>प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान

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प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान पुरानी ना सही पर तीन बरसों में कार्यक्रमों के दौरान हुई कुछ एक मुलाकातों का असर गहरा जरुर है . दिल्ली जैसे महानगर में प्रभाष जी का ठेठपन मेरे जैसे कितने गंवई इंसानों को उनके करीब चुम्बक की भांति खींच लाता था .जनसत्ता हो या तहलका उनके आलेखों को पढ़कर और यदा-कदा टेलीविजन के कार्यक्रमों में उनको सुनकर खुद को उनसे जुडा हुआ पाता था .”प्रभाष जोशी ” यह नाम पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु साक्षात्कार के दौरान सुधीश पचौरी के मुख से सुना था .उन्हीं दिनों हिन्दी विभाग जामिया में दाखिला लिया तो जनसत्ता पढने की लत लगी और यहीं से शुरू हुआ प्रभाष जोशी और हमारा संबंध जो तक़रीबन एकतरफा होते हुए भी सीमाओं से परे था .एक पाठक की हैसियत से  देशकाल को लेकर जो समसामयिक सवाल  मन में कौंधते, उनका उत्तर ‘कागद कारे’ में उनको पढ़कर मिल जाया करता . इस अनोखे संवाद ने धीरे-धीरे जोशी जी को मेरे हर रविवार का साथी बना दिया था .जहाँ दिन भर जनसत्ता हाथ में लेकर उनके आलेख में मीनमेख ढूँढना मेरा काम था .ऐसा इसलिए की मुझे उनसे जलन होती थी आखिर हर कोई उनका नाम क्यूँ लेता है .मन हीं मन उनसे लम्बी बहस होती और उसी बहस से अपने विचारों की धार भी बनाता . लगभग ढाई बरस तक कागद कारे पढ़ते हुए उनकी साफगोई और वादनिरपेक्षता ने मुझे भी उनका प्रशंसक -समर्थक बना दिया था .हालाँकि आप मुझे उनका अंधभक्त नहीं कह सकते क्योंकि मेरा मानना है – ‘किसी विचारधारा या व्यक्ति के विचारों को अनुसरित करने और खुद को उसमें बाँध लेने से स्वयं का विकास  और नए विचारों का मार्ग स्वतः अवरुद्ध हो जाता है .’
प्रभाष जोशी को कुछ लोग गांधीवादी तो कोई समाजवादी और कुछ लोग तो ब्राह्मणवादी ,रुढिवादी पत्रकार बताते हैं . परन्तु मैं उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक पत्रकार जानता और मानता हूँ . एक पत्रकार को पत्रकार हीं रहने दिया जाए तो बहुत है ! प्रभाष जी सच लिखते थे और उनके सच को पढ़कर ,सुनकर उन्हें कभी वामपंथी,कभी समाजवादी ,कभी रुढिवादी ,कभी ब्राह्मणवादी तो कभी संघी भी मान लिया जाता रहा है . अभी दो महीने भी नहीं बीते जब रविवार में छपे उनके एक साक्षात्कार को लेकर उन्हें ब्राह्मणवादी और संघी कहा गया { ब्राह्मणवादी या संघी होना गलत है या सही अथवा अपमानजनक यह अलग सवाल है } .हिन्दी चिट्ठाकारी के एक गुट ने उनके खिलाफ बेसिर -पैर का अभियान चलाने की कोशिश की थी .जोशी जी के नाम पत्रकारिता की दूकान चलाने वाले शायद भूल गये कि प्रभाष जोशी को किसी भी वाद से नहीं जोड़ा जा सकता है .क्योंकि प्रभाष जी की नज़रों में नंदीग्राम और गुजरात में बहाया गया खून एक था .उनके लिए सत्ता मद में चूर इंदिरा गाँधी और बुद्धदेव भट्टाचार्य में कोई भेदभाव नहीं था . उनके शब्द बाण किसी की व्यक्तिगत आलोचना में नहीं बल्कि शोषण और अन्य के खिलाफ शोषितों के हक में चला करते थे . क्या ऐसे किसी पत्रकार को किसी भी वाद से जोड़ना उचित है ? पत्रकार शब्द और उसके मायने स्वयं में परिपूर्ण हैं इसलिए यह सोचने की जरुरत  है कि किसी पत्रकार बोला जाए और किसे नहीं ? जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं . प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा  था .
आज प्रभाष जी इस दुनिया को त्याग कर अनंत यात्रा पर जा चुके हैं . उनके निधन पर शोक प्रकट करने वाले लोगों  व अखबारों और ब्लॉग पर स्मृति लेख के जरिये संवेदना जताने वालों ने उनके आगे आखिरी शब्द लगा कर इस बात को उभारने की भरसक कोशिश की है कि अब कोई प्रभाष जोशी जैसा नहीं बनना चाहता है .अब कोई उनकी समृद्ध पत्रकारीय विरासत का दामन थामने को तैयार नहीं है .लेकिन क्या सच इतना अंधकारमय है ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ! कई नौजवान पत्रकार और पत्रकारिता के सैकड़ों छात्र उनकी इस विरासत से जुड़ने का ख्वाब पाल रहे हैं . ये वही लोग हैं जिनके बीच प्रभाष जी किसी न किसी कार्यक्रम में अक्सर आते और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं . 

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