>किसी की पोस्ट को बगैर पढ़े टिपियाने लगता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं

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पिछली पोस्ट में उधृत हिंदी भाषा पर चल रहे बहस में कड़ियाँ जुड़ती जा रही है और दो अलग-अलग सोच के मध्य संवाद भी बढ़ता जा रहा है . कितना सुन्दर  है जब विरोधी विचारों को सम्मान और  धैर्यपूर्वक सुनकर अपने मन के उदगार व्यक्त किये जा रहे हैं  ! किसी प्रकार की विशिष्टता नहीं रखने वाले आम लोगों को भी स्थिरता से दूसरों को सुनने और उन पर सोच समझ कर अपनी प्रतिक्रिया जताने की आदत होनी चाहिए . पर साहब यहाँ तो हम और आप खास बने बैठे हैं , लेकिन यही खास जब किसी की पोस्ट को बगैर पढ़े टिपियाने लगता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं . संवाद की जगह विवाद पैदा करता है तब बौद्धिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं . तर्कपूर्ण उत्तर के बजाय गाली-गलौज पर उतर आता है तब बौद्धिकता वेश्यावृत्ति से भी गिरी हुई मालूम होती है . ध्यान रहे यह बौद्धिकता केवल उनकी है जो ऐसा करते हैं . तो साहब फर्जीबाड़े  से निकलिए और दुनिया देखिये कुछ सीखिए . ………….. पेश है हिंदी भाषा गूगल ग्रुप पर चल रहे बहस की अगली कड़ी ………..
” प्रिय दिनेश सरोज जी ,
आपने मेरे शब्दों को सम्मान दिया उसके लिए धन्यवाद ,
एक बात की ओर आपका ध्यान चाहूँगा कि जो लोग समाज सेवा या किसी की सेवा का कार्य नहीं करते तो क्या उनसे इस बात की आशा कर सकते हैं कि वे देश सेवा की भावना या देशवासी होने का भाव व्यक्त कर सकते हैं ? या वे कहते कुछ और हैं और करते कुछ और ?
आपने कुछ उधाहरण दिए तो वे ठीक हैं पर अगर बहुत सारे में कुछ नाम इस बात को सही बताने के लिए हैं तो क्या उचित है ? क्या इस से आप यह कह कर अपने आप को संतुष्ट करते है कि मैंने सबको खुश कर दिया ??
रही बात मेरी तो मैंने कहा है कि मैंने सभी जाति के स्टूडेंट्स को गाइड किया और करता भी रहा पर जबमैंने देखा कि वे लोग अध्यन के प्रति गंभीर न हो कर अन्य कार्यों में ज्यादा धयान देतें है तो मेरी जगह आप होते तो क्या करते ? इसलिय अ़ब मैं उन्हें कहता हूँ कि उन्हें यहीं अध्यन करना ठीक होगा, क्यांकि यहाँ उन्हें परेशानी नहीं होगी, और अपने धर्म कि दुहाई दे कर पास भी हो जायेंगे और उसके बाद बैंक से लोन ले कर गबन भी कर जायेंगे, तो कोई रोक भी नहीं सकेगा या अपने अल्पसंख्यक होने की दुहाई दे कहीं भी कब्जा करके आराम से जीवन बिता सकते हो …ये भारत है हम विरोध नहीं करते भले हमारा कोई भी विरोध करें हम बुरा नहीं मानते.. यही तो हमारी संस्कृति है न …
वैसे भी मैं इस बात को सही नहीं मानता कि मेरे कारण दुसरे देश के लोगों को परेशानी हो ? हमे तो आदत है परेशानी में रहने की. हम व्यवस्था में रहने के आदी नहीं है तो हमे हक़ नहीं कि हम दुसरे देश की व्यवस्था को डिस्टर्ब करें ?
वैसे मैं संतुष्ट हूँ कि मैं जो काम कर रहा हूँ वो अपने देश के लिय कर रहा हूँ क्योकि भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों से न केवल अध्यन करके वापस आयेंगे बल्कि पार्ट टाइम कार्य  करके पैसा भी कमाएंगे यानि वे वहां कि अच्छी बातें अच्छी तकनीक भी जानेंगे साथ ही विदेशी करेंसी भी साथ ले कर आयेंगे जो हमारे देश को मजबूत बनाएगी . साथ ही वे हिन्दू वादी भी बनेगे क्योकि वहां जाने से महसूस होता है कि हिन्दू होना और गर्व से अपने आप को हिन्दुस्तानी कहना कितना अच्छा लगता है . यहाँ तो अपने आप को गर्व से हिन्दू कहना कट्टर्तारवादी घोषित करता है , और हम घिर जातें है सम्प्रदाइक ए़कता, सर्व धर्म सम्भाव टाइप की बिना मतलब की बातों से ,
वैसे आपके पेज में न्यूज़ पेपर के माध्यम से बताया गया है कि कैसे मुसलमानों से नमाज के समय रोड ब्लोक कर दिया था ? और हाँ ताजमहल मुसलमानों की दरगाह या मस्जिद नहीं है वो विश्व के सात अजूबों में एक ईमारत है तो वो किसी धर्म विशेष की नहीं है कि कोई एक वहां नमाज करे च्चाहे एक बार ही क्यों ? मुझे आपकी यह तरफदारी पसंद नहीं आये एय्सा लगा जैसे एक नेता वोट मागने के लिए कुछ लोगों की तरफदारी कर रहा हो ?
मेरी समझ में नहीं आता कि इतना भी क्या नरम होना कि अपने देश के गर्व को भी भूल जाएँ ? अपनी अस्मिता , अपनी धरोहर को अपने देश की न समझ कर दूसरों को दे दें ? क्या एय्सा करना किसी भी देश के नागरिक को शोभा देता है ?
हमारे देश में दंगों की शुरुआत कौन करता है हिन्दू या मुस्लमान? नकली करेंसी चलाने वालों, रोड के किनारे नकली सी डी बेचने वालों में सबसे ज्यादा किस जाति के लोग हैं कभी आपने देखा है ? इतना सब होने के बाद भी आप कहते हैं हमे उनका आदर करना चाइए? हम खुद जब खुल कर विरोध नहीं कर सकते तो कह देतें हैं कि सरकार या प्रशासन विरोध करे ? क्या एक भारतीय होने के नाते हमारा कर्त्तव्य नहीं है कि पहले हम विरोध करें और प्रशासन का धयान खींचे?
आपको एक जानकारी देना चाहूँगा कि वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश , बिहार , जमू कश्मीर  में जो मुस्लमान रहते हैं वे बांग्लादेश या पाकिस्तान से गैरकानूनी रूप से आने वालों को अपने घरों में ठहरातें हैं उनका नकली राशन कार्ड वोटर कार्ड बन्वातें हैं और फिर वे लोग मिल कर देश में घूम घूम कर अपराध करते है और यहाँ रहने वाले मुस्लमान अपने आप को बेगुनाह बताते हैं ? बताइए इस को आप क्या कहेंगे ? देश भक्ति ? और ये सब वे लोग इसलिए कर पातें हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दू विरोध तो करते नहीं हैं खुल कर चलो इस कमजोरी का लाभ उठातें है और इस देश को अन्दर से खोखला  बनातें है ?

जय हिंद
आपका ही
मोहन भया mohan bhaya

माननीय मोहनजी,

मैं आपके कहे इन तर्कों से पूर्णतया सहमत हूँ, हर भारतीय को भारतीयता का सम्मान एवं आदर सहित पालन करना ही चाहिए…. जो नहीं करते वो यकीनन भारतीय कहलाने के योग्य नहीं ही हैं….

और रही बार रेलगाडी में सफ़र की तो मुंबई के लोकल ट्रेन में आप हम हिन्दुओं को हर त्यौहार बड़ी ही सिद्धत से मानते पाएंगे, बिल्कुल वैसे ही जैसा की कोई अपने घर में या दफ्तर में मनाता है| रही बात पटाखे फोड़ने की तो आप समझ सकते हैं की हम ऐसा कम से कम ट्रेन में तो नहीं ही कर सकते हैं!  पर हाँ हम लोकल ट्रेन में भी होली में रंग गुलाल से जरुर खुशियाँ मानते है| नवरात्रि में दुर्गा पूजा भी करते है…… और हर रोज सुबह दफ्तर जाते समय या शाम को घर लौटते समय लोकल ट्रेन में भजन-कीर्तन करना आम बात है|  क्योंकि हम लोकल ट्रेन को अपनी जिंदगी का एक अहम् हिस्सा मानते है| क्या प्राचीनतम मंदिर पुरातत्व महत्व के नहीं है…… जरुर हैं….  और हम उनमें रोजाना पूजा-पाठ भी करते है…… तो यदि वर्ष में एक या दो बार ताजमहल में नमाज़ अदा कर दी तो एतराज क्यों…….? और यदि यह गैर कानूनी हो तो सरकार से गुजारिश है की वह कार्यवाही  करें………

ये हमारी संस्कृति की उदारता एवं बड़प्पन ही है की हम किसी संस्कृति पर आक्रमण नहीं करते और हमें इस संस्कृति पर गर्व होना चाहिए …. हमारी संस्कृति हमें सभी का सम्मान एवं आदर करना सिखाती है और यदि हम-आप या कोई और इसे हमारी कायरता और कमजोरी समझता है तो नादान है…. लेकिन अगर आप इतिहास देखें तो हम पर भाहरी लोगों ने इसीलिए राज करनें में सफलता पाई क्योंकि तत्कालीन राजा-राजवाडे और शासक आपसी रंजिस और मनमुटाव के चलते उनका मुकाबला एकजुटता से नहीं किया था कुछ तो बदले की भावना से बाहरी ताकत से मिल कर उनका साथ भी दिया….. खैर ये तो इतिहास हो चुका है ….. और ये भी सर्वविदित है की आज भी कुछ ऐसे लोग है जो बाहरी लोगों के बहकावे में या किसी मनमुटाव एवं हीनभावना के तहत आकर बाहरी लोगों को शय देते हैं और उनके इशारे पर देश विरोधी कृत्य को अंजाम देते है……

और मैं आपके बता दूं की यदि कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञ और कट्टरपंथ धर्मगुरु हम लोगों को एकदूसरे के खिलाफ भड़काना और बरगलाना बंद करदें तो भारत देश में भी असीम शांति और भाईचारा बना रह सकेगा, पर यही हमारी बदकिस्मती है की ऐसा तब नहीं हो पायेगा जब तक हर एक नागरिक समझदार एवं जागरुक नहीं हो जाता|

और ये कहावत भी है की जहां चार बर्तन होंगे वहां आवाजें तो होंगी ही…..| और वही हो रहा है….. हमें चाहिए की सभी बर्तनों को करीने से सजाये ना की आपस में टकराने दें…. पर यह क्रांति कौन लाये…………..? क्या आप और हम नहीं ला सकते………….? जरूर ला सकते हैं यदि हर एक नागरिक सजग एवं जागरुक हो और जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद एवं धर्मान्धता से ऊपर उठ कर सोचे तो……..!!!
सप्रेम,
जय हिंद …..

दिनेश   Dinesh R Saroj <dineshrsaroj@gmail.com>


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