>अफजल तो फ़िर भी बच गया.

>मै अपने कुछ मित्रो के साथ मेरठ से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में समय काटने के लिए कुछ बातचीत का दौर चल पडा , तो यात्रा में केन्द्रीय सरकार के कार्यो की मीमांसा शुरू हो गई। बात शुरू हुई अफजल की,क्योकि हमने भी अफजल गुरु की फांसी के लिए कई प्रदर्शन किए थे। खूब जुलुस निकाले और खूब गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये भी कि अफजल को फांसी दो,फांसी दो। हुआ कुछ नही तो एक भड़ास थी मन में, निकालनी शुरू कर दी।
हमने बात को आगे बढाते हुए कहा कि,कितने साल हो गए लेकिन सरकार अफजल को फांसी नही दे रही है और अब तो सरकार ने हद कर दी है कि केन्द्र सरकार आतंकवादियों के परिवार की पेंशन बांधने जा रही है और भी बातें आगे बढ़ी। कसाब का जिक्र हुआ, सोहराबुद्दीन का हुआ। अंत में मैंने मित्रो के साथ एक निर्णय किया कि,हम भी बहरे प्रशासन व सोई हुई हिंदू जनता को जगाने के लिए कोई ऐसा कार्य करे कि हमारी बात को पूरा मीडिया जगत पूरे देश में पहुचाये।
निर्णय भी ले लिया कि भगत सिंह जी के अनुरूप हम भी तेज धमाके वाला व धुएँ वाला कोई बम फोडेंगे । जिससे कोई व्यक्ति आह़त न हो,तथा अपनी ग्रिफतारी देकर जनता को जगायंगे। अब बात थी कि बम कहाँ फोड़ा जाय, तो तय हुआ की दिल्ली तो जा रहे है क्यो न कनाट प्लेस पर ये शुभ कार्य किया जाय। अब दिल्ली पहुचकर बम की खोज शुरू हो गई। जल्दी ही दिवाली पर छोड़े जाने वाले दो पटाखे हमे प्राप्त हो गए। और कनाट प्लेस पर जाकर फोड़ डाले और इन्तजार करने लगे मीडिया का।
परन्तु एक आर्श्चय हुआ कि भारतीय पुलिस जो हमेशा घटना के काफी देर बाद पहुचती है वो मिडिया के लोगो से पहले पहुँच गई,और हमे ग्रिफतार कर लिया गया। हमने बड़ी शान से ग्रिफ्तारी भी दे दी। परन्तु थाने तक पहुचते पहुचते सारा नजारा ही बदल गया। लगता था की पूरी दिल्ली की सारी पुलिस वहां थी ,हमने सोचा कि हमारे आलावा कोई बहुत बड़ा आतंकी भी शायद इसी थाने मे है। परन्तु जो हुआ वो तो सोचा भी न था ,कि वो सारा इंतजाम तो हमारे लिए ही था।अब हमें महसूस होने लगा कि सारा मामला ही बिगड़ गया है।
पुलिस का कोई ऑफिसर हमसे पूछ रहा था कि और कहाँ कहाँ बम फोड़ने का प्लान है?कोन से आतंकवादी संगठन से जुड़े हो?तो कोई पूछ रहा था कि इससे पहले कहाँ कहाँ बम फोडे है।

अफजल को फांसी दिलाने का सारा सपना चूर-चूर होता दीख रहा था। परंतु मैंने थोडी सी हिम्मत दिखायी,और पुलिस को सारा नाटक समझाया कि हम तो सोई जनता को जगाने के लिए व बहरे शासन को अपना पक्ष सुनाने के लिए सरदार भगत सिंह के रास्ते पर चलना चाह रहे है। परंतु हमारी बात किसी ने भी नही सुनी।
एक सिपाही हमारे पास आया ,बोला बबुआ कोन आतंकवादी को फोलो कर रहे हो,बड़ा साब और मंत्री जी आपके बारे में बतिया रहे है तो मंत्री जी ही कहत रह कि इ लोगन तो ससुरा बहुत बड़े आतंकी का फोलो करता है। ससुरों को कल ही फांसी पर लटकवा दो।
पता नही रात कैसे कटी ?आँख लग ही नही पायी। सुबह सुबह एक नेताजी आए हाथ में समाचार पत्र लिए हुए थे। हमारे ऊपर फैक कर मारा कि तुम हिंदू आतंकवादी बाज नही आओगे। पहले अंग्रेजो को मार रहे थे अब हमे मारना चाहते हो। हमारी कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि हम करे तो क्या करे ? हमे न तो कोई फोन ही करने दिया गया, और न ही मीडिया से बात।
achanak केन्द्रीय सरकार भी हरकत मे आ गई। सरकार की मीटिंग हुई। मैडम जी ने सरदार को ऑर्डर दिया की, मन्नू इन आतंकवादियों को एक महीने में फांसी हो जानी चाहिए, चुनाव नजदीक है। काफी फायदा मिलेगा। मैडम के ही एक मंत्री ने कहा कि मैडम जी बुरा न मानो तो एक बात कहूं कि इन को फांसी देने के बाद हिंदू लोग अफजल के बारे में नही पूछेंगे। बैठक में एक मिनट को सन्नाटा छा गया । परंतु मैडम की जहरीली मुस्कान चेहरे पर फैली और बोली ये तो अच्छा ही है, लगे हाथ अफजल की फांसी की घोषणा भी कर देते है,मुसलमानों को ये तो कह ही देंगे की देखो हमने मुस्लिम आतंकी को फांसी देने से पहले चार हिंदू आतंकियों को फांसी पर चढाया है। बैठक में मैडम की जय जयकार होने लगी और मीटिंग समाप्त हो गई।
आर्श्चय, एक महीने में ही हमारे विरूद्ध सारे सबूत जुटा लिए गए।सारी राजनैतिक ताकत हमारे विरूद्ध खडी हो गई । समाचार पत्र से पता लगा कि हमारे बाद अफजल को भी फांसी हो रही है,तो मन में कही थोडी खुशी हुई कि चलो हमारा बलिदान ही सही लेकिन अफजल को फांसी तो हो रही है।
अब फाँसी वाला दिन भी आ गया । हमे फाँसी के तख्ते की और ले जाया जाने लगा । हम सोच रहे थे जेल के चारो और हमारी जय जयकार हो रही होगी। परंतु कोई इंसान तो इन्सान किसी जानवर कि भी आवाज नही आई। हाँ रास्ते में मिले एक दो कैदियों ने जरूर कहा कि साले चले थे भगत सिंह बनने,अब मरो।हम भी बेशर्मी से उनकी और देखते हुए निकल गए।
अब जैसे ही हमे फांसी पर लटकाया गया तो अचानक हमारी आँख खुल गई,और अपने को अपने बिस्तर पर पसीनो से लथपथ पाया। कुछ देर तो अपने को सँभालने में लगी। पर जैसे ही अपने सपने के बारे में सोचा तो बड़ा अफ़सोस हुआ कि आँख खुलने से अफजल तो साला फ़िर भी बच गया.

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