>सच बोलने की सजा …

>
आज फिर मैंने सच बोलने की सजा पाई…

उस शाम,

बैठा था माँ की गोद में, सर रखकर

माँ सहला रही थी आँचल से मेरा माथा कि,

हौले से पूछ बैठी… बेटा ,

आगे का क्या है इरादा ?

मेरा तन – मन पुलक उठा,

एक अजीब से जोश से भर उठा,

और मै हौले से बोल उठा,

माँ …!

मेरा मन नहीं लगता प्रौद्योगिकी में,

गणित के सूत्रों और सिद्धांतों की भौतिकी में,

मेरा दिल तो लगा है राष्ट्रप्रीति में,

इसलिए हे माँ मुझे जाना है राजनीति में…

माँ तुनक उठी,

मुझ पर जोरों से बिफर उठी,

हल्के गुस्से में बोल उठी,

क्या इसीलिए पढाया तुझे विषम परिस्थिति में ?

या फिर गोबर भरा है तेरी मति में,

बाबू …

चाहे जिंदगी गुजार लो खेती में,

मगर दोबारा मत कहना कि,

मुझे जाना है राजनीति में …

इतना कहकर माँ ने मुझे हल्की सी चपत लगाईं,

मेरी आँखें न जाने क्यों डबडबा आई,

और इस तरह एक बार फिर,

मैंने सच बोलने की सजा पाई …!

शुक्रवार पत्रिका के २४ जुलाई अंक में प्रकाशित


सर्वाधिकार सुरक्षित @ जयकरन सिंह भदौरिया ‘जय’

www.shagird-e-rekhta.blogspot.com

www.sipahiofkalam.blogpot.com

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>’किस पथ से जाऊँ?’

>हरिवंश जी के “मधुशाला” की कुछ पंक्तियाँ …..

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’।।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।

यदि कांग्रेस खत्म हो जाये, तो हिन्दू-मुस्लिम दंगे नहीं होंगे…- सन्दर्भ मिरज़ के दंगे Miraj Riots & Communal Politics by Congress

प्रायः सभी लोगों ने देखा होगा कि भारत में होने वाले प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगे के लिये संघ-भाजपा को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जब भी कभी, कहीं भी दंगा हो, आप यह वक्तव्य अवश्य देखेंगे कि “यह साम्प्रदायिक ताकतों की एक चाल है… भाजपा-शिवसेना द्वारा रचा गया एक षडयन्त्र है… देश के शान्तिप्रिय नागरिक इस फ़ूट डालने वाली राजनीति को समझ चुके हैं और चुनाव में इसका जवाब देंगे…” आदि-आदि तमाम बकवास किस्म के वक्तव्य कांग्रेसी और सेकुलर लोग लगातार दिये जाते हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के मिरज़ कस्बे में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बारे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी ठीक यही रटा-रटाया बयान दिया है कि “महाराष्ट्र के चुनावों को देखते हुए राजनैतिक लाभ हेतु किये गये मिरज़ दंगे साम्प्रदायिक शक्तियों का एक षडयन्त्र है…”।

कुछ दिनों पूर्व मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें इन दंगों के लिये जिम्मेदार हालात (अफ़ज़ल-शिवाजी और स्थानीय मुस्लिमों की मानसिकता के बारे में) तथा उन घटनाओं के बारे में विस्तार से चित्रों और वीडियो सहित लिखा था, जिस कारण दंगे फ़ैले। यहाँ देखा जा सकता है http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/09/miraj-riots-ganesh-mandal-mumbai.html

आईये सबसे पहले देखते हैं कि अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री बने कैसे, और किन परिस्थितियों में? गत 26 नवम्बर को जब पाकिस्तान से आये कुछ आतंकवादियों ने मुम्बई में हमला किया था, और उसके नतीजे में “कर्तव्यनिष्ठ”, “जिम्मेदार” और “सक्रिय” सूट-बूट वाले विलासराव देशमुख अपने बेटे रितेश और रामगोपाल वर्मा को साथ लेकर ताज होटल में तफ़रीह करने गये थे, उसके बाद शर्म के मारे उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था और अचानक अशोक चव्हाण की लाटरी लग गई थी, तो क्या हम मुम्बई हमले को अशोक चव्हाण का षडयन्त्र मान लें जो कि उन्होंने अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिये रचा था? यदि मिरज़ दंगों के बारे में ऊपर दिये गये तर्क के अनुसार चलें, तो इस आतंकवादी घटना का सबसे अधिक राजनैतिक फ़ायदा तो अशोक चव्हाण को ही हुआ, इसलिये इसमें उनका हाथ होने का शक करना चाहिये। जब विधानसभा की दो-चार सीटें हथियाने के लिये भाजपा-शिवसेना यह दंगों का षडयन्त्र कर सकती हैं तो मुख्यमंत्री पद पाने के लिये अशोक चव्हाण आतंकवादियों का क्यों नहीं? लेकिन ऐसा नहीं है, यह हम जानते हैं। इसलिये ऐसे मूर्खतापूर्ण वक्तव्य अब बन्द किये जाने चाहिये।

एक गम्भीर सवाल उठता है कि क्या हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से भाजपा को सच में फ़ायदा होता है? जब मुम्बई में हुए भीषण पाकिस्तानी हमले के बावजूद (जो कि एक बहुत बड़ी घटना थी) तत्काल बाद हुए चुनावों में मुम्बई की लोकसभा सीटों पर भाजपा को जनता ने हरा दिया था, तब एक मिरज़ जैसे छोटे से कस्बे में हुए दंगे से सेना-भाजपा को कितनी विधानसभा सीटों पर फ़ायदा हो सकता है?

यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि इस प्रकार के हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से कभी भी हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होता, लेकिन मुस्लिम वोट जरूर एकमुश्त थोक में एक पार्टी विशेष को मिल जाते हैं। मुसलमानों को डराने के लिये कांग्रेस और सेकुलर पार्टियाँ हमेशा भाजपा-संघ का हौवा खड़ा करती रही हैं, राजनैतिक पार्टियाँ जानती हैं कि हिन्दू वोट कभी एकत्र नहीं होता, बिखरा हुआ होता है, जबकि मुस्लिम वोट लगभग एकमुश्त ही गिरता है (भले ही वह कांग्रेस के पाले में हो या सपा या किसी अन्य के)। इसलिये जब भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं उसके पीछे कांग्रेसी षडयन्त्र ही होता है, भाजपा-संघ का नहीं। कांग्रेसी लोग कितने बड़े “राजनैतिक ड्रामेबाज” हैं उसका एक उदाहरण — सन् 2000 में शिवसेनाप्रमुख बाल ठाकरे को गिरफ़्तार करने का एक नाटक किया गया था, खूब प्रचार हुआ, मीडिया के कैमरे चमके, बयानबाजियाँ हुईं। कांग्रेस को न तो कुछ करना था, न किया, लेकिन मुसलमानों के बीच छवि बना ली गई। मुम्बई के भेण्डीबाजार इलाके में शिवसेना की पीठ में “छुराघोंपू” यानी छगन भुजबल का, मुस्लिम संगठनों द्वारा तलवार देकर सम्मान किया गया, एक साल के भीतर समाजवादी पार्टी के विधायक राकांपा में आ गये और उसके बाद मुम्बई महानगरपालिका में एकमुश्त मुस्लिम वोटों के कारण, शरद पवार की पार्टी के पार्षदों की संख्या 19 हो गई… इसे कहते हैं असली षडयन्त्र। इतना बढ़िया षडयन्त्र सेना-भाजपा कभी भी नहीं कर सकतीं। इससे पहले भी कई बार पश्चिमी महाराष्ट्र के मिरज़, सांगली, इचलकरंजी, कोल्हापुर आदि इलाकों में दंगे हो चुके हैं, कभी भी सेना-भाजपा का उम्मीदवार नहीं जीता, ऐसा क्यों? बल्कि हर चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे आदि का नाम ले-लेकर मुस्लिम वोटों को इकठ्ठा किया जाता है और फ़सल काटी जाती है।

गुजरात की जनता समझदार है जो कि हर बार कांग्रेस के इस षडयन्त्र (यानी प्रत्येक चुनाव से पहले गुजरात दंगों की बात, किसी आयोग की रिपोर्ट, किसी फ़र्जी मुठभेड़ को लेकर हल्ला-गुल्ला आदि) को विफ़ल कर रही है। मुसलमानों को एक बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिये कि हिन्दू कभी भी “क्रियावादी” नहीं होता, नहीं हो सकता, हिन्दू हमेशा “प्रतिक्रियावादी” रहा है, यानी जब कोई उसे बहुत अधिक छेड़े-सताये तभी वह पलटकर वार करता है, वरना अपनी तरफ़ से पहले कभी नहीं। कांग्रेस हमेशा मुसलमानों को डराकर रखना चाहती है और हिन्दुओं के विरोध में पक्षपात करती जाती है, राजनीति करती रहती है, तुष्टिकरण जारी रहता है… तब कभी-कभार, बहुत देर बाद, हिन्दुओं का गुस्सा फ़ूटता है और “अयोध्या” तथा “गुजरात” जैसी परिणति होती है।

यदि अशोक चव्हाण षडयन्त्र की ही बात कर रहे हैं, तब यह भी तो हो सकता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के इस इलाके से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का पत्ता साफ़ हो गया था, इसलिये फ़िर से मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ़ करने के लिये यह षडयन्त्र रचा गया हो (वीडियो फ़ुटेज तो यही कहते हैं)।

मिरज़ के इन दंगों के बारे में कुछ और खुलासे, तथा पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर कुछ बिन्दु निम्नलिखित हैं…

1) पुलिस की सरकारी जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहराने वाले शाहिद मोहम्मद बेपारी को पुलिस, दंगों के 12 दिन बाद गिरफ़्तार कर पाई (Very Efficient Work)

2) शाहिद मोहम्मद बेपारी ने इन 12 दिनों में से अपनी फ़रारी के कुछ दिन नगरनिगम के एक इंजीनियर (यानी सरकारी कर्मचारी) बापूसाहेब चौधरी के घर पर काटे। आज तक इस सरकारी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

3) इससे पहले इसी बापूसाहेब चौधरी ने ईदगाह मैदान पर नल के कनेक्शन को स्वीकृति दी थी, और नल लगवाया जबकि उस विवादित मैदान पर कोर्ट केस चल रहा है। इस नल कनेक्शन को लगवाने पर PHE विभाग को कोई पैसा नहीं दिया गया, और अब बात खुलने पर रातोंरात इस नल कनेक्शन को उखाड़ लिया गया है, ऐसे हैं कांग्रेसी सरकारी कर्मचारी।

4) इसके पहले इस साजिश के मुख्य मास्टरमाइंड (यानी पहले भड़काऊ भाषण देने वाले और बाद में, गणेश मूर्तियों पर पत्थर फ़ेंकने की शुरुआत की) इमरान हसन नदीफ़ को पुलिस ने आठ दिन बाद गिरफ़्तार किया (सोचिये, जिन व्यक्तियों के चित्र और वीडियो फ़ुटेज उपलब्ध हैं उसे पकड़ने में आठ दिन और बारह दिन लगते हैं, तो पाकिस्तान से आये आतंकवादियों को पकड़ने में कितने दिन लगेंगे)।

5) जब शाहिद बेपारी जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहरा रहा था, तब एक बार उसके हाथ से झण्डा गिर गया था, उस समय वहाँ एएसपी के सामने उपस्थित एक सब-इंस्पेक्टर ने वह झण्डा उठाकर फ़िर से ससम्मान शाहिद के हाथ में थमाया, इस “महान” सब-इंस्पेक्टर का तबादला 21 दिन बाद पुणे के एक ग्रामीण इलाके में किया गया। जबकि पिछले साल ठाणे में हुए दंगों के दौरान मुस्लिम युवकों को बलप्रयोग से खदेड़ने वाले इंस्पेक्टर साहेबराव पाटिल का तबादला अगले ही दिन हो गया था…। कांग्रेसियों की नीयत पर अब भी कोई शक बचा है?

देश में होने वाले प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगों के पीछे रची गई कुटिल चालों को उजागर करना चाहिये, ताकि हर दंगे का ठीकरा भाजपा-संघ के सिर ही न फ़ोड़ा जाये, लेकिन अक्सर यही होता कि परदे के पीछे से चाल चलने वाली कांग्रेस तो साफ़ बच निकलती है और हिन्दुओं की “प्रतिक्रिया” व्यक्त करने वाली भाजपा-सेना-संघ सामने होते हैं और उन्हें साम्प्रदायिक करार दिया जाता है, जबकि असली साम्प्रदायिक है कांग्रेस, जो शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट को लतियाकर मुसलमानों को, तथा तुरन्त ही जन्मभूमि का ताला खुलवाकर हिन्दुओं को खुश करने के चक्कर में देश की हवा खराब करती है। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि यदि देश से कांग्रेस (सिर्फ़ कांग्रेस नहीं, बल्कि कांग्रेसी मानसिकता) का सफ़ाया हो जाये तो हिन्दू-मुस्लिम दंगों की सम्भावना बहुत कम हो जायेगी, और देश सुखी रहेगा… आप क्या सोचते हैं?

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>तन्हाई

>आँखों की कशिश शर्मा रही है

तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
गुमशुदा है दिल की तमन्ना
या तमन्ना अपनी छुपा रही है
सहमी सी देख रही है तुमको
या तुम्हारी नजरो से खुद को छुपा रही है
शर्मा रही है या घबरा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
तुम्हारी शीतल छुअन
एहसासों को जगा रही है
आंखे बंद करके प्यारे लम्हे को सजा रही है
आगोश मे आने को हर लम्हा
तिल-तिल कर बिता रही है
तुम्हारे स्पर्श की बाबरी
अपना प्यार बढा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
बेसुध सी हुए पड़ी है
आंखे तो सोना चाहे
पर नींदे कहाँ आती है
यादो के यादो मे
अपने दिल और रात बिता रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है
आँखों से आँखों के मिलन मे
आँखों की कशिश शर्मा रही है
उनके यादो मे डूबी बाबरी
खुद को कितना सजा रही है
तन्हाई मे न जाने क्या क्या गुनगुना रही है

>ब्लोगवाणी के बंद पर इतना मातम क्यों

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ब्लोगवाणी के बंद पर इतना मातम क्यों छाया है ? खबरदार, मेरा उसके बंद होने सम्बंधित विवाद से कोई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है . क्यों हम हिंदी वाले जो है उसी में संतुष्ट रहते हैं .  “थोड़ा और विश करो” की चाहत हमारे दिल में क्यूँ नहीं पलती ? हिंदी चिट्ठों के इस बड़े साम्राज्य में मात्र दो सक्रीय प्रतिनिधि यानि एग्रीगेटर ब्लोगवाणी और चिट्ठाजगत  ! उसमें एक बंद हो गया तो जैसे सबकी बोलती बंद . अरे कुछ लोगों ने आरोप लगाया तो बंद ! इतने कमजोर थे तो बंद होना ही था . वैसे भी क्या फायदा रह गया था ब्लोगवाणी को इस रूप में चलाने का ? अब इतने लोकप्रिय डोमेन पर कुछ नए कांसेप्ट के साथ उतरा जायेगा ! खैर अन्दर की बात जो भी है भगवान् जाने ! पर क्या ब्लोगवाणी का जाना इतनी बड़ी क्षति है जो लोग मातम में पोस्ट पर पोस्ट धकेल रहे हैं ? एक एग्रीगेटर के बंद होने से हिंदी चिट्ठों की हालत ख़राब हो जाए तो ऐसे चिट्ठे लिखने से पहले सोचना चाहिए . क्यों हम आत्म निर्भर होना नहीं चाहते ? क्यों नहीं हिंदी में १०-२० बड़ी साईट हो जो संकलक  का काम करे ? क्या हिंदी चिट्ठों को  इस ओर नहीं सोचना चाहिए ? कुछ लोग कह रहे हैं कि यह किसी नए एग्रीगटर की साजिश है . साजिश हो या न हो , क्या किसी और एग्रीगेटर से हिंदी जगत का भला नहीं हो सकता ? या हिंदी की समृद्धि के लिए दर्जनों एग्रीगेटर खुल जाने चाहिए ?  इन सारे सवालों के बीच मुझे लगता है ब्लॉग जगत को मौका मिला है समुन्दर में तैरने का और रोने-धोने में यह मौका गंवाना नहीं चाहिए . हर एक चिट्ठे को अपने भरोसे पाठकों तक पहुँचने का हुनर भी तो मालूम हो ! और जो बंधू ऐसा नहीं चाहते तो उनके लिए भी अच्छा होगा रोना बंद करें और अन्य विकल्प को तलाशें क्योंकि साहब यहाँ सब अपनी दूकान चला रहे हैं कोई सेवा नहीं हो रही . भले ही दूकान से आठ आने की कमी न हो अरबों रूपये का मानसिक सुख तो मिल रहा है . मैंने एक विकल्प कुछ दिन पाहिले हीं खोज लिया था आप भी जा सकते हैं .

>स्मरशील गोकुल सारे: कुमारी फैयाज की आवाज में एक सुन्दर मराठी गीत

>कुछ दिनों पहले मैं रेडियोवाणी की पुरानी पोस्ट्स देख रहा था। एक पोस्ट पर नज़र पड़ी जो हिन्दी फिल्मों की सबसे बढ़िया फिल्म दो आँखें बारह हाथ पर आधारित थी। उस पोस्ट में चालीसगांव वाले विकास शुक्लाजी ने एक बड़ी लेकिन बहुत ही जानकारीपूर्ण टिप्पणी दी थी।
उस टिप्प्णी में आपने कई मराठी गीतों का जिक्र किया था। साथ ही एक और गीत का जिक्र किया था जो अण्णा साहेब सी. रामचन्द्रजी की फिल्म घरकुल का था गीत के बोल थे “कोन्यात झोपली सतार, सरला रंग…पसरली पैंजणे सैल टाकुनी अंग ॥ दुमडला गालिचा तक्के झुकले खाली…तबकात राहिले देठ, लवंगा, साली ॥ साथ ही इस गीत की गायिका फैयाज यानि कुमारी फैयाज के बारे में बताते हुए लिखा था कि वे उपशास्त्रीयगायिका हैं और नाट्यकलाकार भी।
मैने इस गीत को नेट पर खोजना शुरु किया, कुछ मराठी मित्रों की मदद ली, पर गीत नहीं मिला। अचानक कुमारी फैयाज का एक गीत दिखा। उसे सुनते ही मैं उछल पड़ा। गीत मराठी में होने की वजह से ज्यादा समझ में नहीं आया लेकिन जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि गीत-संगीत किसी भाषा के मोहताज नहीं होते, वे सभी सीमाओं
से परे होते हैं, गीत सुनते ही मेरी आंखें बहने लगी।
कुमारी फैय्याज की इतनी दमदार कैसे हिन्दी संगीत प्रेमियों तक छुपी रही? क्या आप जानते हैं फैय्याज जी ने ऋषिकेश मुखर्जी दा की फिल्म आलाप में दो गीत गाये हैं ( शायद और भी गायें हो- जानकारी नहीं है) एक भूपिन्दर सिंह के साथ है और दूसरा अकेले आई ऋतु सावन की गाया है! संभव हुआ तो इस गीत को भी बहुत जल्द सुनाया जायेगा।
छाया गांगुली की आवाज में जिसने भी कोई गीत सुना है उसे एकबारगी लगेगा कि छाया जी ही गा रही हैं।
लीजिये आप गीत सुनिये।
http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=8656773-861

एक और प्लेयर ताकि सनद रहे (बकौल यूनुस भाई)

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf

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स्मरशील गोकुळ सारे
स्मरशील यमुना, स्मरशील राधा
स्मरेल का पण कुरूप गवळण
तुज ही बंशीधरा रे ?

रास रंगता नदीकिनारी
उभी राहिले मी अंधारी
न कळत तुजला तव अधरावर
झाले मी मुरली रे !
स्मरशील गोकुळ सारे

ऐन दुपारी जमीन जळता
तू डोहोवर शिणून येता
कालिंदीच्या जळात मिळुनी
धुतले पाय तुझे रे.
स्मरशील गोकुळ सारे

>किसी की पोस्ट को बगैर पढ़े टिपियाने लगता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं

>

पिछली पोस्ट में उधृत हिंदी भाषा पर चल रहे बहस में कड़ियाँ जुड़ती जा रही है और दो अलग-अलग सोच के मध्य संवाद भी बढ़ता जा रहा है . कितना सुन्दर  है जब विरोधी विचारों को सम्मान और  धैर्यपूर्वक सुनकर अपने मन के उदगार व्यक्त किये जा रहे हैं  ! किसी प्रकार की विशिष्टता नहीं रखने वाले आम लोगों को भी स्थिरता से दूसरों को सुनने और उन पर सोच समझ कर अपनी प्रतिक्रिया जताने की आदत होनी चाहिए . पर साहब यहाँ तो हम और आप खास बने बैठे हैं , लेकिन यही खास जब किसी की पोस्ट को बगैर पढ़े टिपियाने लगता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं . संवाद की जगह विवाद पैदा करता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं . तर्कपूर्ण उत्तर के बजाय गाली-गलौज पर उतर आता है तब बौद्धिकता वेश्यावृत्ति से भी गिरी हुई मालूम होती है . ध्यान रहे यह बौद्धिकता केवल उनकी है जो ऐसा करते हैं . तो साहब फर्जीबाड़े  से निकलिए और दुनिया देखिये कुछ सीखिए . ………….. पेश है हिंदी भाषा गूगल ग्रुप पर चल रहे बहस की अगली कड़ी ………..
” प्रिय दिनेश सरोज जी ,
आपने मेरे शब्दों को सम्मान दिया उसके लिए धन्यवाद ,
एक बात की ओर आपका ध्यान चाहूँगा कि जो लोग समाज सेवा या किसी की सेवा का कार्य नहीं करते तो क्या उनसे इस बात की आशा कर सकते हैं कि वे देश सेवा की भावना या देशवासी होने का भाव व्यक्त कर सकते हैं ? या वे कहते कुछ और हैं और करते कुछ और ?
आपने कुछ उधाहरण दिए तो वे ठीक हैं पर अगर बहुत सारे में कुछ नाम इस बात को सही बताने के लिए हैं तो क्या उचित है ? क्या इस से आप यह कह कर अपने आप को संतुष्ट करते है कि मैंने सबको खुश कर दिया ??
रही बात मेरी तो मैंने कहा है कि मैंने सभी जाति के स्टूडेंट्स को गाइड किया और करता भी रहा पर जबमैंने देखा कि वे लोग अध्यन के प्रति गंभीर न हो कर अन्य कार्यों में ज्यादा धयान देतें है तो मेरी जगह आप होते तो क्या करते ? इसलिय अ़ब मैं उन्हें कहता हूँ कि उन्हें यहीं अध्यन करना ठीक होगा, क्यांकि यहाँ उन्हें परेशानी नहीं होगी, और अपने धर्म कि दुहाई दे कर पास भी हो जायेंगे और उसके बाद बैंक से लोन ले कर गबन भी कर जायेंगे, तो कोई रोक भी नहीं सकेगा या अपने अल्पसंख्यक होने की दुहाई दे कहीं भी कब्जा करके आराम से जीवन बिता सकते हो …ये भारत है हम विरोध नहीं करते भले हमारा कोई भी विरोध करें हम बुरा नहीं मानते.. यही तो हमारी संस्कृति है न …
वैसे भी मैं इस बात को सही नहीं मानता कि मेरे कारण दुसरे देश के लोगों को परेशानी हो ? हमे तो आदत है परेशानी में रहने की. हम व्यवस्था में रहने के आदी नहीं है तो हमे हक़ नहीं कि हम दुसरे देश की व्यवस्था को डिस्टर्ब करें ?
वैसे मैं संतुष्ट हूँ कि मैं जो काम कर रहा हूँ वो अपने देश के लिय कर रहा हूँ क्योकि भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों से न केवल अध्यन करके वापस आयेंगे बल्कि पार्ट टाइम कार्य  करके पैसा भी कमाएंगे यानि वे वहां कि अच्छी बातें अच्छी तकनीक भी जानेंगे साथ ही विदेशी करेंसी भी साथ ले कर आयेंगे जो हमारे देश को मजबूत बनाएगी . साथ ही वे हिन्दू वादी भी बनेगे क्योकि वहां जाने से महसूस होता है कि हिन्दू होना और गर्व से अपने आप को हिन्दुस्तानी कहना कितना अच्छा लगता है . यहाँ तो अपने आप को गर्व से हिन्दू कहना कट्टर्तारवादी घोषित करता है , और हम घिर जातें है सम्प्रदाइक ए़कता, सर्व धर्म सम्भाव टाइप की बिना मतलब की बातों से ,
वैसे आपके पेज में न्यूज़ पेपर के माध्यम से बताया गया है कि कैसे मुसलमानों से नमाज के समय रोड ब्लोक कर दिया था ? और हाँ ताजमहल मुसलमानों की दरगाह या मस्जिद नहीं है वो विश्व के सात अजूबों में एक ईमारत है तो वो किसी धर्म विशेष की नहीं है कि कोई एक वहां नमाज करे च्चाहे एक बार ही क्यों ? मुझे आपकी यह तरफदारी पसंद नहीं आये एय्सा लगा जैसे एक नेता वोट मागने के लिए कुछ लोगों की तरफदारी कर रहा हो ?
मेरी समझ में नहीं आता कि इतना भी क्या नरम होना कि अपने देश के गर्व को भी भूल जाएँ ? अपनी अस्मिता , अपनी धरोहर को अपने देश की न समझ कर दूसरों को दे दें ? क्या एय्सा करना किसी भी देश के नागरिक को शोभा देता है ?
हमारे देश में दंगों की शुरुआत कौन करता है हिन्दू या मुस्लमान? नकली करेंसी चलाने वालों, रोड के किनारे नकली सी डी बेचने वालों में सबसे ज्यादा किस जाति के लोग हैं कभी आपने देखा है ? इतना सब होने के बाद भी आप कहते हैं हमे उनका आदर करना चाइए? हम खुद जब खुल कर विरोध नहीं कर सकते तो कह देतें हैं कि सरकार या प्रशासन विरोध करे ? क्या एक भारतीय होने के नाते हमारा कर्त्तव्य नहीं है कि पहले हम विरोध करें और प्रशासन का धयान खींचे?
आपको एक जानकारी देना चाहूँगा कि वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश , बिहार , जमू कश्मीर  में जो मुस्लमान रहते हैं वे बांग्लादेश या पाकिस्तान से गैरकानूनी रूप से आने वालों को अपने घरों में ठहरातें हैं उनका नकली राशन कार्ड वोटर कार्ड बन्वातें हैं और फिर वे लोग मिल कर देश में घूम घूम कर अपराध करते है और यहाँ रहने वाले मुस्लमान अपने आप को बेगुनाह बताते हैं ? बताइए इस को आप क्या कहेंगे ? देश भक्ति ? और ये सब वे लोग इसलिए कर पातें हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दू विरोध तो करते नहीं हैं खुल कर चलो इस कमजोरी का लाभ उठातें है और इस देश को अन्दर से खोखला  बनातें है ?

जय हिंद
आपका ही
मोहन भया mohan bhaya

माननीय मोहनजी,

मैं आपके कहे इन तर्कों से पूर्णतया सहमत हूँ, हर भारतीय को भारतीयता का सम्मान एवं आदर सहित पालन करना ही चाहिए…. जो नहीं करते वो यकीनन भारतीय कहलाने के योग्य नहीं ही हैं….

और रही बार रेलगाडी में सफ़र की तो मुंबई के लोकल ट्रेन में आप हम हिन्दुओं को हर त्यौहार बड़ी ही सिद्धत से मानते पाएंगे, बिल्कुल वैसे ही जैसा की कोई अपने घर में या दफ्तर में मनाता है| रही बात पटाखे फोड़ने की तो आप समझ सकते हैं की हम ऐसा कम से कम ट्रेन में तो नहीं ही कर सकते हैं!  पर हाँ हम लोकल ट्रेन में भी होली में रंग गुलाल से जरुर खुशियाँ मानते है| नवरात्रि में दुर्गा पूजा भी करते है…… और हर रोज सुबह दफ्तर जाते समय या शाम को घर लौटते समय लोकल ट्रेन में भजन-कीर्तन करना आम बात है|  क्योंकि हम लोकल ट्रेन को अपनी जिंदगी का एक अहम् हिस्सा मानते है| क्या प्राचीनतम मंदिर पुरातत्व महत्व के नहीं है…… जरुर हैं….  और हम उनमें रोजाना पूजा-पाठ भी करते है…… तो यदि वर्ष में एक या दो बार ताजमहल में नमाज़ अदा कर दी तो एतराज क्यों…….? और यदि यह गैर कानूनी हो तो सरकार से गुजारिश है की वह कार्यवाही  करें………

ये हमारी संस्कृति की उदारता एवं बड़प्पन ही है की हम किसी संस्कृति पर आक्रमण नहीं करते और हमें इस संस्कृति पर गर्व होना चाहिए …. हमारी संस्कृति हमें सभी का सम्मान एवं आदर करना सिखाती है और यदि हम-आप या कोई और इसे हमारी कायरता और कमजोरी समझता है तो नादान है…. लेकिन अगर आप इतिहास देखें तो हम पर भाहरी लोगों ने इसीलिए राज करनें में सफलता पाई क्योंकि तत्कालीन राजा-राजवाडे और शासक आपसी रंजिस और मनमुटाव के चलते उनका मुकाबला एकजुटता से नहीं किया था कुछ तो बदले की भावना से बाहरी ताकत से मिल कर उनका साथ भी दिया….. खैर ये तो इतिहास हो चुका है ….. और ये भी सर्वविदित है की आज भी कुछ ऐसे लोग है जो बाहरी लोगों के बहकावे में या किसी मनमुटाव एवं हीनभावना के तहत आकर बाहरी लोगों को शय देते हैं और उनके इशारे पर देश विरोधी कृत्य को अंजाम देते है……

और मैं आपके बता दूं की यदि कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञ और कट्टरपंथ धर्मगुरु हम लोगों को एकदूसरे के खिलाफ भड़काना और बरगलाना बंद करदें तो भारत देश में भी असीम शांति और भाईचारा बना रह सकेगा, पर यही हमारी बदकिस्मती है की ऐसा तब नहीं हो पायेगा जब तक हर एक नागरिक समझदार एवं जागरुक नहीं हो जाता|

और ये कहावत भी है की जहां चार बर्तन होंगे वहां आवाजें तो होंगी ही…..| और वही हो रहा है….. हमें चाहिए की सभी बर्तनों को करीने से सजाये ना की आपस में टकराने दें…. पर यह क्रांति कौन लाये…………..? क्या आप और हम नहीं ला सकते………….? जरूर ला सकते हैं यदि हर एक नागरिक सजग एवं जागरुक हो और जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद एवं धर्मान्धता से ऊपर उठ कर सोचे तो……..!!!
सप्रेम,
जय हिंद …..

दिनेश   Dinesh R Saroj <dineshrsaroj@gmail.com>


>इकोनोमी क्लास का ढोंग किसलिए?

>लो जी थरूर साहब भी केटल[इकोनोमी]क्लास में सफर को राजी हो गए!होते भी क्यूँ नहीं महारानी और युवराज़ जो ऐसा चाहते है!लेकिन इससे क्या होगा ?विमान तो अपने गंतव्य तक जाएगा ही …!फ़िर किसके और कैसे .paise… बचेंगे ?ऊपर से सुरक्षा बलों ने कुछ सीटें और खाली करवा ली!सोनिया जी और राहुल के ऐसा चाहने से किसी का भला होने वाला नहीं है!अगर वास्तव में ही खर्चा कम करना है तो जनता के गाढे पैसे की बर्बादी रूकनी चाहिए!आज कोसा विधायक,मंत्री या कोई नेता ऐसा है जो अपने वेतन से काम चला रहा है?आज एक अदना सा आदमी अपने मासिक वेतन से घर नहीं चला सकता,उसे तो जैसे तैसे जीने की आदत पड़ चुकी है !और एक ये नेता जी है जो अपने वेतन से इतना कमा लेते है कि इन्हे किसी चीज़ कि कमी नहीं….!बस इसी बात में .सारा रहस्य छिपा है!आपने किसी नेता को भीख मांगते देखा है?मैंने बहुत से राष्ट्रीय खिलाड़ियों,पुरुस्कृत शिक्षकों और सवतंत्रता सेनानियों को रोज़ी रोटी के लिए संघर्ष करते देखा है!वे पूरी जिंदगी में इतना नही कमा सके कि अपना पेट भर सके और एक छोटा सा नेता पाँच साल में इतना कैसे कमा लेता है?इस प्रशन में ही सारे उत्तर .छिपे है!

>अभी तो महंगाई की शुरुआत है……

>

आज देश जिस स्थिति से गुजर रहा है,वह आने वाले समय की हकीकत बयान कर रहा है!नई सरकार के आने से हुई खुशी काफूर हो चुकी है!सरकार के अधिकाँश मंत्री गण भी अपना पैसा बनाने में लगे है!आख़िर चुनावी खर्चे की भरपाई भी तो करनी है !तभी तो देखिये ना मनमोहन सिंह जी इतने बड़े अर्थशाष्त्री होते हुए भी महंगाई को रोकने में असफल रहे है ,और जनता से कह रहे है की अभी महंगाई और बढेगी!देश के कृषि मंत्री खुले आम कह रहे है कि चीनी और चावल कि किल्लत है सो ये और मंहगे होंगे!जी ठीक है आपने कहा हमने मान लिया ,पर जनता करे क्या !सारा देश जानता है कि कितनी चीनी मिलें शरद पवार की है?जब देश के मुखिया हार गए तो अब क्या हो?आप देश के संचालक है,जनता का दुःख दूर करिए!चीनी की कमी है तो आयात कीजिये….,राशनिंग ….कुछ भी कीजिये लेकिन यूँ हार के ना बैठिये ..!महंगाई दर शुन्य है लेकिन महंगाई आसमान छु रही है ..और आप .हाथ पे हाथ धर के बैठे है?आगे त्योंहारों का सीजन है !ये महंगाई तो दिवाली का दिवाला निकाल देगी…!क्या फ़िर महंगाई मार .गई जैसे गाने फ़िर चलेंगे…!देश के लिए आगामी कुछ महीने बहुत कष्टदायक होने वाले है !क्या सरकार कुछ कर पाएगी,ये हर देश वासी जानना चाहता है…!आख़िर सरकार भी तो हमने ही चुनी है ,हमें जानने का भी पूरा हक है….

>डा. श्याम गुप्त केी ्गज़ल

>
अपनी मर्ज़ी से चलने का सभी को हक है।
कपडे पहनें,उतारें,न पहनेसभी को हक है।


फ़िर तो औरों की भी मर्ज़ी है,कोई हक है,
छेडें, कपडे फ़ाडेंया लूटें,सभी को हक है।

और सत्ता जो कानून बनाती है सभी,
वो मानें, न मानें,तोडें, सभी को हक है।

औरों के हक की न हद पार करे कोई,
बस वहीं तक तो मर्ज़ी है,सभी को हक हैं।

अपने-अपने दायित्व निभायें जो पहले,
अपने हक मांगने का उन्हीं को तो हक है।

सत्ता के धर्म केनियम व सामाज़िक बंधन,
ही तो बताते हैं,क्या-क्या सभी के हक हैं।

देश का,दीन का,समाज़ का भी है हक तुझ पर,
उसकी नज़रों को झुकाने का न किसी को हक है।

सिर्फ़ हक की ही बात न करे कोई ’श्याम,
अपने दायित्व निभायें, मिलता तभी तो हक है

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