भारत में ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी… Christian Muslim Ratio and Dominance in Kerala

केरल, भारत का प्राकृतिक रूप से सम्पन्न एक खूबसूरत प्रदेश, जहाँ समुद्र का “बैकवाटर” इसे भारत का वेनिस कहे जाने को मजबूर कर देता है, कुछ ही वर्षों में एक भयानक संघर्ष की भूमि बन जाने को अभिशप्त लगने लगा है। लगभग आज़ादी के बाद से ही यहाँ दो प्रमुख गठबन्धन शासन में रहे हैं, कांग्रेस गठबन्धन और वामपंथी गठबन्धन। हमेशा से इन गठबन्धनों में चर्च और मुस्लिम लीग की भूमिका हमेशा अहम रही है, उम्मीदवारों के चयन से लेकर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने तक में। आज की तारीख में केरल में अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कृषि, ग्रामीण और शहरी भूमि, वित्तीय संस्थानों और सरकार के सत्ता केन्द्रों में ईसाईयों और मुसलमानों का वर्चस्व और बोलबाला है। यदि सरकार, निगमों, अर्ध-सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सरकारी नियन्त्रण में स्थापित उद्योगों में कर्मचारियों का अनुपात देखें तो साफ़ तौर पर चर्च और मुस्लिम-लीग का प्रभाव दिखाई देता है।

खाडी के देशों से आने वाले पैसे (चाहे वह वहाँ काम करने वाले मलयाली लोगों ने भेजे हों अथवा मुस्लिम लीग और मदनी को चन्दे के रूप में मिले हों) ने समूचे केरल में जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है, उसमें हिन्दुओं की कोई भूमिका अब नहीं बची है। ज़ाहिर है कि यह स्थिति कोई रातोंरात निर्मित नहीं हो गई है, गत 60 साल से दोनों गठबन्धनों के राजनेताओं और विदेशी पैसे का उपयोग करके चर्च और मुस्लिम लीग ने अपनी ज़मीन मजबूत की है। लोकतन्त्र के दायरे में रहकर किस प्रकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करना है यह चर्च और मुस्लिम लीग से सीखना चाहिये, उम्मीदवार चयन से ही उनका दखल प्रारम्भ हो जाता है, विदेश से चर्च के लिये तथा खाड़ी देशों से मुस्लिम लीग के लिये भारी मात्रा में आया हुआ पैसा इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, इनके चुने हुए उम्मीदवार जीतने के बाद इन्हीं की जी-हुजूरी करते हैं इसमें कहने की कोई बात ही नहीं है। समूचे केरल में हिन्दू (पूरे देश की तरह ही) बिखरे हुए और असंगठित हैं, उनके पास चुनाव में वोट देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, न ही नीति-निर्माण में उनकी कोई बात सुनी जाती है, न ही उनकी समस्याओं के निराकरण में। केरल में हिन्दुओं की कोई “राजनैतिक ताकत” नहीं है [देश में ही नहीं है], जल्दी ही पश्चिम बंगाल और असम भी इसी रास्ते पर कदम जमा लेंगे, जहाँ हिन्दुओं की कोई सुनवाई नहीं होगी (कश्मीर तो काफ़ी समय पहले ही हिन्दुओं को लतियाकर भगा चुका है)।

फ़िलहाल केरल में जनसंख्या सन्तुलन की दृष्टि से देखें तो लगभग 30% ईसाई, लगभग 30% मुस्लिम और 10% हिन्दू हैं, बाकी के 30% किसी धर्म के नहीं है यानी वामपंथी है (यानी बेपेन्दे के लोटे हैं) जो जब मौका मिलता है, जिधर फ़ायदा होता उधर लुढ़क जाते हैं चाहे चुनावों में मदनी जैसे धर्मनिरपेक्ष(?) का साथ देना हो अथवा चर्च से चन्दा ग्रहण करना हो। केरल में मलाबार देवासोम कानून हो (http://www.thehindu.com/2009/07/25/stories/2009072552860300.htm) अथवा सबरीमाला के मन्दिर के प्रबन्धन का नियन्त्रण अपने हाथ में लेना हो, सारे कानून और अधिसूचनायें ईसाई और मुस्लिम अधिकारी/विधायक मिलजुलकर पास कर लेते हैं। वामपंथी दोगलेपन की हद देखिये कि इन्हें हिन्दू मन्दिरों से होने वाली आय में से राज्य के विकास के लिये हिस्सा चाहिये, लेकिन चर्च अथवा मदरसों को मिलने वाले चन्दे के बारे में कभी कोई हिसाब नहीं मांगा जाता। यही दोगलापन बंगाल में नवरात्र के दौरान काली पूजा के पांडालों में अपने-आप को “नास्तिक” कहने और धर्म को “अफ़ीम” का दर्जा देने वाले वामपंथी नेताओं की उपस्थिति से प्रदर्शित होता है। धीरे-धीरे देश के कई मन्दिरों का प्रबन्धन और कमाई सरकारों ने अपने हाथ में ले ली है और इस पैसे का उपयोग मदरसों और चर्च को अनुदान देने में भी किया जा रहा है। आज की तारीख में केरल विधानसभा का एक भी विधायक खुलेआम हिम्मत से “हाँ, मैं हिन्दू हूँ…” कहने की स्थिति में नहीं है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में कालोनियाँ और सोसायटी चलाने वाले ईसाई-मुस्लिम गठजोड़ को आसानी से कौड़ियों के दाम ज़मीन मिल जाती है। हिन्दुओं के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले हिन्दू मुन्नानी, विश्व हिन्दू परिषद एवं संघ कार्यकर्ताओं पर मराड (http://en.wikipedia.org/wiki/Marad_massacre) तथा कन्नूर (http://www.rediff.com/news/2008/jan/13kannur.htm) जैसे रक्तरंजित हमले किये जाते हैं और पुलिस आँखें मूंद कर बैठी रहती है, क्योंकि हिन्दू न तो संगठित हैं न ही “वोट बैंक”। केरल से निकलने वाले 14 प्रमुख अखबारों में से सिर्फ़ एक अखबार मालिक हिन्दू है, जबकि केबल नेटवर्क के संगठन पर माकपा के गुण्डे कैडर का पूर्ण कब्जा है।

यह तो हुई आज की स्थिति, भविष्य की सम्भावना क्या बनती है इस पर भी एक निगाह डाल लें। यह बात सर्वविदित है कि धर्मान्तरण में चर्च और विदेशी पैसे की भूमिका बेहद अहम है, लेकिन भारत में मुसलमानों के मुकाबले ईसाइयों ने अधिक चतुराईपूर्ण तरीके से धर्म-परिवर्तन करके अपनी जनसंख्या बढ़ाने का काम किया है। जहाँ एक तरफ़ मुस्लिमों ने अपनी खुद की आबादी बढ़ाकर, पाकिस्तानी या बांग्लादेशियों की मदद से अथवा जोर-जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन और जनसंख्या बढ़ाई वहीं दूसरी ओर ईसाई अधिक चालाक हैं, पहले उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा संस्थानों के जरिये समाज में अपनी “इमेज” एक मददगार के रूप में मजबूत की (इस इमेज निर्माण में उन्हीं द्वारा दिये गये पैसों पर पलने वाले मीडिया का रोल प्रमुख रहा)। गाँव-गाँव तथा जंगलों के आदिवासी इलाकों में पहले अस्पताल और शिक्षा संस्थान खोलकर चर्च की इमेज बनाई गई। फ़िर अगले चरण में कभी बहला-फ़ुसलाकर तो कभी धन का लालच देकर गरीबों और आदिवासियों द्वारा चुपके से ईसाई धर्म स्वीकार करवा लिया। मुसलमानों की तरह ईसाईयों ने धर्म परिवर्तित व्यक्ति का नाम बदलने की जिद भी नहीं रखी (जैसे कि बहुत से लोगों को तब तक पता नहीं था कि YS राजशेखर रेड्डी एक ईसाई हैं, जब तक कि उनको दफ़नाने की प्रक्रिया शुरु नहीं हुई, इसी प्रकार उनका दामाद अनिल, कट्टर एवेंजेलिकल ईसाई है और दोनों ने मिलकर तिरुपति मन्दिर के आसपास चर्चों का जाल बिछा दिया हैं)। इस्लाम ग्रहण करते ही यूसुफ़ योहाना को मोहम्मद यूसुफ़ अथवा चन्द्रमोहन को चांद मोहम्मद बनना पड़ा हो, लेकिन ईसाईयों ने हिन्दू नाम यथावत ही रहने दिये (एक रणनीति के तहत फ़िलहाल ही), जैसे अनिल विलियम्स, मनीषा जोसफ़, विनय जॉर्ज आदि, बल्कि कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा नाम ही हिन्दू है, लेकिन असल में वह ईसाई बन चुका होता है। चर्च ने शुरुआती तौर पर धर्म-परिवर्तित लोगों को घरों से हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र निकाल फ़ेंकने पर भी ज़ोर नहीं दिया है, बस “पवित्र जल” छिड़ककर, दुर्गा मैया के फ़ोटो के पास ही बाइबल और क्रास भी रख छोड़ा है।

“फ़िलहाल” का मतलब यह है कि धर्म परिवर्तन करवाने वाले ईसाई संगठनों को अच्छी तरह पता है कि भले ही वह व्यक्ति इस पीढ़ी में “विनय जॉर्ज” रहे, और दुर्गा और बाइबल दोनों को एक साथ रखे रहे, लेकिन उसके लगातार चर्च में आने, और चर्च साहित्य पढ़ने से उसकी अगली पीढ़ी निश्चित ही “विन्सेंट जॉर्ज” होगी, और एक बार किसी खास इलाके, क्षेत्र या राज्य का जनसंख्या सन्तुलन चर्च के पक्ष में हुआ कि उसके बाद ही तीसरा चरण आता है जोर-जबरदस्ती करने, अलग राज्य की मांग करने और भारत सरकार को आँखें दिखाने का (उदाहरण त्रिपुरा, नागालैंड और मिजोरम)। कहने का तात्पर्य यह कि ईसाई संगठन और चर्च, मुसलमानों के मुकाबले बहुत अधिक शातिर तरीके और ठण्डे दिमाग से काम ले रहे हैं। कश्मीर में इस्लाम के नाम पर, हिन्दुओं को लतियाकर और भगाकर, जो स्थिति जोर-जबरदस्ती से बनाई गई है, लगभग अब वैसा ही कुछ उत्तर-पूर्व के राज्यों में ईसाईयत के नाम पर होने जा रहा है, जहाँ कम से कम 20 उग्रवादी संगठनों को चर्च का खुला संरक्षण हासिल है। प्रथम अश्वेत आर्चबिशप डेसमंड टूटू का वह बहुचर्चित बयान याद करें, जिसमें उन्होंने कहा था कि “जब अफ़्रीका में चर्च आया तब हमारे पास ज़मीन थी और उनके पास बाइबल। चर्च ने स्थानीय आदिवासियों से कहा आँखें बन्द करके प्रभु का ध्यान करो, चंगाई होगी… और जब हमने आँखें खोलीं तब हमारे हाथ में सिर्फ़ बाइबल थी, सारी ज़मीन उनके पास…”।

(भारत में हिन्दुओं के बीच फ़ैल रहे “जागरण”, यानी उड़ीसा, गुजरात और तमिलनाडु की घटनाओं, से पोप चिंतित क्यों हैं इसके लिये मेरा एक लेख यहाँ क्लिक करके पढ़ें http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/09/pope-conversion-in-india.html)

केरल में अगले कुछ वर्षों में यही स्थिति बनने वाली है कि हिन्दू जो कि पहले ही कमजोर हो चुके हैं, लगभग बाहर धकियाये जा चुके होंगे तथा “सत्ता पर पकड़” और अपना “वर्चस्व” स्थापित करने के लिये मुस्लिमों और चर्च के बीच संघर्ष होगा। ऐसी स्थिति में वामपंथियों को “किसी एक” का साथ देने के लिये मजबूर होना ही पड़ेगा। क्योंकि दोनों ही धर्म भले ही अपने-आप को कितना ही “सेवाभावी” या “परोपकारी” बतायें, विश्व का ताजा इतिहास बताता है कि सबसे अधिक संघर्ष इन्हीं दो धर्मों के बीच हुआ है, कोई इसे “जेहाद” का नाम देता है, कोई इसे “क्रूसेड” का। जो भी धर्म जहाँ भी बहुसंख्यक हुआ है वहाँ उसने “अल्पसंख्यकों” पर अत्याचार ही किये हैं, हिन्दू धर्म को छोड़कर। भारत से यदि किसी राज्य को अलग करना हो, तो सबसे आसान तरीका है कि उस राज्य में साम-दाम-दंड-भेद की नीतियाँ अपना कर हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना दो, बस अपने-आप अलगाववादी मांग उठने लगेगी, और यह केवल संयोग नहीं हो सकता कि पश्चिम बंगाल और असम दोनों सीमावर्ती राज्य हैं, जहाँ मुस्लिम-ईसाई आबादी की तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। केरल भी इसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, सिर्फ़ यह देखना बाकी है कि केरल के इस ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की स्थिति में जीत किसकी होती है, क्योंकि वैसे भी हिन्दुओं ने आज तक देखते और सहते रहने के अलावा किया भी क्या है?

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29 Comments

  1. October 21, 2009 at 11:37 am

    अरे बाप रे, हमें तो सुन के ही डर लगता है।-Zakir Ali ‘Rajnish’ { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  2. mehta said,

    October 21, 2009 at 12:42 pm

    jagruk kesa ho hindu jab midea hi hamara hoker inke gungan ga rha hai media hi hame jankari deta hai par iss khabar ko wo khabar nhi manta kehta hai bharat dharm nirpeksh hai abb inhe koi ye bataye muslim ka bhumat punjab or sindh me hua wo pakistan ban gya punjab bat gya hindustan ka batawara ho gya abb kha se samjhaye paso ke bal par ye khel deshhit me nhi

  3. October 21, 2009 at 1:07 pm

    यह सब अपने ही देश मै हो रहा है …. राम राम ओर हमारी सरकार कहां सोई हुयी है??

  4. Sachi said,

    October 21, 2009 at 1:37 pm

    Islam and christianity both expand through their own methods, while Islam is violent in nature and believes in the destruction of the earlier ideologies, the church takes the position of sweet poision. they try to respresent Jesus, in the lap of Maa Parvati, and Jospeh always has "Neelkanth" like Shiva, so that they can resemble to hindu gods. No one can deny their roles in education and health sector, but these are centres from where the conversion begins. even in the blogs, we have read many stories on the so called "miracles" of Jesus or Church. I knew this fact, and I am dead sure that your prophecy will come true upto certain extenet in North East & Kerala

  5. October 21, 2009 at 1:47 pm

    सुरेश का हर लेख एक क्लासिक होता है. इस लेख में भी ध्यान योग्य कई बातें कही गई हैं, लेकिन कुछ तकनीकी गलतियों के कारण आलेख एकपक्षीय हो गया है.उदाहरण के लिये केरल में इसाईयों की संख्या 30% नहीं बल्कि 20% है और वह भी 2000 साल में हुआ है. पिछले 200 साल से यह प्रतिशत लगभग स्थिर है.मुस्लिमों की संख्या भी 30% नहीं है.यह कहना एकदम गलत है कि केरल में सिर्फ 10% हिन्दू हैं. केरल के लगभग 60% लोग हिन्दू हैं और नस्तिकों की संख्या न के बराबर है. यह भी कहना गलत है कि केरल के हिन्दू हिम्मत के साथ यह नहीं कह पाते कि वे हिन्दू हैं. भारत के अन्य प्रदेशों की तुलना में केरल के हिन्दू काफी स्वाभिमानी हैं और गर्व के साथ अपने धर्म की घोषणा करते हैं. इतना ही नहीं, केरल शायद हिन्दुस्तान का एकमात्र प्रदेश हैं जहां गैर हिन्दू लोग हिन्दू मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते. इसके बारे में एक दिलचस्प बात कल सारथी पर छापूंगा.सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.Sarathi.info

  6. October 21, 2009 at 1:47 pm

    संगठन के दृष्टिकोण से जो सनातन धर्म में कमिया है, धर्म जल्द विलुप्त होते दिख रहा है,एक तरफ एक ईशा एक अल्लाह और यहाँ चौरासी करोड़ देवता जिनमे ५ सीधे पूज्य उनके बहत्तर औतार पूज्य और चार शंकराचार्य,इशाई एक ,मुसलमान एक सनातन धर्मी भाति भाति के असल अल्पसंख्यक तो हम है !

  7. October 21, 2009 at 1:49 pm

    जब शरीर को कोई बीमारी लग जाती है तो विकारग्रस्त अंग के साथ – साथ शरीर के अन्य अंग भी बीमारी से लड़ने में अपनी भूमिका में मुस्तैद हो जाते हैं और इसी प्रकार शरीर और प्राण की रक्षा होती है परन्तु हिन्दू जब तक अपनी स्वयं की गर्दन पर तलवार की धार न महसूस करे तब तक शुरुर्मुर्गी रवैया अपनाए रहता है और इसीलिए हिन्दू इतिहास गुलामी का इतिहास है.

  8. October 21, 2009 at 1:56 pm

    आदरणीय शास्त्री जी,आपके लेख का इंतज़ार रहेगा…। आपने जिन गलतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है, उसका एक बार और अध्ययन और खोज करने की कोशिश करता हूं…। यदि आँकड़ों पर न जायें तो वैसे मेरे लेख का मंतव्य कुछ अलग है…

  9. safat alam said,

    October 21, 2009 at 2:06 pm

    अच्छी जानकारी प्रस्तुत की है आपने बहुत बहुत धन्यवाद

  10. October 21, 2009 at 2:13 pm

    प्रिय सुरेश, मैं ने तुम्हारे मंतव्य का विरोध नहीं किया है. लेकिन चूँकि मंतव्य गलत आंकडों पर और सुनीसुनाई खबरों पर आधारित है अत: इसमें कहीं गई बातों में कुछ अतिशयोक्ति आ गई है. एक सधे लेखक के लिये जरूरी है कि जहां तक हो सके वह अतिशयोक्ति से बचे. सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.Sarathi.info

  11. arun arora said,

    October 21, 2009 at 2:20 pm

    गर्व से कहो हम गुलाम थे गुलाम है गुलाम ही रहेगे

  12. October 21, 2009 at 3:18 pm

    मैं केरल कभी गया तो नहीं पर पुष्ट खबरों के आधार पे मैं इतना तो कह ही सकता हूँ की आपका आंकडा कमोबेश सही है | २०% ऐसे लोग भी हैं जिनका पूरा नाम ही हिन्दू का है पर वो वास्तव मैं इसाई हैं, नाम नहीं बदलते क्योंकि reservation नहीं मिलेगा | विडम्बना देखिये की इतना कुछ हो रहा है और आम हिन्दू सोया है, धर्म-परिवर्तन वाली समस्या को समस्या मानने को तैयार नहीं | high class और बहुरास्ट्रीय कंपनी मैं काम करने वाले हिन्दू, विलासिता मैं डूबा रहना चाहता है, मध्यमवर्गी हिन्दू अपने आप को माडर्न दिखाने मैं मशगुल है, तथाकथिक हिन्दू बुद्धिजीवी लोग सेकुलर – सेकुलर का खेल खेलने मैं ही मस्त हैं, निम्न वर्ग दो वक्त की रोटी के जुगाड़ मैं रात-दिन एक करता है | जो २-४% सजग हिन्दू हैं वो भी बस यही सोचते हैं की धर्म-परिवर्तन वाली समस्या के समाधान का कार्य RSS, या हिन्दू संगठन का ही है |लेकिन आशावादी और सच्चा वीर वही है जो इन विपरीत परिस्थितियों मैं भी हिम्मत से मैदान मैं डाटा रहता है | कुप्रचारी कितना भी कोशिश कर ले हिन्दू धर्म सनातन है और रहेगा क्योंकि हमारे साथ स्वेम भगवान् हैं … यदा यदा धर्मश्य …. | सुरेश भाई जैसे भगवान् कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाते समय सारे ग्वाल बाल ने अपने लाठी के सहारे ठेंक दिया था बस वैसी ही ठेंक हमें हिन्दू धर्म को बचाने मैं देनी है, मुख्य कार्य को भगवान् ही करेंगे | हाँ हम अपनी ठेंक से पीछे हटे तो … इश्वर भी हमसे विमुख हो जायेंगे ….

  13. October 21, 2009 at 4:21 pm

    अब एक यही कसर रह गयी थी, यह तो पता था कि केरल में ईसाई ज्यादा हैं पर मुस्लिमों के बारे में पहली बार पता चला। वाकई बहुत चिंता का विषय है।

  14. October 21, 2009 at 4:24 pm

    क्या यह सही नहीं की भारत में जितने मुस्लिम है अगर उतने ईसाई होते तो हिन्दू अब तक हिंद महा सागर में गुम हो चुके होते

  15. October 21, 2009 at 4:54 pm

    @धीरू भाई कुछ समझ मैं नहीं आया आप क्या कहना चाहते हैं ? कैसी व्यंग है ये ?

  16. Common Hindu said,

    October 21, 2009 at 5:00 pm

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/– a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu- Hindu Online.

  17. दहाड़ said,

    October 21, 2009 at 5:27 pm

    विवेका नन्द ने कहा था..जब एक हिन्दु धर्मातरित होता है तो ना केवल एक हिन्दु घट जाता बल्कि एक विघटन कारी बढ जाता है अर्थात दुगना देश का नुकसान.घोर सेकुलर वादिओ ने हिन्दु शब्द मजाक बन दिया है जबकि हर वो व्यक्ति हिन्दु है जो भारत माता को नमन करता है जिसका अपमान उसे ठीक ना लगे,जो बलात धर्म परिवर्तन ,लोभ द्वारा केसे भी ना करवाये,गाय को आदर से पूजे,माता पिता का सम्मान करे,अपने लिये बनाये गये भोजन मे से कुछ गरीबो,पशुओ के लिये भी रखे. वोही सही हिन्दु है चाहे वो नाम का इमरान हो या डिसूजा

  18. Common Hindu said,

    October 21, 2009 at 5:48 pm

    ….@ Rakesh Singh – राकेश सिंह truley said …"पर वो वास्तव मैं इसाई हैं, नाम नहीं बदलते क्योंकि reservation नहीं मिलेगा |""सुरेश भाई जैसे भगवान् कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाते समय सारे ग्वाल बाल ने अपने लाठी के सहारे ठेंक दिया था बस वैसी ही ठेंक हमें हिन्दू धर्म को बचाने मैं देनी है…….."

  19. October 21, 2009 at 7:21 pm

    आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी , आपने जो दृष्टिकोण रखा है , केरला की इस्थिति के बारे मैं उसके बारे मैं ये कहना चाहूँगा की आपका दृष्टिकोण संकीर्ण है , कुछ भी ग़लत हो रहा है , तो इसका ये मतलब नही की आप भी ग़लत हो जायें , हिंदू , मुस्लिम ,इसाई जाग्रति की बात सब करते हैं , देश , रास्त्र जाग्रति की बात कोई नही करता , ये हमारे देश का दुर्भाग्य है , वैसे ये आप पर है की आप क्या चुनना चाहते हैं , हमारा देश इतने सालों तक इस लिए पीछे रहा की यहाँ सब राजनीती कर रहे हैं , सायद आप भी उसी राजनीती का शिकार हैं , कभी मेरे ब्लॉग पर पधारें , धरम और जातियों के विषय में मेरे क्या विचार हैं , पढ़ें , कोई गलती हुई हो तो छमा । ध्य्नावाद .

  20. October 22, 2009 at 5:29 am

    सुरेश जी, जहां तक मैंने केरल के अन्दर जाकर देखा, तो मुझे नहीं लगता कि वहाँ के इसाई और मुसलमान आपस में इस बैमानुष्य्ता को पालेंगे ! लेकिन आपकी बात मुझे वहा सत्य लगती है कि जिस तरह से इस्लाम केरल में फैल गया है, हर चार कदम पर इमामबाडे नजर आने लगे है, उससे यह बहुत संभव है ( और जिसके लिए कि मुसलमान जाने भी जाते है ) कि देश के एनी भागो और विदेशो से आकर मुसलमान वहा के इन दोनों समूहों को लड़ाने में कोई कसार नहीं छोडेंगे ! और यह भी संभव है कि कालांतर में इसाइयों का वहा से सफाया भी कर दे !

  21. October 22, 2009 at 5:34 am

    लेख के आँकड़े गलत हो सकते है, चिंताएं सही है. "देश के कई मन्दिरों का प्रबन्धन और कमाई सरकारों ने अपने हाथ में ले ली है और इस पैसे का उपयोग मदरसों और चर्च को अनुदान देने में भी किया जा रहा है।" पूर्णतः सहमत. मैं हमेशा से कहता आया हूँ और इस पर कायम हूँ कि हमें ईसाईयों से सीखना चाहिए. आज भी कहता हूँ. जैसी बातें आपने ईसाईयों के लिए कही है, इस पर शास्त्रीजी की टिप्पणी आई है. क्या एक मुसलमान या हिन्दु इतना शांत रह पाता? यह जरूरी है.

  22. October 22, 2009 at 6:04 am

    अरूण सही कह रहे हैं।

  23. October 22, 2009 at 11:14 am

    लोकतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता,समानता के नाम पर किस तरह संसाधनों पर कब्ज़ा किया जाता है ये तो कोई भारत के कथित ऊँची जातियों के हिन्दुओ से सीखे.

  24. October 22, 2009 at 12:26 pm

    सुरेश जी मैं चाहूँगा की धर्म के विषयों पर चर्चा हो ।

  25. October 22, 2009 at 4:31 pm

    इस लेख में आँकडे महत्वपूर्ण नहीं हैं, महत्वपूर्ण वह प्रक्रिया है जो हिन्दुओं को कमज़ोर और अल्पसंख्यक बना रही है । एक सुलझे हुए ईसाई से चुप नहीं रहा गया और वह अपने धर्म् बन्धुओं के कृत्यों को न्यायोचित ठहराने के लिए लेख लिखेगा और हमारे हिन्दुओं को कौन समझाए सुरेश चिपलूनकर के लेख का विरोध कर समझ लेते हैं कि वे विश्व मानव हो गए … श्रीराम इन्हें बुद्धि दो…और बचाओ आतताईयों से…तलवार तो इनसे उठेगी नहीं…

  26. October 23, 2009 at 5:38 am

    केरल सदियों से सभी विदेशी धर्मों का पनाहगार रहा है. वहां की सहिष्णुता अतुलनीय है. इसका अनुभव वहां कुछ समय बिताने पर ही किया जा सकता है. पूरे देश की तुलना में वहां धार्मिक उन्माद के कारण हुए दंगे नगण्य हैं.हमारी कामना है की वहां साम्प्रदायिक घमासान की स्थिति निर्मित न हो.

  27. SANJAY KUMAR said,

    October 26, 2009 at 12:51 pm

    Apart from Muslim and Christian divisive forces, Forces like Thakrey cannot be pardoned off, in the guise of Hindusim, they are doing much harm to the Hindu community settled in Maharashtra.What a shame ? A hindu cannot celebrate his PURE & AUSPICIOUS FESTIVAL of CHHATH, becuase of a HINDU.Many North Indians were so scared to celebrate CHHATH that they went back to their native place for celebrations.Remaining who had performed they performed under heavy protection due to threat not from PAKISTAN or TALIBAN rather …..( Shame to call them Hindu also).Now it is becoming difficult for HINDU to protect thier relions because of THAKREYS and their goons.During our "Scared Thread (ygayopavit)" ceremony, we performs ritual of going KASHI for education".Thakrey shall look through their regional spectacles and ask us to change the ritual to going to Latur, Jalgaon or Dhulia.During our puja we make ahwhan (Calling) of "Sapt-sindhu (Seven rivers)" as GANGA, YAMUNA GODAVARI SCH–" now we may have to change "Godavari, Bani, Khari, Mithi -sch (rivers of Maharashtra)"It is matter of shame none of the Hindu nor follower of other religion, not even commumnist and secular has ever made any remark against this Hindu festival. It is condemned none other than person who claim themselves as champions of Hindu Cause"

  28. October 26, 2009 at 2:36 pm

    @संजय कुमार जी … there is no doubt about the damage being done by Thakrey. I agree to you on this. We need to fight against this Thakrey along with other Anti-Hindu. Thakrey is anti-hindu but he says that he is a Hindu.

  29. October 31, 2009 at 2:00 pm

    मुझे इन आकंडो के बारे में जानकारी नही इस्लिये उस पर मैं कुछ नही बोलुंगा…सुरेश जी हमारे देश में आज़ादी के बाद बहुत से हिन्दुओं ने धर्म परिवर्तन किया है और इस विषय पर बहुत बार शोर-शराबा और हो-हल्ला मच चुका है। हर बार शोर मचाने वाले थोडी देर शोर मचाकर चुप हो जाते है लेकिन कभी किसी ने इस बात की वजह को गहराई से जानने की नही की और ना ही कोई करना चाहता है…लोग कहते है की ज़ब्रद्स्ती धर्म-परिवर्तन करा दिया..या पैसा देकर करा दिया… आप एक बात बतायें दिया गया पैसा कितने दिन चलेगा??? या फ़िर ज़बर्द्स्ती धर्म-परिवर्तन कराने के बाद क्या दिल से अपने भगवान के प्रति आस्था भी खत्म हो जाती है???? क्या आप ज़ब्रद्स्ती नमाज़ पढ लोगे?? या मैं ज़ब्रद्स्ती पुजा कर लुंगा???मैं आज आपको इसका मुख्य कारण बताता हूं इसका मुख्य कारण "सनातन धर्म" में मौजुद जाति-प्रथा है…लोग कहते है की हमने इस प्रथा को खत्म कर दिया है लेकिन ये सिर्फ़ अमीर और पढे-लिखे लोगो के बीच से कम हुई है लेकिन वहां अब भी बाकी है….लेकिन जो गरीब तबका है वो अब भी इस प्रथा में उलझा हुआ है…ये जाति प्रथा सबसे ज़्यादा तकलीफ़ दो वक्त देती है एक तो जब भगवान की पुजा होती है और दुसरे जब अपने बच्चों की शादी-ब्याह का वक्त आता है…. ये दोनों वक्त उस नीची ज़ात के इंसान को बहुत ज़्यादा तकलीफ़ होती है….पुजा के वक्त जब उसे पुजा करने से रोक दिया जाता है तो उसके दिल में एक बात यही आती है जब मुझे धर्म का अनुयायी होने के बाद भी मेरे भगवान की पुजा करने से रोका जाता है वो भी मेरी ज़ात की वजह से तो उस धर्म का पालन कर के मैं क्या करूगां….ज़ात को लेकर शादी करना ये तो अब मुसलमानों में भी सर उठाने लगी है मेरे रिश्ता भी इसी वजह से खत्म हुआ है….लेकिन ये पुजा वाली बात सबसे अहम है यही एक बात का सबसे बडा फ़र्क है क्यौंकि मुस्लिम और ईसाई दोनों अपने-अपने खुदा की ईबादत के वक्त कभी ज़ात और पैसा नही देखते है….नमाज़ के वक्त एक सफ़ में राजा भी होता है और उसका नौकर भी होता है और शहर का सफ़ाई कर्मचारी भी होता है…यही चर्च में प्रार्थना के वक्त होता है…


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