>विरासत

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गर्मियों की एक दोपहर गर्म हवाओं के थपेड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए दरवाजे खिड़की बंद कर बैठी थी ,कि दरवाजों कि संध को रास्ता बना कर एक आवाज़ भीतर तक घुस आयी ,घी लिलो-घी लेलो.अलसाई दुपहरी में ये कौन आ गया ,बुदबुदाते हुए थोड़ी सी खिड़की खोल कर बाहर झाँका ,तो हाथ में एक छोटी सी मटकी पकडे ,लहंगा पहने ,एक औरत को खड़े देखा.बाई सा घी ले लो.चोखो घी है, हाँथ को बन्यो ,उसने कहा.घी तो चाहिए ही नही ,इसलिए उसे टरकाने कि गरज से कहा, नही हम घी नही लेते घर पर ही बनाते है,अभी जाओ.अरे बाई देखि लो घर को बन्यो चोखो घी है.पैसा कि जरूरत है काम आयेगो.अब तक मेरा आलस छूट गया था इसलिए उस के बारे में और पता करने कि गरज से मैंने पूछा कहाँ से आयी हो?राजस्थान से आयी हूँ बाई .यहाँ ढोर चराने आए है .एक बार घी देख लो ,चोखो लगे तो ले लीजो.उसके सरल आग्रह को मैं इनकार न कर सकी और गर्म थपेड़ों कि परवाह न करते हुए दरवाजा खोल के बाहर आ गयी.मटकी में देखा करीब एक किलो घी होगा .कितने का है ?नही लेना था फिर भी पूछा .एक सेर है पचास और दस रूपया दे दीजो। अब चौकाने कि बारी मेरी थी एक किलो घी आधा किलो कि कीमत में ? पर ये तो एक किलो है,इसकी कीमत तो एक सौ बीस रुपये होनी चाहिए.गाँवों में आधा किलो को एक सेर कहते है इसलिए ये कम कीमत लगा रही है.पर उसकी सरलता ने मुझे मोह लिया था ,मैं नही चाहती थी कि वो ठगी जाए इसलिए कहा ,ये तो एक किलो है इसकी कीमत कम क्यो बता रही हो ?पर मेरी खड़ी बोली उसके ज्यादा पल्ले नही पड़ी,तब अपनी भाषा को तोड़-मरोड़ कर उसे समझाया इतने घी के सौ ऊपर बीस रूपया लेना.अब उसे कुछ समझ आया तो बोली ,ना बाई म्हारी सास ने गाँव से आते समय बोल्यो थो ,सहर में नी मिले तो भूखो राइ लेजो पण बेईमानी को पैसो मत कमाजो ,यो घी तो एक सेर है नि तुम तो पचास ऊपर दस रूपया दी दो,इतना कहते हुए उसने वो घी कि मटकी मेरे हाथ में पकड़ा दी.और मैं अवाक् खड़ी ये समझने की कोशिश करती रही कि ६० रुपये में घी के साथ-साथ किस सरलता से संस्कारों कि कितनी बड़ी विरासत भी वो मुझे दिए जा रही है.

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