>"Hindi bhasha google group" में चल रहे विवाद से सबक लेना चाहिए ब्लॉग जगत को

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अंतरजाल पर आजकल विवादों का चलन बढ़ गया है . किसी भी बात को लेकर लोग टीका- टिप्पणी शुरू कर देते हैं फ़िर शुरू होता है आरोप -प्रत्यारोप का दौर . चिट्ठों पर तो दर्जनों पोस्ट व्यक्तिगत लड़ाई में लिखी जा रही है .और गौर करें तो अक्सर बहस हिन्दू -मुस्लिम की ओर , महिला-पुरुष , दलित-सवर्ण की ओर पहुँच जाती है भले ही मुद्दा कुछ भी हो .लेकिन कुछेक सार्थक बहस भी हो रही है  उदाहरण के लिए  ‘हिंदी भाषा’  पर चल रहे इस विवाद को हीं लीजिये :
                                                  एक सज्जन दिनेश सरोज ने शुभकामना क्या भेजी बबाल हो गया :
                                                       हर दुआ कुबूल हो आपकी,
हर तमन्ना साकार हो,
महफिलों सी रहे रोशन जिंदगी,
कभी न जीवन में वीरानी हो,
हमारे तरफ से आप सभी को
   “नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ”/“ईद मुबारक हो!!”

                                                      शुभकामना सन्देश को पढ़कर मोहन भैया ने ये कहा :
नवरात्र  की शुभकामनाये  तो  ठीक   है   पर  दूसरी ….?  क्यों ? जबकि 15 अगस्त  और  26 जनवरी को  उनकी  भीड़
इतनी  नहीं  होती  जितना  वो  लोग  ताजमहल   और  रोड्स  पर  करते  है ,,,,? इसका  क्या  मतलब  हुआ   यह  समझ  के  बाहर  है ? साथ  ही  वे  लोग  हमारे  किसी  त्यौहार  की  शुभकामनायें  पब्लिकली  नहीं  देते ….? सोचिये …..वर्ना  जो  लोग  पोलियो  ड्रोप्स / परिवार  निओजन  / नागरिकता  के  बारे  में  घम्भीर  नहीं  है  और  दिन  दूनी  रत  चौगुनी  अपनी  संख्या  बढा  रहे  हैं  और  यही  रफ्तार  रही  तो  बहुत  जल्दी  वो  ही  दिखेंगे  भारत  में  हम  नहीं  रहेंगे ….जैसा  कुछ  दिन  पहले  इंडियन  मुजाहिद्दीन  ने  हमारे  न्यूज़  पपेर्स  में  विगय्प्ती  प्रकाशित  करवाई  की  5 साल  में   भारत  से  हिंदूं  का  नाम  निशान  मिटा  देंगे ..? कहाँ  है  हमारी  भारतीयता  की  भावना ….नागरिकता  की  भावना ..? या  गुलामी  और  मस्का परस्त  ही  हमारी  पहचान  बन  गई  है ….?
-एक   भारतीय  नागरिक .
मोहन भैया ने परिवार नियोजन की बात तो सही कही है लेकिन ईद की शुभकामना पर सवाल उठाना उचित नहीं लगता . हमें कोई काम नहीं पसंद तो ना करें पर दूसरों को रोक नहीं सकते . 
                                                              
                                                    आगे चलिए रजिया मिर्जा अपनी प्रतिक्रिया में कहती हैं :

बेशक़!! जो भारतीय अपने आपको हिन्दुस्तानी कहलाना मंज़ूर नहिं करते उन्हें भारत में रहना ही नही चाहिये। बताईये कौन सा मज़हब-धर्म  वतन से नफरत सिखाता है? मैं उसे धर्म- मज़हब नहिं क्हुंगी। हम सब भारतीय ही हैं। और रहेंगे। ईस देश को तोडनेवाली ताक़्तों से नफरत है मुझे। मेरा हिन्दुस्तान “महान” है। जहां मेरा जन्म हुआ वो भारत को मेरा सलाम है।

                                       बहुत हीं सही बात कही रजिया ने परन्तु क्या लोग ऐसा समझते हैं ? 

                                 बहस में एक और जनाब मंसूर अली पधारे और शुभकामना दे चलते बने :

नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ…..तमाम  भारतवासियों  को  चाहे  वोह  किसी  भी  धर्म  अथवा  जाती  का  हो . धन्यवाद !

                                       चलो कुल मिलकर बहस सही दिशा में जाती दिख रही है .आपको क्या लगता है ?

                                     पुनः दिनेश जी, मोहन जी को संबोधित करते हुए आपने सधे शब्दों में बातें रखते हैं :

प्रिय मोहनजी,

आपकी वतनपरस्ती एवं उससे जुडी चिंता के लिये आपको सलाम!!!

आपकी चिंता एवं उसके उपलक्ष्य में आपने जो ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात कही है मैं भी उससे इत्तेफाक रखता हूँ| परन्तु १५ अगस्त एवं २६ जनवरी में इकठ्ठे भीड़ में से आप किसी हिन्दू, मुस्लिम या किसी ईसाई को पृथक कैसे कर पायेंगे? क्या ऐसा कोई चस्मा है? क्या कहीं भीड़ के आंकड़े निर्दिष्ट किये हुए है? या हम बस ऐसा मान लेते है और अपने मन में अवधारणा बना लेते है|

जब आप ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात करते हैं, तब शायद आप यह भूल जाते है या यूँ कहे की नजरअंदाज कर देते है की उससे कहीं कहीं ज्यादा भीड़ मुंबई एवं अन्य जगहों पर गणेश पंडालों में गणेश जी के दर्शन के लिए उमड़ती है तथा चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन करने आये श्रध्हलुओं की होती है, जिसे संभालना प्रशासन के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाता है| मुंबई के जन्माष्टमी को भी शायद आप भूल गए जिसमे इस बार swine flu के संक्रमण के भय के बावजूद भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी| एसे और भी कई उधाहरण मैं प्रस्तुत कर सकता हूँ जैसे कुम्भ का मेला ईत्यादी| क्या आपने कभी क्रिकेट मैच में जुटे भीड़ को उनके जाती-धर्म के आधार पर आंकने की कोशिश की है?

आज भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में अपनी संप्रभुता बना चुका है…. और भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता बनाये रखने का पुर-पूरा अधिकार दिया है|
और इसपर न ही आप ना ही मैं और ना ही कोई और प्रश्न उठा सकता है|

और रही “इंडियन मुजाहिद्दीन” के ५ सालों में हिन्दुओं का नामों निशां मिटाने की तो उसके लिए आप निश्चिंत रहें…. ऐसी कोशिशे सदियों से होती आ रही हैं पर सदा ही नाकाम भी होती रही हैं!!! भारतीय संस्कृति इतनी उदार और परिपक्कव है की यह सभी को अपने में समाहित कर लेती है!!!

कोई भी जागरूक माता-पिता अपने बच्चों को पोलियो टिका से वांच्छित नहीं रखेंगे …. और यदि कोई रखता है तो मैं समझता हूँ वे नासमझ हैं, उन्हें जागरुक बनाने की जरुरत है| इसे धर्म-जाती के  आधार से देखना मुझे तर्क सांगत लगता है| और यदि कोई धार्मिक गुरु पोलियो टिका न देने की सलाह या फतवा देता है तो  मैं इसे धर्मान्धता और अज्ञानता ही कहूँगा|

परिवारनियोजन एक गंभीर मुद्दा है, जिस तरह जनसँख्या विस्फोट हो रहा है यह निकट भविष्य के लिए बहुत ही बड़ी समस्या बनता जा रहा है| पर मैं फिर कहना चाहूँगा इस विषय को भी एक रंग के चश्मे से न देखें| आपको केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं अपितु हर धर्म के परिवार मिल जायेंगे जो बच्चों को ईश्वर का रूप कहते हैं और परिवार नियोजन के नाम से कन्नी काटते हैं| मैंने एक हिन्दू धर्मगुरु (किसी का नाम नहीं लेना चाहूँगा) के पुस्तक में उन्हें यह सन्देश देते पाया है की भारत देश में हिन्दुओं की संख्या बढाइये सरकार के परिवार नियोजन को तवज्जो न दें? इसके बारे में आप क्या कहेंगे??? मैं तो इसे धर्मान्धता ही कहूँगा फिर चाहे कोई भी धर्म गुरु ऐसा क्यों न कहे|

रही भारतीय नागरिकता की बात, तो भाईजी, तो जो मुस्लिम खुद को भारतीय या हिन्दुस्तानी कहलाना पसंद नहीं करते थे (या जैसी भी परिस्थिति रही हो) १९४७ में ही भारत छोड़ चले गए थे| और जो देश छोड़ कर नहीं गए यहीं रह गए आप उन्हें देशप्रेमी कहने के बजाय उन्हें एक विशेष रंग के चश्में से देख रहे हैं!!! यह कहाँ तक तर्कसंगत है??? आप यह भूल जाते हैं की मुस्लिमों के आलावा  कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख एवं अन्य) १९४७ में भारत नहीं आये थे और जहां थे वहीँ बसे रहे, उन्हें अपनी जन्मभूमि से प्रेम था चाहे अब वह अखंड भारत देश का हिस्सा न रहा हो| उनका मैं सम्मान करता हूँ| और जो मुस्लिम यहाँ रह गए हैं उनका भी सम्मान करता हूँ|

कृपया हमारे राजनीतिज्ञों एवं तथाकथित कट्टरपंथीयों की तरह अखंड भारत देश को जाती-धर्म के चश्में से मत देखें| कम से कम मैं इतना कह ही सकता हुं की मेरे जितने भी गैर हिन्दू मित्र या जानने वाले लोग हैं वे मुझे हर हिंन्दु धार्मिक त्योहारों की शुभकामना के साथ साथ स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की बधाई देते है| और मैं इसी पर विश्वास करता हुं| और तो और कुछ तो मेरे साथ मंदिरों में आकर प्रार्थना करने में जरा भी संकोच नहीं करते| और मैं स्वयं भी दरगाहों, मजारों, गिरिजाघरों में उसी श्रध्दा से जाता हूँ जैसे की मंदिरों में|

मैं सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता हूँ, और हर धर्म को सामान रूप से आदर भी देता हूँ| और मेरा सभी महानुभावों से निवेदन है की मानव धर्म को सभी जाती-धर्मों से सर्वोपरि समझे| वैस हर इंसान अपनी विचारधारा के लिए स्वतंत्र है| सुनी-सुनाई बातों में कितना सत्य है या कितनी छलावा यह मैं नहीं कह सकता| hindibhasha Group पर भी गैर हिन्दू मित्र हिन्दू त्योहर्रों की बधाई देते रहे हैं यह तो आपने भी देखा होगा|

अंत में मैं यह भी कहना चाहूँगा की बिना आग के धुआं नहीं निकलता, कुछ चंद मुठ्ठी भर एसे लोग भी यकीनन हैं जो भारत देश की संप्रभुता को क्षति पहुँचाने में जुटे हुए हैं और लगातार प्रयास करते रह रहे हैं, जिस कारण हमें अक्सर कई आतंकवादी हमलों एवं सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड जाता है| परन्तु किसी परिवार के रसोई घर के चूल्हे में लगी आग से निकले धुएँ को किसी आतंकी हमले में हुए विस्फोटों का धुंआ समझ लेना कितना तर्कसंगत है???

मैं किसी के भावना को आघात पहुँचाना नहीं चाहता, और यदि जाने अनजाने ऐसा कुछ हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी हुं!!!

रहीमन धागा प्रेम का,मत तोड़ो चटाकाई|टूटे से फिर ना जुड़े,जुड़े गाँठ परि जाई|| जय हिंद !!!

फिलहाल तो यह बहस जारी है ……………………… . क्या ब्लॉगजगत को इस बहस से कुछ सीख लेने की जरुरत है ? सवाल पर जरा मंथन कीजियेगा . 
अरे , साहब मैं बेकार की नसीहत नहीं दे रहा हूँ . आपने अपने ब्लॉगजगत की बहस को देखा है तो समझते होंगे . यहाँ ऐसे-ऐसे सूरमा हैं कि बस पूछो मत ! एक जनाब हर जगह धमकी देते हैं “:- फुरसत में आउंगा तेरी तरफ, रोंद डालूंगा तब तक मुंह बंद करले और विचार कर ”  पर फुर्सत में कब आयेंगे पता नहीं ? पोस्ट कुछ भी बात वहीँ करेंगे जो उनको बकना है . एक दुसरे के नाम से पोस्ट लिख -लिख कर लोकप्रियता की उचाइयों को छूना चाहते हैं ! अब हिंदी चिट्ठों  का भगवान् ही मालिक है .

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