>तो फिर अब नपुंसक जनता तैयार रहे

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देश की नीति-नियती निर्धारित करने वाली राष्ट्रीय राजधानी की गलियों में मंहगाई के खिलाफ गूंजते नारे नक्कारखाने में तूती की बोलती से अधिक कुछ और नहीं है। सशक्त विपक्ष के रूप में खुद को साबित करने के लिए भाजपा ने जनता की दुखती रग पर हाथ रखा है .आलू-प्याज ,आटा-दाल, तेल-पानी, बिजली-बस- मेट्रो की बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर दिल्ली बंद , भाजपा कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे, अनेक जगहों पर दुकाने और परिवहन सेवा ठप रही परन्तु क्या इसे बंद कहा जाना चाहिए? नहीं यह एक राजनैतिक दल का सफल अभियान जरूर है, पर बंद नहीं।
बंद से जनता नदारद रही। जीने के लिए आवश्यक हर वस्तु की कीमत सुरसा मुख की तरह बढ़ती जा रही है। महंगाई का रोना हर कोई रो रहा है। जब कुछ करने की बारी आती है तो मुंह छुपा कर घर में दुबक जाते हैं। क्या ऐसे अकर्मण्य नागरिकों को महंगाई के लिए सरकार को कोसने का हक है जो अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकते?
अकर्मण्यता या कर्म भीरूता का यह विषाणु तो सदियो से हमारे भीतर रहा है। जो मानव इतिहास में सबसे अधिक 1500 सालों तक पराधीन रहने का कारण है। अंग्रेजो से आजादी की लड़ाई के वक्त ९५% भारतीय सामान्य गुलामी की जिंदगी बसर कर रहे थे। 5 % लोग लड़ते और शहीद होते रहे तभी गांधी नाम एक उद्घारक आया जिसने उन कायरों को कलंक धोने लायक बना डाला। गांधी ने जब समझाया कि बगैर कुछ खोए सभा में बैठकर सड़को पर नारे लगाकर हमें आजादी पा सकते है तब ये चूहो की तरह बिलों से निकल-निकल कर गांधी सभाओं में,अहिंसक आंदोलनों में भागीदारी करने लगे। अपनी कायरता/नपुंसकता को सहिष्णुता / अहिंसकता/ दयालुता के चादर में लपेट कर आने वाली पीढी को अपने देशप्रेम का सबूत दिया गया।
आज परिस्थितियां और भी बदतर है। अपने ही चंद लोगों ने गुलाम बना रखा है हमें। हमारी जरूरतों की एक-एक चीज, हमारी शिक्षा, हमारी जीवनशैली, चंद उद्योगपतियों, जन प्रतिनिधियों और कुछ विदेशी दलालों (जिनमें मीडियाकर्मियों से लेकर नव एनजीओ चालक तक शामिल है) के अनुसार तय होती है। इनकी पकड़ सामाजिक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था पर इतनी सूक्ष्म है कि नंगी आंखों से एक बारगी देखने पर भी समझ पाना बेहद कठिन है।
लेकिन कुछ चीजें प्रत्यक्ष दिखती हैं जैसे महंगाई। महंगाई जैसी कुव्यवस्था से लड़ने का लोकतांत्रिक हथियार है बंद, चक्का जाम, धरना प्रदर्शन। आज जनता में इतना साहस भी नहीं बचा कि अपनी ही चुनी हुई सरकार से अपने प्रतिनिधि से महंगाई का हिसाब मांग सके। सरकार निकम्मी थी तो काम चल जाता था। भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई और सुरक्षा आदि मुद्दों पर विपक्ष जनता के साथ मिलकर सरकार का घेराव करती थी और सरकार को जनहित को प्राथमिकता देनी पड़ती। अब सरकार के साथ-साथ जनता निकम्मी हो चली है।
अपने हक की लड़ाई को राजनीति का हिस्सा समझ कर खुद को उससे अलग मानने लगी है। सरकार और विपक्ष के बीच बैटिंग-बॉलिंग हो रही है और फील्डिंग करने वाली जनता नदारद है। ऐसे हालात में लोकतंत्र का यह खेल ज्यादा समय तक सुचारू रूप से खेला जाना संभव नहीं है।
“ठेके’’ के इस युग में सरकार जिस तरह से सार्वजनिक उपक्रमो को निजी कंपनियों के हवाले कर रही है वैसे ही जनता ने अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों नेताओ को ठेके पर दे रखा है तो फिर अब नपुंसक जनता तैयार रहे…………….. किस चीज के लिए………….. यह तो वक़्त बताएगा।
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