>ग़ज़ल

>उल्फत की तमन्ना का शायद यह सिला है,
हर शख्स ही दुनिया का अब हमसे खफा है.

गम और उदासी  का कुछ हॉल ही न पूछो,
हम कह न सकेंगे कि सब उनका दिया है.

अब छोड़ गए हो तो, मुड़ मुड के यूं न देखो;
इस ज़ख़्म पे खंजर तो पहले ही चला है.

क्या उनको बतायेंगे, क्या उनसे छुपायेंगे;
अब दिल का यह आलम तो बस में न रहा है.

कोई लम्हा भी न गुज़रा, जब याद न आये तुम;
हर वक्त ही इस दिल को, यादों ने डसा  है.

जिस पे भी भरोसा था कि साथ निभाएगा;
उसने ही साथ छोड़ा, बेगाना हुआ है.

क्या मैंने गंवाया है, क्या इश्क में पाया है?
पूछो न कि उल्फत में मैंने क्या लिया है ?
                              –रेक्टर कथूरिया
(आकाशवाणी जालंधर से १६ मार्च १९८५ को
प्रसारित कविता पाठ में से )

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