"दया" के महासागर, "मानवता" के मसीहा, सुपर सेकुलर – एम. करुणानिधि (भाग-1) Karunanidhi, Secularism, Human Rights, Terrorism (भाग-1)

हम लोगों ने कई बार पुराने जमाने के किस्से-कहानियों में राजा-महाराजाओं तथा बादशाहों के बारे में पढ़ा-सुना है कि वे अपने जन्मदिन पर अथवा उनके माता-पिता या पितरों की पुण्यतिथियों पर राज्य की जनता को भोज देते थे और बन्दी बनाये गये कैदियों को रिहा कर दिया करते थे। ऐसे मौके पर प्रजा उनकी दयालुता और महानता के किस्से बढ़-चढ़कर बयान करती थी और धन्य-धन्य हो जाती थी।

आप सोच रहे होंगे कि इस बात का आज के प्रगतिवादी जमाने और लोकतन्त्र के राज में इसका क्या सम्बन्ध है, लेकिन है। आज भी करुणानिधि जैसे दया के सागर और मानवता के मसीहा कुछ ऐसा ही करते हैं। इनकी “मानवता” और दयालुता के किस्से वैसे तो अपार हैं लेकिन फ़िर भी वीरप्पन और प्रभाकरण को लेकर इनकी मानवता यदा-कदा टपक-टपक जाया करती थी। इन्होंने एक बार बयान दिया था कि “तमिल और तमिलों के हितों की रक्षा के लिये जो भी व्यक्ति काम करेगा मैं उसका खुले दिल से समर्थन करता हूं और इसीलिये श्रीलंका के टाइगर्स को उग्रवादी नहीं कह सकता…”। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में तमिलों के हितों की रक्षा में ये इतने आगे बढ़ गये थे कि वीरप्पन और प्रभाकरण को अपराधी मानने में भी इन्हें हिचक होती थी। बहरहाल, इसी करुणा और मानवता को आगे बढ़ाते हुए करुणानिधि ने अपनी दया का कटोरा इस्लामिक उग्रवादियों पर भी ढोल दिया है ताकि वे उपेक्षित महसूस न करें।

करुणानिधि की दया का यह महासागर अक्सर उनके कथित गुरु अन्नादुरै की पुण्यतिथि के दिन हिलोरें मारने लगता है, स्वर्गीय अन्नादुरै के जन्मदिन (15 सितम्बर) पर करुणानिधि की मानवता के सागर में ज्वार उठता है, और वे इस महान भारत के लोकतन्त्र, अदालतों, कानूनों को एक उम्दा लात जमाते हुए पुराने जमाने के बादशाहों की स्टाइल में तमिलनाडु की जेलों में बन्द कैदियों को छोड़ते चले जाते हैं (इस लोकतन्त्र ने ही उन्हें ऐसी बादशाहों वाली शक्ति दी है, ठीक वैसे ही जैसे कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मौत की सजा के बावजूद राष्ट्रपति नामक “रबर स्टाम्प” जिसे चाहे जीवित रख सकता है, जिसे चाहे मार सकता है, कानून-वानून की बात करना बेकार है…)।

करुणानिधि साहब ने सत्ता में लौटने के बाद अर्थात मई 2006 से प्रतिवर्ष अन्नादुरै के जन्मदिन पर खूंखार से खूंखार कैदियों को भी छोड़ना शुरु किया (2006 में 540 आजीवन कैद की सजा प्राप्त अपराधी तथा 2007 में 200 कैदी छोड़े गये, जबकि पिछले साल तो इनकी मानवता ऐसी हिलोरें मार रही थी कि इन्होंने 1400 कैदियों को ही छोड़ दिया। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इसके खिलाफ़ न्यायालय में याचिका दायर की, लेकिन आप हमारे देश की अदालतों के हाल तो जानते ही हैं, कुछ नहीं हुआ। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है, उधर “दया के सागर” करुणानिधि लगातार “हार्डकोर” अपराधियों को छोड़े चले जा रहे हैं, यह कितना कानून सम्मत है इसकी बारीक जानकारी तो नहीं है, लेकिन देखने में तो यह खुलेआम लोकतन्त्र और न्यायालय को लतियाने जैसा ही लगता है, लेकिन उनसे कोई सवाल-जवाब नहीं किया जा सकता (आखिर “तमिल अस्मिता” का सवाल है भई, और ये सज्जन केन्द्र में सरकार के एक प्रमुख घटक भी हैं)।

यह तो भगवान का शुक्र मनाईये कि वीरप्पन और प्रभाकरण नामक समस्याएं किस्मत से (या श्रीलंका सरकार के पुरुषार्थ से) समाप्त हो गईं और दोनों इतिहास में समा गये, लेकिन करुणानिधि की मानवता कम होने का नाम नहीं ले रही। हाल ही में उन्होंने अन्नादुरै की 101वें जन्मदिन पर 1998 के कोयम्बटूर के सीरियल बम विस्फ़ोटों के 10 आतंकवादियों को भी रिहा कर दिया (बादशाह जो ठहरे!!!)। हालांकि पिछले साल तक करुणानिधि ने इन इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ने में ना-नुकुर की थी, लेकिन शायद दो तमिल योद्धाओं(?) के मारे जाने के बाद और उनके निवास के सामने कुछ मुस्लिम महिलाओं द्वारा छाती पीट-पीटकर रोने-धोने से उनका कलेजा मानवता से भर आया होगा, और यह पुण्य कार्य इस वर्ष उन्होंने कर ही दिया, और सामाजिक न्याय, सेकुलरिज़्म, बराबरी का अधिकार, मानवाधिकार जैसे बड़े-बड़े शब्दों के पीछे छिपकर करुणानिधि ने अशफ़ाक शेख, शाहुल हमीद, मोहम्मद रफ़ीक, अब्बास अब्दुल जाफ़र, अब्दुल फ़ारुख, अब्दुल रहमान, अब्दुल रऊफ़, फ़करुद्दीन अली, अब्दुल वहाब और मोहम्मद इब्राहीम को 15 सितम्बर को रिहा कर दिया, जबकि सभी की कठोर सजा के कम से कम 2 साल बचे हुए थे।

तमिलनाडु में “सिमी” की गतिविधियाँ और द्रमुक का शतुरमुर्गी रवैया –

जैसा कि सभी जानते हैं, सिमी पर लगभग पूरे देश में प्रतिबन्ध लागू है। सिमी कई नाम धरकर अपने काम में लगा रहता है, तमिलनाडु में भी कई वर्ष पहले ही जिहाद मूवमेंट के नाम से एक संगठन खड़ा किया गया था, जिसके प्रमुख सूत्रधार थे पलानी बाबा और एसए बाशा। ये लोग सबसे पहले तब लाइमलाइट में आये थे, जब इन्होंने नवम्बर 1993 में चेन्नई स्थित संघ कार्यालय पर हमला करके 11 स्वयंसेवकों की हत्या कर दी थी। किसी भी द्रमुक या अन्नाद्रमुक सरकार ने इन अपराधियों को गिरफ़्तार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई और इन्होंने हिन्दू मुन्नानी नेता राजागोपाल की अक्टूबर 1994 में हत्या की, और पिछले 15 साल में तमिलनाडु और केरल में अल-उम्मा, सिमी और अन्य जेहादी संगठनों की गतिविधियाँ चरम पर पहुँच गईं, लेकिन करुणानिधि तो सेकुलर हैं और सेकुलर ही बने रहे और आगे भी रहेंगे।

आईये अब देखते हैं कि इस “दया के सागर” का मुस्लिमों के प्रति पिछला रिकॉर्ड कैसा है-

1996 के विधानसभा चुनाव में DMK उम्मीदवार सीटी दण्डपाणि और एम रामानाधन ने एक मुस्लिम बहुल इलाके में यह घोषणा की कि चुनाव जीतने पर वे इस इलाके से पुलिस की सभी चेक-पोस्ट हटवा देंगे… चुनाव नतीजों में उनके आगे होने की खबर मात्र से इलाके के मुस्लिमों ने सभी चेकपोस्टों पर हमला करके उन्हें तोड़फ़ोड़ दिया, इस हमले में दो कांस्टेबल भी घायल हुए थे… यहाँ देखें
(http://www.mrt-rrt.gov.au/docs/research/IND/rr/IND30613.pdf)

करुणानिधि की पार्टी का “गुपचुप गठबन्धन” तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कषगम से भी हुआ, 18 मई 1996 को मदुराई के मीनाक्षी अम्मन मन्दिर में जो ब्लास्ट हुआ उसके मुख्य आरोपी रहे TTMK के नेता नायना मोहम्मद, सैत साहब, रज़ा हुसैन और फ़खरुद्दिन।
http://www.assembly.tn.gov.in/archive/Resumes/11assly/11_01.pdf

8 फ़रवरी 1997 को तंजावुर में एक शक्तिशाली बम धमाका हुआ, जिसमें मोहम्मदिया चावल मिल में पुलिस ने बड़ी मात्रा में जिलेटिन छड़ें, अमोनियम नाइट्रेट, सल्फ़्यूरिक एसिड, डिटोनेटर और पिस्तौल बरामद किया था, उस केस में कोई प्रगति नहीं हुई http://www.thehindu.com/fline/fl1505/15050170.htm

कोयम्बटूर बम धमाकों की बात करें तो 14 फ़रवरी 1998 को दोपहर 3.50 से 4.50 के बीच 13 बम धमाके हुए जिसमें 45 व्यक्ति मारे गये और घायलों में 14 लोग बाद में अस्पताल में मारे गये जबकि 200 घायल हुए। इसके अलावा NSG ने कई जगह से बम बरामद किये जो कि फ़ट न सके। 70 किलो विस्फ़ोटकों से लदी एक कार भी रेल्वे स्टेशन के बाहर से बरामद की गई। (क्या यह सब रातोंरात हो गया? राज्य सरकार क्या कर रही थी? आदि सवाल पूछना बेकार है) पुलिस ने बाद में कोयम्बटूर के अन्दरूनी इलाके से अल-उम्मा सरगना एसए बाशा और अन्य 12 लोगों को पकड़ा।

जब मीडिया इन धमाकों के सिलसिले में एक मुस्लिम बहुल इलाके कोट्टामेदु गये तब महिलाओं ने उन्हें घेर लिया और कहा कि हमने अपने बेटों को जिहाद(?) के लिये समर्पित कर दिया है, मारे गये आतंकवादियों के शवों की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई और उस फ़ुटेज को चन्दा उगाहने के लिये खाड़ी देशों में भेजा गया।

इस बीच मार्च 2002 में इन बम धमाकों के मुख्य आरोपी केरल के अब्दुल नासेर मदनी को जयललिता सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया था और मामला कोर्ट में चल रहा था। मदनी को ज़मानत पर रिहा करवाने के कई प्रयास किये गये, इस वजह से तत्कालीन गृह सचिव मुनीर होडा को जयललिता के कोप का भाजन बनना पड़ा और उन्हें सस्पेण्ड कर दिया गया। 2 जुलाई 2005 को केरल के मुख्यमंत्री मदनी की बीवी से उसके घर पर मिलने पहुँचे (VIP है भई) और “मानवीय आधार पर” (जी हाँ, ये “मानवीय आधार” केरल के मुख्यमंत्रियों पर भी जमकर हावी है) मदनी को रिहा करवाने का आश्वासन दिया। 14 मार्च 2006 को भारत के संसदीय इतिहास की एक अद्वितीय घटना में केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों के मुख्य आरोपी अब्दुल मदनी को मानवीयता के नाते रिहा कर देने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

2006 में “दया के महासागर” करुणानिधि फ़िर से सत्ता में आ गये, मुनीर होडा को ही उन्होंने अपना सचिव नियुक्त कर लिया। तुरन्त TTMK के अध्यक्ष जवाहिरुल्लाह ने इनके पालतू चैनल “सन टीवी” पर एक इंटरव्यू देकर कहा कि मदनी को उनकी अस्वस्थता के कारण जल्दी से जल्दी छोड़ा जाना चाहिये। केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन (जी हाँ, वही जिन्होंने NSG कमाण्डो के पिता का अपमान किया था), कोयम्बटूर जेल में मिलने गये और उसे “नैतिक समर्थन” दिया (मानो मदनी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी हो) तथा कहा कि जल्दी ही उनकी रिहाई के प्रयास करवाये जायेंगे।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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31 Comments

  1. November 18, 2009 at 9:07 am

    इनके सेकुलर कारनामे सब जानते हैं. बस आँखे बंद किए रहते हैं. वोटों के लिए ये लोग किसी भी हद तक गिर सकते हैं. इस देश में सेकुलरी बिमारी केवल हिन्दूओं को ही क्यों लगती है वह पता नहीं… वैसे ये दक्षिणी नेता हिन्दू नहीं मानते अपने आपको. कई तो हिन्दूनाम धारी इसाई होंगे या फिर नास्तिक टाइप में कुछ.वैसे भी हिन्दू होना ओल्ड फैशनड है. यह बुखार अब बॉलीवुड में भी आ गया है. वहाँ अभिनेता – अभिनेत्रियाँ चर्च अधिक जाती हैं… यह लेटेस्ट फैशन है… या फिर एक बड़ी साजिश है.. ऐसे साजिश जिस पर आसानी से शक भी ना हो और बात भी बन जाए. वैसे मिशनरियाँ ऐसे कामों में "उस्ताद" है.

  2. November 18, 2009 at 9:24 am

    मुसलमान खामखा रोते है, सच्‍चर कमेटी रि‍पोर्ट बेकार है कि मुसलमान यहां दलितों से बदतर हैं, तुम्‍हारी झूठी रिपोटों से लगता है चारों तरफ मुसलमानों के मजे हैं, अरे दंगा अभिलाषी, मराठी समर्थक भगवान करे तेरी अभिलाषा कभी पूरी न हो,कभी अवध गये हो हम तो नहीं गये, परन्‍तु तुम गये होते तो ऐसी अभिलाषा कभी ना करतेअवधिया चाचा

  3. November 18, 2009 at 9:55 am

    लिख लिया हो अब चाचा-मामा जैसे संदेश वाहको से भी निपटों. 🙂

  4. November 18, 2009 at 10:23 am

    इन करुना महाशय ने देश के सारे कायदे कानूनों को धत्ता बताते हुए तीन बीबियाँ रखी है, ढेरो बच्चे है ! सारे के सारे बच्चे मंत्री बना दिए ! इन्हें और क्या चाहिए, देश जाए भाड़ में, देश की किसे फिक्र ?

  5. SANJAY KUMAR said,

    November 18, 2009 at 10:40 am

    In your blogs written last year , you justified the menaance created by Raj Thakrey and his goons directed against North Indians based on Anti-Hindi, Anti-North Indian stand of Karunanidhi and his supporters.I fail to understand, how does two independednt WRONGS(i.e. wrongs not directed against each other) make one RIGHT.

  6. Common Hindu said,

    November 18, 2009 at 11:16 am

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/– a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu- Hindu Online.

  7. rohit said,

    November 18, 2009 at 11:17 am

    i fully agree with sanjay kumar this person is fanatic.he doesnt has any work except pour petrol in fire. why does he not wright against corruption in mp bjp government.against MNS, shivsena. why?

  8. flare said,

    November 18, 2009 at 11:27 am

    Karuna-nidhi ?We have to think, why? all politician go in favor of muslim and Cristian only ? I know it is due to vote bank but what other factors?Finally what all we can do as small part of our contribution …… so that we can remove these problems faced by hindus ?

  9. rohit said,

    November 18, 2009 at 11:27 am

    but if we see other facet of coin he seems right and i do appreciate his home work which he has done for wrightin this post.

  10. November 18, 2009 at 11:37 am

    श्री रोहित,भ्रष्टाचार सभी जगह व्याप्त है चाहे वह आर्थिक हो या मानसिक. जहाँ तक भाजपा, संघ परिवार व शिवसेना का सवाल है, इनके विरूद्ध लिखने वालों की तो एक पूरी जमात है. परंतु श्री चिपलूनकर जिन "महाशयों" की पोल खोलते हैं उनकी कारगुजारियों पर लिखने वाला कोई नहीं मिलेगा, या इक्का दुक्का ही होगा. इसलिए चिपलूनकरजी के कार्य को कमतर आँकना या इसे किसी धर्म विशेष से जोड़कर देखना गलत है. अच्छा लगा कि आपने यह जोड़ा कि इनका "होमवर्क" बढिया होता है. निसंदेह वह बढिया ही होता है तभी मत विरोधी तर्कपूर्ण विरोध दर्ज नहीं करवा पाते और "तु तड़ाक" पर उतर आते हैं. जहाँ तक मेरी समझ है चिपलूनकरजी मनसे जैसी पार्टियों के समर्थक कतई नही है और इनके खिलाफ लिखते भी रहते हैं.

  11. SANJAY KUMAR said,

    November 18, 2009 at 12:06 pm

    No doubt Karunidhi along with his mentors like Periyar, Annadurai other Justice Party leaders were Anti-Hindu.Periyar and Karunanidhi (He was young then) in late 1940 beaten Lord Rama idol with Chappals and they had taken a procession of Lord Ganesha garlanded with shoes.He dabbed all hindu gods as an aggressor to Dravidian culture.Periyar and Karunanidhi opposed imposition of Hindi as they dabbed it as direct decendednt of Brahminical language Sanskrit.In fact name of one of the son of Karunanidhi is STALIN that reflects his mentality.Such ideology can never be appreciated.The very pupose of writing my earlier mail was that last year one full blog of Mr. Chiplunkar (Mr. Chiplunkar you remember that blog or you want me to give link of that blog, JANTA KI MEMORY ITNI BHI CHHOTI NAHI HAI) was devoted to justifying activities of Thakreys based on ideology (if at all this can be called as ideology)of Karunanidhi. Whatever may be your school of thought, if are writing to public, be consistent in your thinking and ideology.

  12. November 18, 2009 at 1:22 pm

    Dear Mr. Sanjay Kumar,As I have already said, I am not in favour of Raj Thakre and many times in many comments I have criticized his policies too. In my last year's blog also (which you are referring) my stand is clear that "Raj Thakre has pointed out correct problem, but his attitude and way to tackle the problem is wrong". So kindly again go through my that blog. If Marathi people is in favour of Raj Thakre, he would get more seats, but a common Marathi people doesn't like this type of Goons, even Bal Thakre in his old days is not popular only because of his Pro-Marathi stand, but various other reasons, and still he managed to get power only once and that too with the help of BJP. Just compare the Karunanidhi's Anti-Hindi agitation and Raj Thakre's Anti-Hindi agitation, you will feel the difference between Tamils and Marathis. I am sorry to write in English, but your comment is in English so I have to reply it in your language… 🙂 My languages is Hindi first and then Marathi and then English… 🙂

  13. SANJAY KUMAR said,

    November 18, 2009 at 2:15 pm

    If you stick to stand cited in first paragraph of your reply, I have absolutely no difference of opinion with you.However, in one of your post appeared last year you justified Thakreys Anti-hindi stand based on that of Karunanidhi's (Even Thakreys used to do so), even though their reason for opposition are entirely different (You are absolutely right).Karunanidhi opposes Hindi, because it is direct decendent of Bramhinical language Sanskrit and he cast it as a Aryan language (Even Marathi comes in that definition), whereas Thakreys opposes becuse it is the language of Bhaiyyas ( For me "Bhaiya" word denotes mark of respect for Thakreys it is derogatory word for North Indians). In past both Thakereys and Karunanidhi opposed each other for different reasons, ironically, whenever they have to oppose Hindi, they come together.Only way they had difference in opposition of Hindi is that followers of Karunanidhi used to blaken the signboard written in Hindi, whereas followers of Thakreys donot ( In fact they cannot do, because like Hindi, Marathi is also written in Devanagari script, it is diifcult to distinguish between Hindi Signboard and Marathi Signboard).Any way my reply is not directed against Marathi or Tamil community, in fact based on my personal experience, I found both communities most civilised in the country ( my personal experience only , no data to support), as I got oppertunity to stay In Maharashtra as well as Tamilnadu for long period, ofcourse, like a sensible citizen of our country I find my duty to expose those black sheeps present in the civilised communities.I have different reason of writing in English in your blogI am not writing in HINDI because many a time you had written about dominance of Hindiwallah and they effort to impose Hindi (Infact one of your article had appeared in popular Hindi magazine "SARITA").So I donot want to be counted by you in those kind of people .I am quite comfortable in writing in Marathi and I have absolutely no reservation in writing in Marathi, however, the reason for not writing is that majority of the followers of this blog may not understand Marathi language.English is the only language left, which I expect majority of followers of blog may understand apart from Hindi.Any way if we are committed to restructuring of nation, let us do away with ranking of languages as No. 1 , No. 2 , No. 3……

  14. November 18, 2009 at 2:53 pm

    आपके लेख बहुत अच्छे होते हैं. नकली सेकुलर लोगों की पोल खोल बहुत कम लोग ही कर रहे हैं अत: मेरी ओर से शुभकामनायें.मुझे एक कंफ़्यूजन है: भाजपा जो कि अपने आप को अच्छी पार्टी का नाम देती है वो क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली शिवसेना के साथ चुनाव लड़ती है? राज ठाकरे तो इसी शिवसेना के एजेंडे की कार्बन कापी है ना? फ़िर क्यों भाजपा शिवसेना को समर्थन देती है? इसका तो अर्थ यही हुआ कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस दोनो ही सत्ता के लिये वोट बैंक के पीछे पड़े हैं. एक मुस्लिम वोट बैंक के लिये दूसरा हिंदू(पर हिंदूओं को वोट बैंक उतनी आसानी से नही बनाया जा सकता है, हां मुसलमानों के खिलाफ़ आग उगलने वाला हिन्दुत्व, थोड़ी मात्रा में हिन्दू वोट बैंक जरूर बना सकता है) या फ़िर मराठी वोट बैंक (और यही बात शायद मराठी वोट बैंक पर भी लागू होती है, शायद इसीलिये शिवसेना-भाजपा गठबंधन हार गया).मुझे राजनीति के क्षेत्र का पूरा ज्ञान नही है और राजनीति में आप मेरे से ज्यादा जानते हैं अत: इस बारे में मैं आपके विचार जानना चाहूंगा.

  15. November 18, 2009 at 3:16 pm

    अंकुर भाई… आपने कहा "…हिंदूओं को वोट बैंक उतनी आसानी से नही बनाया जा सकता है…" इसी में बहुत कुछ निहित है, ठीक इसी तरह मराठियों को भी वोट बैंक नहीं बनाया जा सकता। अब आते हैं आपके प्रश्नों पर – भाजपा शिवसेना के साथ काफ़ी समय से है, जब शिवसेना मराठी के मुद्दे पर इतनी संकीर्ण नहीं थी तब से। राजनीति में गठबन्धन करना कई बार मजबूरी भी होती है… यदि भाजपा-सेना अलग-अलग लड़ते तो कभी भी सत्ता में नहीं आ पाते… और सत्ता में आने के बाद उन्होंने हिन्दुओं और महाराष्ट्र के भले के लिये कुछ नहीं किया, सो बाहर कर दिये गये। इस चुनाव में भी महंगाई, किसानों की आत्महत्या, मुम्बई हमले के बावजूद लोगों ने मजबूरी में कांग्रेस को चुना क्योंकि कोई विकल्प नहीं था। जब भाजपा को दिल्ली में सत्ता मिली थी तब उसने कई पार्टियों के साथ गठबन्धन किया था, लेकिन अपना मूल स्वभाव छोड़ देने तथा कन्धार प्रकरण की वजह से उसके परम्परागत मतदाता उससे नाराज़ हो गये। भाजपा को छोड़कर सभी पार्टियों को मालूम है कि हिन्दू कभी वोट बैंक नहीं बन सकते इसलिये हमेशा मुसलमानों, दलितों और इसाइयों के पक्ष में बोलते-करते-देखते रहते हैं, और यह ऐसा ही चलेगा, जब तक "हिन्दू" एक वोट बैंक में परिवर्तित न हो जायें, या कम से कम ऐसा आभास तो दें… लेकिन ऐसा नहीं हो रहा तथा नकली सेकुलरिज़्म फ़ल-फ़ूल रहा है… और इसका खामियाज़ा कश्मीर से कन्याकुमारी तथा मुम्बई से गुवाहाटी तक हिन्दू ही भुगत रहे हैं…। फ़िर भी हिन्दुओं को संगठित करने के प्रयास तो करने ही होंगे… और मेरा ब्लॉग, इस वृहत कार्य में चींटी बराबर ही सही योगदान दे रहा है…

  16. November 18, 2009 at 4:38 pm

    भाग २ का इन्तज़ार

  17. RAJENDRA said,

    November 18, 2009 at 4:44 pm

    likhte rahiye chiplunkar aapke hosle se bhonkne walon ko bhi apna kaam karne ki yaad bani rehti hai

  18. November 18, 2009 at 4:48 pm

    जब तक हिन्दुओं को सेकुलरवाद के नाम पर अफीम देकर सुलाने के लिए मीडिया ज़िंदा रहेगा. इस देश में हिन्दुओं पर दमन करने वाली ताकतें राज करती रहेंगी. और मुलायम, मायावती, पासवान, आठवले, करुणानिधी, कम्युनिस्ट, कोंग्रेस, लालू, देवगोडा, जैसे तुगलक और तैमूरलंग पैदा होंगे. दरअसल हिन्दू प्रजा के असली दुश्मन तो यह सेकुलर ही हैं. जो सचाई पर पर्दा डालकर सुलाए रखने को प्रतिबद्ध हैं. ऐसे में जन-जागरण का आपका प्रयास नि;संदेह सराहनीय है.

  19. November 18, 2009 at 4:58 pm

    सुरेश जी मुझे अब ये लगानेलागा है की सेकुलरों के पाप का घडा जल्दी भरनेवाला है | घडा भरते ही इन सेकुलरों का काम तमाम होनेवाला है |हो सकता है हिन्दुओं की शांति किसी आंधी आने से पहले की शांति का सूचक हो ? बहरहाल हमें सेकुलरों को बेनकाब करते रहना है |

  20. November 18, 2009 at 5:11 pm

    @sanjay kumar ji, I have been reading your comments for last couple of months. And seems to me (I might not be 100% right, again its my personal opinion) that you never appreciate the writings which truly expose seculars, Christian missionary. Instead, you cleverly say the language that lead to think me that you are not real ‘Sanjay Kumar’ something else which is unknown to us. If you remember I have asked to reveal your real identity as a friendly but you never interested.Sorry, since your profile does not have e-mail or your photo or any identity so I have to write it here.

  21. November 18, 2009 at 6:24 pm

    ये बात तो साफ ही हो गयी कि कितने बड़े मानवता के मसिहा है करुड़ानिधि।

  22. November 18, 2009 at 7:07 pm

    भाऊ एक लाईन मे कहता हूं किसिको बुरा लगे तो लगे,अंधा बांटे रेवड़ी अपन-अपन को देय,या,अंधा पीसे,कुत्ता खाये।

  23. November 18, 2009 at 7:12 pm

    राकेश जी ने नब्ज पकड़ी है , ये तो शतप्रतिशत कोई फर्जी हीं है , फिर भी इनको इनके प्रश्नों का अच्चा जबाव उन्हीं की भाषा में मिला है चिपलूनकर भाई से ……………… करूणानिधि के बाद नितीश जी का भी नंबर लगाइए जरा …….अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी खोल रहे हैं किशनगंज में ! पहले एक नालंदा था उसको तो संभाल नहीं पाए ,एक भी आइआइती / एम्स /आइआइएम जैसा संसथान खोलने में जनम बीत जायेगा उनका लेकिन एएमयू का केम्पस खोल के ही दमलेंगे …… भले तबतक नितीश जी की लुटिया दुबे पर सरकार aएएमयू तो फिर भी बनेगा कहे की नितीश जायेंगे तो लालू आयेंगे बहुत हुआ और भाजपा आ भी गयी तो यहाँ भी सत्ता पाते ही मुस्लिम वोट बैंक का ख्याल आने लगता है !अब इ सब बात का एकही इलाज है वो है मुस्लिम जनता सच को समझ ले की एएमयु के मदरसे से पढ़कर उसका कल्याण नहीं होने वाला है .अगर इतना ही चिंता है नितीश -मुलायम-पासवान आदि को तो सर्वसाधारण के कॉलेज /स्कूल में व्यवस्था क्यों नहीं ठीक करते ? वहीँ एक भारतीय होने के नाते हिन्दू-मुस्लिम सब पढेंगे .

  24. mahashakti said,

    November 19, 2009 at 3:01 am

    ये तो घडि़याली ऑसू बहने के बहुत महिर खिलाड़ी है, यही करूणानिधि भाजपा के साथ थे आज सोनिया के साथ, कोई नीति नही है इनकी।

  25. SANJAY KUMAR said,

    November 19, 2009 at 5:29 am

    Rakesh Singh Ji,Jairam Viplavji,You have every reason to doubt my identity.There is no reason to doubt my intentionsIn fact, being a "Jagrut Hindu" I cannot tolerate any injustice with the Hindu Society, whether it done by Insiders or that by Outsiders.You read my reply carefully, I supplemented Mr. Chiplunkar by providing more details and activities of Karunanidhi.Rakesh Singhji, I am surprised that you are doubting my intention, it was me, who in reply to one of your post has taken Muslim Separationsist for a task and thoroghly exposed them and they could not get answer for that.But, whenever, I find any ASMITA of "Hindi, Hindu , Hindustan " in question I donot spare any one.In fact I objected even Mr. Chiplunkar for certain unpleasent remarks against our Holy Rivers.

  26. November 19, 2009 at 7:24 am

    आपका हर आलेख अपने आप में पूर्ण होता है. और ऐसा ही करुणानिधि-I के मामले में भी है. फिर भी भाग-II की प्रतीक्षा रहेगी.करुणानिधि हो या जयललिता, या संत राजशेखर रेड्डी, या अछूतानंदन, या फिर मौलाना मुलायम या कोई और !! ये सारे के सारे वो कलुषित मानसिकता वाले लोग हैं, जिन्हे सत्ताप्राप्ति के लिए किसी भी हद तक गुजरने से कोई ऐतराज नहीं।

  27. cmpershad said,

    November 19, 2009 at 9:16 am

    हमारे देश में यही सब तो हो रहा है … पुलिस जी-जान लगा कर अपराधी तत्वों को पकड़ती है और राजा लोग अपने गुर्गों को छुडा लेते हैं। यही कारण है कि हमारे पुलिस विभाग का मोरेल डाउन हो गया है। जब छोड़ना ही है तो पकडे क्यों- यह मानसिकता आ गई है।

  28. November 19, 2009 at 11:46 am

    राज ठाकरे क्या गलत कर रहा है, पहाड़ पर कभी वही हुआ करता था. तमिलनाडु में भी वही किया गया. हिमाचल में, कश्मीर में, देश के कई अन्य राज्यों में दूसरे राज्य का व्यक्ति जमीन नहीं खरीद सकता. यह सब क्या है?? सब ओछी राजनीति. अगर करुणा करुणा बरसाकर वोट पैदा कर रहे हैं तो राज मार-कुटाई कर. दूसरी बात कि क्या हालात हैं जिनके चलते पुरबिये (अन्यथा न लें) अपना घर-बार छोड़कर दूसरे प्रान्तों में जा रहे हैं. मानवीय श्रम को इतना सस्ता कर डाला इन…………. ने. कौन अपना घर-बार छोड़ना चाहता है. हिन्दू तो बेवकूफ है और रहेगा जिस दिन अकल आयेगी तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. जो असल हिन्दू अपने आपको कह रहे हैं मुझे उन पर संदेह होता है.

  29. SANJAY KUMAR said,

    November 19, 2009 at 12:37 pm

    "Bhartiya Nagrik _Indian Citizen " you have rightly indicated towards the problem.Not only Kashmir, Himachal Pradesh, A citizen from other state cannot buy land in Sikkim, Arunachal Pradesh, Jharkhand (Tribal Land), Dadra & Nagar Haveli, Daman etc. that all due to government policy of appeasing certain section of people.On the other hand, every one is welcome buy land in Bihar and Uttar Pradesh.You are right, Purabia Hindu were fooled by their leaders (those Crooks, Goons and Buffons as a result they are still undergoing painfull process of migration.The penalty of the migration is their gross humiliation at every stage.Unjustified punishment for the migration is their religion (read Hinduism), Festivals, Customs , language all were put into question and looked down.They were never treated as co-religionist, they were warned against celebrating their Hindu festivals.Their language once a symbol of National pride is now looked down as a language of idiots (their version).Cultural humiliation is not the solution of Economic problem, i.e. what is not understood by Thakreys.You first sentence….Thousands of wrong cannot make one right.Somebody is beating you in your helplessness stage, that does give me right to beat you up." If one's house is not locked, that does not give rights to other to steal the house".If your last sentence is referred to me "What makes you to have such doubts".

  30. मनुज said,

    November 20, 2009 at 4:37 pm

    द्वितीय भाग का बेसब्री से इंतज़ार है..बहुत बढ़िया सुरेश जी. लिखते रहिये…

  31. November 22, 2009 at 11:56 am

    आपकी बात में दम हैं……


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