>भारतीय सिनेमा की लीक तोड़ते अनुराग

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दैनिक हिन्दुस्तान के सप्लीमेंट ‘रिमिक्स’ के अंदर छपे एक लेख ने मेरे मस्तिष्क को अच्छा खासा घुमाया। अब आप यह सोच रहे होंगे की ऐसा लेख क्या था? वह लेख था ‘अनुराग कैसे पहुंचे वेनिस’’ । इस शीर्षक से लेखक ने युवा निर्देशक अनुराग कश्यप की दो फिल्में ‘देव डी और ‘गुलाल ’ के वेनिस फिल्म महोत्सव में शामिल होने पर सवालिया निशान लगाया है। उनका मानना है कि मार्केटिंग की नीतियां अब रचनात्मकता पर भारी पड़ने लगी है। लेखक के इस कथन से मैं पूर्णतया सहमत हूँ कि आज सिनेमा जगत में भी मार्केटिंग काफी हद तक फिल्म की सफलता को प्रभावित करने लगा हैं। मगर यह कथन अनुराग कश्यप की फिल्मों के लिए सहीं नहीं कहा जा सकता हैं। अनुराग की फिल्मों के चर्चा का कारण सदैव उनका विषय रहा है। उन्होंने हमेशा ‘लीक’ से हटकर फिल्में बनाई है। और फिल्म की घिसीपिटी धारा के साथ प्रयोग किया है। मृणाल सेन ने ‘भुवन शोम’ के साथ भारतीय सिनेमा में जिस युग की शुरूआत की थी। इस युग की धारा को आगे ब़ाने में अनुराग कश्यप की फिल्मों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। राजकपूर, सत्यजीत रे, मृणाल सेन तथा गोविंद निहलानी जैसे निर्देशकों के सफलता के पीछे एक रहस्य था कि उन्होंने ज़मीन से जुड़ी फिल्में बनाई थी। उन्होंने एक आम आदमी के उस दर्द को सिनेमा के रंगीन पर्दे पर उतारा था। जिस दर्द को आम आदमी अपनी किस्मत का लिखा समझ कर चुपचाप सहता रहता था। उनकी फिल्मों के पात्र एक रिक्शा चालक से लेकर एक सर्कस का जोकर भी है। मगर अब हमारा समाज बदल चुका है। आज के युवाओं को अपने पिता का कर्ज़ चुकाने की ज़रूरत नहीं हैं। आज साहूकार हमारे समाज को लूट नहीं रहे हैं। आज हमारे देश को आतंकवाद जैसी बीमारी से बचाने की ज़रूरत है। आज का युवा दौलत, शोहरत और रूतबे की किसी भी काम को कर गुजरने की चाहत रखता है। उसके सोचने समझने की शक्ति पर इन तीन चीज़ों का असर पूर्णरूप से परिलक्षित हो रहा है। आज युवाओं के पश्चिमी सभ्यता के प्रति झुकाव ने उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ही नहीं किया हैं, बल्कि एक इनके बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसे तोड़ना आज किसी के बस में नहीं है।
यह बात दीगर है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है। इसी तर्ज़ पर अनुराग कश्यप की फिल्में आज के इस बदलते समाज और युवाओं का चित्रण करती नज़र आती है। अनुराग ने अभी तक 7 फिल्मों का निर्देशन किया है। इन सभी फिल्मों में अनुराग ने आज के युवा और समाज की उस बदलती हुई तस्वीर को दिखाया। जिसे हम देखते तो रोज है मगर स्वीकार करने से हिचकते है। क्योंकि सच कड़वा होता है और कड़वी चीज़े आसानी से नहीं निगली जा सकती है। ॔देव डी’ की ॔पारो’ अब देव के लिए अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करती है बल्कि वो अपने पति के साथ खुशी से रहती हैं। ये सिर्फ फिल्म की रंगीन दुनिया में ही नहीं बल्कि हमारे आसपास ही घटित होता हुआ दिखाई देता है। ॔गुलाल’ आज के युवाओं की राजनीति और राजनीति में तालमेल बिठाती हुई यह फिल्म हमारी राजनीति के उस परत को उधेड़ कर सामने लाती है। जो देखने में बहुत ही घटिया है मगर हक़ीकत है। और हक़ीकत भी ऐसी जिसे कबूलना हमारे इस सभ्य समाज के बस में नहीं है। क्योंकि यह सभ्य समाज बाहर से देखने पर जितना रंगीन और रौशनी से भरा है। उतना ही अंदर से खोखला है। अनुराग के कास्टिंग में बड़े सितारे नहीं होते है, उनके पास होता है सिर्फ एक अच्छा विषय और संगीत। इन्हीं के दम पर आज अनुराग बॉलीवुड़ में अपनी एक अलग पहचान कायम कर पाये हैं। आज सिनेमा के तरफ रूझान रखने वाले हर युवा का रॉल मॉडल राजकपूर, सत्यजीत रे, मृणाल सेन, बुद्वदेव दास गुप्ता के साथ अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज भी शामिल हैं। लेखक का मानना है कि अगर ॔ब्लैक फ्राइडे’ को हटा दिया जाए तो अनुराग की कोई भी फिल्म सत्यजीत रे, राजकपूर, मृणाल सेन, गोविंद निहालानी के फिल्मों के समकक्ष नहीं है। मेरा माना है कि अगर किसी निर्देशक की अच्छी और सफल फिल्मों को उसके कैरियर से हटा दिया जाता है तो वह भी एक असफल निर्देशक बन जाता हैं। अत : इस तरह की बाते अब नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि अब हम इक्कीसवीं सदी में है और यहाँ कुछ भी हटाया नहीं जाता है बल्कि केवल जोड़ा जाता है। वो चाहे फिल्मों की संख्या हो नोटों की गड्डी। लिहाजा अनुराग कश्यप की फिल्में ‘वेनिस’ तो क्या विश्व के किसी भी फिल्म समारोह में हिस्सा ले सकती है।

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