>नवगीत : भुज भर भेंटो… संजीव ‘सलिल’

>आज की रचना:

नवगीत

संजीव ‘सलिल’

फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो…

*

भूलो भी तहजीब
विवश हो मुस्काने की.
देख पराया दर्द,
छिपा मुँह हर्षाने की.

घिसे-पिटे
जुमलों का
माया-जाल समेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो…

*

फुला फेंफड़ा
अट्टहास से
गगन गुंजा दो.
बैर-परायेपन की
बंजर धरा कँपा दो.

निजता का
हर ताना-बाना
तोड़-लपेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो…

*

बैठ चौंतरे पर
गाओ कजरी
दे ताली.
कोई पडोसन भौजी हो,
कोई हो साली.

फूहड़ दूरदर्शनी रिश्ते
‘सलिल’ न फेंटो. .
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो…

*

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>युवा

> दैत्य को बढ़ने दो , मै उसे मार दूंगा 
तूफ़ान को आने दो , मै फिर भी तैरूँगा  
सूरज के डूबने दो , मै रौशनी दूंगा  
हवओं को उठने दो , मै फिर भी उडूँगा  


ज्वालामुखी के फटने पर भी मै खडा रहूँगा
युद्घ शुरू होने पर मै टूट पडूंगा
उन्हें श्याई ले लेने दो , मै खून से लिखूंगा  
दुश्मनों को परवान चढ़ने दो मै बिजली बन गिरूंगा  


मुझे संगीत बनाने दो फिर हम सब गायेंगे  
मुझे गुलाब उगने दो फिर हम सब महक जायेंगे  
मुझे तारा बनाने दो फिर हम सब चमक जायेंगे  
मुझे रास्ता बनाने दो फिर हम लक्ष्य तक पहुच जायेंगे

ईसाई संगठन का यह न्यूज़लेटर साम्प्रदायिक है या मनगढ़न्त? KCBC Newsletter Kerala Love Jihad

केरल में कोचीन स्थित केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) के तहत काम करने वाले संगठन कमीशन फ़ॉर सोशल हारमोनी एण्ड विजिलेंस द्वारा जारी ताज़ा न्यूज़लेटर में केरल में चल रहे “लव जेहाद” और इसके धार्मिक दुष्प्रभावों के बारे में ईसाई समाज को जानकारी दी गई है।

अपने अनुयायियों में बाँटे गये इस न्यूज़लेटर के अनुसार पालकों को निर्देशित किया गया है कि केरल और कर्नाटक में “लव जेहाद” जारी है, जिसमें भोलीभाली लड़कियों को मुस्लिम लड़कों द्वारा फ़ाँसकर उन्हें शादी का भ्रमजाल दिखाकर धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है। बिशप काउंसिल ने आग्रह किया है कि पालक अपनी लड़कियों पर नज़र रखें, यदि लड़कियाँ मोबाइल उपयोग करती हैं तो उनके माता-पिता को उनकी इनकमिंग और आऊटगोइंग कॉल्स पर नज़र रखना चाहिये, यदि घर पर कम्प्यूटर हो तो वह “सार्वजनिक कमरे” में होना चाहिये, न कि बच्चों के कमरे में। पालकों को अपनी लड़कियों को ऐसे लड़कों के जाल में फ़ँसने से बचाव के बारे में पूरी जानकारी देना चाहिये। यदि कोई लड़की गुमसुम, उदास अथवा सभी से कटी-कटी दिखाई देने लगे तब तुरन्त उसकी गतिविधियों पर बारीक नज़र रखना चाहिये।
(यदि ऐसे दिशानिर्देश किसी हिन्दूवादी संगठन ने जारी किये होते, तो पता नहीं अब तक नारी संगठनों और न्यूज़ चैनलों ने कितनी बार आकाश-पाताल एक कर दिये होते)।

उल्लेखनीय है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक ताज़ा आदेश में “लव जेहाद” के बारे में पूरी तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के निर्देश दिये हैं (शायद हाईकोर्ट भी साम्प्रदायिक हो??)। एक अपुष्ट सूचना के अनुसार सन् 2005 से अब तक 4000 ईसाई लड़कियों द्वारा धर्म परिवर्तन किया जा चुका है, उनमें से कुछ गायब भी हो गईं। इस न्यूज़लेटर में आगे कहा गया है कि चूंकि वे लड़कियाँ 18 वर्ष से उपर की हैं इसलिये वे कानूनन इस बारे में कुछ कर भी नहीं सकते, लेकिन ईसाई लड़कियों की मुस्लिम लड़कों से बढ़ती दोस्ती निश्चित ही चिन्ता का विषय है।

इस कमीशन के सचिव फ़ादर जॉनी कोचुपराम्बिल कहते हैं कि “फ़िलहाल” यह मामला धार्मिक लड़ाई का नहीं लगता बल्कि यह एक सामाजिक समस्या लगती है…। यह लड़कियाँ अपने कथित प्यार की खातिर सब कुछ छोड़कर चली जाती हैं, लेकिन जल्दी ही उनके साथ यौन दुराचार शुरु हो जाता है तथा उनकी जिन्दगी नर्क बन जाती है, जहाँ उन्हें कोई आज़ादी नहीं मिलती (यह भी एक साम्प्रदायिक बयान लगता है…??)। जिस परिवार पर यह गुज़रती है, वह सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से कई बार पुलिस में भी नहीं जाता, जिसका फ़ायदा लव जेहादियों को मिलता है। न्यूज़लेटर में सन् 2006 से 2009 के बीच, विभिन्न जिलावार 2868 ईसाई लड़कियों के नाम-पते हैं जो मुस्लिम लड़कों के प्रेमजाल में फ़ँसीं, जिसमें से अकेले कासरगौड़ जिले की 586 लड़कियाँ शामिल हैं। फ़ादर कहते हैं कि “हमें यह मसला गम्भीरता से लेना होगा…”।

इन लव जेहादियों को शुरुआत में बाइक, मोबाइल तथा फ़ैशनेबल कपड़ों के पैसे दिये जाते हैं और “काम” सम्पन्न होने के बाद प्रति धर्मान्तरित लड़की एक लाख रुपये दिये जाते हैं। कॉलेजों में एडमिशन लेते समय इन्हें ऐसी ईसाई-हिन्दू लड़कियों की लिस्ट थमाई जाती है, जिन्हें आसानी से फ़ुसलाया जा सकता हो। इस काम में मुख्यतः खाड़ी देशों से पैसा आता है और सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि गायब हो चुकी लड़कियाँ वहीं पहुँचाई जा चुकी हैं।

सेकुलरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि जब हिन्दुत्ववादी संगठन कुछ भी कहते हैं तो वे इसे दुष्प्रचार, साम्प्रदायिक झूठ आदि की संज्ञा दे देते हैं, समस्या को समस्या मानते ही नहीं, रेत में सिर दबाये शतुरमुर्ग की तरह पिछवाड़ा करके खड़े हो जाते हैं। लव जेहाद के बारे में सबसे पहले हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ही आवाज़ उठाई थी, लेकिन हमेशा की तरह उसे या तो हँसी में टाला गया या फ़िर उपेक्षा की गई। अब आज जबकि कर्नाटक और केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश खुद इसकी जाँच के आदेश दे रहे हैं तब इनकी बोलती बन्द है। ईसाई संगठनों को भी इस लव जेहाद के अंगारे महसूस होने लगे तभी माना गया कि यह एक समस्या है, वरना हिन्दू संगठन कितना भी कहें कोई मानने वाला नहीं, सेकुलरों का यही रवैया उन्हें देशद्रोही की श्रेणी में रखता है। क्या आज से 50 साल पहले कश्मीर की स्थिति के बारे में किसी ने सोचा था कि वहाँ से हिन्दुओं का नामोनिशान मिट जायेगा? आज जब हिन्दूवादी संगठन असम, पश्चिम बंगाल और केरल के बदलते जनसंख्या आँकड़ों और राजनैतिक परिस्थितियों का हवाला देते हैं तब सेकुलर और कांग्रेसी इसे गम्भीरता से नहीं लेते, लेकिन कुछ वर्षों बाद ही वे इसे समस्या मानेंगे, जब स्थिति हाथ से निकल चुकी होगी… लानत है ऐसी सेकुलर नीतियों पर। हाल ही में “नक्सलवादियों की चैम्पियन बुद्धिजीवी”(?) अरुंधती रॉय ने बयान दिया कि “जब राज्य सत्ता किसी व्यक्ति की सुन ही नही रही हो, और उस पर अन्याय और अत्याचार जारी रहे तो उसका बन्दूक उठाना जायज़ है…”, फ़िर तो इस हिसाब से कश्मीर के विस्थापित हिन्दुओं को सबसे पहले हथियार उठा लेना चाहिये था, क्या तब बुकर पुरस्कार विजेता उनका साथ देंगी? जी नहीं, बिलकुल नहीं, क्योंकि यदि हिन्दू “प्रतिकार” करे तो वह घोर साम्प्रदायिकता की श्रेणी में आता है, ऐसी गिरी हुई मानसिकता है इन सेकुलर लुच्चों-टुच्चों की। हिन्दुओं के साथ कोई अन्याय हो तो वह कानून-व्यवस्था का मामला है, हिन्दू लड़कियों के साथ लव जेहाद हो तो वह साम्प्रदायिक दुष्प्रचार है, और यदि मामला मुस्लिमों और ईसाई लड़कियों से जुड़ा हो तब वह या तो सेकुलर होता है अथवा हिन्दूवादी संगठनों का अत्याचार…

पिछली पोस्ट में मैंने भारत में ईसाई मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी इस बारे में कुछ बताया था, जिस पर आदरणीय शास्त्री जी अपना जवाब जारी रखे हुए हैं। इस जवाब की पहली किस्त में शास्त्री जी ने केरल की विशिष्ट परम्परा और धार्मिक समूहों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया है, मुझे उम्मीद है कि शास्त्री जी केरल के तेजी से बदलते राजनैतिक और सामाजिक वातावरण पर भी लिखेंगे। शास्त्री जी सज्जन व्यक्ति हैं इसलिये हो सकता है कि शायद उन्होंने मेरी पोस्ट में उल्लिखित केरल के राजनैतिक वातावरण को नज़र-अंदाज़ कर दिया हो, लेकिन मुझे आशा है कि शास्त्री जी, केरल में अब्दुल नासेर मदनी के बढ़ते प्रभाव, उम्मीदवार चयन में “चर्च के दखल” और कन्नूर तथा अन्य जगहों पर संघ कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याओं तथा इन सारी घटनाओं के दूरगामी प्रभाव के सम्बन्ध में भी कुछ अवश्य लिखेंगे, जो कि मेरा मूल आशय था। फ़िलहाल शास्त्री जी पहले अपना लेख पूरा कर लें, फ़िर मैं बाद में कुछ कहूंगा, तब तक के लिये केरल के हालात पर यह एक छोटी सी पोस्ट है। मैं शास्त्री जी जितना सज्जन नहीं हूं, इसलिये मुझे प्रत्येक राजनैतिक घटना को थोड़ा “टेढ़ा” देखने की आदत है, साथ ही किसी बुरी नीयत से किये गये “तथाकथित अच्छे काम” को भाँपने की भी… बहरहाल केरल के राजनैतिक हालातों पर एक अन्य विस्तृत पोस्ट शास्त्री जी के लेख समाप्त होने के बाद लिखूंगा…

फ़िलहाल केरल और ईसाई धर्मान्तरण से सम्बन्धित मेरे कुछ अन्य लेखों की लिंक्स नीचे दी जा रही है, पढ़ें और बतायें कि इसमें से आपको कितना काल्पनिक लगता है और कितना तथ्यहीन… 🙂

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/04/talibanization-kerala-congress-and_13.html


http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/04/talibanization-kerala-congress-and.html


http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/11/kerala-and-malwa-becoming-nursery-of.html


http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/10/alliance-between-church-and-naxalites_10.html


http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/09/pope-conversion-in-india.html

इस खबर की स्रोत साइटें…

http://expressbuzz.com/edition/story.aspx?Title=Watch+your+children+well:+KCBC+panel&artid=ApAxX8jXX54=&SectionID=1ZkF/jmWuSA=&MainSectionID=1ZkF/jmWuSA=&SEO=KCBC,+Fr+Johny+Kochuparambil,+jehadis,+Christian&SectionName=X7s7i%7CxOZ5Y=

http://in.christiantoday.com/articles/church-warns-of-love-jihad-in-kerala/4623.htm

http://mangalorean.com/news.php?newstype=broadcast&broadcastid=152084

चित्र साभार – द टेलीग्राफ़

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>अफजल तो फ़िर भी बच गया.

>मै अपने कुछ मित्रो के साथ मेरठ से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में समय काटने के लिए कुछ बातचीत का दौर चल पडा , तो यात्रा में केन्द्रीय सरकार के कार्यो की मीमांसा शुरू हो गई। बात शुरू हुई अफजल की,क्योकि हमने भी अफजल गुरु की फांसी के लिए कई प्रदर्शन किए थे। खूब जुलुस निकाले और खूब गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये भी कि अफजल को फांसी दो,फांसी दो। हुआ कुछ नही तो एक भड़ास थी मन में, निकालनी शुरू कर दी।
हमने बात को आगे बढाते हुए कहा कि,कितने साल हो गए लेकिन सरकार अफजल को फांसी नही दे रही है और अब तो सरकार ने हद कर दी है कि केन्द्र सरकार आतंकवादियों के परिवार की पेंशन बांधने जा रही है और भी बातें आगे बढ़ी। कसाब का जिक्र हुआ, सोहराबुद्दीन का हुआ। अंत में मैंने मित्रो के साथ एक निर्णय किया कि,हम भी बहरे प्रशासन व सोई हुई हिंदू जनता को जगाने के लिए कोई ऐसा कार्य करे कि हमारी बात को पूरा मीडिया जगत पूरे देश में पहुचाये।
निर्णय भी ले लिया कि भगत सिंह जी के अनुरूप हम भी तेज धमाके वाला व धुएँ वाला कोई बम फोडेंगे । जिससे कोई व्यक्ति आह़त न हो,तथा अपनी ग्रिफतारी देकर जनता को जगायंगे। अब बात थी कि बम कहाँ फोड़ा जाय, तो तय हुआ की दिल्ली तो जा रहे है क्यो न कनाट प्लेस पर ये शुभ कार्य किया जाय। अब दिल्ली पहुचकर बम की खोज शुरू हो गई। जल्दी ही दिवाली पर छोड़े जाने वाले दो पटाखे हमे प्राप्त हो गए। और कनाट प्लेस पर जाकर फोड़ डाले और इन्तजार करने लगे मीडिया का।
परन्तु एक आर्श्चय हुआ कि भारतीय पुलिस जो हमेशा घटना के काफी देर बाद पहुचती है वो मिडिया के लोगो से पहले पहुँच गई,और हमे ग्रिफतार कर लिया गया। हमने बड़ी शान से ग्रिफ्तारी भी दे दी। परन्तु थाने तक पहुचते पहुचते सारा नजारा ही बदल गया। लगता था की पूरी दिल्ली की सारी पुलिस वहां थी ,हमने सोचा कि हमारे आलावा कोई बहुत बड़ा आतंकी भी शायद इसी थाने मे है। परन्तु जो हुआ वो तो सोचा भी न था ,कि वो सारा इंतजाम तो हमारे लिए ही था।अब हमें महसूस होने लगा कि सारा मामला ही बिगड़ गया है।
पुलिस का कोई ऑफिसर हमसे पूछ रहा था कि और कहाँ कहाँ बम फोड़ने का प्लान है?कोन से आतंकवादी संगठन से जुड़े हो?तो कोई पूछ रहा था कि इससे पहले कहाँ कहाँ बम फोडे है।

अफजल को फांसी दिलाने का सारा सपना चूर-चूर होता दीख रहा था। परंतु मैंने थोडी सी हिम्मत दिखायी,और पुलिस को सारा नाटक समझाया कि हम तो सोई जनता को जगाने के लिए व बहरे शासन को अपना पक्ष सुनाने के लिए सरदार भगत सिंह के रास्ते पर चलना चाह रहे है। परंतु हमारी बात किसी ने भी नही सुनी।
एक सिपाही हमारे पास आया ,बोला बबुआ कोन आतंकवादी को फोलो कर रहे हो,बड़ा साब और मंत्री जी आपके बारे में बतिया रहे है तो मंत्री जी ही कहत रह कि इ लोगन तो ससुरा बहुत बड़े आतंकी का फोलो करता है। ससुरों को कल ही फांसी पर लटकवा दो।
पता नही रात कैसे कटी ?आँख लग ही नही पायी। सुबह सुबह एक नेताजी आए हाथ में समाचार पत्र लिए हुए थे। हमारे ऊपर फैक कर मारा कि तुम हिंदू आतंकवादी बाज नही आओगे। पहले अंग्रेजो को मार रहे थे अब हमे मारना चाहते हो। हमारी कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि हम करे तो क्या करे ? हमे न तो कोई फोन ही करने दिया गया, और न ही मीडिया से बात।
achanak केन्द्रीय सरकार भी हरकत मे आ गई। सरकार की मीटिंग हुई। मैडम जी ने सरदार को ऑर्डर दिया की, मन्नू इन आतंकवादियों को एक महीने में फांसी हो जानी चाहिए, चुनाव नजदीक है। काफी फायदा मिलेगा। मैडम के ही एक मंत्री ने कहा कि मैडम जी बुरा न मानो तो एक बात कहूं कि इन को फांसी देने के बाद हिंदू लोग अफजल के बारे में नही पूछेंगे। बैठक में एक मिनट को सन्नाटा छा गया । परंतु मैडम की जहरीली मुस्कान चेहरे पर फैली और बोली ये तो अच्छा ही है, लगे हाथ अफजल की फांसी की घोषणा भी कर देते है,मुसलमानों को ये तो कह ही देंगे की देखो हमने मुस्लिम आतंकी को फांसी देने से पहले चार हिंदू आतंकियों को फांसी पर चढाया है। बैठक में मैडम की जय जयकार होने लगी और मीटिंग समाप्त हो गई।
आर्श्चय, एक महीने में ही हमारे विरूद्ध सारे सबूत जुटा लिए गए।सारी राजनैतिक ताकत हमारे विरूद्ध खडी हो गई । समाचार पत्र से पता लगा कि हमारे बाद अफजल को भी फांसी हो रही है,तो मन में कही थोडी खुशी हुई कि चलो हमारा बलिदान ही सही लेकिन अफजल को फांसी तो हो रही है।
अब फाँसी वाला दिन भी आ गया । हमे फाँसी के तख्ते की और ले जाया जाने लगा । हम सोच रहे थे जेल के चारो और हमारी जय जयकार हो रही होगी। परंतु कोई इंसान तो इन्सान किसी जानवर कि भी आवाज नही आई। हाँ रास्ते में मिले एक दो कैदियों ने जरूर कहा कि साले चले थे भगत सिंह बनने,अब मरो।हम भी बेशर्मी से उनकी और देखते हुए निकल गए।
अब जैसे ही हमे फांसी पर लटकाया गया तो अचानक हमारी आँख खुल गई,और अपने को अपने बिस्तर पर पसीनो से लथपथ पाया। कुछ देर तो अपने को सँभालने में लगी। पर जैसे ही अपने सपने के बारे में सोचा तो बड़ा अफ़सोस हुआ कि आँख खुलने से अफजल तो साला फ़िर भी बच गया.

>नवगीत: चीनी दीपक-दियासलाई संजीव ‘सलिल’

>नवगीत

संजीव ‘सलिल’

चीनी दीपक
दियासलाई,
भारत में
करती पहुनाई…

*

सौदा सभी
उधर है.
पटा पड़ा
बाज़ार है.
भूखा मरा
कुम्हार है.
सस्ती बिकती
कार है.

झूठ नहीं सच
मानो भाई.
भारत में
नव उन्नति आयी…

*

दाना है तो
भूख नहीं है.
श्रम का कोई
रसूख नहीं है.
फसल चर रहे
ठूंठ यहीं हैं.
मची हर कहीं
लूट यहीं है.

अंग्रेजी कुलटा
मन भाई.
हिंदी हिंद में
हुई पराई……

*

दड़बों जैसे
सीमेंटी घर.
तुलसी का
चौरा है बेघर.
बिजली-झालर
है घर-घर..
दीपक रहा
गाँव में मर.

शहर-गाँव में
बढ़ती खाई.
जड़ विहीन
नव पीढी आई…

*

>अमेरिका भारत की धार्मिक नीतियों के बारे में बोलना बंद करे.

>अब भारत सरकार की धार्मिक निति क्या हो और उसे पूरे देश में किस प्रकार लागू किया जाय ?इसकी चिंता अमेरिका सरकार को सताने लगी है। इस्लामिक देशों की अपने अपने देश में अल्पसंख्यकों के प्रति क्या निति है किस प्रकार सरेआम वहां अल्पसंख्यकों को मोत के घाट उतारा जा रहा है, किस प्रकार मानवाधिकारों की वहां धज्जियाँ उडाई जा रही हैं,यह सब देख सुनकर भी अमेरिका किसी भी छोटे मोटे इस्लामिक देश के विरूद्ध एक भी शब्द बोलने का साहस नही कर पाता।
चीन की किसी भी घरेलू निति के बारे में बोलने में जिस अमेरिका की रूह कापती है,आस्ट्रेलिया में हो रहे भारतीय समाज पर हमलों के बारे में जिसने एक शब्द भी नही बोला है,वह आज भारत की धार्मिक निति पर खुले आम बयानबाजी कर रहा है तथा एक रिपोर्ट तैयार कराई है।
जी हाँ ,अभी हाल ही में अमेरिका के लोकतंत्र ,मानवाधिकार और श्रम मामलों के सहायक मंत्री माइकल एच पोजर ने भारत की केन्द्र सरकार की धार्मिक निति पर बोलते हुए कहा है की ,”प्रश्न यह है कि भारत की केन्द्र सरकार की निति को स्थानीय स्तर पर किस प्रकार लागू किया जाय।” अमेरिका ने इस मामले में जो रिपोर्ट तैयार की है,उसमे कांग्रेस सरकार की धार्मिक निति (भारत का इसाई करण)की प्रशंसा की है,तथा भाजपा की नीतियों की आलोचना की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि,”कुछ प्रदेशों में इस धार्मिक स्वतंत्रता को धर्मांतरण विरोधी क़ानून बनाकर या क़ानून में संशोधन करके इसे सीमित कर दिया है,और वहां पर अल्पसंख्यक लोगो पर आक्रमण करने वाले लोगो के विरूद्ध कोई भी प्रभावी कार्यवाही नही की गई है।” रिपोर्ट में वरुण गाँधी के भाषण का भी जिक्र किया गया है।
इस बात को अगर पूरी गहराई से परखा जाय,तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि किस प्रकार अमेरिका भारत को एक इसाई देश बनाने की सुनियोजित षड़यंत्र रच रहा है। कभी राजग सरकार के साथ गलबहियां करने वाला अमेरिका किस प्रकार एक विदेशी इसाई महिला के हाथ में सत्ता की चाबी आते ही किस षड़यंत्र में लग गया है, यह रिपोर्ट साफ़ बताती है।

फ़ाइव स्टार होटल की नौकरी छोड़कर, मदुरै की सड़कों पर मनोरोगियों, पागलों और विक्षिप्तों को भोजन कराता एक महात्मा… A Social Worker Madurai

हम सभी ने अपने-अपने शहरों में सड़कों, गलियों और बस-स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशनों आदि कई जगह अनाथ, लेकिन पागल और अर्धविक्षिप्त लोगों को हमेशा देखा है। कभी-कभार दया दिखाये हुए हम उनको कुछ खाने को दे देते हैं, लेकिन मनुष्य के शरीर को भूख तो जीवन भर ही लगती है, सुबह-शाम लगती है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, बुद्धिमान हो या अर्धविक्षिप्त। हम कभी भी इस बात पर विचार नहीं करते कि आखिर शहर भर में फ़ैले ऐसे भिखारियों (जो कि हट्टे-कट्टे और भले-चंगे नहीं, बल्कि जिनका मानसिक सन्तुलन खोया हुआ है) को रोज खाना कैसे मिलता होगा? सुबह-शाम वे क्या खाते होंगे? जो “प्रोफ़ेशनल भिखारी” (जी हाँ, प्रोफ़ेशनल) हैं, वे तो घूम-घूम कर माँगकर शाम तक आराम से इतना पैसा एकत्रित कर लेते हैं कि खाने के अलावा दारू भी पी सकें, लेकिन ऐसे अर्ध अथवा पूर्ण विक्षिप्त बेसहारा लोगों के बारे में क्या, जो ठीक से बोल भी नहीं पाते, अथवा एक जगह से दूसरी जगह चलकर जाने में उन्हें बेहद तकलीफ़ होती है, उनका गुज़ारा कैसे होता होगा?

यही सारे प्रश्न मदुराई के एक युवक एन कृष्णन के दिमाग में उठते थे, लेकिन उसने वह कर दिखाया जो कई लोग या तो सोच ही नहीं पाते, अथवा सिर्फ़ सोचकर रह जाते हैं। मदुराई का यह कर्मठ महात्मा, पिछले सात साल से रोज़ाना दिन में तीन बार शहर में घूम-घूमकर ऐसे रोगियों, विक्षिप्तों और बेसहारा लोगों को खाना खिलाता है। मात्र 30 वर्ष की उम्र में “अक्षयपात्र” नामक ट्रस्ट के जरिये वे यह सेवाकार्य चलाते हैं।

अक्षयपात्र ट्रस्ट की रसोई में झांककर जब हम देखते हैं, तो पाते हैं कि चमचमाते हुए करीने से रखे बर्तन, शुद्ध दाल, चावल, सब्जियाँ और मसाले… ऐसा लगता है कि हम किसी 5 सितारा होटल के किचन में हैं, और हो भी क्यों ना, आखिर एन कृष्णन बंगलोर के एक 5 सितारा होटल के “शेफ़” रह चुके हैं (इतने बड़े होटल के शेफ़ की तनख्वाह जानकर क्या करेंगे)। कृष्णन बताते हैं कि आज सुबह उन्होंने दही चावल तथा घर के बने अचार का मेनू तय किया है, जबकि शाम को वे इडली-सांभर बनाने वाले हैं… हम लोग भी तो एक जैसा भोजन नहीं खा सकते, उकता जाते हैं, ऐसे में क्या उन लोगों को भी अलग-अलग और ताज़ा खाना मिलने का हक नहीं है?”। कृष्णन की मदद के लिये दो रसोईये हैं, तीनों मिलकर नाश्ता तथा दोपहर और रात का खाना बनाते हैं, और अपनी गाड़ी लेकर भोजन बाँटते हैं, न सिर्फ़ बाँटते हैं बल्कि कई मनोरोगियों और विकलांगों को अपने हाथ से खिलाते भी हैं।

कृष्णन कहते हैं कि “मैं साधारण भिखारियों, जो कि अपना खयाल रख सकते हैं उन्हें भोजन नहीं करवाता, लेकिन ऐसे बेसहारा जो कि विक्षिप्त अथवा मानसिक रोगी हैं यह हमसे पैसा भी नहीं मांगते, और न ही उन्हें खुद की भूख-प्यास के बारे में कुछ पता होता है, ऐसे लोगों के लिये मैं रोज़ाना भोजन ले जाता हूं”। चौराहों, पार्कों और शहर के विभिन्न ठिकानों पर उनकी मारुति वैन रुकती है तो जो उन्हें नहीं जानते ऐसे लोग उन्हें हैरत से देखते हैं। लेकिन “पेट की भूख और कृष्णन द्वारा दिये गये मानवीय संवेदना के स्पर्श” ने अब मानसिक रोगियों में भी इतनी जागृति ला दी है कि वे सफ़ेद मारुति देखकर समझ जाते हैं कि अब उन्हें खाना मिलने वाला है। कहीं-कहीं किसी व्यक्ति की हालत इतनी खराब होती है कि वह खुद ठीक से नहीं खा सकता, तब कृष्णन उसे अपने हाथों से खिलाते हैं। कृष्णन बताते हैं कि उन्होंने ऐसे कई बेसहारा मानसिक रोगी भी सड़कों पर देखे हैं, जिन्होंने 3-4 दिन से पानी ही नहीं पिया था, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था पानी कहाँ मिलेगा, और पीने का पानी किससे और कैसे माँगा जाये।

इतना पुण्य का काम करने के बावजूद भोजन करने वाला व्यक्ति, कृष्णन को धन्यवाद तक नहीं देता, क्योंकि उसे पता ही नहीं होता कि कृष्णन उनके लिये क्या कर रहे हैं। सात वर्ष पूर्व की वह घटना आज भी उन्हें याद है जब कृष्णन अपने किसी काम से मदुराई नगर निगम आये थे और बाहर एक पागल व्यक्ति बैठा अपना ही मल खा रहा था, कृष्णन तुरन्त दौड़कर पास की दुकान से दो इडली लेकर आये और उसे दीं… जब उस पागल ने उसे खाया अचानक उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आई… कृष्णन कहते हैं कि “उसी दिन मैंने निश्चय कर लिया कि अब ऐसे लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था मुझे ही करना है, उस भूखे पागल के चेहरे पर आई हुई मुस्कुराहट ही मेरा धन्यवाद है, मेरा मेहनताना है…”।

इस सारी प्रक्रिया में कृष्णन को 12,000 रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है (भोजन, सब्जियाँ, रसोईयों की तनख्वाह, मारुति वैन का खर्च आदि)। वे कहते हैं कि अभी मेरे पास 22 दिनों के लिये दानदाता मौजूद हैं जो प्रतिमाह किसी एक तारीख के भोजन के लिये 12,000 रुपये रोज भेजते हैं, कुछ रुपया मेरे पास सेविंग है, जिसके ब्याज आदि से किसी तरह मेरा काम 7 साल से लगातार चल रहा है। इन्फ़ोसिस और TVS कम्पनी ने उन्हें 3 एकड़ की ज़मीन दी है, जिस पर वे ऐसे अनाथ लोगों के लिये एक विश्रामगृह बनवाना चाहते हैं। सात साल पहले का एक बिल दिखाते हुए कृष्णन कहते हैं कि “किराने का यह पहला बिल मेरे लिये भावनात्मक महत्व रखता है, आज भी मैं खुद ही सारा अकाउंट्स देखता हूं और दानदाताओं को बिना माँगे ही एक-एक पैसे का हिसाब भेजता हूं। आर्थिक मंदी की वजह से दानदाताओं ने हाथ खींचना शुरु कर दिया है, लेकिन मुझे बाकी के आठ दिनों के लिये भी दानदाता मिल ही जायेंगे, ऐसा विश्वास है”। इलेक्ट्रानिक मीडिया में जबसे उन्हें कवरेज मिला और कुछ पुरस्कार और सम्मान आदि मिले तब से उनकी लोकप्रियता बढ़ गई, और उन्हें अपने काम के लिये रुपये पैसे की व्यवस्था, दान आदि मिलने में आसानी होने लगी है।

ऐसा नहीं कि कृष्णन का एक यही काम है, मदुरै में पुलिस द्वारा जब्त की गई लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार भी वे करते हैं। नगर निगम, सरकारी अस्पताल और पुलिस उन्हें सूचित करते हैं और वे उन लावारिस मुर्दों को बाकायदा नहला-धुलाकर उनका अन्तिम संस्कार करते हैं।

कृष्णन अभी तक अविवाहित हैं, और उनकी यह शर्त है कि जिसे भी मुझसे शादी करना हो, उसे मेरा यह जीवन स्वीकार करना होगा, चाहे किसी भी तरह की समस्याएं आयें। कृष्णन मुस्कराते हुए कहते हैं कि “…भला ऐसी लड़की आसानी से कहाँ मिलेगी, जो देखे कि उसका पति दिन भर दूसरों के लिये खाना बनाता रहे और घूम-घूमकर बाँटता रहे…”। प्रारम्भ में उनके माता-पिता ने भी उनकी इस सेवा योजना का विरोध किया था, लेकिन कृष्णन दृढ़ रहे, और अब वे दोनों इस काम में उनका हाथ बँटाते हैं, इनकी माँ रोज का मेनू तैयार करती है, तथा पिताजी बाकी के छोटे-मोटे काम देखते हैं। पिछले 7 साल में गर्मी-ठण्ड-बारिश कुछ भी हो, आज तक एक दिन भी उन्होंने इस काम में रुकावट नहीं आने दी है। जून 2002 से लेकर अक्टूबर 2008 तक वे आठ लाख लोगों को भोजन करवा चुके थे।

रिश्तेदार, मित्र और जान-पहचान वाले आज भी हैरान हैं कि फ़ाइव स्टार के शेफ़ जैसी आलीशान नौकरी छोड़कर उन्होंने ऐसा क्यों किया, कृष्णन का जवाब होता है… “बस ऐसे ही, एक दिन अन्दर से आवाज़ आई इसलिये…”।

कृष्णन जैसे लोग ही असली महात्मा हैं, जिनके काम को भरपूर प्रचार दिया जाना चाहिये, ताकि “समाज की इन अगरबत्तियों” की सुगन्ध दूर-दूर तक फ़ैले, मानवता में लोगों का विश्वास जागे, तथा यह भावना मजबूत हो कि दुनिया चाहे कितनी भी बुरी बन चुकी हो, अभी भी ऐसा कुछ बाकी है कि जिससे हमें संबल मिलता है।

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समाज के ऐसे ही कुछ अन्य लोगों के बारे मे मेरे निम्न लेख भी पढ़ सकते हैं…

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/10/dedicated-doctor-koelhe-at-gadhchiroli.html



http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/07/social-service-medical-equipments.html


http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/06/unnoticed-unsung-heroes-of-india.html

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>तेरे बिन

>तनहा तनहा
रात गुजारी,
तनहा तनहा दिन

खयालो में ही
खोया रहता हूँ,
सारा सारा दिन

नहीं सह सकता
विरह की पीडा
हर पल छिन

अब तो आजा
हरजाई,
नहीं लगता दिल
तेरे बिन

mylogo

>दो दशकों से चला आया रहा है यह वाम- आतंकवाद / लाल-आतंकवाद क्यों नहीं दिखता ?

>

कमजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति ने माओवादिओं के हौसले दिनोदिन बुलंद होते हीं जा रहे हैं . अभी -अभी टीवी पर खबर देखा तो दंग रह गया . अब तक रेल की पटरियां उड़ाने वाले माओवादिओं ने रेल को हीं बंधक बना लिया है . खबर में बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के झारग्राम में भुवनेश्वर राजधानी ट्रेन को पीसीपीए नाम के माओवादी संगठन ने रोक रखा है . माओवादियों की दलील है कि सरकार की ज्यादतियों के विरोध में ऐसा किया गया है और उन्होंने माओवादी सरगना छत्रधर  महतों की रिहाई की मांग की है  . अब कोई उनसे और दिल्ली में बैठे नक्सलियों -माओवादिओं को वैचारिक खुराक देने वालों से पूछेगा कि सरकार की कौन सी ज्यादती किसके खिलाफ है ? उन ज्यादतियों के जबाव इस तरह आम आदमी को बंधक बना कर देने का ठेका उन्हें किसने दिया है ? गरीबों ,मजदूरों ,किसानों को न्याय दिलाने के नाम पर आम जनता को निशाना बनाना क्या आतंकवाद नहीं  ? लोकतंत्र के चौथे खम्भों को अपने कन्धों पर ढ़ोने का दावा करने वाले दलाल बताएँगे कि उन्हें हिन्दू आतंकवाद दिखता है , इस्लामिक आतंकवाद दिखता है लेकिन  दो दशकों  से चला आया रहा है यह वाम- आतंकवाद / लाल-आतंकवाद क्यों नहीं दिखता ? क्यों माओवादियों /नक्सलवादिओं को समानता की लड़ाई का सिपाही बता कर उनके पक्ष में तमाम तरह की दलीलें दी जाती है ? अब , मीडिया को पक्षपातपूर्ण रवैया बंद करना होगा . क्या अब भी कुछ जानने को रह गया है ? कब तक  माओवादियों के नकली उद्देश्य के चक्कर में पड़ कर उनके कुकृत्यों को वैचारिक जामा पहनाते रहेंगे ये कलम के दलाल ?
 बाज़ार का  बिस्तर गर्म करने वाले  इन पत्र -अ -कारों  ,नेताओं ,सरगनाओं को बाज़ार से जंग की बातकरने का कोई हक़ नहीं बनता.

>सेमिनार का विषय "in india we are not indians "

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बेगानेपन का अहसास दबाये दिल वालों की दिल्ली में पूर्वोत्तर भारतीय समय काट रहे हैं .मुनिरका ,मुखर्जीनगर ,कटवारिया ,लाडोसराय आदि  इलाकों के दरबे जैसे घरों में रहने वाले इन बेगाने भारतीयों को कदम-कदम पर अपमान का घूंट पी कर जीना पड़ता है . राह चलते चिंकी ,सेक्सी , माल ,नेपाली ,चाइनीज जैसे फिकरे सुनना तो इनकी नियति बन गयी है . हद तो तब हो जाती है मनचले हाथ लगाने पर उतर आते हैं . ऐसा नहीं है कि ये हरकतें कम-पढ़े लिखे आवारा किस्म के लड़के करते हैं बल्कि डीयु ,जामिया,आई आई टी सरीखे नामी गिरामी शिक्षण संसथानों के तथाकथित सभी छात्र भी इनसे मज़े लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते .राजधानी में पूर्वोत्तर की लड़की की आई आई टी के छात्र द्वारा हत्या और ग्यारहवीं के छात्रों द्वारा जामिया के मॉस कॉम में पढ़ रही अरुणाचल की लड़की के कपडे फाड़ने की घटना इन बातों को साबित करने के लिए काफी है . इनकी हालत उन बिहारी रिक्शा चालकों जैसी है जिन्हें दायें -बाएं से आने गुजर रहे हर दुपहिया -चरपहिया वालों की लताड़ खानी पड़ती है . इतना हीं नहीं जब तब सरकार की  भेदभावपूर्ण नीतियों  का शिकार भी इन्हें होना पड़ता है . भारोत्तोलक मोनिका देवी मामले में भारतीय खेल प्राधिकरण का रवैया इसका ताजा उदाहरण है .अकसर हम इनको राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने की बात करते हैं लेकिन क्या इन सबके बावजूद  पूर्वोत्तर राज्यों से पढ़ाई या नौकरी के लिए देश की राजधानी आए लोगों  के मन में भारतीय होने का अहसास बच पायेगा ?
ईटानगर में आयोजित एक सेमीनार में का किस्सा याद आ रहा है . हम संयोगवश वहां पहुंचे थे . हमने सेमिनार का विषय “in india we are not indians ” देखा तो आश्चर्यचकित हो गये . अब  अहसास  हो रहा है, वो गलत नहीं थे . पूर्वोत्तर में हमेशा गृहयुद्ध की हालत को भोग रहे ये लोग जब दिल्ली -मुंबई का रुख करते हैं तब हमसे तिरस्कार ,घृणा के सिवा इन्हें क्या मिलता है ?  विश्वबंधुत्व का ढिंढोरा पीटने वाले हम भारतवासी क्या भारतीय कहलाने के काबिल रह गये हैं ?  हम समय के साथ अपने भारतीय होने की अपनी पहचान को खोते जा रहे हैं . यह एक गिरते हुए समाज की तस्वीर है .जो शक्ति खुद के लिए , समाज के लिए और देश के लिए प्रयोग करनी चाहिए थी वह खुद को हीं बदनाम करने में प्रयोग हो रहा है .इस मामले को महज पुलिस कार्यक्षेत्र का मसला समझ कर भूल जाना हमें महंगा पड़ेगा .पुलिस की नाकामी से पहले यह समाज की और समाज से पहले व्यक्ति की नाकामी और पतन का  सूचक है . आखिर ऐसी मानसिकता समाज से हीं तो पैदा हो रही है जो युवाओं को एक खास वर्ग या समुदाय के प्रति नीचता करने को प्रेरित करती है ? समाज को चलाने का दंभ करने वाले बुद्धिजीवी लोग भी इस मसले पर मूकदर्शक बने नज़र आते हैं .मुंबई में राज ठाकरे की गुंडई पर गला फाड़ने वाले पत्रकार बंधू भी गला साफ़ करने में लगे रहते हैं .क्या जो उत्तर भारतीयों के साथ मुंबई में होता है वही पूर्वोत्तर वालों के साथ दिल्ली में नहीं हो रहा है ? फ़िर ,विरोध में भेदभाव क्यों ? क्या देश के चौथे स्तम्भ की उदासीनता { बाकि तो पहले से कन्नी कटे हुए हैं } से मान लिया जाए चीन की बात सही है कि अरुणाचल उनका हिस्सा है ? क्या इसी तरह सांस्कृतिक के आधार पर थोड़े अलग इन भारतीयों को गैरभारतीय मान लिया जाए जिन्हें दिल्ली -मुंबई में शरण दे कर हमने उन पर अहसान किया है ?

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सम्पादकीय समूह , जनोक्ति

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