अमेरिका में शाहरुख खान को रोकने के दो और मजबूत कारण… Shahrukh Khan Detention At US-Airport

गत दिनों शाहरुख को अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के लिये रोके जाने पर खासा बावेला खड़ा किया गया था। शाहरुख खान का हास्यास्पद बयान था कि उसे मुस्लिम होने की वजह से परेशान किया गया, और भारत में सेकुलरों और हमारे भाण्ड-गवैये टाइप इलेक्ट्रानिक मीडिया को एक मुद्दा मिल गया था दो दिन तक चबाने के लिये। हालांकि इस मुद्दे पर अमेरिका के सुरक्षा अधिकारियों की तरफ़ से भी स्पष्टीकरण आ चुका है, लेकिन इस मामले में शाहरुख को वहाँ रोके रखने के दो और सम्भावित कारण सामने आये हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत से फ़िल्मी कलाकार अक्सर अमेरिका स्टेज शो करके डालर में मोटी रकम कमाने आते-जाते रहते हैं। डालर की चकाचौंध के कारण विदेशों में इस प्रकार के कई संगठन खड़े हो गये हैं जो भारतीय फ़िल्म कलाकारों को बुलाते रहते हैं, यदि भारतीय कलाकार वहाँ सिर्फ़ “भारत के नागरिक” बनकर जायें तो उन्हें उतना पैसा नहीं मिलेगा, चूंकि हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रियता पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में भी काफ़ी है, इसलिये अमेरिका, कनाडा आदि देशों में ऐसे सभी आप्रवासियों को एकत्रित करके इस प्रकार के स्टेज शो को “साउथ एशिया” के किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। इस चालाकी में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय कलाकारों और हिन्दी फ़िल्मों की ताकत का प्रदर्शन है। शाहरुख खान का 15 अगस्त का दौरा ऐसे ही एक कार्यक्रम हेतु था (वे वहाँ भारत के किसी स्वाधीनता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने नहीं गये थे, बल्कि पैसा कमाने गये थे)। 15 अगस्त को शिकागो और ह्यूस्टन में अमेरिका स्थित भारतीयों और पाकिस्तानियों के एक ग्रुप ने “साउथ एशिया कार्निवाल” का आयोजन रखा था, उसमें शाहरुख बतौर “मेहमान”(?) बुलाये गये थे। इस कार्निवाल का टिकट 25 डालर प्रति व्यक्ति था, मेले में बॉलीवुड के कई कलाकारों के नृत्य-गीत का कार्यक्रम, एक फ़ैशन शो और एक वैवाहिक आईटमों की प्रदर्शनी शामिल था (तात्पर्य यह कि “स्वतन्त्रता दिवस” जैसा कोई कार्यक्रम नहीं था, जिसका दावा शाहरुख अपनी देशभक्ति दर्शाने के लिये कर रहे थे)। इस कार्निवाल के विज्ञापन में सैफ़ अली खान, करीना, कैटरीना, दीया मिर्ज़ा और बिपाशा बसु का भी नाम दिया जा रहा था, इस कार्निवाल को भारत की एयर इंडिया तथा सहारा एवं पाकिस्तान की दो बड़ी कम्पनियाँ प्रायोजित कर रही थीं, पूरे विज्ञापन में कहीं भी भारत या पाकिस्तान (14 अगस्त) के स्वतन्त्रता दिवस का कोई उल्लेख नहीं था।

तो समस्या कहाँ से शुरु हुई होगी? अमेरिका जाते समय तो ये कलाकार भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि और भारत के नागरिक के तौर पर जाते हैं लेकिन अमेरिका में प्रवेश करते समय कस्टम की पहचान सम्बन्धी पूछताछ के दौरान कभी-कभी ये अपने आपको “दक्षिण एशियाई” बता देते हैं। एक सम्भावना यह है कि शाहरुख ने पहले तो जाँच के नाम पर अपनी परम्परागत भारतीय “फ़ूं-फ़ाँ” दिखाई होगी, जिससे अमेरिकी पुलिसवाला और भी शक खा गया होगा अथवा भड़क गया होगा, ऊपर से तुर्रा यह था कि शाहरुख का सामान भी उनके साथ नहीं पहुँचा था (बाद में अगली फ़्लाइट से आने वाला था), ऐसे मामलों में अमेरिकी अधिकारी और अधिक सख्त तथा शंकालु हो जाते हैं। शाहरुख और उस पुलिस वाले के बीच हुई एक काल्पनिक बातचीत का आनन्द लें (क्या बात हुई होगी, इसकी एक सम्भावना) –

अमेरिकी कस्टम अधिकारी – तो मि शाहरुख आप अमेरिका क्यों आये हैं?

शाहरुख – मुझे यहाँ “साउथ एशिया कार्निवाल” में एक भाषण देने के लिये बुलाया गया है।

अधिकारी – अच्छा, वह कैसा और क्या कार्यक्रम है?

शाहरुख – (हे ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए… बकरे की तरह मिमियाने का शाहरुखी स्टाइल) दक्षिण एशिया के लोग आपस में मेलजोल बढ़ाने के लिये एकत्रित होते हैं और स्वतन्त्रता दिवस मनाते हैं…

अधिकारी – दक्षिण एशिया, क्या वह भी कोई देश है?

शाहरुख – नहीं, नहीं, दक्षिण एशिया मतलब भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान के लोग…

सुरक्षा अधिकारी पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनकर ही सतर्क हो जाता है… “वेट ए मिनट मैन्…” अधिकारी अन्दर जाकर वरिष्ठ अधिकारी के कान में फ़ुसफ़ुसाता है… यह आदमी अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान और भाषण वगैरा बड़बड़ा रहा है, मुझे शक है… इसे और गहन जाँच के लिये रोकना होगा।

सही बात तो शाहरुख और वह जाँच करने वाला अमेरिकी अधिकारी ही बता सकता है, लेकिन जैसा कि अमेरिका की सुरक्षा जाँच सम्बन्धी मानक बन गये हैं, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनते ही अमेरिकी अधिकारियों के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसे में क्या जरूरत है अपनी अच्छी खासी भारतीय पहचान छिपाकर खामखा “दक्षिण एशियाई” की पहचान बताने की? आप भले ही कितने ही शरीफ़ हों, लेकिन यदि आप वेश्याओं के मोहल्ले में रहते हैं तो सामान्यतः शक के घेरे में आ ही जाते हैं। खुद ही सोचिये, कहाँ भारत, भारत की इमेज, भारतीयों की अमेरिका में इमेज आदि, और कहाँ पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान के साथ खुद को जोड़कर देखना? है कोई तालमेल? इन “असफ़ल और आतंकवादी देशों” के साथ खुद को खड़ा करने की क्या तुक है?

जबकि इसी काल्पनिक घटना का दूसरा रूप यह भी हो सकता था –

अधिकारी – मि शाहरुख आप अमेरिका किसलिये आये हैं?

शाहरुख – मैं यहाँ भारत के स्वतन्त्रता दिवस समारोह में एक भाषण देने आया हूं।

अधिकारी – भारत का स्वतन्त्रता दिवस?

शाहरुख – जी 15 अगस्त को भारत का 63 वां स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा है।

अधिकारी – वाह, बधाईयाँ, अमेरिका में आपका स्वागत है…

संदेश साफ़ है, हम पाकिस्तान और बांग्लादेश रूपी सूअरों के दो बाड़ों से घिरे हैं, उनकी “पहचान” के साथ भारत की गौरवशाली पहचान मिक्स करने की कोई जरूरत नहीं है, गर्व से कहो हम “भारतीय” हैं, दक्षिण एशियाई क्या होता है?
(समाचार यहाँ देखें…)

2) शाहरुख को रोकने की एक और वजह सामने आई है। बेवजह इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीय तूल दिया गया और हमारे मूर्ख मीडिया ने इसे मुस्लिम पुट देकर बेवकूफ़ाना अन्दाज़ में इसे पेश किया, जबकि इस मामले में रंग, जाति, धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। असल में जिस कार्निवाल की बात ऊपर बताई गई उसके आयोजकों का रिकॉर्ड अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सन्देह के घेरे में है, भले ही वे आतंकवादी गुटों से सम्बद्ध न हों लेकिन अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धित अवश्य हैं। इस नाच-गाने के शो का प्रमुख प्रमोटर था लन्दन निवासी फ़रहत हुसैन और शिकागो में रहने वाला उसका भाई अल्ताफ़ हुसैन, इन दोनों भाईयों की एक संस्था है लेक काउंटी साउथ एशियन एंटरटेनमेंट इन्क। इन दोनों भाईयों पर टैक्स चोरी और अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धों के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को शक है। जैसा कि शाहरुख खान ने बाद में प्रेस से कहा कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के कुछ सवाल “अपमानजनक”, “गैर-जिम्मेदाराना”, “बेतुके” थे, असल में यह सवाल इन्हीं दोनों भाईयों के सम्बन्ध में थे। कुछ समय पहले भी ऐसी ही एक कम्पनी “एलीट एंटरटेनमेंट” के प्रमोटर विजय तनेजा नामक शख्स को अमेरिका में धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का दोषी पाया गया और उसे बन्द करवा दिया था।

अब इस पर ध्यान दीजिये… एक वरिष्ठ सीनेटर केनेडी अमेरिका में जाना-पहचाना नाम है, उन्हें भी कई बार सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ा, क्योंकि उनके नाम का उपयोग करके एक आतंकवादी ने अमेरिका में घुसने की कोशिश की थी, बाद में बार-बार होने वाली परेशानी से तंग आकर केनेडी ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई और उनका नाम “शंकास्पद नामों” की लिस्ट से हटाया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति अल-गोर एक बार बगैर सामान चेक करवाये ग्रीन दरवाजे से जाने लगे तब उन्हें भी रोककर खासी तलाशी ली गई थी। जिस दिन शाहरुख की जाँच की गई थी, उसी दिन एक दूसरे शहर में अमेरिका के प्रसिद्ध रॉक स्टार बॉब डिलन को दो पुलिसवालों ने जाँच के लिये रोका, (और पुलिस वाले यदि पहचान भी गये हों तब भी), जब वे अपनी पहचान प्रस्तुत नहीं कर पाये तब उन्हें पकड़कर उनके मेज़बान के घर ले जाया गया और तसदीक करके ही छोड़ा। उससे कुछ ही दिन पहले ओलम्पिक के मशहूर तैराक विश्व चैम्पियन माइकल फ़ेल्प्स, बीयर पीकर कार चलाते पकड़े गये, हालांकि फ़ेल्प्स द्वारा पी गई बीयर कानूनी सीमा के भीतर ही थी, लेकिन फ़िर भी पुलिसवाले उन्हें थाने ले गये, उन्हें एक लिखित चेतावनी दी गई फ़िर छोड़ा गया। (देखें चित्र)

दिक्कत यह हुई कि शाहरुख खान को उम्मीद ही नहीं थी कि एक “सुपर स्टार” होने के नाते उनसे ऐसी कड़ी पूछताछ हो सकती है, सो उन्होंने निश्चित ही वहाँ कुछ “अकड़-फ़ूं” दिखाई होगी, जिससे मामला और उलझ गया। जबकि अमेरिका में सुरक्षा अधिकारी न तो कैनेडी को छोड़ते हैं न ही अल गोर को, कहने का मतलब ये कि शाहरुख का नाम यदि “सेड्रिक डिसूजा” भी होता तो तब भी वे उसे बिना जाँच और पूछताछ के न छोड़ते। अमेरिका, अमेरिका है, न कि भारत जैसी कोई “धर्मशाला”। हमारे यहाँ तो कोई भी, कभी भी, कहीं से भी आ-जा सकता है और यहाँ के सरकारी कर्मचारी, कार्पोरेट्स, अमीरज़ादे और नेता, भ्रष्टाचार और चापलूसी की जीवंत मूर्तियाँ हैं, किसी को भी “कानून का राज” का मतलब ही नहीं पता।

तात्पर्य यह कि न तो शाहरुख के साथ कथित ज्यादती(?) “खान” नाम होने की वजह से हुई, न ही उस दिन शाहरुख का भारत के स्वतन्त्रता दिवस से कोई लेना-देना था, और इमरान हाशमी की तरह “रोतलापन” दिखाकर उन्होंने अमेरिका में अपनी हँसी ही उड़वाई है, जबकि भारत में “अभी भी” शाहरुख को सही मानने वालों की कमी नहीं होगी, इसका मुझे पूरा विश्वास है।

स्रोत – टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क यूएस तथा India Syndicate

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32 Comments

  1. August 31, 2009 at 7:55 am

    जिस संस्था के लिए जा रहे हो उसकी पृष्टभूमि तो जाँच लेनी चाहिए. अच्छा लेख है…

  2. khursheed said,

    August 31, 2009 at 8:04 am

    कमाल है! कानून को जूते की नोक पर रखने वाले कानून की बात कर रहे हैं.

  3. August 31, 2009 at 8:15 am

    लेख में व्यक्त संभावनाओं से सहमत हुआ जा सकता है |लेकिन शाहरुख़ जैसे भारतीय ( दक्षिण एशियाई ?) की लोकप्रियता इस नाटकीय घटना से बढ़ाने की कोशिश की गयी है |

  4. flare said,

    August 31, 2009 at 8:18 am

    शाहरुख हो या आमिर ……… सब के सब चोर है ……… इसी देश का खाते है और बजाते अपने साउदी/इस्लामी आकाऔ की ……. ये १४०० साल के मानसिक शोषण का नतीजा है ………….. अगर दुबई/पाकिस्तान का फ़ोन और डबडबा ना हो तो बॉलीवुड में कोई इनको पूछे भी ………….. अत ही क्या है इनको …….. सिवाय जब्जस्ती की मार्केटिंग के ………. इनकी कोई भी फिल्म हो ४ हफ्ते से पहले सिनेमा हॉल वाले उतर नहीं सकते ……… और कितनी भी आची फिल्म (जिसमें दोसरा हीरो हो) २-३ हफ्ते से ज्यादा लगे नहीं रहने देते …….. यही इनकी कमी का राज है ……….. ये कलाकार नहीं ……… फ़िल्मी माफिया है ….

  5. August 31, 2009 at 8:23 am

    अगर खुर्शीद भाई का मतलब शरीयत के कानून से है तो हमारे लिए उसकी सही जगह वही है अर्थात ( जूते की नोक पर ) |अगर भारत के कानून से है तो फिर सर आँखों पर |बाकि लेख में जालीदार टोपी वाली मानसिकता पर अच्छा प्रहार है |वैसे यहाँ पर भी उन लोगों ( अरे वही अल्ल , बल्ल , सल्ल वाली स्वच्छ ? बिरादरी ) आने की सम्भावना है क्या ?

  6. August 31, 2009 at 8:33 am

    बढ़िया विश्लेषण |

  7. August 31, 2009 at 8:37 am

    दो टके के कुछ उन गिने-चुने पत्रकारों और मीडिया कर्मियों ने इसे ज्यादा हवा दी जिन्हें नियमित रूप से शाहरुख एंड कम्पनी से रकम मिलती है ! जैसा कि मैंने उस वक्त भी कहा था, अमेरिका वह देश है जो अपने नागरिको की सुरक्षा को सबसे पहली प्राथमिकता देता है ! वैसे भी शाहरुख जैसे बीसियों घूमते है वहा !

  8. August 31, 2009 at 9:06 am

    कल्पनाशीलता के द्वारा ओछी मानसिकता का सटीक विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए कोटिशः बधाई के पात्र हैं आप..ये अल्लू, सल्लू,अज्जू, वजू…इत्यादि जब भी गड़बड़ाते हैं तो अल्पसंख्यक होने की हुआं-हुआं शुरू कर देते हैं। याद है ना, मियां अजहरुद्दीन साहब जब मैच फिक्सिंग में फंसे थे तो यही हुआं-हुआं शुरु कर दिया था….

  9. August 31, 2009 at 10:07 am

    अभी कुछ शुद्ध निरपेक्षिये और कुछ विशुद्ध पत्रकार और कुछ चिरशुद्ध बुद्धिजीवी आ रहे होंगे बाल की खाल निकालने और उलाहना देने.

  10. wahreindia said,

    August 31, 2009 at 10:28 am

    ये शाहरुख ख़ान अपने आपको किंग कियू समजता है पता नही. ये कोई शिवाजी है या फिर महाराणा प्रताप ये इंडिया का कलाकार है जो उसे इंडिया के पब्लिक ने बनाया है. अमेरिका पब्लिक ने नही मूज़े नही लगता के अमरीका मे इंडियन पब्लिक के सिवा उसे कोई ठीक से कोई जानता होगा. अगर कोई अमरीका का सूपर स्टार इंडिया मे आए तो हमरे पोलीस क्या उन इंपोर्टेड कलाकारोको पहचान पाएगी. ये ख़ान ने अभी अपना घमेंड कम करना चाहिए.तो अमेरिका के लिए पता लगाना बहुत बड़ी बात नही है.बदकिस्मती से मुस्लिम ही आतंकवादी है तो इस मे अमेरिका भारत या किसी भी देश का क्या कसूर.जब किसी भी देश को किसी से ख़तरा महसूस होता है तो वो उसको चेक कर सकता है. ठीक है आप नेक दिल इंसान है. पर हर कोई तो है नही ना. आपको इतना तो पता है ना गेहू के साथ घुन भी पीसती है. अगर आप जैसे नेक दिल इंसान कोशिश कर सकते है उन मुस्लिमो को सही राह पे लाने की और देश की प्रगती मे अपना योगदान देने की,जो अच्छी बात है.वरना आतंकवाद का अंत कैसा होता वो किसी से नही च्छूपा.http://wahreindia.blogs.linkbucks.com

  11. khursheed said,

    August 31, 2009 at 10:39 am

    सुरेश जी, ज़रा बताएं क्या डा. कलाम ने भी शाहरुख़ खान की तरह नाटक किया था?

  12. August 31, 2009 at 10:46 am

    बहुत बढिया Analysis है जीप्रणाम स्वीकार करें

  13. khursheed said,

    August 31, 2009 at 10:46 am

    अमेरिका ने कम से कम शाहरुख़ को तलाशी के लायक तो समझा वरना भारत में कुछ नेता ऐसे हैं जिनको अमेरिका तलाशी लेने के लायक भी नहीं समझता अर्थात छूना भी नहीं चाहता.

  14. August 31, 2009 at 11:48 am

    पूरी तरह से तर्कपूर्ण लिखा है, सुरेश जी आपने. सावधानी हटेगी तो दुर्घटना घटेगी ही.

  15. hindugang said,

    August 31, 2009 at 1:02 pm

    suresh ji macca ke bare me pura yaha dekhe http://volker-doormann.org/kaaba23.htm

  16. August 31, 2009 at 1:24 pm

    दिलचस्प आलेख!दीपक भारतदीप

  17. August 31, 2009 at 2:26 pm

    waahumdaa aalekh !

  18. August 31, 2009 at 2:52 pm

    इस लेख से (लगभग सभी लेखों से) एक बात यह साफ़ हो जाती है कि वे लोग जो खुद तो राष्ट्रवादी कहते है…. किसी भी मुसलमान को एक ही नज़रिए से देखते है… आतंकवादी के नज़रिए से जैसा कि सुरेश ने इसमें झलका भी दिया (पकिस्तान और अफगानिस्तान का नाम लेकर)और एक बात इस लेख से (लगभग सभी लेखों से) एक बात यह साफ़ हो जाती है कि वे जो खुद तो राष्ट्रवादी समझते है मुसलामानों से कितनी नफरत करते हैं (पढें मेरा लेख 'साम्प्रदायिकता का निवारण')हाँ, खुर्शीद ने सही कहा- कम से कम शाहरुख़ खान वहां तक तो पहुंचे जहाँ तलाशी ली गयी…वरना कई ऐसे कथीर व्वयभु राष्ट्रवादी (नरेन्द्र मोदी और उसके जैसे) को तो अमेरिका वीसा तक नहीं देता.शाहरुख़ खान जिस इंडस्ट्री में हैं उसमें यह दावा किया ही नहीं जा सकता कि वह इस्लाम के नियमों पर तनिक भी चलते होंगे….

  19. August 31, 2009 at 4:21 pm

    एक तो इस 'स्वच्छ' भाई से मुझे शिकायत है. मैं मानता हूँ को आप मुस्लिम हैं और आपको मुस्लिम दृष्टिकोण रखने की पूरी स्वतंत्रता है,लेकिन दूसरे की बातों को न समझते हुए(जानबूझ कर) कुतर्क करना बड़ा अजीब लगता है.और गुस्सा दिलाता है. अफगानिस्तान और पाकिस्तान आतंकवादी देश हैं ये सभी जानते हैं और इससे पीड़ित हैं,इसमें कोई दो राय नहीं है.अब ये पाकिस्तान और अफगानिस्तान को क्या कहलवाना चाहतें हैं(आतंकवादी देश के अलावा) ये जाने.शाहरूख खान ने अपने को 'राष्ट्र निरपेक्ष' घोषित करने की कोशिश की और उसको ये कोशिश महँगी पड़ी.हमें कोई फर्क नहीं पड़ता यदि वो खुद को 'पाकिस्तानी' भी बताता तो. इस देश के कम पढ़े लिखे लोग या 'स्टारडम' से मुग्ध होने वाले तो उसकी(शाहरुख़ की)बात का विश्वास कर लें, लेकिन इस देश में सभी मूर्ख ही तो नहीं हैं?और कितना 'स्वाभिमान' विहीन आदमी है ये 'शाहरुख़' इतना सब होने के बाद भी कह रहा है की मैं अब दोबारा अमेरिका नहीं आना चाहता, लेकिन आपके प्यार(डॉलर)के लिए आता रहूँगा. अगर असली मुस्लमान होता तो अपने साथ होने वाले अपमान(शाहरुख़ खान और भांड मिडिया के अनुसार) के बाद दोबारा अमेरिका नहीं जाता, आजीवन!!

  20. Ghost Buster said,

    August 31, 2009 at 4:24 pm

    मस्त! सुरेश भाई, आपकी तो हर पिक्चर हिट है, मतलब कि पोस्ट.

  21. August 31, 2009 at 4:56 pm

    सुरेश भाई बढिया विश्लेषण किया है | खुर्शीद भाई लगता है आप पोस्ट ठीक से पढ़ नहीं पाए तभी आप कलम साहब की बात कर रहे हैं| कलाम साहब भारत के रास्त्रपति थे , शाहरुख़ खान प्रेजिडेंट नहीं ये बात भी आप नहीं समझ पाए ???खैर नहीं समझे तो और एक वाक्य सुनिए विश्वास करना ना करना आपकी मर्जी :मेरे साथ भी कंसास सिटी और अटलांटा – २००५ और न्यू यार्क – २००३ मैं लगभग ऐसा ही हो चुका है | मेरे नाम मैं कोई खान या मुस्लिम नाम नहीं है | ऐसे हजारों वाकये हैं, सुरेश जी ने बता ही दिया है की किस किस बड़े लोगों को भी रोका गया है | कुछ मुसलमान भाईयों की एक गलत आदत सी बन गई है … हर घटना को इस्लाम के अन्गेल से देखने का |

  22. August 31, 2009 at 5:29 pm

    सुरेश जी,काफ़ी अच्छा लेख है….बहुत सही बात कही है आपने..ये अक्सर देखा जाता है कि जब किसी मुस्लमान के हाथ में कुछ नही होता है तो वो अल्पसंख्यक होने और मुस्लमान होने का रोना रोता है…और ऐसे लोग ही मुस्लमानों को शर्मिंदा करते हैं…

  23. Common Hindu said,

    August 31, 2009 at 6:04 pm

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/– a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu- Hindu Online.

  24. richa said,

    September 1, 2009 at 2:25 am

    खुर्शीद जी आपका पाचन तंत्र ठीक काम नही कर रहा जिसकी वजह से आपको कोई ढंग की बात हजम नही होती . तुरंत हकीम चिढ कुटरे का जुलाबुल रोगन १०० एम एल एक गिलास नीम के रस मे मिलाकर हफ़ते भर दिन मे तीन बार सेवन करे.दिल दिमाग और पेट की सारी गंदगी बाहर निकल जायेगी तब ये लेख आपकी समझ मे आयेगा.फ़िर भी ना आये तो कोर्स को एक हफ़्ते बढाये . लेकिन फ़िर भी ना आये तो समझ ले लाइलाज सेकुलरिज्म कैंसर हो गया है . तब इस प्रकार के ढंग के लेख आपकी समझ मे कभी नही आ पायेगे बेकार मे मुगालते मे दिमाग को कष्ट ना दे . अब अल्लाह ताला भी हर किसी को तो सब कुछ नही दे देता .

  25. September 1, 2009 at 4:22 am

    Bollywood thrives on BLACK MONEY and all products related to this WOOD are subject to scrutiny . Nice write up , but i suggest u to tone down 'vyangya' and keep it straight and hard hitting.

  26. September 1, 2009 at 4:57 am

    सारे चोचले हिट होने के बाद शुरू होते हैं।उससे पहले तो कब आते थे कब जाते पता भी नही चलता था।दर्शको का प्यार और पैसा इन लोगो का दिमाग सातवे आसमान पर पहुंचा देता है जिसे अमेरिका ने ज़मीन पर ला दिया तो बुरा लग गया भाई को।

  27. September 1, 2009 at 8:44 am

    चेकिंग या पूछताछ एक कानूनी प्रक्रिया हैजिसका सभी को सम्मान करना चाहिए चाहे वह कलाम हों या शाहरुख़ अथवा यशवंत सिन्हा. पता नहीं मीडिया या वी आई पी क्यों हो -हल्ला मचाते हैं.

  28. September 1, 2009 at 11:28 am

    बिलकुल सही कहा आपने……

  29. psudo said,

    September 1, 2009 at 4:29 pm

    Ek nachniye ko uski hasiayt pata chal gayee..

  30. September 1, 2009 at 5:23 pm

    Vyang ke roop mein oomda lekh…. Dr. Aditya Kumar ji se poori tarah se sahmat hoon….

  31. September 2, 2009 at 12:16 pm

    कौन है यह शाहरुख खान? कोई अफगानी कबीले वाला अभिनेता है क्या?

  32. September 3, 2009 at 12:24 pm

    सुरेश जी, आपका ब्लॉग खुलने में काफी समय लेता है. यहां रवि रतलामी जी के नूतन आलेख "ब्लॉगिंग टिप्स…" से सहमत होते हुए बस इतना ही निवेदन करुंगा कि कुछ तृतीय पक्ष लिंकों को हटा दें तो, हम पाठकों को आपका ब्लॉग देखने के लिए ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी…आशा है, मेरी विनती पर विचार करेंगे….


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