>ब्लोगवाणी के बंद पर इतना मातम क्यों

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ब्लोगवाणी के बंद पर इतना मातम क्यों छाया है ? खबरदार, मेरा उसके बंद होने सम्बंधित विवाद से कोई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है . क्यों हम हिंदी वाले जो है उसी में संतुष्ट रहते हैं .  “थोड़ा और विश करो” की चाहत हमारे दिल में क्यूँ नहीं पलती ? हिंदी चिट्ठों के इस बड़े साम्राज्य में मात्र दो सक्रीय प्रतिनिधि यानि एग्रीगेटर ब्लोगवाणी और चिट्ठाजगत  ! उसमें एक बंद हो गया तो जैसे सबकी बोलती बंद . अरे कुछ लोगों ने आरोप लगाया तो बंद ! इतने कमजोर थे तो बंद होना ही था . वैसे भी क्या फायदा रह गया था ब्लोगवाणी को इस रूप में चलाने का ? अब इतने लोकप्रिय डोमेन पर कुछ नए कांसेप्ट के साथ उतरा जायेगा ! खैर अन्दर की बात जो भी है भगवान् जाने ! पर क्या ब्लोगवाणी का जाना इतनी बड़ी क्षति है जो लोग मातम में पोस्ट पर पोस्ट धकेल रहे हैं ? एक एग्रीगेटर के बंद होने से हिंदी चिट्ठों की हालत ख़राब हो जाए तो ऐसे चिट्ठे लिखने से पहले सोचना चाहिए . क्यों हम आत्म निर्भर होना नहीं चाहते ? क्यों नहीं हिंदी में १०-२० बड़ी साईट हो जो संकलक  का काम करे ? क्या हिंदी चिट्ठों को  इस ओर नहीं सोचना चाहिए ? कुछ लोग कह रहे हैं कि यह किसी नए एग्रीगटर की साजिश है . साजिश हो या न हो , क्या किसी और एग्रीगेटर से हिंदी जगत का भला नहीं हो सकता ? या हिंदी की समृद्धि के लिए दर्जनों एग्रीगेटर खुल जाने चाहिए ?  इन सारे सवालों के बीच मुझे लगता है ब्लॉग जगत को मौका मिला है समुन्दर में तैरने का और रोने-धोने में यह मौका गंवाना नहीं चाहिए . हर एक चिट्ठे को अपने भरोसे पाठकों तक पहुँचने का हुनर भी तो मालूम हो ! और जो बंधू ऐसा नहीं चाहते तो उनके लिए भी अच्छा होगा रोना बंद करें और अन्य विकल्प को तलाशें क्योंकि साहब यहाँ सब अपनी दूकान चला रहे हैं कोई सेवा नहीं हो रही . भले ही दूकान से आठ आने की कमी न हो अरबों रूपये का मानसिक सुख तो मिल रहा है . मैंने एक विकल्प कुछ दिन पाहिले हीं खोज लिया था आप भी जा सकते हैं .

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