके पिछ्ले लेख पर बता चुका हूं….. काबा पर हर साल कोई मेला नही होता था…वहां पर लोग "हज" करने आते थे…उसको पहले भी "हज" कहा जाता था और आज भी "हज" कहा जाता है…बस फ़र्क काबा में रखे ३६० बुतों का है पहले लोग उनकी इबादत करते थे….

    आपने कहा "मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके।"

    ये हुक्म कुरआन में दिया गया कि गैर-मुस्लिमों को काबे से दुर कर दो….उन्हे मस्जिदे-हराम के पास भी नही आने देना

    आपने कहा :- "जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है।"

    इसमे आप गलत है :- सिर्फ़ सर मुडांया जाता है…ढाढी नही मुडांई जाती है

    आपकी जानकारी के लिये आपको बता दूं "काबा" दरगाह नही है

    • Oracle Apps said,

      February 17, 2010 at 12:42 pm

      ब्रह्मा की आयु
      विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
      हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा होते हैं। इनकी आयु इन्हीं के सौ वर्षों के बराबर होती है। इनकी आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। विष्णु पुराण के अनुसार काल-गणना विभाग, विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय के अनुसार:
      • 2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
      • 4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
      • 3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
      • 2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
      • 1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
      • 12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
      ब्रह्मा की काल गणना
      • 1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
      (दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
      • 30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
      • 12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
      • 50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
      • 2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
      ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
      चारों युग
      4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष)
      सत युग

      3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग

      2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग

      1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग

      [१]
      यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
      • एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
      • श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार “सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः”, अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
      • एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
      • प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
      • एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
      • ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
      (14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
      = 994 महायुग + (60 चरण)
      = 994 महायुग + (6 x 10) चरण
      = 994 महायुग + 6 महायुग
      = 1,000 महायुग

      मन्वंतर / Manvantar
      • सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों
      1. सत युग,
      2. त्रेता युग,
      3. द्वापर युग,और
      4. कलि युग का एक ‘महायुग’ माना जाता है ।
      • 71 महायुग मिलकर एक ‘मन्वंतर’ बनाता है।
      • महायुग की अवधि 43 लाख 20 हजार वर्ष मानी गई है।
      • 14 मन्वंतरों का एक ‘कल्प’ होता है।
      • प्रत्येक मन्वंतर में सृष्टि का एक मनु होता है और उसी के नाम पर उस मन्वंतर का नाम पड़ता है।
      • मानवीय गणना के अनुसार एक मन्वंतर में तीस करोड़ ,अड़सठ लाख , बीस हजार वर्ष होते हैं ।
      • पुराणों में चौदह मन्वंतर इस प्रकार हैं-
      1. स्वायंभुव ,
      2. स्वारोचिष,
      3. उत्तम ,
      4. तामस,
      5. रैवत,
      6. चाक्षुष,
      7. वैवस्वत,
      8. अर्क सावर्णि,
      9. दक्ष सावर्णि,
      10. ब्रह्म सावर्णि,
      11. धर्म सावर्णि,
      12. रूद्र सावर्णि,
      13. रौच्य,
      14. भौत्य।
      • इनमें से चाक्षुस तक के मन्वंतर बीत चुके हैं ।
      • वैवस्वत इस समय चल रहा है । संकल्प आदि में इसी का नामोच्चार होता है ।

      Regards,

    • aHindu said,

      April 18, 2011 at 5:07 pm

      Ok,.
      मैं भी तो कहूँ कि ऐसा कैसे हो सकता है., क्योंकि मैने भी वीडिओ में लोगों को दाढ़ी में ही परिक्रमा करते देखा है.,

  34. August 28, 2009 at 5:53 pm

    सुरेश जी,एक सलाह है :- आगे से कुरआन को सही तरह से लिखा करें…सही अलफ़ज़ xकुरानx नही xकुरआनx हैसबसे पहले आपने इस लेख को लिखने के लिये जो मेहनत की है उसकी मैं दाद देता हूं…लेकिन आपके दिये गये तथ्यों से मैं सहमत नही हूंक्यौं नही हूं ये मैं आपके लेख के अनुसार एक-एक करके आपको बता रहा हूं—जैसा की मैं आपके पिछ्ले लेख पर बता चुका हूं….. काबा पर हर साल कोई मेला नही होता था…वहां पर लोग "हज" करने आते थे…उसको पहले भी "हज" कहा जाता था और आज भी "हज" कहा जाता है…बस फ़र्क काबा में रखे ३६० बुतों का है पहले लोग उनकी इबादत करते थे….आपने कहा "मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके।"ये हुक्म कुरआन में दिया गया कि गैर-मुस्लिमों को काबे से दुर कर दो….उन्हे मस्जिदे-हराम के पास भी नही आने देनाआपने कहा :- "जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है।"इसमे आप गलत है :- सिर्फ़ सर मुडांया जाता है…ढाढी नही मुडांई जाती हैआपकी जानकारी के लिये आपको बता दूं "काबा" दरगाह नही है

  35. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 28, 2009 at 6:20 pm

    आप कौन से पारम्परिक अरबी आलेखो की बात कर रहे हैं….ज़रा हमे भी बतायें..

    "काबा" में जो ३६० बुत रखे थे वो किसी तुफ़ान में नही टुटे थे बल्कि उनको "मक्का फ़तह" के वक्त हुज़ुर सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने अपनी छ्डी से तोडा था…हर बुत को तोड्ते जा रहे थे और कुरआन की आयत पढते जा रहे थे सुरह बनी इसराईल सु.१७ : आ. ८१ "और तु कह कि अल्लाह की तरफ़ से हक आ चुका है और झुठ नाबूद हो चुका है क्यौंकि झुठ बर्बाद होने वाला है

    इस बात के बाद आपके नवग्रह की पुजा वाली बात खारिज हो जाती है।

    "आबे ज़म-ज़म" झरना नही है…वो एक कुआं है जनाब…

    18×14 फ़ीट और 18 मीटर गहरा है…
    4000 साल पुराना है…ना कभी सुखा…ना कभी स्वाद बदला…
    आज तक कभी भी कुऐं में ना कोई काई जमी और ना ही कोई पेड उगा…ना आज तक उस पानी में कोई बैक्टिरिया मिलें…

    युरोपियन लैबोरेट्री में चेक हो चुका है उन्होने इसे पीने लायक घोषित कर दिया है।

    ये छोटा सा कुआं लाखों लोगो को पानी देता है…8000 लीटर प्रति सेकेण्ड पानी की ताकत वाली मोटर 24 घण्टे चलती है….

    और सिर्फ़ 11 मिनट बाद पानी का लेवल बराबर हो जाता है

    • aHindu said,

      April 18, 2011 at 5:26 pm

      दरअसल काशिफ साहब जैसा कि आपने इसपर इनकार नहीं किया है कि गैर मुस्लिम का वहां जाना निषेध है सो, बेचारों को क्या पता कि वो कुआ है कि झरना, लिखने वाले ने तो कहीं से पढ़ा और यहाँ छाप दिया., अब वहां जाना अलाऊ करवाओ तो कुछ गैर मुस्लिम दिल से सजदा भी करने जायेंगे और कुछ बस घूमने और जानेंगे कि आबे झम-झम कुआ है या झरना.,

      और सर एक बात और अगर बुत परस्तों ने कभी उस बिल्डिंग (पवित्र काबा) पर कब्ज़ा करकर वहां बुतों की स्थापना की हो और फिर हुजुर सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने उन्हें जाकर तोडा हो तो बात स्वीकार्य है, लेकिन अगर खुद शुरुआत करते हुए हुजुर ने ऐसा किया है तो भले ही वे बड़े विद्वान आलिम रहे हों, उन्हें किसी की आस्था की प्रतिमूर्ती को खंडित नहीं करना चाहिऐ था., इसकी कृत्य की तारीफ़ तो नहीं की जा सकती.

  36. August 28, 2009 at 6:20 pm

    आप कौन से पारम्परिक अरबी आलेखो की बात कर रहे हैं….ज़रा हमे भी बतायें.."काबा" में जो ३६० बुत रखे थे वो किसी तुफ़ान में नही टुटे थे बल्कि उनको "मक्का फ़तह" के वक्त हुज़ुर सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने अपनी छ्डी से तोडा था…हर बुत को तोड्ते जा रहे थे और कुरआन की आयत पढते जा रहे थे सुरह बनी इसराईल सु.१७ : आ. ८१ "और तु कह कि अल्लाह की तरफ़ से हक आ चुका है और झुठ नाबूद हो चुका है क्यौंकि झुठ बर्बाद होने वाला हैइस बात के बाद आपके नवग्रह की पुजा वाली बात खारिज हो जाती है।"आबे ज़म-ज़म" झरना नही है…वो एक कुआं है जनाब…18×14 फ़ीट और 18 मीटर गहरा है…4000 साल पुराना है…ना कभी सुखा…ना कभी स्वाद बदला…आज तक कभी भी कुऐं में ना कोई काई जमी और ना ही कोई पेड उगा…ना आज तक उस पानी में कोई बैक्टिरिया मिलें…युरोपियन लैबोरेट्री में चेक हो चुका है उन्होने इसे पीने लायक घोषित कर दिया है।ये छोटा सा कुआं लाखों लोगो को पानी देता है…8000 लीटर प्रति सेकेण्ड पानी की ताकत वाली मोटर 24 घण्टे चलती है….और सिर्फ़ 11 मिनट बाद पानी का लेवल बराबर हो जाता है

  37. Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said,

    August 28, 2009 at 6:22 pm

    @ काशिफ जी, यदि हो सके तो कृ्प्या "मस्जिदे हराम" का हिन्दी अर्थ बताने की कृ्पा करें।।

  38. August 28, 2009 at 6:22 pm

    @ काशिफ जी, यदि हो सके तो कृ्प्या "मस्जिदे हराम" का हिन्दी अर्थ बताने की कृ्पा करें।।

  39. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 28, 2009 at 6:42 pm

    लो जी ये गंगा वाली बात भी गलत साबित हो गयी।

    जनाब "बकरीद" भारतीय उपमहाद्विप मे कहा जाता है वो भी इस वजह से क्यौंकि यहां पर बकरे की कुरबानी दी जाती है…आपको पता नही है क्या "बकरीद" का असली नाम "ईद-उल-अज़हा" है।

    ये बात तो ५वीं के बच्चे को भी पता होती है…

    "ग्यारवीं शरीफ़" इस्लाम में नही है….इसका कुरआन या किसी भी सही हदीस में ज़िक्र नही है…ये भारतीय उपमहाद्विप के कुछ मौलवियों के दिमाग की उपज है जिनका पेट हलाल की कमाई से नही भर रहा था तो उन्होने अनपढ मुसलमानों के वर्ग को निशाना बना कर अलग-अलग त्योहार बनायें है…अरब में आपको "ग्यारवीं शरीफ़" का नामोनिशान नही मिलेगा..

    भारतीय उपमहाद्विप में ऐसे बहुत से त्योहार आपको मिल जायेंगे जो इसलाम में नही है— ये त्योहार शिया समाज तथा कुछ मौलवियों की उपज है जैसे :- मोहर्रम, शबे-बारात, ईद-मिलादुनबी, ग्यारवीं, टिकियां,

  40. August 28, 2009 at 6:42 pm

    लो जी ये गंगा वाली बात भी गलत साबित हो गयी।जनाब "बकरीद" भारतीय उपमहाद्विप मे कहा जाता है वो भी इस वजह से क्यौंकि यहां पर बकरे की कुरबानी दी जाती है…आपको पता नही है क्या "बकरीद" का असली नाम "ईद-उल-अज़हा" है।ये बात तो ५वीं के बच्चे को भी पता होती है…"ग्यारवीं शरीफ़" इस्लाम में नही है….इसका कुरआन या किसी भी सही हदीस में ज़िक्र नही है…ये भारतीय उपमहाद्विप के कुछ मौलवियों के दिमाग की उपज है जिनका पेट हलाल की कमाई से नही भर रहा था तो उन्होने अनपढ मुसलमानों के वर्ग को निशाना बना कर अलग-अलग त्योहार बनायें है…अरब में आपको "ग्यारवीं शरीफ़" का नामोनिशान नही मिलेगा..भारतीय उपमहाद्विप में ऐसे बहुत से त्योहार आपको मिल जायेंगे जो इसलाम में नही है— ये त्योहार शिया समाज तथा कुछ मौलवियों की उपज है जैसे :- मोहर्रम, शबे-बारात, ईद-मिलादुनबी, ग्यारवीं, टिकियां,

  41. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 28, 2009 at 6:55 pm

    सुरेश भाई,
    दुसरे का लिखा अपने ब्लोग पर उतारने से पहले थोडा दिमाग तो लगा लेते…

    आपने ये लेख कहां से लिया है…

    ये लेख 7 November 2004 को इस वेबसाइट पर छपा था…

    http://www.hinduism.co.za/kaabaa.htm

    "ईद-उल-फ़ितर" के मायने "पितरो की ईद" नही है…..आपको फ़ितर और पितरों में कोई फ़र्क नज़र नही आता

    "फ़ितर" शब्द "फ़ितरा" से आया है… ये एक खास किस्म का दान होता है जो ईद का चांद दिखने के बाद से ईद की नमाज़ से पहले देना होता है……जो ढाई किलो गेहूं के बराबर होना चाहिये…या तो अनाज दे दिजिये या नकद पैसा दे दिजिये—लेकिन अनाज देना अफ़ज़ल है और ये हर बालिग पर फ़र्ज़ है…

    बाकी जवाब बाद में….बहुत देर हो गयी है मुझे 3 बजे सेहरी के लिये उठना है…

  42. August 28, 2009 at 6:55 pm

    सुरेश भाई,दुसरे का लिखा अपने ब्लोग पर उतारने से पहले थोडा दिमाग तो लगा लेते…आपने ये लेख कहां से लिया है…ये लेख 7 November 2004 को इस वेबसाइट पर छपा था…http://www.hinduism.co.za/kaabaa.htm"ईद-उल-फ़ितर" के मायने "पितरो की ईद" नही है…..आपको फ़ितर और पितरों में कोई फ़र्क नज़र नही आता"फ़ितर" शब्द "फ़ितरा" से आया है… ये एक खास किस्म का दान होता है जो ईद का चांद दिखने के बाद से ईद की नमाज़ से पहले देना होता है……जो ढाई किलो गेहूं के बराबर होना चाहिये…या तो अनाज दे दिजिये या नकद पैसा दे दिजिये—लेकिन अनाज देना अफ़ज़ल है और ये हर बालिग पर फ़र्ज़ है…बाकी जवाब बाद में….बहुत देर हो गयी है मुझे 3 बजे सेहरी के लिये उठना है…

  43. Mohammed Umar Kairanvi said,

    August 28, 2009 at 7:03 pm

    भैया चिपलूनकर तनिक प्रतीक्षा करो, कैरानवी बिना तुम्‍हें मजा भी नहीं आ रहा होगा, क्‍या करूं अधिकत्‍ार मुसलमानों की तरह रमजान मे पूरे दिन भूखा रह कर गरीबों की भूख से पतिचित हो रहा हूं , पिछली बार तो तुम रेल में चुटकुले सुनाने गये थे अबकि बार कहां जाओगे?
    अभी में यह तोडमरोड कहानी पढ रहा हूं फिर जवाब भी दूंगा महानुभव तब तक विचार करो कि
    मुहम्मद सल्ल. सर्वधर्म के कल्कि व अंतिम अवतार? या यह Big gamge against Islam है?
    antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog)

    इस्लामिक पुस्तकों के अतिरिक्‍त छ अल्लाह के चैलेंज
    islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)

  44. August 28, 2009 at 7:03 pm

    भैया चिपलूनकर तनिक प्रतीक्षा करो, कैरानवी बिना तुम्‍हें मजा भी नहीं आ रहा होगा, क्‍या करूं अधिकत्‍ार मुसलमानों की तरह रमजान मे पूरे दिन भूखा रह कर गरीबों की भूख से पतिचित हो रहा हूं , पिछली बार तो तुम रेल में चुटकुले सुनाने गये थे अबकि बार कहां जाओगे? अभी में यह तोडमरोड कहानी पढ रहा हूं फिर जवाब भी दूंगा महानुभव तब तक विचार करो किमुहम्मद सल्ल. सर्वधर्म के कल्कि व अंतिम अवतार? या यह Big gamge against Islam है?antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog)इस्लामिक पुस्तकों के अतिरिक्‍त छ अल्लाह के चैलेंज islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)

  45. Mohammed Umar Kairanvi said,

    August 28, 2009 at 7:24 pm

    @ श्री राकेश सिंह जी जहाँ कहीं भी हों ध्‍यान दें, पुस्‍तक 'कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब' पर आपके लिये एक अजनबी ने निम्‍नलिखित कमेंटस छोडा है सभी कुप्रचारीयों से मशवरा करके जवाब से नवाजियेगा, और मुझे जो कमेंटस द्वारा आपने बताया था कि अंतिम अवतार पर पुस्‍तक लिखने वाले श्रीवास्‍तव जी मुसलमान होगये हैं उनका मुस्लिम नाम बतादिजिये ताकि वह शुभ नाम भी उसके साथ लिख सकूं आपके सहयोग का जिक्र भी वहां अवश्‍य करूंगा,

    Anonymous said…
    राकेश सिंह जी आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद, मैं भी विभिन्न धर्मों का ज्ञान प्राप्त करने में बहुत रुचि रखता हूँ, और मैं जानता हूँ कि शायद इस पुस्तक का अपजैसे कुछ लोगों पर कोई प्रभाव नहीं होगा – लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अवतार के चक्कर ने कई हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन करा दिया है, जी हाँ – वे मुसलमान तो नहीं बन पाए लेकिन बहाईयों (बहाई धर्म – जिनका नई दिल्ली में लोटस मंदिर है) ने इस शब्द का उपयोग कर के लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करा दिया. आज भारत में 15 से 20 लाख बहाई हैं और इन में से सिर्फ 1 प्रतिशत मुसलमान थे बाकी सभी हिन्दू थे. क्या आपने कभी इस धर्म का क्रिटिकल अभ्यास किया है. मैं आपकी सेवा में एक लिंक दे रहा हूँ, अगर आप इसको पढ़ेंगे तो शायद आपके लिए यह मामला और साफ होजाए.

    http://www.h-net.org/~bahai/bhpapers/vol2/india2.htm

    इसे ज़रूर पढ़ीयेगा ज़रूर

    आपका छोटा भाई.

  46. August 28, 2009 at 7:24 pm

    @ श्री राकेश सिंह जी जहाँ कहीं भी हों ध्‍यान दें, पुस्‍तक 'कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब' पर आपके लिये एक अजनबी ने निम्‍नलिखित कमेंटस छोडा है सभी कुप्रचारीयों से मशवरा करके जवाब से नवाजियेगा, और मुझे जो कमेंटस द्वारा आपने बताया था कि अंतिम अवतार पर पुस्‍तक लिखने वाले श्रीवास्‍तव जी मुसलमान होगये हैं उनका मुस्लिम नाम बतादिजिये ताकि वह शुभ नाम भी उसके साथ लिख सकूं आपके सहयोग का जिक्र भी वहां अवश्‍य करूंगा, Anonymous said… राकेश सिंह जी आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद, मैं भी विभिन्न धर्मों का ज्ञान प्राप्त करने में बहुत रुचि रखता हूँ, और मैं जानता हूँ कि शायद इस पुस्तक का अपजैसे कुछ लोगों पर कोई प्रभाव नहीं होगा – लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अवतार के चक्कर ने कई हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन करा दिया है, जी हाँ – वे मुसलमान तो नहीं बन पाए लेकिन बहाईयों (बहाई धर्म – जिनका नई दिल्ली में लोटस मंदिर है) ने इस शब्द का उपयोग कर के लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करा दिया. आज भारत में 15 से 20 लाख बहाई हैं और इन में से सिर्फ 1 प्रतिशत मुसलमान थे बाकी सभी हिन्दू थे. क्या आपने कभी इस धर्म का क्रिटिकल अभ्यास किया है. मैं आपकी सेवा में एक लिंक दे रहा हूँ, अगर आप इसको पढ़ेंगे तो शायद आपके लिए यह मामला और साफ होजाए.http://www.h-net.org/~bahai/bhpapers/vol2/india2.htmइसे ज़रूर पढ़ीयेगा ज़रूरआपका छोटा भाई.

  47. Mohammed Umar Kairanvi said,

    August 28, 2009 at 8:18 pm

    चिपलूनकर जी आप हिन्‍दू विरोधी हो, मिडिया को हिन्‍दू विरोधी बताकर वहाँ धर्म को ठेस पहुंचाई खामखाह दूसरे धर्म वालों को भी जगा दिया अब वह कहेंगे भैया हमारा भी पैसा लगा है इस टी.वी चेनल में हमारे धर्म का भी प्रचार करो, अब इस पोस्ट से तो आपने हिन्‍दू-मुस्लिम को एक करने का सिरा ही थमा दिया, मेरी तबियत बाग-बाग करदी अरे जनाब इस तोड मरोड कहानी का तो हर जवाब मैं एक पुस्‍तक के रूप में नेट जगत को प्रस्‍तुत कर चुका, जिसमें श्री अनुवाद सिंह का सहयोग का वर्णन अवश्‍य करूंगा उन्‍होंने मनु श्‍लोक पर बहस करी तो मैं ले आया 'वेद-कुरआन' की शिक्षाओं पर आधारित पुस्‍तक 'अगर अब भी ना जागे तो' जिसने मेरे विचार ही बदल दिये, मुझे मालूम हुआ तुम लोग तो मेरे बिछुडे भाई हो, मनु नौकासवार की नसल से तुम भी हम भी, scribd पर है इस लिये 2 मिनट भी नहीं लगेंगे,जरा झांक आओ अध्‍याय14 'वैदिक धर्मों में काबे की हक़ीक़त, पृष्‍ठ 139 से 143'
    http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

    झलक दिखादूं तब जाओगे तो लो, दुनिया जानती है काबा को हमने पृथ्‍वी का मध्‍य साबित किया है, वहीं है आपका हमारा तीर्थ, पुस्‍तक में यह भी बताया गया है कि वह आपको कैसे मिल सकता हैः, नीचे दिया गये श्‍लोक का अनुवाद करने की आवश्‍यकता नहीं पडेगी,
    'इलायास्‍तवा पदे वयं नाभा पृथिव्‍या अधि' ऋगवेद 3-29-4

  48. August 28, 2009 at 8:18 pm

    चिपलूनकर जी आप हिन्‍दू विरोधी हो, मिडिया को हिन्‍दू विरोधी बताकर वहाँ धर्म को ठेस पहुंचाई खामखाह दूसरे धर्म वालों को भी जगा दिया अब वह कहेंगे भैया हमारा भी पैसा लगा है इस टी.वी चेनल में हमारे धर्म का भी प्रचार करो, अब इस पोस्ट से तो आपने हिन्‍दू-मुस्लिम को एक करने का सिरा ही थमा दिया, मेरी तबियत बाग-बाग करदी अरे जनाब इस तोड मरोड कहानी का तो हर जवाब मैं एक पुस्‍तक के रूप में नेट जगत को प्रस्‍तुत कर चुका, जिसमें श्री अनुवाद सिंह का सहयोग का वर्णन अवश्‍य करूंगा उन्‍होंने मनु श्‍लोक पर बहस करी तो मैं ले आया 'वेद-कुरआन' की शिक्षाओं पर आधारित पुस्‍तक 'अगर अब भी ना जागे तो' जिसने मेरे विचार ही बदल दिये, मुझे मालूम हुआ तुम लोग तो मेरे बिछुडे भाई हो, मनु नौकासवार की नसल से तुम भी हम भी, scribd पर है इस लिये 2 मिनट भी नहीं लगेंगे,जरा झांक आओ अध्‍याय14 'वैदिक धर्मों में काबे की हक़ीक़त, पृष्‍ठ 139 से 143'http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-झलक दिखादूं तब जाओगे तो लो, दुनिया जानती है काबा को हमने पृथ्‍वी का मध्‍य साबित किया है, वहीं है आपका हमारा तीर्थ, पुस्‍तक में यह भी बताया गया है कि वह आपको कैसे मिल सकता हैः, नीचे दिया गये श्‍लोक का अनुवाद करने की आवश्‍यकता नहीं पडेगी,'इलायास्‍तवा पदे वयं नाभा पृथिव्‍या अधि' ऋगवेद 3-29-4

  49. fishabab said,

    August 28, 2009 at 8:21 pm

    sriman mhudyee ka pura lyekh me ne phra muje lagta un ko or bho islam kebare pata karna chyee kuii ki bhut sari batyee nirdhaar he unhyee bhut acchyee se pataa karna hogaa or islam ke bryee me patna karna ho ga.

    farooque shabab
    duabi

  50. fishabab said,

    August 28, 2009 at 8:21 pm

    sriman mhudyee ka pura lyekh me ne phra muje lagta un ko or bho islam kebare pata karna chyee kuii ki bhut sari batyee nirdhaar he unhyee bhut acchyee se pataa karna hogaa or islam ke bryee me patna karna ho ga.farooque shababduabi

  51. Dr.Aditya Kumar said,

    August 28, 2009 at 9:15 pm

    आपके आलेख शोध परक होते हैं ,आप मेहनत करते हैं. पर लेखन वही रचनात्मक है जो समाज में दिलों को जोड़े ,न कि आहात करे. काबा को शिव मंदिर सिद्ध करने से क्या हो जायेगा. काबा काबा ही रहेगा ,शिव मंदिर नहीं बन सकता. ,वैसे भी हमारे देश में अनेक शिव मंदिर ऐसे है जिनका रख -रखाव होना ही एक चुनौती है.आप जीनियस है .आपका लेखन समाज को एक नई सकारात्मक दिशा एवं प्रेरणा दे न कि विवाद ,यह मेरी अभिलाषा है,

  52. August 28, 2009 at 9:15 pm

    आपके आलेख शोध परक होते हैं ,आप मेहनत करते हैं. पर लेखन वही रचनात्मक है जो समाज में दिलों को जोड़े ,न कि आहात करे. काबा को शिव मंदिर सिद्ध करने से क्या हो जायेगा. काबा काबा ही रहेगा ,शिव मंदिर नहीं बन सकता. ,वैसे भी हमारे देश में अनेक शिव मंदिर ऐसे है जिनका रख -रखाव होना ही एक चुनौती है.आप जीनियस है .आपका लेखन समाज को एक नई सकारात्मक दिशा एवं प्रेरणा दे न कि विवाद ,यह मेरी अभिलाषा है,

  53. mahashakti said,

    August 29, 2009 at 4:40 am

    संग्रहणीय लेख

  54. mahashakti said,

    August 29, 2009 at 4:40 am

    संग्रहणीय लेख

  55. SANJAY KUMAR said,

    August 29, 2009 at 5:39 am

    In spite of the fact that your are trying to prove common ancestry and origin and trying to draw similarity between Islam and Hinduism, are your ready to accept Arabs as your own sibling.

    Suppose they revert back to their original practice and adopt all the practices of Bramhin, say Konkanath Bramhin, shall you be ready to accept as your brother?
    If not, there is no purpose of writing such article

  56. SANJAY KUMAR said,

    August 29, 2009 at 5:39 am

    In spite of the fact that your are trying to prove common ancestry and origin and trying to draw similarity between Islam and Hinduism, are your ready to accept Arabs as your own sibling.Suppose they revert back to their original practice and adopt all the practices of Bramhin, say Konkanath Bramhin, shall you be ready to accept as your brother?If not, there is no purpose of writing such article

  57. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said,

    August 29, 2009 at 5:55 am

    अनुसन्धानात्मक लेख में आपने बड़ा परिश्रम किया है।
    बधाई!

  58. August 29, 2009 at 5:55 am

    अनुसन्धानात्मक लेख में आपने बड़ा परिश्रम किया है।बधाई!

  59. स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said,

    August 29, 2009 at 6:17 am

    भाई वाह ! काशिफ भाई !! कमाल की धुलाई कर दी… सारे कुतर्कों की 'वाट' ही लगा दी….

    सच तो ये है ब्लॉगर बन्धुवों कि इस्लाम अर्थात सनातन धर्म एक ही है.

    कुर'आन में अल्लाह सुबहान-व-ताला फरमाता है कि "ऐसी कोई क़ौम न हीं जहाँ हमने समझाने वाला नहीं भेजा" अल्लाह सुबहान-व-ताला ने यह भी फ़रमाया कि "मैंने सभी क़ौम में हिदायत की किताब अता करी है"

    और देखिये इस एक वाक्य से यह सिद्ध हो सकता है कि वेद भी (हो सकता है) ईश्वर की पुस्तक हो… और वेदों में कई जगह साफ़ तौर पर लिखा है ईश्वर एक ही है और वेदों में कई जगह मुहम्मद (स) का ज़िक्र है.

    यानि ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मद उर-रसूलुल्लाह

    जगतगुरु शंकराचार्य ने भी कहा था कि "वेदों का रस निचोड़ कर रख दिया इस एक वाक्य ने"

    मुहम्मद उमर कैरानवी भाई की टिपण्णी भी बहुत महत्वपूर्ण है…

    अब सुरेश बाबू ने जब मान ही लिया है… तो उन्हें देर नहीं करनी चाहिए…

  60. August 29, 2009 at 6:17 am

    भाई वाह ! काशिफ भाई !! कमाल की धुलाई कर दी… सारे कुतर्कों की 'वाट' ही लगा दी…. सच तो ये है ब्लॉगर बन्धुवों कि इस्लाम अर्थात सनातन धर्म एक ही है. कुर'आन में अल्लाह सुबहान-व-ताला फरमाता है कि "ऐसी कोई क़ौम न हीं जहाँ हमने समझाने वाला नहीं भेजा" अल्लाह सुबहान-व-ताला ने यह भी फ़रमाया कि "मैंने सभी क़ौम में हिदायत की किताब अता करी है"और देखिये इस एक वाक्य से यह सिद्ध हो सकता है कि वेद भी (हो सकता है) ईश्वर की पुस्तक हो… और वेदों में कई जगह साफ़ तौर पर लिखा है ईश्वर एक ही है और वेदों में कई जगह मुहम्मद (स) का ज़िक्र है.यानि ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मद उर-रसूलुल्लाहजगतगुरु शंकराचार्य ने भी कहा था कि "वेदों का रस निचोड़ कर रख दिया इस एक वाक्य ने"मुहम्मद उमर कैरानवी भाई की टिपण्णी भी बहुत महत्वपूर्ण है…अब सुरेश बाबू ने जब मान ही लिया है… तो उन्हें देर नहीं करनी चाहिए…

  61. Suresh Chiplunkar said,

    August 29, 2009 at 6:32 am

    @ काशिफ़ आरिफ़ – शायद आपने ठीक से पढ़ा नहीं, मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूं कि यह सारे निष्कर्ष और तथ्य इतिहासकार पीएन ओक साहब के हैं…। मैं जो भी डाटा कहीं से भी लेता हूं उसका उल्लेख अवश्य करता हूं, जरा तीसरे भाग तक सब्र कीजिये सारी लिंक्स दूंगा। "मस्जिदे-हराम" का मतलब भी बताईयेगा और पास नहीं फ़टकने देने को क्यों कहा गया था यह भी। क्या "मस्जिदे-हलाल" भी कोई टर्म होती है, यदि हो तो उसका अर्थ भी बतायें। यह भी बतायें कि वे साहब, छड़ी से उन 360 बुतों को क्यों तोड़ रहे थे? जैसे आपके तर्क और तथ्य हैं और आपने भी कहीं से उठाये होंगे, ठीक वैसे ही ओक साहब का भी अपना शोध है… इस मामले में सलीम जी को एक सलाह कि "कुतर्क" दूसरे लोग भी कर सकते हैं… अकेले आप नहीं।

    @ कैरानवी – कृपया सीधी-सादी भाषा में लिखें भाई, मुझे आज तक आपकी एक भी बात समझ में नहीं आई, कि आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? कभी किसी तथाकथित अवतार के बारे में, कभी कुरआन को लेकर, कभी कुछ-कभी कुछ…। हिन्दी में लिखिये ना तो मुझे समझ में भी आये। "गोल पृथ्वी" के बीचोंबीच(?) काबा कैसे होता है इस बात का भी पता लगाना होगा। 🙂

  62. August 29, 2009 at 6:32 am

    @ काशिफ़ आरिफ़ – शायद आपने ठीक से पढ़ा नहीं, मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूं कि यह सारे निष्कर्ष और तथ्य इतिहासकार पीएन ओक साहब के हैं…। मैं जो भी डाटा कहीं से भी लेता हूं उसका उल्लेख अवश्य करता हूं, जरा तीसरे भाग तक सब्र कीजिये सारी लिंक्स दूंगा। "मस्जिदे-हराम" का मतलब भी बताईयेगा और पास नहीं फ़टकने देने को क्यों कहा गया था यह भी। क्या "मस्जिदे-हलाल" भी कोई टर्म होती है, यदि हो तो उसका अर्थ भी बतायें। यह भी बतायें कि वे साहब, छड़ी से उन 360 बुतों को क्यों तोड़ रहे थे? जैसे आपके तर्क और तथ्य हैं और आपने भी कहीं से उठाये होंगे, ठीक वैसे ही ओक साहब का भी अपना शोध है… इस मामले में सलीम जी को एक सलाह कि "कुतर्क" दूसरे लोग भी कर सकते हैं… अकेले आप नहीं। @ कैरानवी – कृपया सीधी-सादी भाषा में लिखें भाई, मुझे आज तक आपकी एक भी बात समझ में नहीं आई, कि आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? कभी किसी तथाकथित अवतार के बारे में, कभी कुरआन को लेकर, कभी कुछ-कभी कुछ…। हिन्दी में लिखिये ना तो मुझे समझ में भी आये। "गोल पृथ्वी" के बीचोंबीच(?) काबा कैसे होता है इस बात का भी पता लगाना होगा। 🙂

  63. cmpershad said,

    August 29, 2009 at 6:39 am

    ये मज़जिद है वो बुतखाना

    चाहे ये मानो या वो मानो॥

  64. cmpershad said,

    August 29, 2009 at 6:39 am

    ये मज़जिद है वो बुतखानाचाहे ये मानो या वो मानो॥

  65. rkg said,

    August 29, 2009 at 7:26 am

    SHRI MAAN KASHIF JI, VAISE YE CHHADI KIS CHEEJ KI BANI HUI THI JISKE LAGNE SE HI SAARE STATUE (BUT) TOOT GAYE.

  66. rkg said,

    August 29, 2009 at 7:26 am

    SHRI MAAN KASHIF JI, VAISE YE CHHADI KIS CHEEJ KI BANI HUI THI JISKE LAGNE SE HI SAARE STATUE (BUT) TOOT GAYE.

  67. wahreindia said,

    August 29, 2009 at 3:10 pm

    सुरेश जी आपका कारया सराहनीय है आप फ़िज़ूल की बकवास पर ध्यान ना देकर आगे बढ़ते रहिए अंत मे आपका धन्यवाद आपकी पोस्ट को मेरे ब्लॉग पर प्रस्तुत करने की इज़ाज़त देने के लिए.
    http://wahreindia.blogs.linkbucks.com/

  68. wahreindia said,

    August 29, 2009 at 3:10 pm

    सुरेश जी आपका कारया सराहनीय है आप फ़िज़ूल की बकवास पर ध्यान ना देकर आगे बढ़ते रहिए अंत मे आपका धन्यवाद आपकी पोस्ट को मेरे ब्लॉग पर प्रस्तुत करने की इज़ाज़त देने के लिए.http://wahreindia.blogs.linkbucks.com/

  69. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 29, 2009 at 6:24 pm

    सुरेश भाई,

    मैने भी तो यही कहा है जो आप कह रहे है…

    मैने ऐसा इसलिये कहा कि आप इतने अच्छे पत्रकार है बात की गहराई में जाते है…तो दुसरे का शोध और लोगो तक पहुचाने से पहले थोडा दिमाग लगाकर सोच लेते…

    "काबा" को मस्जिदे-हराम इसलिये कहा गया है क्यौंकि यही एक मस्जिद है जो गैर-मुस्लिमों पर हराम की गयी है…..वरना गैर-मुस्लिम हर मस्जिद में जा सकते है..उनको मस्जिद में जाने को मना नही है। मुसलमानों को गैर-मुस्लिम को मस्जिद में जाने से रोकने का हुक्म सिर्फ़ एक हालत में है जब गैर-मुस्लिम के इरादे गलत हो…वो मस्जिद को नुक्सान पहुचाने का इरादा रखता हो…

    पास नही फ़टकने को इसलिये कहा गया था क्यौंकि इब्राहिम अलैहि सलाम के काबा बनाने के बाद काफ़िरों ने उस पर कब्ज़ा कर लिया था…और वहां अपने खुदाओं के बुत रख दिये थे…तो जब मक्का फ़तह किया गया तो साफ़ ताकिद कर दी गयी की काफ़िरों इसके पास फ़टकने भी नही देना क्यौकि हो सकता है वो दोबारा इस पर कब्ज़ा करने कि कोशिश करें।

    अल्लाह के रसुल सल्लाहो अलैहि वस्सलम के हाथ में उस वक्त छ्डी थी तो उन्होने उन बुतों को छ्डी से तोडा….ये तो आम बात है

  70. August 29, 2009 at 6:24 pm

    सुरेश भाई,मैने भी तो यही कहा है जो आप कह रहे है…मैने ऐसा इसलिये कहा कि आप इतने अच्छे पत्रकार है बात की गहराई में जाते है…तो दुसरे का शोध और लोगो तक पहुचाने से पहले थोडा दिमाग लगाकर सोच लेते…"काबा" को मस्जिदे-हराम इसलिये कहा गया है क्यौंकि यही एक मस्जिद है जो गैर-मुस्लिमों पर हराम की गयी है…..वरना गैर-मुस्लिम हर मस्जिद में जा सकते है..उनको मस्जिद में जाने को मना नही है। मुसलमानों को गैर-मुस्लिम को मस्जिद में जाने से रोकने का हुक्म सिर्फ़ एक हालत में है जब गैर-मुस्लिम के इरादे गलत हो…वो मस्जिद को नुक्सान पहुचाने का इरादा रखता हो…पास नही फ़टकने को इसलिये कहा गया था क्यौंकि इब्राहिम अलैहि सलाम के काबा बनाने के बाद काफ़िरों ने उस पर कब्ज़ा कर लिया था…और वहां अपने खुदाओं के बुत रख दिये थे…तो जब मक्का फ़तह किया गया तो साफ़ ताकिद कर दी गयी की काफ़िरों इसके पास फ़टकने भी नही देना क्यौकि हो सकता है वो दोबारा इस पर कब्ज़ा करने कि कोशिश करें।अल्लाह के रसुल सल्लाहो अलैहि वस्सलम के हाथ में उस वक्त छ्डी थी तो उन्होने उन बुतों को छ्डी से तोडा….ये तो आम बात है

  71. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 29, 2009 at 6:34 pm

    आगे के जवाब :-

    आपने कुरआन कि कुछ आयतों का ज़िक्र किया है चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है।

    आपने इन आयतों के नंबर वगैरह ठीक से नही दिये है…इसलिये इनके बारे में बाद में बात करेंगे।

    हां कुरआन में स्पेस साइंस के मुताल्लिक बहुत सी आयतें हैं जिसमें काफ़ी कुछ बताया गया है जो अब साइंटिस्ट बता रहे हैं।

    जैसा कि मैं पिछली टिप्पणी में बता चुका हूं "शबे-बारात" का कुरआन या किसी भी हदीस में जिक्र नही है…ये हिन्दुस्तान के कुछ मुल्लाओं की ईजाद हैं।

  72. August 29, 2009 at 6:34 pm

    आगे के जवाब :-आपने कुरआन कि कुछ आयतों का ज़िक्र किया है चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है।आपने इन आयतों के नंबर वगैरह ठीक से नही दिये है…इसलिये इनके बारे में बाद में बात करेंगे।हां कुरआन में स्पेस साइंस के मुताल्लिक बहुत सी आयतें हैं जिसमें काफ़ी कुछ बताया गया है जो अब साइंटिस्ट बता रहे हैं।जैसा कि मैं पिछली टिप्पणी में बता चुका हूं "शबे-बारात" का कुरआन या किसी भी हदीस में जिक्र नही है…ये हिन्दुस्तान के कुछ मुल्लाओं की ईजाद हैं।

  73. जगदीश त्रिपाठी said,

    August 29, 2009 at 10:01 pm

    सुरेश भाई,
    दरअसल यह निवेदन मैं तभी करने जा रहा था, जब आपने इस आलेख की पहली कड़ी लिखी थी। लगभग पूरी टिप्पणी लिख चुका था कि एक खबर को लेकर आपाधापी मच गई और टिप्पणी पोस्ट नहीं कर सका। फिर रात देर हो जाने के कारण सीधे आवास पर चला आया और भूल गया। निवेदन है कि चूतियों के चक्कर में न पड़ें। क्योंकि हर चीज की हद होती है, चूतियापे की नहीं। बेहतर हो कि इनकी टिप्पणियां आप डिलीट कर दें। ये अपने कुतर्क का कचरा अपने ब्लॉग पर ही परोसें। सो आप अपना काम करें। अच्छा कर रहे हैं। साधुवाद के पात्र हैं।

  74. August 29, 2009 at 10:01 pm

    सुरेश भाई,दरअसल यह निवेदन मैं तभी करने जा रहा था, जब आपने इस आलेख की पहली कड़ी लिखी थी। लगभग पूरी टिप्पणी लिख चुका था कि एक खबर को लेकर आपाधापी मच गई और टिप्पणी पोस्ट नहीं कर सका। फिर रात देर हो जाने के कारण सीधे आवास पर चला आया और भूल गया। निवेदन है कि चूतियों के चक्कर में न पड़ें। क्योंकि हर चीज की हद होती है, चूतियापे की नहीं। बेहतर हो कि इनकी टिप्पणियां आप डिलीट कर दें। ये अपने कुतर्क का कचरा अपने ब्लॉग पर ही परोसें। सो आप अपना काम करें। अच्छा कर रहे हैं। साधुवाद के पात्र हैं।

  75. wahreindia said,

    August 30, 2009 at 7:57 am

    आदरणीय सुरेश जी इंटरनेट पर सरफिंग के दौरान एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है अवश्य देखे
    गुजरात दंगो का सच – मीडिया द्वारा फेलाए भ्रम का सच
    इसका लिंक आप यहा से प्राप्त कर सकते है. क्षमा चाहता हू मेरी हिन्दी कमज़ोर है पर यदि आप इसे उचित समझे तो इसका हिन्दी अनुवाद करके पोस्ट करके अपने ब्लॉग पर एक नेक काम कर सकते है
    http://wahreindia.blogs.linkbucks.com/

  76. wahreindia said,

    August 30, 2009 at 7:57 am

    आदरणीय सुरेश जी इंटरनेट पर सरफिंग के दौरान एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है अवश्य देखेगुजरात दंगो का सच – मीडिया द्वारा फेलाए भ्रम का सच इसका लिंक आप यहा से प्राप्त कर सकते है. क्षमा चाहता हू मेरी हिन्दी कमज़ोर है पर यदि आप इसे उचित समझे तो इसका हिन्दी अनुवाद करके पोस्ट करके अपने ब्लॉग पर एक नेक काम कर सकते हैhttp://wahreindia.blogs.linkbucks.com/

  77. VIJAYENDRA said,

    August 30, 2009 at 9:50 am

    sureshjee,
    aksar aap nirman samvad par aate hai, socha kee mai bhee nyotaa poora kar doon.yah lekh padha.atma-mugdha honaa achha hai, par aseem aatm- mugdhtaa achhee nahee hai. mana kee aapke kathit hidutwa ka samrajya duniyaan me faila tha. kaikayee kakrkas kee gandharee gandhar kee.ahiraawan patal lok yanee america ka,ghodraa pradesh yanee poora arabian country sab aapka hee raha. mohammad ka baal bhee aapke hajrat bal me hee hai.

    duniyaa ke saare dharam,mahapuroos do kauree ke hain, aap nahee hote to e log janm hee nahee le paate

  78. VIJAYENDRA said,

    August 30, 2009 at 9:50 am

    sureshjee,aksar aap nirman samvad par aate hai, socha kee mai bhee nyotaa poora kar doon.yah lekh padha.atma-mugdha honaa achha hai, par aseem aatm- mugdhtaa achhee nahee hai. mana kee aapke kathit hidutwa ka samrajya duniyaan me faila tha. kaikayee kakrkas kee gandharee gandhar kee.ahiraawan patal lok yanee america ka,ghodraa pradesh yanee poora arabian country sab aapka hee raha. mohammad ka baal bhee aapke hajrat bal me hee hai. duniyaa ke saare dharam,mahapuroos do kauree ke hain, aap nahee hote to e log janm hee nahee le paate

  79. VIJAYENDRA said,

    August 30, 2009 at 9:57 am

    bare samraajyawadee the aap log bhai.,Bush ka baap bhee itnaa bada samrajya vistaar nahee kar paata jitnaa aapne kiyaa……? bade miyan to bade miyan chhote miyan subhan allaah…sangh se lekar suresh chiplunkar tak sabhee log ek hee saoloon me baal katate hain..
    mana kee dada ke paas haathee huaa karta tha, ab janjeer hila- hila kar desh ko kya dikhana chahte hain..?

  80. VIJAYENDRA said,

    August 30, 2009 at 9:57 am

    bare samraajyawadee the aap log bhai.,Bush ka baap bhee itnaa bada samrajya vistaar nahee kar paata jitnaa aapne kiyaa……? bade miyan to bade miyan chhote miyan subhan allaah…sangh se lekar suresh chiplunkar tak sabhee log ek hee saoloon me baal katate hain.. mana kee dada ke paas haathee huaa karta tha, ab janjeer hila- hila kar desh ko kya dikhana chahte hain..?

  81. flare said,

    August 30, 2009 at 10:15 am

    बहुत बेहतरीन लेख …… पर कई जगहों पे सन्दर्भ/ चित्र दिए जाने पे थोडा और मजा आता ………..

  82. flare said,

    August 30, 2009 at 10:15 am

    बहुत बेहतरीन लेख …… पर कई जगहों पे सन्दर्भ/ चित्र दिए जाने पे थोडा और मजा आता ………..

  83. Press Club of Kairana said,

    August 30, 2009 at 12:02 pm

    chiplonkar sahab aapki jhot mot ki khani barbad hone per mery taraf se badhai

  84. August 30, 2009 at 12:02 pm

    chiplonkar sahab aapki jhot mot ki khani barbad hone per mery taraf se badhai

  85. निशाचर said,

    August 30, 2009 at 3:09 pm

    @ काशिफ आरिफ
    भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे बहुत से त्यौहार आपको मिल जायेंगे जो इसलाम में नहीं हैं – ये त्यौहार शिया समाज तथा कुछ मौलवियों की उपज हैं जैसे :-मुहर्रम, शबे बारात , ईद उल मिलादुल नबी, ग्याहरवी, टिकिया,

    तो भाई आरिफ आपके यहाँ तो फतवों से बड़े – बड़े मसले निपटा लिए जाते हैं, क्यों नहीं इन सबको गैर- इस्लामी (काफिर) घोषित कर देते, या फिर "हाथी के दांत " वाला मसला है.

    और जहाँ तक नक़ल की बात है तो नक़ल पूर्ववर्ती की होती है. सभी जानते हैं कि इसलाम का प्रादुर्भाव सातवी- आठवीं सदी में हुआ जबकि सनातन धर्म का इतिहास ईसा से दो हज़ार साल पहले तक प्रमाण सहित खोजा जा चुका है. क्या यह संभव है कि वैदिक धर्म इसलाम की नक़ल पर आधारित हो? यह तो बच्चे द्वारा अपने बाप को पैदा करने जैसी असंभव कल्पना है.

    आँखे खोल कर सत्य को स्वीकार करो, कुँए के मेंढक बनकर कुछ हासिल नहीं होने वाला. जन्नत की हूरों के चक्कर में क्यों अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हो……..

  86. August 30, 2009 at 3:09 pm

    @ काशिफ आरिफ भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे बहुत से त्यौहार आपको मिल जायेंगे जो इसलाम में नहीं हैं – ये त्यौहार शिया समाज तथा कुछ मौलवियों की उपज हैं जैसे :-मुहर्रम, शबे बारात , ईद उल मिलादुल नबी, ग्याहरवी, टिकिया, तो भाई आरिफ आपके यहाँ तो फतवों से बड़े – बड़े मसले निपटा लिए जाते हैं, क्यों नहीं इन सबको गैर- इस्लामी (काफिर) घोषित कर देते, या फिर "हाथी के दांत " वाला मसला है.और जहाँ तक नक़ल की बात है तो नक़ल पूर्ववर्ती की होती है. सभी जानते हैं कि इसलाम का प्रादुर्भाव सातवी- आठवीं सदी में हुआ जबकि सनातन धर्म का इतिहास ईसा से दो हज़ार साल पहले तक प्रमाण सहित खोजा जा चुका है. क्या यह संभव है कि वैदिक धर्म इसलाम की नक़ल पर आधारित हो? यह तो बच्चे द्वारा अपने बाप को पैदा करने जैसी असंभव कल्पना है.आँखे खोल कर सत्य को स्वीकार करो, कुँए के मेंढक बनकर कुछ हासिल नहीं होने वाला. जन्नत की हूरों के चक्कर में क्यों अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हो……..

  87. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 30, 2009 at 6:12 pm

    @ निशाचर जी,

    इस सिलसिले पर काम और कोशिशे जारी है…लेकिन ये लोगो के दिलो-दिमाग में बहुत गहराई से बस चुका है…फ़तवे निकालने वाले लोग ही इसमें शामिल हैं और जब इस मसले पर सुबुतों और हदीसों को पेश करने की बात आती है तो उन लोगो की "अना" बीच में आ जाती है।

    जनाब आपसे किसने कहा कि इसलाम सातवी-आठवीं सदी में हुआ…जब से दुनिया बनी है तब से इस्लाम है…

    अल्लाह ने दुनिया में 1,24,000 नबी और रसुल भेजे और सब पर किताबे नाज़िल की…

    कुरआन में नाम से 25 नबी और 4 किताबों का ज़िक्र है…. कुरआन में बताये गये २५ नबी व रसुलों के नाम बता रहा हूं…उनके नामों के इंग्लिश में वो नाम दिये है जिन नामों से इन नबीयों का ज़िक्र "बाईबिल" में है….

    1. आदम अलैहि सलाम (Adam)
    2. इदरीस अलैहि सलाम (Enoch)
    3. नुह अलैहि सलाम (Noah)
    4. हुद अलैहि सलाम (Eber)
    5. सालेह अलैहि सलाम (Saleh)
    6. ईब्राहिम अलैहि सलाम (Abraham)
    7. लुत अलैहि सलाम (Lot)
    8. इस्माईल अलैहि सलाम (Ishmael)
    9. इशाक अलैहि सलाम (Isaac)
    10. याकुब अलैहि सलाम (Jacob)
    11. युसुफ़ अलैहि सलाम (Joseph)
    12. अय्युब अलैहि सलाम (Job)
    13. शुऎब अलैहि सलाम (Jethro)
    14. मुसा अलैहि सलाम (Moses)
    15. हारुन अलैहि सलाम (Aaron)
    16. दाऊद अलैहि सलाम (David)
    17. सुलेमान अलैहि सलाम (Solomon)
    18. इलियास अलैहि सलाम (Elijah)
    19. अल-यासा अलैहि सलाम (Elisha)
    20. युनुस अलैहि सलाम (Jonah)
    21. धुल-किफ़्ल अलैहि सलाम (Ezekiel)
    22. ज़करिया अलैहि सलाम (Zechariah)
    23. याहया अलैहि सलाम (John the Baptist)
    24. ईसा अलैहि सलाम (Jesus)
    25. आखिरी रसुल सल्लाहो अलैहि वस्सलम (Ahmed)

    इन नबीयों में से छ्ठें नबी "ईब्राहिम अलैहि सलाम" जिन्होने "काबा" को तामिल किया था उनका जन्म 1900 ईसा पूर्व हुआ था….

    अब आप बतायें कि "बाप कौन है और बेटा कौन?"

  88. August 30, 2009 at 6:12 pm

    @ निशाचर जी,इस सिलसिले पर काम और कोशिशे जारी है…लेकिन ये लोगो के दिलो-दिमाग में बहुत गहराई से बस चुका है…फ़तवे निकालने वाले लोग ही इसमें शामिल हैं और जब इस मसले पर सुबुतों और हदीसों को पेश करने की बात आती है तो उन लोगो की "अना" बीच में आ जाती है।जनाब आपसे किसने कहा कि इसलाम सातवी-आठवीं सदी में हुआ…जब से दुनिया बनी है तब से इस्लाम है…अल्लाह ने दुनिया में 1,24,000 नबी और रसुल भेजे और सब पर किताबे नाज़िल की…कुरआन में नाम से 25 नबी और 4 किताबों का ज़िक्र है…. कुरआन में बताये गये २५ नबी व रसुलों के नाम बता रहा हूं…उनके नामों के इंग्लिश में वो नाम दिये है जिन नामों से इन नबीयों का ज़िक्र "बाईबिल" में है….1. आदम अलैहि सलाम (Adam)2. इदरीस अलैहि सलाम (Enoch)3. नुह अलैहि सलाम (Noah)4. हुद अलैहि सलाम (Eber)5. सालेह अलैहि सलाम (Saleh)6. ईब्राहिम अलैहि सलाम (Abraham)7. लुत अलैहि सलाम (Lot)8. इस्माईल अलैहि सलाम (Ishmael)9. इशाक अलैहि सलाम (Isaac)10. याकुब अलैहि सलाम (Jacob)11. युसुफ़ अलैहि सलाम (Joseph)12. अय्युब अलैहि सलाम (Job)13. शुऎब अलैहि सलाम (Jethro)14. मुसा अलैहि सलाम (Moses)15. हारुन अलैहि सलाम (Aaron)16. दाऊद अलैहि सलाम (David)17. सुलेमान अलैहि सलाम (Solomon)18. इलियास अलैहि सलाम (Elijah)19. अल-यासा अलैहि सलाम (Elisha)20. युनुस अलैहि सलाम (Jonah)21. धुल-किफ़्ल अलैहि सलाम (Ezekiel)22. ज़करिया अलैहि सलाम (Zechariah)23. याहया अलैहि सलाम (John the Baptist)24. ईसा अलैहि सलाम (Jesus)25. आखिरी रसुल सल्लाहो अलैहि वस्सलम (Ahmed)इन नबीयों में से छ्ठें नबी "ईब्राहिम अलैहि सलाम" जिन्होने "काबा" को तामिल किया था उनका जन्म 1900 ईसा पूर्व हुआ था….अब आप बतायें कि "बाप कौन है और बेटा कौन?"

  89. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 30, 2009 at 6:29 pm

    @ निशाचर जी,

    जिस कहानी को आप और सुरेश जी सत्य कह रहे है उसे सत्य तो साबित कीजिये…

    मैं इतिहास का जानकार नही हूं मैने सुरेश जी के लेख में जितनी गलतियां निकाली सब कुरआन और हदीस की जानकारी के बल पर निकाली है….

    और इतनी कमिंयां निकलने के बाद कोई शोध सत्य कैसे हो सकता है???????

    अब मुझ जैसे इतिहास की कम जानकारी रखने वाले ने इतनी कमियां निकाल दी……..ज़रा सोचिये की इतिहास और इस्लाम दोनो का जानकार इंसान इसमें कितनी कमियां निकालेगा??????

    सुरेश जी से एक सवाल :-

    आपने अपने पहले लेख "राजा विक्रमादित्य" का ज़िक्र किया है….

    क्या आप बता सकते है कि उनका जन्म और मुत्यु कब हुई थी?

    और जैसा मैं सोच रहा हूं अगर आपका जवाब मेरे अनुरुप हुआ तो ये बहस और विचार-विमर्श यही खत्म हो जायेगा

  90. August 30, 2009 at 6:29 pm

    @ निशाचर जी,जिस कहानी को आप और सुरेश जी सत्य कह रहे है उसे सत्य तो साबित कीजिये…मैं इतिहास का जानकार नही हूं मैने सुरेश जी के लेख में जितनी गलतियां निकाली सब कुरआन और हदीस की जानकारी के बल पर निकाली है….और इतनी कमिंयां निकलने के बाद कोई शोध सत्य कैसे हो सकता है???????अब मुझ जैसे इतिहास की कम जानकारी रखने वाले ने इतनी कमियां निकाल दी……..ज़रा सोचिये की इतिहास और इस्लाम दोनो का जानकार इंसान इसमें कितनी कमियां निकालेगा??????सुरेश जी से एक सवाल :-आपने अपने पहले लेख "राजा विक्रमादित्य" का ज़िक्र किया है….क्या आप बता सकते है कि उनका जन्म और मुत्यु कब हुई थी?और जैसा मैं सोच रहा हूं अगर आपका जवाब मेरे अनुरुप हुआ तो ये बहस और विचार-विमर्श यही खत्म हो जायेगा

  91. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    August 30, 2009 at 6:44 pm

    जगदीश त्रिपाठी जी और गरूणध्वज जी,

    ब्लोग के रुप में हम लोगो को बहुत अच्छा मंच मिला है….

    तो कृप्या करके इसका सही और अच्छा उपयोग करे…

    यहां बहस बहुत सार्थक और तथ्यों के दम पर हो रही है…..अगर आप लोग तथ्य पेश कर सकते है तो कीजिये….

    अगर आप लोग सार्थक बहस नही कर सकते है तो बहस में हिस्सा मत लीजिये।

    किसी भी धर्म और धर्म-ग्रन्थ के लिये कृप्या करके उन शब्दों का उपयोग ना करे…जो शब्द आप अपने धर्म और धर्म-ग्रन्थ के लिये ना सुन सकें।

    ये गुज़ारिश मैं सारे हिन्दी ब्लोग्गर्स से पहले भी कर चुका हूं अपने लेख में और अब भी कर रहा हूं….

  92. August 30, 2009 at 6:44 pm

    जगदीश त्रिपाठी जी और गरूणध्वज जी,ब्लोग के रुप में हम लोगो को बहुत अच्छा मंच मिला है…. तो कृप्या करके इसका सही और अच्छा उपयोग करे…यहां बहस बहुत सार्थक और तथ्यों के दम पर हो रही है…..अगर आप लोग तथ्य पेश कर सकते है तो कीजिये….अगर आप लोग सार्थक बहस नही कर सकते है तो बहस में हिस्सा मत लीजिये।किसी भी धर्म और धर्म-ग्रन्थ के लिये कृप्या करके उन शब्दों का उपयोग ना करे…जो शब्द आप अपने धर्म और धर्म-ग्रन्थ के लिये ना सुन सकें।ये गुज़ारिश मैं सारे हिन्दी ब्लोग्गर्स से पहले भी कर चुका हूं अपने लेख में और अब भी कर रहा हूं….

  93. Suresh Chiplunkar said,

    August 31, 2009 at 6:52 am

    @ काशिफ़ आरिफ़ –
    1) अपशब्दों का प्रयोग करना मैं भी अनुचित समझता हूं, इसलिये आपकी इस बात से सहमति। आपने देखा होगा कि सलीम की साइट पर भी मैंने कभी अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया है…। जो भी टिप्पणीकार ऐसा कर रहे हैं, वे अपनी जिम्मेदारी समझें, तथ्य रखें, तर्क रखें, व्यंग्य करें, हँसी उड़ायें लेकिन सभ्य शब्दों में। मैं बस इतना ही कह सकता हूं, हाँ ये बात जरूर है कि मैं इन टिप्पणियों को हटाऊंगा नहीं, क्योंकि मैं शुरु से इसके खिलाफ़ रहा हूं…
    2) यदि आप इस्लाम को वैदिक संस्कृति से पुराना माने बैठे हैं, तब तो बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती… जो भी पुरावशेष सारी दुनिया में मिले हैं और मिलते रहते हैं उनकी कार्बन डेटिंग के आधार पर ही लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं कि वैदिक संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी है, जबकि इस्लाम और ईसाईयत बहुत बाद में आये… आप नहीं मानना चाहते हों तो न मानें, आपकी मर्जी।
    3) दुनिया के प्रत्येक कोने में खुदाई के दौरान हिन्दू वैदिक परम्पराओं से सम्बन्धित देवताओं के चिन्ह और मूर्तियाँ मिलती रहती हैं, ऐसा क्यों होता है? कभी सुनने में नहीं आया, कि रूस या कम्बोडिया अथवा अफ़्रीका में खुदाई के दौरान किसी मस्जिद का गुम्बद प्राप्त हुआ जो इतने हजार वर्ष पुराना है? ऐसी कोई लिंक उपलब्ध हो तो आप बतायें, मैं आपको ऐसी दसियों उदाहरण (डाक्यूमेंट्री प्रूफ़ सहित) दे सकता हूं, जिसमें खुदाई के दौरान प्राप्त ऐसी मूर्तियों का विस्तारपूर्ण अध्ययन किया गया है, और पाया गया है कि ये हजारों साल पुरानी हैं। फ़िर भी यदि आप इस्लाम को, वैदिक परम्परा और संस्कृति से प्राचीन मानते हैं, तो मैं कुछ नहीं कर सकता।

  94. August 31, 2009 at 6:52 am

    @ काशिफ़ आरिफ़ – 1) अपशब्दों का प्रयोग करना मैं भी अनुचित समझता हूं, इसलिये आपकी इस बात से सहमति। आपने देखा होगा कि सलीम की साइट पर भी मैंने कभी अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया है…। जो भी टिप्पणीकार ऐसा कर रहे हैं, वे अपनी जिम्मेदारी समझें, तथ्य रखें, तर्क रखें, व्यंग्य करें, हँसी उड़ायें लेकिन सभ्य शब्दों में। मैं बस इतना ही कह सकता हूं, हाँ ये बात जरूर है कि मैं इन टिप्पणियों को हटाऊंगा नहीं, क्योंकि मैं शुरु से इसके खिलाफ़ रहा हूं… 2) यदि आप इस्लाम को वैदिक संस्कृति से पुराना माने बैठे हैं, तब तो बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती… जो भी पुरावशेष सारी दुनिया में मिले हैं और मिलते रहते हैं उनकी कार्बन डेटिंग के आधार पर ही लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं कि वैदिक संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी है, जबकि इस्लाम और ईसाईयत बहुत बाद में आये… आप नहीं मानना चाहते हों तो न मानें, आपकी मर्जी। 3) दुनिया के प्रत्येक कोने में खुदाई के दौरान हिन्दू वैदिक परम्पराओं से सम्बन्धित देवताओं के चिन्ह और मूर्तियाँ मिलती रहती हैं, ऐसा क्यों होता है? कभी सुनने में नहीं आया, कि रूस या कम्बोडिया अथवा अफ़्रीका में खुदाई के दौरान किसी मस्जिद का गुम्बद प्राप्त हुआ जो इतने हजार वर्ष पुराना है? ऐसी कोई लिंक उपलब्ध हो तो आप बतायें, मैं आपको ऐसी दसियों उदाहरण (डाक्यूमेंट्री प्रूफ़ सहित) दे सकता हूं, जिसमें खुदाई के दौरान प्राप्त ऐसी मूर्तियों का विस्तारपूर्ण अध्ययन किया गया है, और पाया गया है कि ये हजारों साल पुरानी हैं। फ़िर भी यदि आप इस्लाम को, वैदिक परम्परा और संस्कृति से प्राचीन मानते हैं, तो मैं कुछ नहीं कर सकता।

  95. स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said,

    August 31, 2009 at 7:02 am

    दर असल मस्जिद-उल-हराम लफ्ज़ भी है और हरम-शरीफ भी है….

    अर्थात हराम और हरम…

    हराम शब्द का मायने होता है प्रतिष्ठित….

    दर असल जिस तरह से ज़ और ज होता है वैसे ही अरबी अक्षरों में एक ह होता है (वैसे ही जैसे हिंदी में बोलते हैं) और एक ह होता है (जो हलक़ से बोला जाता है)

    इस तरह जब हम अरबिक शब्द कोष का अध्ययन करेंगे तो पता चलता है कि एक शब्द 'हराम' का मतलब होता है निषेध (prohibited) (यह सामान्य तरह से बोला जाता है, वैसे ही जैसे हिंदी में है)

    एक शब्द हराम होता जिसका अर्थ होता है 'प्रतिष्ठित' The Sacred यह हलक़ से बोलते हैं

    जब हम प्रतिष्ठित वाला हराम लिखते है हिंदी में तो उसके नीचे बिंदी लगाते हैं…

    Masjid-ul-Haram means The Secrad Mosque

  96. August 31, 2009 at 7:02 am

    दर असल मस्जिद-उल-हराम लफ्ज़ भी है और हरम-शरीफ भी है….अर्थात हराम और हरम…हराम शब्द का मायने होता है प्रतिष्ठित….दर असल जिस तरह से ज़ और ज होता है वैसे ही अरबी अक्षरों में एक ह होता है (वैसे ही जैसे हिंदी में बोलते हैं) और एक ह होता है (जो हलक़ से बोला जाता है) इस तरह जब हम अरबिक शब्द कोष का अध्ययन करेंगे तो पता चलता है कि एक शब्द 'हराम' का मतलब होता है निषेध (prohibited) (यह सामान्य तरह से बोला जाता है, वैसे ही जैसे हिंदी में है) एक शब्द हराम होता जिसका अर्थ होता है 'प्रतिष्ठित' The Sacred यह हलक़ से बोलते हैंजब हम प्रतिष्ठित वाला हराम लिखते है हिंदी में तो उसके नीचे बिंदी लगाते हैं…Masjid-ul-Haram means The Secrad Mosque

  97. Suresh Chiplunkar said,

    August 31, 2009 at 7:26 am

    सलीम ने मेरे बाद टिप्पणी की, फ़िर भी कमाल है, मेरी टिप्पणी का कोई जवाब नहीं, कोई कुतर्क नहीं? 🙂
    काशिफ़ ने "बाप-बेटे वाले" तर्क का जवाब दिया है, अब तो आपको यह साबित करना ही होगा कि इस्लाम विश्व का सबसे पुराना धर्म है। हम साबित करेंगे कि वैदिक संस्कृति सबसे पुरानी है। किसने किसकी नकल की, किसने किसकी परम्परायें उधार लीं, कैसे उन्हें अपने अनुसार बदला आदि-आदि। दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा…। फ़िलहाल आप मानते रहिये कि इस्लाम सबसे पुराना है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों और शोधग्रंथों को झुठलाना आपके लिये आसान नहीं होगा…

  98. August 31, 2009 at 7:26 am

    सलीम ने मेरे बाद टिप्पणी की, फ़िर भी कमाल है, मेरी टिप्पणी का कोई जवाब नहीं, कोई कुतर्क नहीं? 🙂 काशिफ़ ने "बाप-बेटे वाले" तर्क का जवाब दिया है, अब तो आपको यह साबित करना ही होगा कि इस्लाम विश्व का सबसे पुराना धर्म है। हम साबित करेंगे कि वैदिक संस्कृति सबसे पुरानी है। किसने किसकी नकल की, किसने किसकी परम्परायें उधार लीं, कैसे उन्हें अपने अनुसार बदला आदि-आदि। दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा…। फ़िलहाल आप मानते रहिये कि इस्लाम सबसे पुराना है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों और शोधग्रंथों को झुठलाना आपके लिये आसान नहीं होगा…

  99. SANJAY KUMAR said,

    August 31, 2009 at 7:56 am

    One small doubt,
    If KABA is Shivlinga and there are many idols in the vicinity and Stone Scriptures are Sanskrit and other Indian languages.

    How, it was allowed to remain in Centre of Islamic Culture.

    Muslims would have destroyed all those symbols as they have done in other part of the world.

  100. SANJAY KUMAR said,

    August 31, 2009 at 7:56 am

    One small doubt, If KABA is Shivlinga and there are many idols in the vicinity and Stone Scriptures are Sanskrit and other Indian languages.How, it was allowed to remain in Centre of Islamic Culture.Muslims would have destroyed all those symbols as they have done in other part of the world.

  101. दिवाकर मणि said,

    August 31, 2009 at 9:26 am

    प्रमाणयुक्त आलेख हेतु धन्यवाद. सुरेश जी और अन्य पाठक बंधुओं, आप एक बात अवश्य जान लें, कि मियां सलीम और कैरानवी भाई से कभी सार्थक टिप्पणी की आशा नहीं की जा सकती। ये तो वही कहेंगे, जो इनको कहना है। अगर आपको मेरी बात पर विश्वास ना हो तो इनके तथाकथित "स्वच्छ संदेश" पर चले जाइए या फिर अन्य कहीं…एक ही टिप्पणी को हजार बार चिपियाते रहेंगे। हां, काशिफ आरिफ़ भाई की बातों में अवश्य तार्किकता का समावेशन किंचित हद तक मिल सकता है…

  102. August 31, 2009 at 9:26 am

    प्रमाणयुक्त आलेख हेतु धन्यवाद. सुरेश जी और अन्य पाठक बंधुओं, आप एक बात अवश्य जान लें, कि मियां सलीम और कैरानवी भाई से कभी सार्थक टिप्पणी की आशा नहीं की जा सकती। ये तो वही कहेंगे, जो इनको कहना है। अगर आपको मेरी बात पर विश्वास ना हो तो इनके तथाकथित "स्वच्छ संदेश" पर चले जाइए या फिर अन्य कहीं…एक ही टिप्पणी को हजार बार चिपियाते रहेंगे। हां, काशिफ आरिफ़ भाई की बातों में अवश्य तार्किकता का समावेशन किंचित हद तक मिल सकता है…

  103. Mohammed Umar Kairanvi said,

    August 31, 2009 at 9:38 am

    चिपलूनकर- जो भी अगली बार चुराकर लाओगे देख लेना वेसे सैंकडों प्रश्‍नों का उत्‍तर यानी हिन्‍दू-मुस्लिम धर्म से संबंधित प्रश्‍नों का उत्‍तर इस बुक में मिल जायेगा, पहले इस बुक में झांक लेना कि आपका जवाब है कि नहीं फिर अपना लेख पिटवाने को रखना,

    हिन्‍दू-मुस्लिम धर्म पर सैंकडों सवालों के जवाब पाने के लिये पढें:
    सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद– कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book- ''अगर अब भी ना जागे तो''
    http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

    पुस्‍तक परिचयः
    जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया (मुसलमान हैरानी में इसका विरोध कर रहे थे) और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं विद्वान मौलाना आचार्य शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक योग्‍य शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकाने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है,
    http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

  104. August 31, 2009 at 9:38 am

    चिपलूनकर- जो भी अगली बार चुराकर लाओगे देख लेना वेसे सैंकडों प्रश्‍नों का उत्‍तर यानी हिन्‍दू-मुस्लिम धर्म से संबंधित प्रश्‍नों का उत्‍तर इस बुक में मिल जायेगा, पहले इस बुक में झांक लेना कि आपका जवाब है कि नहीं फिर अपना लेख पिटवाने को रखना,हिन्‍दू-मुस्लिम धर्म पर सैंकडों सवालों के जवाब पाने के लिये पढें: सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद– कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book- ''अगर अब भी ना जागे तो''http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-पुस्‍तक परिचयःजिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया (मुसलमान हैरानी में इसका विरोध कर रहे थे) और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं विद्वान मौलाना आचार्य शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक योग्‍य शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकाने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है,http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

  105. दिवाकर मणि said,

    August 31, 2009 at 12:17 pm

    क्या कहा था पाठक बंधुओं मैंने अपनी पूर्व की टिप्पणी में !! एकदम सही निकला ना !! मेरी टिप्पणी के ठीक सोलह मिनट बाद ही पुराना चिपियाउ राग मियां कैरानवी ने अलाप दिया ना?? हा हा हा….

  106. August 31, 2009 at 12:17 pm

    क्या कहा था पाठक बंधुओं मैंने अपनी पूर्व की टिप्पणी में !! एकदम सही निकला ना !! मेरी टिप्पणी के ठीक सोलह मिनट बाद ही पुराना चिपियाउ राग मियां कैरानवी ने अलाप दिया ना?? हा हा हा….

  107. स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said,

    August 31, 2009 at 3:11 pm

    दर असल हज़रत आदम (अ) (संसार के सबसे पहले मानव) के दो बेटे थे…(मैं संछिप्त में कहना चाहता हूँ…) वही से यह चला आ रहा है… इस्लाम और कुफ्र (नास्तिक) या मुश्रीक़ (ईश्वर का साझीदार बनाना, बहुदेववाद) का चलन….

    मैं वैदिक आदि बहस में न पड़ कर यह कहना चाहता हूँ… कि यह दोनों तभी से है….

    वैसे अगर आप वेदों की बात कर रहें है और वैदिक शब्द वेदों की शिक्षाओं से सम्बंधित हो कर, कह रहे हैं तो सुरेश बाबू आप ठीक है क्यूंकि वेदों को मैं (हो सकता है) ईश्वर का ग्रन्थ ही मानता हूँ क्यूंकि उसमें कहीं भी मूर्ति पूजा का ज़िक्र नहीं है…और वेदों में कई जगह कहा गया है कि 'ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है. नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है'…

  108. August 31, 2009 at 3:11 pm

    दर असल हज़रत आदम (अ) (संसार के सबसे पहले मानव) के दो बेटे थे…(मैं संछिप्त में कहना चाहता हूँ…) वही से यह चला आ रहा है… इस्लाम और कुफ्र (नास्तिक) या मुश्रीक़ (ईश्वर का साझीदार बनाना, बहुदेववाद) का चलन….मैं वैदिक आदि बहस में न पड़ कर यह कहना चाहता हूँ… कि यह दोनों तभी से है….वैसे अगर आप वेदों की बात कर रहें है और वैदिक शब्द वेदों की शिक्षाओं से सम्बंधित हो कर, कह रहे हैं तो सुरेश बाबू आप ठीक है क्यूंकि वेदों को मैं (हो सकता है) ईश्वर का ग्रन्थ ही मानता हूँ क्यूंकि उसमें कहीं भी मूर्ति पूजा का ज़िक्र नहीं है…और वेदों में कई जगह कहा गया है कि 'ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है. नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है'…

  109. कृष्ण मोहन मिश्र said,

    August 31, 2009 at 5:35 pm

    दमदार पोस्ट और उससे भी दमदार टिप्पणियां ।

  110. August 31, 2009 at 5:35 pm

    दमदार पोस्ट और उससे भी दमदार टिप्पणियां ।

  111. Ankhen said,

    September 3, 2009 at 12:30 am

    श्रीवास्ताव जी तो खैर मुसलमान बन गये लेकिन इन साहब का क्या करें ‘इस्लाम ’ क्या है सच – एक मुस्लिम की जबानी , जानिये कि किस कारण  उसने अपने मजहब से किनारा लिया :

    Quran

    Do they not consider the Qur'an (with care)? Had it been from other Than Allah, they would surely have found therein Much discrepancy Q.4:82

    What Quran Teaches?   The intolerant teachings of Islam    Quranic verses

    How the Quran lied about Mary and Jesus Christ�s birth? Mohammad Asghar 2005/04/18

    An Imperfection in the Perfect Quran Kimble Smith  2004/10/30

    Psychotherapy a la Qur�anic verses? Abul Kasem   October .24, 2003

    Inheritance Rand 23-Dec-2002

  112. Ankhen said,

    September 3, 2009 at 12:30 am

    श्रीवास्ताव जी तो खैर मुसलमान बन गये लेकिन इन साहब का क्या करें ‘इस्लाम ’ क्या है सच – एक मुस्लिम की जबानी , जानिये कि किस कारण  उसने अपने मजहब से किनारा लिया : QuranDo they not consider the Qur'an (with care)? Had it been from other Than Allah, they would surely have found therein Much discrepancy Q.4:82What Quran Teaches?   The intolerant teachings of Islam    Quranic verses How the Quran lied about Mary and Jesus Christ�s birth? Mohammad Asghar 2005/04/18An Imperfection in the Perfect Quran Kimble Smith  2004/10/30Psychotherapy a la Qur�anic verses? Abul Kasem   October .24, 2003Inheritance Rand 23-Dec-2002

  113. Ankhen said,

    September 3, 2009 at 12:39 am

    Science and Quran

    To argue with a person who has renounced the use of reason is like administering medicine to the dead." — Thomas Paine More Islamic Pseudo-Science THHuxley 2005/09/26
    The Big Bang in the Qur'an 2005/02/21

    7 Layers of Heaven Ali Sina 2004/07/12

    Super-Scientific Religious Scriptures! Oct 21 2003  Avijit Roy

    Is Islam Scientific? By Shafiya April 2002
    Does Quran have any Scientific miracles ? By Avijit Roay

    Western Scientists Discovered the $cience in Quran Abul Kasem

    Religion vs. Modern Science Avijit Roy

    Genesis According to Muhammad    Ali Sina

    Embryology of Quran     A.E.

    Shooting Stars, Allah's Missiles to Scare the Jins?   Ali Sina

    Science in the Quran

    Scientific Errors of the Qur'an

  114. Ankhen said,

    September 3, 2009 at 12:39 am

    Science and Quran To argue with a person who has renounced the use of reason is like administering medicine to the dead." — Thomas Paine More Islamic Pseudo-Science THHuxley 2005/09/26 The Big Bang in the Qur'an 2005/02/21 7 Layers of Heaven Ali Sina 2004/07/12 Super-Scientific Religious Scriptures! Oct 21 2003  Avijit Roy Is Islam Scientific? By Shafiya April 2002 Does Quran have any Scientific miracles ? By Avijit Roay Western Scientists Discovered the $cience in Quran Abul Kasem Religion vs. Modern Science Avijit Roy Genesis According to Muhammad    Ali Sina Embryology of Quran     A.E. Shooting Stars, Allah's Missiles to Scare the Jins?   Ali Sina Science in the QuranScientific Errors of the Qur'an

  115. Ankhen said,

    September 3, 2009 at 12:44 am

    Women in Islam

    I have seen that the majority of the dwellers of Hell-Fire were women….[because] they are ungrateful to their husbands and they are deficient in intelligence. " (The Prophet Muhammad) Sahih Bukhari V 2, B 24, N 541
    Symposium: Gender Apartheid and Islam 2004/12/31

    Islamic Women's Day Abul Kasem 2005/03/14

    Importance of Sex in Islam Zaa Brifd 2004/01/18

    Beat your wives or �separate from them�? Arab Christian and Egyptian Kafir September 7, 2003
    Reclaiming Hijab Or  Declining Freedom? By  Lopa Hassan 09/30/02

    Islam, Political Islam and Women in the Middle East. By Maryam Namazie 09/23/02

    Women in Islam: An exegesis  By Abul Kasem 08/29/02
    Unveiling the Islamic Veil  By Abul Kasem
    Inhuman but Islamic Indeed! By Syed Kamran Mirza 04/16/02
    Women's High status and Privileged Position  Ayesha A 03/08/02
    Holy and blessed Family: An example to emulate?   Abul Kasem   08/19/01

    Slave Girls and Their Rights in Islam   07/07/01
    Women's Paradise  Abul Kasem   07/01/01

    Ambiguity of Dress Code in Islam: Burkha or Hijab (?)   Khurshed Alam Chowdhury   06/14//01

    Polygamy  Fatemolla
    Some Weird Logic in the Polygamy Debate   Aparthib Zaman

    I Apologize   Fatemolla
    Status of Women in Islam Hikmat
    Women Before and After Islam Did really Islam improve the status of women?  Ali Sina

    Status of Women in Islam From Veil of Equality and Justice

    The Bitter Lament of a Muslim Woman

    I Am A Muslim Woman  The story of Dr. Homa Darabi.
    Islam's Shame  Lifting the Veil of Tears
    The Women in Islam according to hadith and Quran

  116. Ankhen said,

    September 3, 2009 at 12:44 am

    Women in IslamI have seen that the majority of the dwellers of Hell-Fire were women….[because] they are ungrateful to their husbands and they are deficient in intelligence. " (The Prophet Muhammad) Sahih Bukhari V 2, B 24, N 541Symposium: Gender Apartheid and Islam 2004/12/31Islamic Women's Day Abul Kasem 2005/03/14Importance of Sex in Islam Zaa Brifd 2004/01/18Beat your wives or �separate from them�? Arab Christian and Egyptian Kafir September 7, 2003Reclaiming Hijab Or  Declining Freedom? By  Lopa Hassan 09/30/02Islam, Political Islam and Women in the Middle East. By Maryam Namazie 09/23/02 Women in Islam: An exegesis  By Abul Kasem 08/29/02Unveiling the Islamic Veil  By Abul KasemInhuman but Islamic Indeed! By Syed Kamran Mirza 04/16/02Women's High status and Privileged Position  Ayesha A 03/08/02Holy and blessed Family: An example to emulate?   Abul Kasem   08/19/01Slave Girls and Their Rights in Islam   07/07/01Women's Paradise  Abul Kasem   07/01/01Ambiguity of Dress Code in Islam: Burkha or Hijab (?)   Khurshed Alam Chowdhury   06/14//01Polygamy  FatemollaSome Weird Logic in the Polygamy Debate   Aparthib ZamanI Apologize   FatemollaStatus of Women in Islam HikmatWomen Before and After Islam Did really Islam improve the status of women?  Ali SinaStatus of Women in Islam From Veil of Equality and Justice The Bitter Lament of a Muslim WomanI Am A Muslim Woman  The story of Dr. Homa Darabi. Islam's Shame  Lifting the Veil of TearsThe Women in Islam according to hadith and Quran

  117. Mohammed Umar Kairanvi said,

    September 4, 2009 at 8:24 pm

    @Ankhe- हिन्‍दी ब्लागिंग में क्‍या कर रहे हो, महाराज से अनुवाद करके रखो तो दुनिया देखे कैरानवी भी हे कोई चीज, मुझे कई बार यह लिंक दे चुके किया करूं में इसका, मेरे भाई मुझे पांच भाषाओं में विचरना है, उर्दू में पहचान बनाने के बाद हिन्‍दी में आया इसमें रूत्‍बा बनाने के बाद मुझे फारसी की तरफ जाना है, उसके बाद सोचुगा की अरबी की तरफ जाउं या आपकी इच्‍छा के मुताबिक इंग्लिश की ओर, वैसे भी वहां पहले कैरानवी का कार्य पहुचा हुआ है नीचे देखो यह लन्‍दन से छपी कैरानवी की पुस्‍तक 7या8 भाषाओं में अनुवाद होचुका इसका, आखिर यह जाकिर नायक के गुरू के गुरू हैं, खरीदना हो तो इस साइट http://www.taha.co.uk/ से खरीद लो, फ्री का तरीका सबको पता है ही
    English Translation of: Izhar -ul- Haq – By M Rahmatullah Kairanvi
    Originally written in Arabic under the Title Izhar ul Haq by the distinguished 19th century Indian Scholar Maulana Rahmatullah Kairanvi and appeared in 1864. Well before the now famous Muslim-Christian Debates by Ahmad Deedat of South Africa Maulana Rahmatullah was challenging the Christian offensive against Islam in British India. In a debate which took place in January 1854, in Akbarabad in the City of Agra. The Rev C C P Founder (who had written a book in Urdu to cast doubts into the minds of the Muslim) admitted that there were alterations in the Bible in seven or Eight places to which the Maulana commented "If any alteration is proved to have been perpetrated in a particular text, it is considered null and void and invalidated. This and other debates proving Islam to be the true religion was part of the trigger which lead to the Brutal British aggression against the Muslims of India in 1857 in which thousands of Ulemah were killed, Maulana Rahmatullah was at the top of the list, but Allah saved him and took him to Makkah where he established The Madrasa Saulatia
    The Truth Revealed Parts 1-2 and 3 Paperback 474 Pages Ref: 139 ti Price: £9.95

  118. September 4, 2009 at 8:24 pm

    @Ankhe- हिन्‍दी ब्लागिंग में क्‍या कर रहे हो, महाराज से अनुवाद करके रखो तो दुनिया देखे कैरानवी भी हे कोई चीज, मुझे कई बार यह लिंक दे चुके किया करूं में इसका, मेरे भाई मुझे पांच भाषाओं में विचरना है, उर्दू में पहचान बनाने के बाद हिन्‍दी में आया इसमें रूत्‍बा बनाने के बाद मुझे फारसी की तरफ जाना है, उसके बाद सोचुगा की अरबी की तरफ जाउं या आपकी इच्‍छा के मुताबिक इंग्लिश की ओर, वैसे भी वहां पहले कैरानवी का कार्य पहुचा हुआ है नीचे देखो यह लन्‍दन से छपी कैरानवी की पुस्‍तक 7या8 भाषाओं में अनुवाद होचुका इसका, आखिर यह जाकिर नायक के गुरू के गुरू हैं, खरीदना हो तो इस साइट http://www.taha.co.uk/ से खरीद लो, फ्री का तरीका सबको पता है हीEnglish Translation of: Izhar -ul- Haq – By M Rahmatullah Kairanvi Originally written in Arabic under the Title Izhar ul Haq by the distinguished 19th century Indian Scholar Maulana Rahmatullah Kairanvi and appeared in 1864. Well before the now famous Muslim-Christian Debates by Ahmad Deedat of South Africa Maulana Rahmatullah was challenging the Christian offensive against Islam in British India. In a debate which took place in January 1854, in Akbarabad in the City of Agra. The Rev C C P Founder (who had written a book in Urdu to cast doubts into the minds of the Muslim) admitted that there were alterations in the Bible in seven or Eight places to which the Maulana commented "If any alteration is proved to have been perpetrated in a particular text, it is considered null and void and invalidated. This and other debates proving Islam to be the true religion was part of the trigger which lead to the Brutal British aggression against the Muslims of India in 1857 in which thousands of Ulemah were killed, Maulana Rahmatullah was at the top of the list, but Allah saved him and took him to Makkah where he established The Madrasa SaulatiaThe Truth Revealed Parts 1-2 and 3 Paperback 474 Pages Ref: 139 ti Price: £9.95

  119. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    September 6, 2009 at 5:47 am

    सुरेश जी,

    1. मुबारक हो, चलिये किसी बात पर तो हमारे विचार मिलते है।

    2. मैने पिछली टिप्पणी में क्या लिखा था की "आदम अलैहि सलाम दुनिया के पहले इन्सान थे….और इस्लाम यही से शुरु हुआ है और हुज़ुर सल्लाहो अलैहि वस्सलम पर आकर पुरा हुआ है….

    मुह्म्मद साहब के आने से पहले तक लोग इसे इसलाम के नाम से नही पुकारते थे…. हर नबी के वक्त में उसके मज़हब को उसके नाम से पुकारा जाता था… इब्राहिम अलैहि सलाम के वक्त में लोग इसे इब्राहिम का मज़ह्ब कहते थे… दाऊद अलैहि सलाम के वक्त में दाउद का मज़हब कहा जाता था….

    यहां तक कि जब मुहम्मद साहब ने इसलाम की दावत लोगो को दी तो मक्का के लोगो ने उसे "मुह्म्मद का दीन कहा"

    अल्लाह ने हर वक्त और हर कौम के लिये नबी और रसुल भेजे सब पर किताबे नाज़िल की…. और हर किताब पिछ्ली किताब से बेहतर थी क्यौकी जैसे जैसे इन्सान की अक्ल बढती गयी वैसे वैसे उसे तालीम मिलती गयी…

    3. मैं मानता हूं कि वैदिक सभ्यता के सबुत मिले है क्यौकि इन्सान के दुनिया में आने के बाद जिस चीज़ ने उसे नुक्सान पहुचाया…चाहे वो पानी का तुफ़ान हो, हवा का तुफ़ान हो, या सुरज की तेज गर्मी…उसने हर उस ताकत की मुरत बनायी जिसका वो कुछ नही बिगाड सकता था… तो मुर्तिया और मन्दिर मिलना लाज़मी है…

    मस्जिद में गुम्बद ज़रुरी नही है… ये तो तुर्कों और मुगलों के द्वारा शुरु किया गया था…फ़िर ये पुरी दुनिया में फ़ैल गया..

    मुसलमान नमाज़ कही भी पढ सकता है चाहे वो जंगल हो, शहर हो, रेगिस्तान हो, बस में हो, ट्रेन में हो या घर में।

    मस्जिद के लिये सिर्फ़ चार दीवारें, एक छत और साफ़ ज़मीन काफ़ी है…

    चार दीवारें भी इसलिये ताकि कोई जानवर या इन्सान उस जगह को, ज़मीन को गन्दा ना कर दें… उस जगह पर नाजाईज़ कब्ज़ा ना कर ले…

    राजा और रंक एक सफ़ (पंक्ति) में कधें से कधां मिलाकर नमाज़ पढे..उनके अन्दर से ऊंच-नीच की भावना खत्म हो जाये…

    मिनारे इस्लिये बनायी गयी ताकि दुर से पता चल जायें की यहां मस्जिद है क्यौकि सफ़र में मुसाफ़िर की पानी और दुसरी आवश्य्कतायें तथा थोडे बहुत आराम और नित्य किर्याओं के लिये मस्जिद से अच्छी जगह कोई नही है….जहां पर आधा-एक घंटा बहुत सुकुन से गुज़र जाता है…

    मैं पिछ्ले सात साल से भारत के दस-बारह शहरों में सफ़र कर रहा हूं…जब पहली बार मैं सफ़र पर गया था तो मेरे पिताजी ने मुझे सबसे पहला जो सबक सिखाया था वो ये था… जब भी किसी नये शहर या नयी जगह जाओं तो दो जगहों के बारे पता करना….पहली मस्जिद और दुसरी एक मुसलमान की खाने की होटल क्यौकी मुसलमान के यहां हलाल का मीट मिलेगा…जो किसी और के यहां नही मिलेगा

  120. September 6, 2009 at 5:47 am

    सुरेश जी,1. मुबारक हो, चलिये किसी बात पर तो हमारे विचार मिलते है।2. मैने पिछली टिप्पणी में क्या लिखा था की "आदम अलैहि सलाम दुनिया के पहले इन्सान थे….और इस्लाम यही से शुरु हुआ है और हुज़ुर सल्लाहो अलैहि वस्सलम पर आकर पुरा हुआ है….मुह्म्मद साहब के आने से पहले तक लोग इसे इसलाम के नाम से नही पुकारते थे…. हर नबी के वक्त में उसके मज़हब को उसके नाम से पुकारा जाता था… इब्राहिम अलैहि सलाम के वक्त में लोग इसे इब्राहिम का मज़ह्ब कहते थे… दाऊद अलैहि सलाम के वक्त में दाउद का मज़हब कहा जाता था….यहां तक कि जब मुहम्मद साहब ने इसलाम की दावत लोगो को दी तो मक्का के लोगो ने उसे "मुह्म्मद का दीन कहा"अल्लाह ने हर वक्त और हर कौम के लिये नबी और रसुल भेजे सब पर किताबे नाज़िल की…. और हर किताब पिछ्ली किताब से बेहतर थी क्यौकी जैसे जैसे इन्सान की अक्ल बढती गयी वैसे वैसे उसे तालीम मिलती गयी…3. मैं मानता हूं कि वैदिक सभ्यता के सबुत मिले है क्यौकि इन्सान के दुनिया में आने के बाद जिस चीज़ ने उसे नुक्सान पहुचाया…चाहे वो पानी का तुफ़ान हो, हवा का तुफ़ान हो, या सुरज की तेज गर्मी…उसने हर उस ताकत की मुरत बनायी जिसका वो कुछ नही बिगाड सकता था… तो मुर्तिया और मन्दिर मिलना लाज़मी है…मस्जिद में गुम्बद ज़रुरी नही है… ये तो तुर्कों और मुगलों के द्वारा शुरु किया गया था…फ़िर ये पुरी दुनिया में फ़ैल गया..मुसलमान नमाज़ कही भी पढ सकता है चाहे वो जंगल हो, शहर हो, रेगिस्तान हो, बस में हो, ट्रेन में हो या घर में।मस्जिद के लिये सिर्फ़ चार दीवारें, एक छत और साफ़ ज़मीन काफ़ी है…चार दीवारें भी इसलिये ताकि कोई जानवर या इन्सान उस जगह को, ज़मीन को गन्दा ना कर दें… उस जगह पर नाजाईज़ कब्ज़ा ना कर ले…राजा और रंक एक सफ़ (पंक्ति) में कधें से कधां मिलाकर नमाज़ पढे..उनके अन्दर से ऊंच-नीच की भावना खत्म हो जाये…मिनारे इस्लिये बनायी गयी ताकि दुर से पता चल जायें की यहां मस्जिद है क्यौकि सफ़र में मुसाफ़िर की पानी और दुसरी आवश्य्कतायें तथा थोडे बहुत आराम और नित्य किर्याओं के लिये मस्जिद से अच्छी जगह कोई नही है….जहां पर आधा-एक घंटा बहुत सुकुन से गुज़र जाता है…मैं पिछ्ले सात साल से भारत के दस-बारह शहरों में सफ़र कर रहा हूं…जब पहली बार मैं सफ़र पर गया था तो मेरे पिताजी ने मुझे सबसे पहला जो सबक सिखाया था वो ये था… जब भी किसी नये शहर या नयी जगह जाओं तो दो जगहों के बारे पता करना….पहली मस्जिद और दुसरी एक मुसलमान की खाने की होटल क्यौकी मुसलमान के यहां हलाल का मीट मिलेगा…जो किसी और के यहां नही मिलेगा

  121. काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said,

    September 6, 2009 at 6:00 am

    @ जनाब गरुणध्वज,

    कभी तो दिमाग का इस्तेमाल कर लिया करो…हमारे आगरा में एक कहावत है..

    शक्ल अच्छी नही तो कम से कम बात तो अच्छी कर लिया करो….अब आपकी शक्ल तो दिख नही रही है….तो शक्ल को नाम से रिप्लेस कर देते है

    जब किसी चीज़ के में जानकारी नही हुआ करें तो ऐसे मुंह खोल के बोलते नही है..

    इस्लाम में उल्टा सोना मना है…कहते है कि उल्टा इबलीस सोता है..

    ज़रा आखें खोल कर देखो हिन्दी बायीं तरफ़ से लिखी जाती है….अंग्रेजी बायीं तरफ़ से लिखी जाती है….

    जबकि उर्दु और अरबी दायीं तरफ़ से लिखी जाती है…..

    तो उल्टा कौन हुआ???????

    "आबे ज़म-ज़म" झरना नही है…वो एक कुआं है जनाब…

    रही बात आबे-ज़म-ज़म की….तो लगता तो है इसकी सप्लाई जन्नत से होती है क्यौकि जहां हर तरफ़ ज़मीन में तेल ही तेल है वहां पर ये कुआं पिछले ४००० साल से मौजुद है…

    18×14 फ़ीट और 18 मीटर गहरा है…

    4000 साल पुराना है…ना कभी सुखा…ना कभी स्वाद बदला…

    आज तक कभी भी कुऐं में ना कोई काई जमी और ना ही कोई पेड उगा…

    ना आज तक उस पानी में कोई बैक्टिरिया मिलें…

    युरोपियन लैबोरेट्री में चेक हो चुका है उन्होने इसे पीने लायक घोषित कर दिया है।

    ये छोटा सा कुआं लाखों लोगो को पानी देता है…

    8000 लीटर प्रति सेकेण्ड पानी की ताकत वाली मोटर 24 घण्टे चलती है….

    और सिर्फ़ 11 मिनट बाद पानी का लेवल बराबर हो जाता है

  122. September 6, 2009 at 6:00 am

    @ जनाब गरुणध्वज,कभी तो दिमाग का इस्तेमाल कर लिया करो…हमारे आगरा में एक कहावत है..शक्ल अच्छी नही तो कम से कम बात तो अच्छी कर लिया करो….अब आपकी शक्ल तो दिख नही रही है….तो शक्ल को नाम से रिप्लेस कर देते हैजब किसी चीज़ के में जानकारी नही हुआ करें तो ऐसे मुंह खोल के बोलते नही है..इस्लाम में उल्टा सोना मना है…कहते है कि उल्टा इबलीस सोता है..ज़रा आखें खोल कर देखो हिन्दी बायीं तरफ़ से लिखी जाती है….अंग्रेजी बायीं तरफ़ से लिखी जाती है….जबकि उर्दु और अरबी दायीं तरफ़ से लिखी जाती है…..तो उल्टा कौन हुआ???????"आबे ज़म-ज़म" झरना नही है…वो एक कुआं है जनाब…रही बात आबे-ज़म-ज़म की….तो लगता तो है इसकी सप्लाई जन्नत से होती है क्यौकि जहां हर तरफ़ ज़मीन में तेल ही तेल है वहां पर ये कुआं पिछले ४००० साल से मौजुद है…18×14 फ़ीट और 18 मीटर गहरा है…4000 साल पुराना है…ना कभी सुखा…ना कभी स्वाद बदला…आज तक कभी भी कुऐं में ना कोई काई जमी और ना ही कोई पेड उगा…ना आज तक उस पानी में कोई बैक्टिरिया मिलें…युरोपियन लैबोरेट्री में चेक हो चुका है उन्होने इसे पीने लायक घोषित कर दिया है।ये छोटा सा कुआं लाखों लोगो को पानी देता है…8000 लीटर प्रति सेकेण्ड पानी की ताकत वाली मोटर 24 घण्टे चलती है….और सिर्फ़ 11 मिनट बाद पानी का लेवल बराबर हो जाता है

  123. प्रिया शर्मा said,

    September 9, 2009 at 3:50 am

    सुरेश जी आपने पी.एन.ओके. साहब के शोध के रुप में एक गोल चीज़ रखी जिसको कुछ लोगो ने बगैर सोचे समझे आखें बन्द करके तरबुज़ समझ कर खाना शुरु कर दिया….

    काशिफ़ जी, आये तो उन्होने उस गोल चीज़ को अपने तर्कों से इतना ठोका की उसके ऊपर से तरबुज़ का खोल उतर गया और सबके सामने आ गया की ये शोध तरबुज़ नही बल्कि नारियल की तरह खोखला था…..

    अब जहां तक मुझे लगता है आपको तीसरा भाग प्रकाशित कर अपनी और फ़जीहत नही करानी चाहिये….

    तो क्या इरादा है????

  124. September 9, 2009 at 3:50 am

    सुरेश जी आपने पी.एन.ओके. साहब के शोध के रुप में एक गोल चीज़ रखी जिसको कुछ लोगो ने बगैर सोचे समझे आखें बन्द करके तरबुज़ समझ कर खाना शुरु कर दिया….काशिफ़ जी, आये तो उन्होने उस गोल चीज़ को अपने तर्कों से इतना ठोका की उसके ऊपर से तरबुज़ का खोल उतर गया और सबके सामने आ गया की ये शोध तरबुज़ नही बल्कि नारियल की तरह खोखला था…..अब जहां तक मुझे लगता है आपको तीसरा भाग प्रकाशित कर अपनी और फ़जीहत नही करानी चाहिये….तो क्या इरादा है????

  125. Rose said,

    December 20, 2009 at 3:52 pm

    Aaj he may nay yea sab tark padhay may kashif ke har baat say sahmat ho jis nay bhout acchay andaj say apny harm ko bayan keya hi kashif tum ko salam

  126. Oracle Apps said,

    February 17, 2010 at 12:37 pm

    ब्रह्मा की आयु
    विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
    हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा होते हैं। इनकी आयु इन्हीं के सौ वर्षों के बराबर होती है। इनकी आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। विष्णु पुराण के अनुसार काल-गणना विभाग, विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय के अनुसार:
    • 2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
    • 4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
    • 3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
    • 2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
    • 1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
    • 12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
    ब्रह्मा की काल गणना
    • 1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
    (दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
    • 30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
    • 12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
    • 50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
    • 2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
    ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
    चारों युग
    4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष)
    सत युग

    3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग

    2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग

    1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग

    [१]
    यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
    • एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
    • श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार “सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः”, अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
    • एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
    • प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
    • एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
    • ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
    (14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
    = 994 महायुग + (60 चरण)
    = 994 महायुग + (6 x 10) चरण
    = 994 महायुग + 6 महायुग
    = 1,000 महायुग

    मन्वंतर / Manvantar
    • सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों
    1. सत युग,
    2. त्रेता युग,
    3. द्वापर युग,और
    4. कलि युग का एक ‘महायुग’ माना जाता है ।
    • 71 महायुग मिलकर एक ‘मन्वंतर’ बनाता है।
    • महायुग की अवधि 43 लाख 20 हजार वर्ष मानी गई है।
    • 14 मन्वंतरों का एक ‘कल्प’ होता है।
    • प्रत्येक मन्वंतर में सृष्टि का एक मनु होता है और उसी के नाम पर उस मन्वंतर का नाम पड़ता है।
    • मानवीय गणना के अनुसार एक मन्वंतर में तीस करोड़ ,अड़सठ लाख , बीस हजार वर्ष होते हैं ।
    • पुराणों में चौदह मन्वंतर इस प्रकार हैं-
    1. स्वायंभुव ,
    2. स्वारोचिष,
    3. उत्तम ,
    4. तामस,
    5. रैवत,
    6. चाक्षुष,
    7. वैवस्वत,
    8. अर्क सावर्णि,
    9. दक्ष सावर्णि,
    10. ब्रह्म सावर्णि,
    11. धर्म सावर्णि,
    12. रूद्र सावर्णि,
    13. रौच्य,
    14. भौत्य।
    • इनमें से चाक्षुस तक के मन्वंतर बीत चुके हैं ।
    • वैवस्वत इस समय चल रहा है । संकल्प आदि में इसी का नामोच्चार होता है ।

    Regards,

    oraappsnew@rediffmail.com

    • Oracle Apps said,

      February 17, 2010 at 12:41 pm

      ब्रह्मा की आयु
      विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
      हिन्दू धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा होते हैं। इनकी आयु इन्हीं के सौ वर्षों के बराबर होती है। इनकी आयु १००० महायुगों के बराबर होती है। विष्णु पुराण के अनुसार काल-गणना विभाग, विष्णु पुराण भाग १, तॄतीय अध्याय के अनुसार:
      • 2 अयन (छः मास अवधि, ऊपर देखें) = 360 मानव वर्ष = एक दिव्य वर्ष
      • 4,000 + 400 + 400 = 4,800 दिव्य वर्ष = 1 कॄत युग
      • 3,000 + 300 + 300 = 3,600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेता युग
      • 2,000 + 200 + 200 = 2,400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर युग
      • 1,000 + 100 + 100 = 1,200 दिव्य वर्ष = 1 कलि युग
      • 12,000 दिव्य वर्ष = 4 युग = 1 महायुग (दिव्य युग भी कहते हैं)
      ब्रह्मा की काल गणना
      • 1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) (चार खरब बत्तीस अरब मानव वर्ष; और यहू सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है).
      (दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)
      • 30 ब्रह्मा के दिन = 1 ब्रह्मा का मास (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
      • 12 ब्रह्मा के मास = 1 ब्रह्मा के वर्ष (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
      • 50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध
      • 2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष= 1 महाकल्प (ब्रह्मा का जीवन काल)(31 शंख 10 खरब 40अरब मानव वर्ष)
      ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
      चारों युग
      4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष)
      सत युग

      3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष) त्रेता युग

      2 चरण (864,000 सौर वर्ष) द्वापर युग

      1 चरण (432,000 सौर वर्ष) कलि युग

      [१]
      यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं
      • एक उपरोक्त युगों का चक्र = एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष)
      • श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार “सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदुः”, अर्थात ब्रह्मा का एक दिवस = 1000 महायुग. इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस = 4 अरब 32 खरब सौर वर्ष. इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है.
      • एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं.
      • प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (1,728,000 = 4 चरण) (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है.)
      • एक कल्प में 1,728,000 सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं
      • ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
      (14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
      = 994 महायुग + (60 चरण)
      = 994 महायुग + (6 x 10) चरण
      = 994 महायुग + 6 महायुग
      = 1,000 महायुग

      मन्वंतर / Manvantar
      • सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों
      1. सत युग,
      2. त्रेता युग,
      3. द्वापर युग,और
      4. कलि युग का एक ‘महायुग’ माना जाता है ।
      • 71 महायुग मिलकर एक ‘मन्वंतर’ बनाता है।
      • महायुग की अवधि 43 लाख 20 हजार वर्ष मानी गई है।
      • 14 मन्वंतरों का एक ‘कल्प’ होता है।
      • प्रत्येक मन्वंतर में सृष्टि का एक मनु होता है और उसी के नाम पर उस मन्वंतर का नाम पड़ता है।
      • मानवीय गणना के अनुसार एक मन्वंतर में तीस करोड़ ,अड़सठ लाख , बीस हजार वर्ष होते हैं ।
      • पुराणों में चौदह मन्वंतर इस प्रकार हैं-
      1. स्वायंभुव ,
      2. स्वारोचिष,
      3. उत्तम ,
      4. तामस,
      5. रैवत,
      6. चाक्षुष,
      7. वैवस्वत,
      8. अर्क सावर्णि,
      9. दक्ष सावर्णि,
      10. ब्रह्म सावर्णि,
      11. धर्म सावर्णि,
      12. रूद्र सावर्णि,
      13. रौच्य,
      14. भौत्य।
      • इनमें से चाक्षुस तक के मन्वंतर बीत चुके हैं ।
      • वैवस्वत इस समय चल रहा है । संकल्प आदि में इसी का नामोच्चार होता है ।

  127. noname said,

    February 26, 2010 at 6:21 pm

    For all Hindus,
    Stop your false propaganda and arrogance, if you religion is so great why you don’t follow your religion,
    I an 100% sure that within 20 to 30 years Hindu religion will be extinct

  128. Pradeep Dey said,

    April 23, 2010 at 8:23 am

    पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने ‎अपने अनुयायियों में सेहतमंद विभेद को बढ़ावा दिया किन्तु मतभिन्नता के ‎आधार पर कट्टरपन और गुटबंदी को आपने पसंद नहीं किया। सेहतमंद ‎मतभिन्नता समाज की प्रगति में सदैव सहायक होती है और गुटबंदी सदैव क्षति पहुंचाती है।

  129. Pradeep Dey said,

    April 23, 2010 at 9:54 am

    अल्लाह /ईश्वर – जिन्होंने इस कायनात के तमाम चीजों की सृजन की, वे इन्सान की सोच और समझ से परे है , तो आप सभी विद्धान जन क्या साबित करना चाहते है ? मुझे लगता है आप सभी विद्धान जन सृजन के नियमों को जान चुके हैं, तो बताइए अल्लाह /ईश्वर कौन हैं ? मेरा यह सवाल सुरेश जी, काशिफ़ आरिफ़ जी, मोहम्मद उमर जी आदि सभी विद्धान जन से है .

  130. rajan said,

    July 26, 2010 at 12:09 pm

    mr. Kashif Arif mene aapke tark padhe kafi achhe the lekin me ek baat aapse puchta hu ki aap ya aapka dharm vyaktigat swatantrata (aajadi) ke bare me kya sochte he

  131. aafee said,

    August 10, 2010 at 11:07 am

    Dear Kashif tum nay sab logo ko muh thod jawab deya hi aghar in logo ko thode se bhe sharm bake hi to tum say baheas nahi karaghay

    • aHindu said,

      April 18, 2011 at 1:45 pm

      जिसने भी ये लेख लिखा था सरकार, वो गोल मोल बात कर करके, बिना पुख्ता आधार के बस विचार झाड़ता चला गया., मुझे तो ये लख बिलकुल पसंद नहीं आया हलाकि में अपने हिन्दू होने पर गर्व करता हूँ., भले ही में अपने धर्म में नहीं मानता ना ही किसी और धर्म में, और डॉक्टर जाकिर नायक भी मुझे आस्थावान नहीं बना पाएंगे.
      लेकिन मैं एक बात कहना चाहूँगा कि मेरे पूर्वज जिस धर्म पद्धती को जानते-मानते अपने जीवन में समाहित करते आये हैं मैं उन्हें बेवकूफ भी नहीं कहलाने दूंगा. आपकी कुरआन वाकई अच्छी रचना है उसमें गलतियाँ निकालना मुश्किल है., और शायद गलतियाँ हों भी नहीं., क्योंकि उसे लिखा ही बिना किसी आडम्बर के गया है.., लेकिन हिन्दू धर्म ग्रन्थ भी महँ हैं क्योंकि जिस ज़माने में वे लिखे गए थे तब अपने विचारों को लिख लेना ही बहोत था. और वो भी इनती सम्रद्धता से काव्यगत(शायरीनुमा). वे बहोत ही अच्छी रचना हैं मैं उनका सम्मान करता हूँ फिर भले ही उमने कुछ गलतियाँ हों., लेकिन आज के पढ़े लिखे लेखकों के दिमाग के सर्किट उड़ जायेंगे तब भी वो उस स्टार की उत्कृष्ट रचना नहीं लिख सकते.,

      मैं तो मानता हूँ कि अगर इश्वर, अल्लाह, गोड होंगे तो हमारी आपकी सोच पर हसते होंगे., क्योंकि हमने उनके बारे किसी किताब में कुछ, तो किसी में कुछ लिखा है., क्या ऊपर वाला जो पूरे जहाँ को बनाकर बैठा है, उसने सबसे बुद्धीजीवी इंसान को चुनकर उन्हें अपनी गाथा लिखने बैठाया तो ये बताना नहीं भूला कि उसकी इबादत कैसे की जाये, लेकिन इसके बारे में बताना भूल गया कि उसने हमें क्यों बनाया है., अगर उसे टाइम पास ही करना था तो हमें लड़वाकर क्यों करना चाहता है., और मेरी ये समझ से परे है कि वो हमसे ही स्तुति या इबादत क्यों करवाना चाहता है जानवरों और कीड़े मकोड़ों से क्यों नहीं, वो भी एक ख़ास तरकीब से ही क्यों
      जब उसका ना आकार है ना शक्लों सूरत है जैसे की वो शुन्य है तो उसका कोई नाम भी क्यों हैं (अगर वो अल्लाह है तो उसे इश्वर कहलाने से क्यों परहेज़ है)., वो ऐसा क्यों समझता है कि अपनी बनाई इतनी कोम्प्लेक्स श्रस्टी के वैज्ञानिक पक्ष को कुरआन की छोटी-छोटी आयतों में गोल मोल सा लिखकर हमें उसका विज्ञान समझा सकता है., अगर उसे ऐसा लगता था तो फिर हम कुरान से वो सब क्यों नहीं समझ पाए, उसे समझने के लिए हमें पश्चिमी लोगों के बोद्धिक कोशल पर क्यों निर्भर रहना पड़ता है, इसका तो मतलब कि उनकी समझाइश तो ज़ाया गई.,
      ऐसे ही सुशास्त्र नाम का वेद जिसमें कभी सर्जिकल ओपरेशन के तरीके बताये गए हैं., उसे लिखने वाला इतना ही ग्यानी था तो अब भी डॉक्टरों को खोजें करने की ज़रुरत क्यों पद रही हैं., कई बीमारियाँ के इलाज उसमें क्यों नहीं हैं. उसमें ऐसा कोई इलाज क्यों नहीं लिखा कि जिसे खाकर हमें कभी कोई बीमारी ना हो., अब हिंदूवादी कहेंगे कि चवनप्राश खाओ, लेकिन आदमी तो उसके बाद भी बीमार हो जाता है.

      इश्वर अल्लाह गोड हो ना हो, अगर होगा तो वैसा तो कदापि नहीं होगा जैसे हमारी आपकी किताबों में लिखा है, हाँ ये हो सकता है कि उसका आकार ना हो, लेकिन वो हमें स्तुति या सजदे के पाठ नहीं पढ़ायेगा.., क्योंकि गौर से सोचा जाये तो ये बेवकूफी सी लगती है,. और इससे किसी का भला भी नहीं हुआ है सिवाए आत्मीय सुख के किसकी को कुछ हासिल नहीं हुआ है.

  132. March 29, 2011 at 9:30 am

    चलो कम से कम दोनों पक्ष इस बात से तो सहमत हैं कि भगवान या सृष्टि का निर्माता एक ही है।
    मैंने दोनों लेख पढ़े हैं। टिप्पणियों से लगता है कि पुरातन धर्म पर चर्चा नहीं हो रही। चर्चा हो रही है अपने-अपने सिद्धांतों को सही साबित करने पर। अगर मुस्लिम यह मान लें कि सनातन धर्म पुराना है तो उनका क्या जाएगा। और अगर हिन्दू भाई मान लें कि मुस्लिम धर्म ने वैदिक परम्राओं का अनुसरण नहीं किया तो उनका क्या चला जाएगा।
    मुस्लिम बोल रहे हैं कि उनके सिद्धांत प्राचीन हैं, हिन्दुओं का अपना मानना है। दोनों पक्षों का एक बात समझ लेनी चाहिए कि सिद्धांत विभिन्न परिस्थितियों/हालातों के मद्देनज़र बने हैं। हम देखते हैं कि मुस्लिम धर्म के लगभग सभी सिद्धांत पानी बचाने पर आधारित हैं। जिन परिस्थितियों में इस्लाम धर्म पनपा, उन हालातों की वजह से सिद्धांत बने। अरब देशों में पानी की कमी के चलते अधिकतर सिद्धांत इसी समस्या को ध्यान में रखकर बनाए गए। देखिए-
    मुस्लिम लोग सिर पर टोपी ओढ़ते हैं ताकि सिर पर धूल-मिट्टी न पड़े। अधिक से अधिक दिन बिना सिर धोए निकाले जा सकें। पानी बचा रहे।
    मूंछें नहीं रखें, ताकि खाते वक्त मूंछों में आहार लगे नहीं और मुंह धोने के लिए पानी की बर्बादी न करनी पड़े।
    लंबा कुर्ता पहनें। ताकि उठते-बैठते समय जो धूल-मिट्टी सलवार/पायजामे पर लगे, वह खड़े होने पर दिखे नहीं। ऐसे में पायजामा कई दिनों तक न धोना पड़े।
    पायजामा/सलवार को एडी से कुछ ऊंचा रखें ताकि उन्हें मिट्टी न लगे। अब भी मैं मुस्लिम लोगों को ऐसा करते देखता हूं। कभी आप भी गौर कीजिएगा।
    चूंकि पानी की कमी के चलते अनाज उत्पादन कम होता था, इसलिए मांस का अधिक सेवन जरूरत बन गया। हलाल करना भी इसी क्रिया का हिस्सा है। साइंस मानती है कि अगर किसी जानवर को हलाल करके मारा जाए तो उसके मांस को ज्यादा धोना नहीं पड़ता।
    मुर्दे को दफानाना भी कुछ इसी प्रक्रिया का नतीजा है। क्योंकि सूखे इलाकों में पानी नहीं है तो पेड़ भी नहीं हैं। जलाने के लिए लकड़ी का प्रबंध नहीं है। इसलिए दफना दो, ताकि जो पेड़ हैं वे सुरक्षित रहें, काटे न जाएं।
    और भी इस धर्म के अधिकतर सिद्धांत वहां की उस समय के हालातों को देखते हुए बनाए गए।

  133. aHindu said,

    April 18, 2011 at 4:53 pm

    हो सकता है हम जो आज अपने आपको हिन्दू बताते हैं आदिवासी रहे हों, मंदिर कभी देखे ही ना हों फिर आर्यों का आगमन हुआ हो.,
    आर्य पूरी आबादी तो अपने साथ नहीं लाये होंगे, यहाँ हमारे साथ रहे हों, उनसे हम आदिवासी लोग इतने प्रभावित हो चले हों कि उनकी तरह सम्रद्ध होना चाहते हों और देखते ही देखते हम उनमें शामिल हो गए हों., हो सकता है उन्होंने ही हमें अपना ज्ञान पढाया हो., और आज हम वैदिक ज्ञान को अपना बताकर दंभ भारी बाते कर रहे हैं.
    आपको पता है भारतीय मूल निवासी कौन है वो जिन्हें शूद्रों की संज्ञा दी जाती है., शिल्पकार भी आर्यों के साथ आये थे,. सो मिडिल कास्ट भी आर्य ही हैं लेकिन एस.सी/ एस.टी. ही असल भारतीय हैं.., हालाँकि ये अलग बात है कि जिसे आज हम भारत कहते हैं उसे भारत उन्हीं ने बनाया हो जो बाहर से आये थे.,

    सो शगूफा मत पालिए. अपनी औकात पता हो तो ठीक, वरना अपने मुह मियां मिट्ठू ना बनिए. ये बात में हिन्दू पर भी लागू होती है और मुसलमान पर भी क्योंकि उन्हें भी इल्म देने वाले बाहर से आये थे., कितने होंगे जो सीधे इल्म देने वालों की संतान हैं, अब सोचिये आप कितने हैं सो ये बात जान लीजिये कि भारतीय उपमहाद्वीप में वो वो कदापि नहीं थे जो वो अपने को मान बैठे हैं. हमें हिन्दू धर्म सिखाने वाला भी महन कहा जा सकता है और आपको मुस्लिम धर्म सिखाने वाला भी., सो हम बहस क्यों कर रहे हैं., क्या झगड़े का मसला ये है कि किसका इल्मदाता सही था और किसका गलत, अरे इससे क्या फर्क पड़ता है,. दोनों ने ही तो हमारे जीवन स्तर को उंचा उठाया है., हमें ज्ञान विज्ञान को बढ़ावा देने में योगदान दे सकने लायक बनाया है, दरअसल ये उपलब्धियां हमारे धार्मिक इल्मदाताओं की उपलब्धी और कुशलता से कहीं उंची है., सो हमें आज पर गर्व करना चाहिऐ कि गुजरे हुए कल पर., अरे भाड़ में गए धर्म मज़हब के किस्से., उन्हें मानों ना मानों आज किसको क्या फर्क पड़ता है.,


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