>केवल पछतावे और निंदा से ब्लॉगजगत का कोई भला नहीं होगा

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आजकल वेबसाइट बनाने में व्यस्त हूँ जिस वजह से लिखने का मूड और समय दोनों का समन्वय नहीं हो पाता है . आज कुछ नए चिट्ठों की सूची प्राप्त हुई . उन चिट्ठों को पढ़कर लिखने का मन हुआ तो सोचा क्यों न नवागंतुकों की प्रशंसा हीं की जाए .अभी -अभी हिंदी दिवस का मातम ख़त्म हुआ है . ब्लॉग / चिट्ठा -जगत का विस्तार हो रहा है  ,उनका स्तर घट गया है  , बेकार के विवाद छाये हैं ,छपास रोग है ब्लॉग लेखन , चिट्ठा लेखन साहित्य नहीं है ,ये प्रचार माध्यम बन गये हैं , साहित्य चुराकर चेपा जा रहा है , इस्लाम हीं क्यों ? , मांसाहार जायज क्यों है ?, हमने पैसे कमाए , चिट्ठों को लोकप्रिय बनायें ,  ब्लॉग्गिंग के नियम -कायदे होने चाहिए , ब्लॉगजगत को पहरेदार की जरुरत है आदि तमाम मुद्दों पर पिछले दिनों खूब लिखा गया .लेखकों ने खूब टीआरपी बटोरी .अधिकाँश बेकार की चर्चा में कुछ जरुरत की चीजें भी परोसी गयी जिसे आप लोगों ने भी देखा और महसूस किया होगा . वो कुछ चीजें हमारे काम की और हमें प्रेरणा देती हैं .एक ब्लॉगर ने लिखा था कि सिमटते हिंदी ब्लॉग जगत का विस्तार हो रहा है . उनका “सिमटना ” कई अर्थों में था . मसलन, ब्लॉग तो खूब बढ़ रहे हैं परन्तु उनमें से बहुत कम लोग सक्रीय हो पाते हैं , हिंदी में लिखने वाले विदेशी लेखकों की संख्या उचित अनुपात में नहीं बढ़ रही है ,लोग उलजुलूल लिखते हैं स्तरीय और पठनीय सामग्री कम हो रही है  इत्यादि .लेकिन उन बंधुवर को एक पक्ष हीं दिखाई दे रहा है . केवल पछतावे और निंदा से ब्लॉगजगत का कोई भला नहीं होगा . हम आत्मविवेचना करें कि क्या सचमुच हम पूरे ब्लॉगजगत को पढ़ते हैं ? विभिन्न एग्रीगेटर पर जाकर रोज -रोज कुछेक ब्लॉग को पढ़कर फैसला सुनाना क्या उनके लिए ज्यादती नहीं जो मुख्यधारा की पत्रकारिता से व्यथित हो यहाँ पहुंचे हैं कि कुछ अच्छा होगा और वो ऐसा कर भी रहे हैं . लेकिन इस लोकमंच को भी आप-हम जैसे ठेकेदारों ने वैसा बनाने की कोशिश की है . एक बात को हमने देखा है  कि अच्छा लिखने वाले किसी ब्लॉग अथवा समाचारपत्र के मोहताज नहीं हैं .उनकी चर्चा किसी अखबार या ब्लॉग के कॉलम /स्तम्भ  में हो या न हो फर्क नहीं पड़ता .अगर ध्यान दिया जाए तो वो भी गलत हैं . मात्र आदर्शों को जीकर मकसद पूरा नहीं हो सकता ! व्यावहारिक तौर पर देखें तो बहुसंख्यक ब्लॉगर चिट्ठाचर्चा या समाचारपत्रों के स्तम्भ में खुद का नाम आने पर गर्वान्वित होते हैं . उन जगहो से प्रमाणित लोगों की प्रतिष्ठा मानी जाती है . फ़िर क्यों न ऐसा मंच भी हो जो बगैर पक्षपात के सही तथ्यों के आधार पर ऐसी सुविधा उपलब्ध करवाए ? हमें खुद से कोई न कोई मानक तय करना होगा अगर हम खुद को सामानांतर मीडिया मानते हैं . खैर , ये चर्चा आगे जारी रहेगी तब तक हमारे इस छोटे से मंच से कुछ नए ब्लॉग की आवाज आप तक पहुंचाई जा रही है : –

 योगेन्द्र बता रहे हैं विडियो को सीखने का माध्यम  बनाने से क्या फायदा है और उनका यह ब्लॉग प्रोग्रामिंग की भाषा सिखाने के लिए बनाया गया है .तो पढ़िये उनकी पहली पोस्ट : ” अभी तक हम-आप सभी किताबों से सीखते आये हैं| सही भी है, किताबों से अच्छा कोई सिखा भी नहीं सकता और किताबों जैसा कोई मित्र हो भी नहीं सकता| आज तक हमने-आपने जो कुछ भी सीखा किताबों से ही सीखा पर जब बात कंप्यूटर सीखने की हो तो सिर्फ किताबें काम नहीं आतीं क्यूंकि कंप्यूटर में आप कुछ सीखना चाहते हैं तो Practically ही सीख सकते हैं| उसके लिए कोचिंग का सहारा लिया जाता है जहाँ पर Teacher हमें कंप्यूटर पर काम कर के दिखता है और हम सीखते हैं| यानि की एक बात पूरी तरह साफ़ है की कंप्यूटर को हम लोग सिर्फ पढ़ कर नहीं सीख सकते बल्कि उसको देख कर सीख सकते हैं|  ”   

एक अन्य ब्लॉगर  बीबीसीBBC हिंदी के लेखों पर टिका टिप्पणियां करने में जुटे हैं . इस तरह के प्रयास होते रहे तो विश्लेषण पढने वालों को मज़े की सामग्री मिलती रहेगी .ऐसे लोगों की कमी नहीं जो ख़बरों-लेखों पर गहरे से विमर्श पसंद करते हैं . तो पढ़िये : ” कोई उन बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है जो इन ख़बरों से उभर कर आती हैं और जो हमारे गणमान्य पत्रकार लिख नहीं रहे या लिखना नहीं चाहते | पहली बात : जो व्यक्ति अपने पैसों से तीन महीने तक पाँच सितारा होटल में रह सकता है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है | वह उन ०.०१ % भारतियों में से है जिनके जन्मे अथवा अजन्मे पोतें-पोतियों को भरण-पोषण के लिए कभी काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | जाहिर है कि वे विमान के पहले दर्जे से ही यात्रा करने के आदी है | उनके लिए विमान का साधारण दर्जा ‘मवेशी क्लास’ ही है | अगर उनके मुंह से गलती से यह सच निकल ही गया तो उसके लिए इतना बवाल मचाने की क्या आवश्यकता है |”

जेकेके नाम से एक बंधू सामाजिक मीडिया अनुकूलन (SMO) के फंडे बता रहे हैं .इस तरह नित्य नयी-नयी जानकारी देने वाले कई ब्लॉगर बंधू लेखन कर रहे हैं .आप भी खोजिये उन्हें पढ़िये और अपना ज्ञान बढाइये .हाँ संकोच न करियेगा कि बड़ा ब्लॉगर है या छोटा ? फिलहाल ये पढ़िये : ” सामाजिक मीडिया अनुकूलन कई वायरल विपणन के लिए एक तकनीक है जहाँ मुँह के शब्द दोस्तों या परिवार लेकिन सामाजिक बुकमार्क करने, वीडियो और फ़ोटो साझा वेबसाइट में नेटवर्किंग के प्रयोग के माध्यम से के माध्यम से नहीं बनाया है के रूप में जुड़े तरीकों में है. में ऐसे ही एक तरह से ब्लॉगों के साथ सगाई की blogosphere और विशेष ब्लॉग खोज इंजन में आरएसएस के प्रयोग के माध्यम से सामग्री बाँटने से ही प्राप्त होता है.”

आनंद सौरभ को देखिये नोटों पर छपे गाँधी की चाहत में परेशान हैं . बाकि  का माल तो उनकी पोस्ट पर जाने से हीं मिलेगा . देखिये तो अन्दर क्या है : ” गाँधी का जिन्न अब कहाँ से टपक पड़ा ……..जब बापू का सत्य , अहिंसा का कोई मतलब नहीं तो फिर सादगी क्यूँ ?सोनिया और राहुल बाबा आप गाँधी उपनाम छोड़ डालिए…बापू तो केमिकल लोचा की तरह गाहे बगाहे आ जाते है ……न आप के नाम में गाँधी होगा न आम लोगो को गाँधी की याद आएगी…..हमसे लोग कभी पूछते है क्या …..कभी शिकायत करते है क्या .”
  
                             आगे जब भी मौका मिलेगा नए चिट्ठों की चर्चा होगी . माफ़ करेंगे समयाभाव के कारण कोई स्थाई अंतराल पर नहीं लिख पा रहा हूँ परन्तु कोशिश होगी कि पाक्षिक चर्चा होती रहे . आशा है आप सभी का सहयोग मिलेगा .
                                                                        
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