>चीन की चाल को समझ ले सरकार

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किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और समृद्धि के स्थायित्व में उसके पड़ोसियों का अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन महत्वपूर्ण योगदान होता है . क्योंकि पड़ोसी देश का सहयोगात्मक रवैया एक राष्ट्र को निश्चित रूप से मजबूती प्रदान करता है .अगर वह उदासीन हो तो भी एक देश बगैर नफे -नुक्सान के अपना हित दूसरो के साथ साध सकता है .लेकिन वही पड़ोसी यदि विरोधपूर्ण रवैया अपनाए तो उस देश के समग्र विकास का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है .और पड़ोसी देश खुद आतंरिक अशांति से जूझ रहा हो तो परेशानी और भी बढ़ जाती है .इन दिनों भारत को पड़ोसी देशों से उत्पन्न कुछ ऐसी हीं परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है .हमारे सामने एक ओर जहाँ चीन द्वारा पैदा की गयी परेशानियाँ है ,वहीँ दूसरी ओर खुद चरमपंथियों से जूझ पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न हो रही दिक्कतें हैं .
                                                                          चीन की बात करें तो , हमारे संबंध हमेशा से अविश्वासपूर्ण और तक़रीबन उदासीन से रहे हैं .हाल के दिनों में चीन का रुख भारत के प्रति कटुता और धमकी से भरा हो चला है .मसलन, सीमा पर सेना का युद्धाभ्यास ,अरुणाचल और लद्दाख क्षेत्र को लगातार अपने नक्शे में दिखाना आदि .पिछले कुछ दिनों में चीन ने एक कूटनीतिक अस्त्र के रूप में ‘दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को क्षति पहुँचाना’ को प्रयुक्त करना शुरू किया है .नेपाल में उसने मुलभुत निर्माण कार्यों में ठेका हासिल करना और आर्थिक मदद करना आरम्भ किया है ,साथ हीं मंडेरिन भाषा सिखाने वाले कई केंद्र भी बनाये हैं ,जो निश्चित तौर पर नेपालियों के दिलों से भारत को विलग करने की दूरगामी पहल है .इसके अलावा उसने श्रीलंका में भी बड़े स्तर पर पाँव पसारने का काम किया है ,चीन ने हनबनोता बंदरगाह के विकास और नवीनीकरण का काम हासिल किया ,हथियारों से जुड़े समझौते किये ,जो सीधे -सीधे भारत की कूटनीतिक क्षति है .म्यांमार के सैन्य शासन को अप्रत्यक्ष सहयोग भी उसके भारत विरोधी नीति का एक आयाम है .पाक-चीन के संबंध को लेकर कुछ कहने की जरुरत नहीं है .इस पूरे प्रहसन की पटकथा हीं भारत विरोधी साजिश की भाव-भूमि पर लिखी गयी है . वस्तुतः यही कहा जा सकता है कि हमें अपनी आतंरिक सुरक्षा ,आर्थिक विकास और सामरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत के समग्र विकास के लिए आँख-कान खुले रखने चाहिए .क्योंकि वैश्विक मंच पर हमारी सशक्त उपस्थिति पड़ोसियों से मजबूत और सुसंगत समीकरणों के बाद हीं संभव हो सकती है .
सुन्दरम आनंद {राजनीतिक विश्लेषक है }

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