>दो दशकों से चला आया रहा है यह वाम- आतंकवाद / लाल-आतंकवाद क्यों नहीं दिखता ?

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कमजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति ने माओवादिओं के हौसले दिनोदिन बुलंद होते हीं जा रहे हैं . अभी -अभी टीवी पर खबर देखा तो दंग रह गया . अब तक रेल की पटरियां उड़ाने वाले माओवादिओं ने रेल को हीं बंधक बना लिया है . खबर में बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के झारग्राम में भुवनेश्वर राजधानी ट्रेन को पीसीपीए नाम के माओवादी संगठन ने रोक रखा है . माओवादियों की दलील है कि सरकार की ज्यादतियों के विरोध में ऐसा किया गया है और उन्होंने माओवादी सरगना छत्रधर  महतों की रिहाई की मांग की है  . अब कोई उनसे और दिल्ली में बैठे नक्सलियों -माओवादिओं को वैचारिक खुराक देने वालों से पूछेगा कि सरकार की कौन सी ज्यादती किसके खिलाफ है ? उन ज्यादतियों के जबाव इस तरह आम आदमी को बंधक बना कर देने का ठेका उन्हें किसने दिया है ? गरीबों ,मजदूरों ,किसानों को न्याय दिलाने के नाम पर आम जनता को निशाना बनाना क्या आतंकवाद नहीं  ? लोकतंत्र के चौथे खम्भों को अपने कन्धों पर ढ़ोने का दावा करने वाले दलाल बताएँगे कि उन्हें हिन्दू आतंकवाद दिखता है , इस्लामिक आतंकवाद दिखता है लेकिन  दो दशकों  से चला आया रहा है यह वाम- आतंकवाद / लाल-आतंकवाद क्यों नहीं दिखता ? क्यों माओवादियों /नक्सलवादिओं को समानता की लड़ाई का सिपाही बता कर उनके पक्ष में तमाम तरह की दलीलें दी जाती है ? अब , मीडिया को पक्षपातपूर्ण रवैया बंद करना होगा . क्या अब भी कुछ जानने को रह गया है ? कब तक  माओवादियों के नकली उद्देश्य के चक्कर में पड़ कर उनके कुकृत्यों को वैचारिक जामा पहनाते रहेंगे ये कलम के दलाल ?
 बाज़ार का  बिस्तर गर्म करने वाले  इन पत्र -अ -कारों  ,नेताओं ,सरगनाओं को बाज़ार से जंग की बातकरने का कोई हक़ नहीं बनता.
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