>गूगल गणराज्य में प्रभाष जी के नायकत्व को चुनौती देने वाले तब भी पिछड़ गये थे

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प्रभाष जी के निधन से अब तक ब्लॉग जगत उनके शोक में संतप्त दिख रहा है . हर कोई अपने हिसाब से उन्हें याद कर रहे है . कुछ अखबारों की आलोचना में भी लगे हैं कि उनने प्रभाष जी के निधन को एकाध कॉलम में जगह देना  उचित नहीं समझा . अक्सर यही देखा है मैंने, मरने के बाद दिवंगत इंसान के प्रति लोगों की सहानुभूति बहुत बढ़ जाती है . आज ब्लॉग जगत में जो सहानुभूति की लहर चल रही है उस पर मुझे हंसी आ रही है . खास कर उनलोगों पर जो महीने भर पहले प्रभाष जोशी जी को अपने मनपसंद गालियों ,संघी -ब्राह्मणवादी-रुढिवादी  आदि , से संबोधित करते हुए उनपर कीचड़ उछल रहा थे , आज उन्हीं के ब्लॉग पर जोशी जी की प्रशंसा में गीत गाये जा रहे है ! या तो जोशी जी की पत्रकारिता को संकुचित वाद /विचार का ठप्पा लगाने पर आमादा ये मूढ़ तब गलत थे या आज गलत है ?  हाँ ,कुछ लोग ऐसे भी थे जो तब भी प्रभाष जी के साथ थे और आज भी है भले हीं उन्हें प्रभाष जी का लठेत कहा गया . गूगल गणराज्य में प्रभाष जी के नायकत्व को चुनौती देने वाले तब भी पिछड़ गये थे और अब तो बाल भी बांका नहीं कर सकते ! जो लोग गूगल सर्च का हवाला दे कर उनके नायकत्व को समाप्त बता रहे थे वो भूल रहे थे कि तब भी प्रभाष जी समर्थन में लिखा मेरा हीं आलेख पहला रिजल्ट था . प्रभाष जी दुनिया में सशरीर नहीं है तो क्या हुआ पत्रकारिता जगत में उनका नायकत्व हमेशा रहेगा  !
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